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General Studies II

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Previous Year - 2012

Question
35 out of 80
 

लोकतंत्र के अधिकांश हिमायती भी यह सुझाने में बल्कि वाक्संयम बरतते रहे हैं कि लोकतंत्र स्वयं ही विकास को और समाज-कल्याण-संवृद्धि को बढ़ाता है- उनकी प्रवृत्ति इन्हें अच्छे किन्तु सुस्पष्टतः अलग और व्यापक रूप से स्वतंत्र लक्ष्यों के रूप में देखने की हुई है। दूसरी ओर, लोकतंत्र के निंन्दक जिसे लोकतंत्र और विकास के बीच गम्भीर तनावों के रूप में देखते हैं, उस पर अपना निदानात्मक विचार व्यक्त करने के लिए काफी इच्छुक प्रतीत हुए हैं, फ्मन बनाइए, आपको लोकतंत्र चाहिए, या इसकी जगह, आप विकास चाहते हैं- बहुधा इस व्यावहारिक विभाजन वाले सिद्धान्तवादी, कम-से-कम प्रारम्भ में, पूर्वी एशियाइ्र देशों से आए, और जैसे-जैसे1970 वे 1980 के दशकों के पूरे दौर में बाद में भी- ये अनेक देश लोकतंत्र का अनुसरण किए बगैर आर्थिक विकास के संवर्धन में अत्यधिक कामयाब होते गए, उनके इस मत का प्रभाव बढ़ता गया है।

इस मुद्दों के सम्बन्ध में हमें खास ध्यान इन दोनों अंतर्विषयों पर देना पड़ेगा कि विकास किसे कहा जा सकता है और लोकतंत्र की व्याख्या क्या है (विशेषकर मतदान और जनविवेक की अपनी-अपनी भूमिकाओं के संदर्भ में), विकास का मूल्यांकन, लोग जो जीवन जी पाते हैं और जिस वास्तविक स्वतंत्रता का वे उपभोग करते हैं, उससे पृथक् नहीं किया जा सकता। विकास, विरले ही, सुविधा की निर्जीव वस्तुओं की संवृद्धि के आधार पर देखा जा सकता है, जैसे कि GPN (या व्यक्तिगत आमदनी) या औद्योगीकरण में वृद्धि-चाहे ये वास्तविक लक्ष्यों के साधनों के रूप में कितने ही महत्वपूर्ण हों, इनका मूल्य इस बात पर निर्भर करता है कि ये सम्बन्धित लोगों की जिन्दगियों उनकी स्वतंत्रता पर क्या प्रभाव डालते हैं, जो कि विकास के विचार का केन्द्रबिदु होना ही चाहिए।

यदि विकास को, अपेक्षाकृत अधिक व्यापक ढंग से, मनुष्य की जिन्दगियों पर संकेन्द्रित कर समझा जाए, तो यह तत्काल स्पष्ट हो जाता है कि विकास लोकतंत्र के बीच के सम्बन्ध को अंशतः उनके मूलभूत संयोजन के आधार पर देखा जाना चाहिए कि मात्र उनके बाह्य सम्पर्कों के द्वारा, यद्यपि अक्सर यह सवाल भी पूछा जाता रहा है कि क्या राजनैतिक स्वतंत्रताएं एवं लोकतांत्रिक अधिकार विकास के संघटक अवयवों में से हैं। विकास हेतु इनकी प्रासंगिकता अप्रत्यक्षतः GPN की अभिवृद्धि में उनके योगदान के द्वारा प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं होती।


लोकतंत्र विकास के मध्य मूलभूत संयोजन का क्या निहितार्थ है?

A इनके मध्य सम्बन्ध को बाह्य सम्पर्कों के माध्यम से देखा जाना चाहिए
B केवल राजनैतिक नागरिक अधिकार ही आर्थिक विकास की ओर ले जा सकते हैं
C राजनैतिक स्वतंत्रताएं एवं लोकतांत्रिक अधिकार विकास के सारभूत तत्त्व हैं
D ऊपर दिए गए कथन (a), (b) (c) में से कोई भी कथन इस संदर्भ में सही नहीं है

Ans. C

Previous Year - 2012 Flashcard List

80 flashcards
1)
निम्नलिखित तीन परिच्छेदों को पढ़िए और उसके उपरान्त प्रत्येक परिच्छेद के आधार पर दिए गए प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए इन प्रश्नांशों के आपके उत्तर केवल परिच्छेदों पर ही आधारित होने चाहिए। शिक्षा का, निस्संदेह, एक महत्वपूर्ण कार्यपरक, नैमित्तिक तथा उपयोगितावादी आयाम होता है। यह तब उद्घाटित होता है जब कोई इस तरह के प्रश्न पूछे, जैसे कि ‘शिक्षा का प्रयोजन क्या है? बहुधा इसके उत्तर होते हैं, ‘रोजगार/ऊर्ध्वगामी गतिशीलता के लिए अर्हताएं अर्जित करना’, और ‘व्यापक/उच्चतर (आय के संदर्भ में) अवसर प्राप्त करना’, ‘राष्ट्रीय विकास हेतु विविध क्षेत्रें में प्रशिक्षित जन-शक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति करना’, परन्तु अपने गहनतम अर्थ में शिक्षा नैमित्तिक नहीं है। कहने का आशय यह है, कि इसका स्वयंमात्र से परे औचित्य नहीं बताया जा सकता, क्योंकि यह औपचारिक कौशलों या कतिपय निश्चित वांछित मनोवैज्ञानिक-सामाजिक गुणों के अर्जन की ओर ले जाती है। यह स्वयं में ही समादरणीय है। इस तरह शिक्षा कोई वस्तु नहीं है। जिसे अर्जित कर या जिससे स्वयं को सम्पन्न कर, तत्पश्चात् उसका इस्तेमाल किया जाए, बल्कि यह व्यक्तियों तथा समाज के लिए अपरिमित महत्त्व रखने वाली प्रक्रिया है, यद्यपि इसमें अपार उपयोग-मूल्य हो सकता है और होता है, अतएव शिक्षा विस्तारण एवं रूपांतरण की प्रक्रिया है, विद्यार्थियों को इंजीनियरों या डॉक्टरों में बदलने के अर्थ में नहीं, बल्कि मन को विस्तारण एवं परिवर्तन-सृजन, पोषण एवं आत्म-विवेचनात्मक बोध का विकास तथा विचार की स्वंतत्रता प्रदान करने के अर्थ में, यह नैतिक-बौद्धिक विकास की आंतरिक प्रक्रिया है। आप शिक्षा के ‘नैमित्तिक’ दृष्टिकोण से क्या समझते हैं?A शिक्षा अपने प्रयोजनों में कार्यपरक व उपयोगितावादी हैB शिक्षा का उद्देश्य मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति हैC शिक्षा का प्रयोजन मानव बुद्धि को प्रशिक्षित करना हैD शिक्षा का उद्देश्य नैतिक विकास की प्राप्ति है
2)
निम्नलिखित तीन परिच्छेदों को पढ़िए और उसके उपरान्त प्रत्येक परिच्छेद के आधार पर दिए गए प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए इन प्रश्नांशों के आपके उत्तर केवल परिच्छेदों पर ही आधारित होने चाहिए। शिक्षा का, निस्संदेह, एक महत्वपूर्ण कार्यपरक, नैमित्तिक तथा उपयोगितावादी आयाम होता है। यह तब उद्घाटित होता है जब कोई इस तरह के प्रश्न पूछे, जैसे कि ‘शिक्षा का प्रयोजन क्या है? बहुधा इसके उत्तर होते हैं, ‘रोजगार/ऊर्ध्वगामी गतिशीलता के लिए अर्हताएं अर्जित करना’, और ‘व्यापक/उच्चतर (आय के संदर्भ में) अवसर प्राप्त करना’, ‘राष्ट्रीय विकास हेतु विविध क्षेत्रें में प्रशिक्षित जन-शक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति करना’, परन्तु अपने गहनतम अर्थ में शिक्षा नैमित्तिक नहीं है। कहने का आशय यह है, कि इसका स्वयंमात्र से परे औचित्य नहीं बताया जा सकता, क्योंकि यह औपचारिक कौशलों या कतिपय निश्चित वांछित मनोवैज्ञानिक-सामाजिक गुणों के अर्जन की ओर ले जाती है। यह स्वयं में ही समादरणीय है। इस तरह शिक्षा कोई वस्तु नहीं है। जिसे अर्जित कर या जिससे स्वयं को सम्पन्न कर, तत्पश्चात् उसका इस्तेमाल किया जाए, बल्कि यह व्यक्तियों तथा समाज के लिए अपरिमित महत्त्व रखने वाली प्रक्रिया है, यद्यपि इसमें अपार उपयोग-मूल्य हो सकता है और होता है, अतएव शिक्षा विस्तारण एवं रूपांतरण की प्रक्रिया है, विद्यार्थियों को इंजीनियरों या डॉक्टरों में बदलने के अर्थ में नहीं, बल्कि मन को विस्तारण एवं परिवर्तन-सृजन, पोषण एवं आत्म-विवेचनात्मक बोध का विकास तथा विचार की स्वंतत्रता प्रदान करने के अर्थ में, यह नैतिक-बौद्धिक विकास की आंतरिक प्रक्रिया है। परिच्छेद के अनुसार, शिक्षा को स्वयंमात्र में समादरणीय क्यों होना ही चाहिए?A क्योंकि यह रोजगार के लिए अर्हताओं के अर्जन में सहायक होती हैB क्योंकि यह ऊर्ध्वगामी गतिशीलता व सामाजिक स्तर प्राप्त करने में सहायक होती हैC क्योंकि यह नैतिक व बौद्धिक विकास की आंतरिक प्रक्रिया हैD इस संदर्भ मेंउपरिलिखित सभी (A), (B) व (A) सही हैं
3)
निम्नलिखित तीन परिच्छेदों को पढ़िए और उसके उपरान्त प्रत्येक परिच्छेद के आधार पर दिए गए प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए इन प्रश्नांशों के आपके उत्तर केवल परिच्छेदों पर ही आधारित होने चाहिए। शिक्षा का, निस्संदेह, एक महत्वपूर्ण कार्यपरक, नैमित्तिक तथा उपयोगितावादी आयाम होता है। यह तब उद्घाटित होता है जब कोई इस तरह के प्रश्न पूछे, जैसे कि ‘शिक्षा का प्रयोजन क्या है? बहुधा इसके उत्तर होते हैं, ‘रोजगार/ऊर्ध्वगामी गतिशीलता के लिए अर्हताएं अर्जित करना’, और ‘व्यापक/उच्चतर (आय के संदर्भ में) अवसर प्राप्त करना’, ‘राष्ट्रीय विकास हेतु विविध क्षेत्रें में प्रशिक्षित जन-शक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति करना’, परन्तु अपने गहनतम अर्थ में शिक्षा नैमित्तिक नहीं है। कहने का आशय यह है, कि इसका स्वयंमात्र से परे औचित्य नहीं बताया जा सकता, क्योंकि यह औपचारिक कौशलों या कतिपय निश्चित वांछित मनोवैज्ञानिक-सामाजिक गुणों के अर्जन की ओर ले जाती है। यह स्वयं में ही समादरणीय है। इस तरह शिक्षा कोई वस्तु नहीं है। जिसे अर्जित कर या जिससे स्वयं को सम्पन्न कर, तत्पश्चात् उसका इस्तेमाल किया जाए, बल्कि यह व्यक्तियों तथा समाज के लिए अपरिमित महत्त्व रखने वाली प्रक्रिया है, यद्यपि इसमें अपार उपयोग-मूल्य हो सकता है और होता है, अतएव शिक्षा विस्तारण एवं रूपांतरण की प्रक्रिया है, विद्यार्थियों को इंजीनियरों या डॉक्टरों में बदलने के अर्थ में नहीं, बल्कि मन को विस्तारण एवं परिवर्तन-सृजन, पोषण एवं आत्म-विवेचनात्मक बोध का विकास तथा विचार की स्वंतत्रता प्रदान करने के अर्थ में, यह नैतिक-बौद्धिक विकास की आंतरिक प्रक्रिया है। शिक्षा एक प्रक्रिया है, जिसमेंA विद्यार्थियों को प्रशिक्षित वृत्तिकों के रूप में बदला जाता हैB उच्च आय के अवसरों का सृजन होता हैC व्यक्तियों में आत्म-विवेचनात्मक बोध और विचार की स्वतंत्रता का विकास होता हैD ऊर्ध्वगामी गतिशीलता के लिए अर्हताओं का अर्जन होता है
4)
यदि कीटप्रतिरोधकता विकसित कर लें तो रासायनिक कीटनाशक धारणीय कृषि में अपना महत्व गँवा देते हैं, कीटनाशक प्रतिरोधकता का विकास मात्र प्राकृतिक वरण की क्रिया है। जब आनुवंशिकता वैविध्य जनसंख्या की बहुत बड़ी संख्या नष्ट हो जाती है, तब इसका घटित होना लगभग सुनिश्चित है। एक अथवा कुछ कीट असामान्य रूप से प्रतिरोधी हो सकते हैं (यह सम्भवतः इसलिए कि उनमें एक ऐसा एन्जाइम होता है जो कीटनाशक को निराविषकारी बना सकता है) यदि यह कीटनाशक बार-बार प्रयोग किया जाता है, तो कीट की हर उत्तरोतर पीढ़ी में प्रतिरोधी कीटों का अनुपात बढ़ता जाता है। कीटों की आन्तर प्रजनन दर ठेठ रूप से बहुत अधिक होती है, अतः एक पीढ़ी के कुछ ही कीट अपनी अगली पीढ़ी में सैकड़ों या हजारों कीटों को जन्म दे सकते हैं, और इससे कीटों की आबादी में प्रतिरोधकता बहुत तेजी से फैल जाती है। पूर्व समय से इस समस्या की प्रायः अवहेलना होती रही, यद्यपि DDT (डाइक्लोरोडाइफिनाइलट्राइक्लोरोएथेन) प्रतिरोधकता के पहले मामले की सूचना1946 में ही प्राप्त हो गई थी। ऐसे अकशेरुकी जीवों की संख्या जिनमें प्रतिरोधकता का विकास हुआ है तथा ऐसे कीटनाशकों की संख्या जिनके विरुद्ध प्रतिरोधकता का विकास हुआ है, में घातांकी वृद्धि हुई है। संधिपाट कीटों के प्रत्येक कुल (जिनमें द्विपंखी जैसे कि मच्छर-मक्खियाँ तथा भृंग, शलभ, ततैया, पिस्सू, जूँ और कुटकी सम्मिलित हैं), में और उनके साथ-साथ अपतृण तथा वनस्पति रोगाणुओं में प्रतिरोधकता दर्ज हुई है। कपास के शलभ कीट, एलाबामा पर्ण कृमि का ही उदाहरण लें, विश्व के एक या अधिक क्षेत्रें में उसमें ऐल्ड्रिन, DDT, डील्ड्रिन, ऐन्ड्रिन, लिन्डेन और टॉक्साफीन के प्रति प्रतिरोधकता विकसित हो गई है। यदि रासायनिक कीटनाशक केवल समस्याओं के उत्प्रेरक होते - यदि उनका प्रयोग मूलतः और घोर रूप से अधारणीय होता - तब उनका व्यापक प्रयोग कब का बंद हो चुका होता। ऐसा नहीं हुआ, इसके विपरीत, उनकी उत्पादन दर तेजी से बढ़ी है। किसी कृषि उत्पादक के लिए आज भी लागत-लाभ का अनुपात कीटनाशकों के प्रयोग के पक्ष में ही बना हुआ है। USA में कीटनाशकों से कृषि उत्पादों का प्रति $1 लागत मिलने वाला अनुमानितलाभ $5 है। इसके अतिरिक्त, बहुत से गरीब देशों में सन्निकट सामूहिक भुखमरी अथवा जानपदिक रोग के आसार इतने भयावह हैं कि कीटनाशक प्रयोग करने की सामाजिक और स्वास्थ्य सम्बन्धी लागत की अवहेलना करनी पड़ती है। कीटनाशकों के प्रयोग को साधारणतया ‘कितने जीवन बच सकें’, ‘खाद्य उत्पादन की आर्थिकदक्षता’ और ‘कल खाद्य उत्पादन’ जैसे यथार्थ मापों के आधार पर न्यायसंगत ठहराया जाता है। इन बिलकुल मूलभूत अर्थों में उनके प्रयोग को धारणीय माना जा सकता है। आचरण में, धारणीयता निरन्तर ऐसे नए कीटनाशकों को विकसित करने पर निर्भर करती है जो कीटों से कम-से-कम एक कदम आगे रहें- ऐसे कीटनाशक जो अल्प स्थायी हों, जैवनिम्नीकरणीय (बायोडिग्रेडेबल) हों और कीटों पर अधिक सधा हुआ लक्ष्य बाँध सकें, फ्कीटनाशक प्रतिरोधकता का विकास प्राकृतिक वरण की क्रिया है, इसका वास्तविक तात्पर्य क्या है?A बहुत से जीवों में कीटनाशक प्रतिरोधकता होना बिल्कुल प्राकृतिक हैB जीवों में कीटनाशक प्रतिरोधकता होना एक विश्वव्यापी तथ्य हैC कीटनाशकों के प्रयोग के पश्चात् किसी एक आबादी में कुछ जीव प्रतिरोधकता दर्शाते हैंD उपर्युक्त (a), (b), तथा (c) में से कोई भी कथन सही नहीं है
5)
यदि कीटप्रतिरोधकता विकसित कर लें तो रासायनिक कीटनाशक धारणीय कृषि में अपना महत्व गँवा देते हैं, कीटनाशक प्रतिरोधकता का विकास मात्र प्राकृतिक वरण की क्रिया है। जब आनुवंशिकता वैविध्य जनसंख्या की बहुत बड़ी संख्या नष्ट हो जाती है, तब इसका घटित होना लगभग सुनिश्चित है। एक अथवा कुछ कीट असामान्य रूप से प्रतिरोधी हो सकते हैं (यह सम्भवतः इसलिए कि उनमें एक ऐसा एन्जाइम होता है जो कीटनाशक को निराविषकारी बना सकता है) यदि यह कीटनाशक बार-बार प्रयोग किया जाता है, तो कीट की हर उत्तरोतर पीढ़ी में प्रतिरोधी कीटों का अनुपात बढ़ता जाता है। कीटों की आन्तर प्रजनन दर ठेठ रूप से बहुत अधिक होती है, अतः एक पीढ़ी के कुछ ही कीट अपनी अगली पीढ़ी में सैकड़ों या हजारों कीटों को जन्म दे सकते हैं, और इससे कीटों की आबादी में प्रतिरोधकता बहुत तेजी से फैल जाती है। पूर्व समय से इस समस्या की प्रायः अवहेलना होती रही, यद्यपि DDT (डाइक्लोरोडाइफिनाइलट्राइक्लोरोएथेन) प्रतिरोधकता के पहले मामले की सूचना1946 में ही प्राप्त हो गई थी। ऐसे अकशेरुकी जीवों की संख्या जिनमें प्रतिरोधकता का विकास हुआ है तथा ऐसे कीटनाशकों की संख्या जिनके विरुद्ध प्रतिरोधकता का विकास हुआ है, में घातांकी वृद्धि हुई है। संधिपाट कीटों के प्रत्येक कुल (जिनमें द्विपंखी जैसे कि मच्छर-मक्खियाँ तथा भृंग, शलभ, ततैया, पिस्सू, जूँ और कुटकी सम्मिलित हैं), में और उनके साथ-साथ अपतृण तथा वनस्पति रोगाणुओं में प्रतिरोधकता दर्ज हुई है। कपास के शलभ कीट, एलाबामा पर्ण कृमि का ही उदाहरण लें, विश्व के एक या अधिक क्षेत्रें में उसमें ऐल्ड्रिन, DDT, डील्ड्रिन, ऐन्ड्रिन, लिन्डेन और टॉक्साफीन के प्रति प्रतिरोधकता विकसित हो गई है। यदि रासायनिक कीटनाशक केवल समस्याओं के उत्प्रेरक होते - यदि उनका प्रयोग मूलतः और घोर रूप से अधारणीय होता - तब उनका व्यापक प्रयोग कब का बंद हो चुका होता। ऐसा नहीं हुआ, इसके विपरीत, उनकी उत्पादन दर तेजी से बढ़ी है। किसी कृषि उत्पादक के लिए आज भी लागत-लाभ का अनुपात कीटनाशकों के प्रयोग के पक्ष में ही बना हुआ है। USA में कीटनाशकों से कृषि उत्पादों का प्रति $1 लागत मिलने वाला अनुमानितलाभ $5 है। इसके अतिरिक्त, बहुत से गरीब देशों में सन्निकट सामूहिक भुखमरी अथवा जानपदिक रोग के आसार इतने भयावह हैं कि कीटनाशक प्रयोग करने की सामाजिक और स्वास्थ्य सम्बन्धी लागत की अवहेलना करनी पड़ती है। कीटनाशकों के प्रयोग को साधारणतया ‘कितने जीवन बच सकें’, ‘खाद्य उत्पादन की आर्थिकदक्षता’ और ‘कल खाद्य उत्पादन’ जैसे यथार्थ मापों के आधार पर न्यायसंगत ठहराया जाता है। इन बिलकुल मूलभूत अर्थों में उनके प्रयोग को धारणीय माना जा सकता है। आचरण में, धारणीयता निरन्तर ऐसे नए कीटनाशकों को विकसित करने पर निर्भर करती है जो कीटों से कम-से-कम एक कदम आगे रहें- ऐसे कीटनाशक जो अल्प स्थायी हों, जैवनिम्नीकरणीय (बायोडिग्रेडेबल) हों और कीटों पर अधिक सधा हुआ लक्ष्य बाँध सकें, परिच्छेद के संदर्भ मे निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए- 1- विश्व के सभी गरीब देशों में रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग अनिवार्य हो गया है। 2- रासायनिक कीटनाशकों की धारणीय कृषि में कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। 3- एक कीट बहुत से कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधकता विकसित कर सकता है। उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?A केवल 1 और 2B केवल 3C केवल 1 और 3D 1, 2 और 3
6)
यदि कीटप्रतिरोधकता विकसित कर लें तो रासायनिक कीटनाशक धारणीय कृषि में अपना महत्व गँवा देते हैं, कीटनाशक प्रतिरोधकता का विकास मात्र प्राकृतिक वरण की क्रिया है। जब आनुवंशिकता वैविध्य जनसंख्या की बहुत बड़ी संख्या नष्ट हो जाती है, तब इसका घटित होना लगभग सुनिश्चित है। एक अथवा कुछ कीट असामान्य रूप से प्रतिरोधी हो सकते हैं (यह सम्भवतः इसलिए कि उनमें एक ऐसा एन्जाइम होता है जो कीटनाशक को निराविषकारी बना सकता है) यदि यह कीटनाशक बार-बार प्रयोग किया जाता है, तो कीट की हर उत्तरोतर पीढ़ी में प्रतिरोधी कीटों का अनुपात बढ़ता जाता है। कीटों की आन्तर प्रजनन दर ठेठ रूप से बहुत अधिक होती है, अतः एक पीढ़ी के कुछ ही कीट अपनी अगली पीढ़ी में सैकड़ों या हजारों कीटों को जन्म दे सकते हैं, और इससे कीटों की आबादी में प्रतिरोधकता बहुत तेजी से फैल जाती है। पूर्व समय से इस समस्या की प्रायः अवहेलना होती रही, यद्यपि DDT (डाइक्लोरोडाइफिनाइलट्राइक्लोरोएथेन) प्रतिरोधकता के पहले मामले की सूचना1946 में ही प्राप्त हो गई थी। ऐसे अकशेरुकी जीवों की संख्या जिनमें प्रतिरोधकता का विकास हुआ है तथा ऐसे कीटनाशकों की संख्या जिनके विरुद्ध प्रतिरोधकता का विकास हुआ है, में घातांकी वृद्धि हुई है। संधिपाट कीटों के प्रत्येक कुल (जिनमें द्विपंखी जैसे कि मच्छर-मक्खियाँ तथा भृंग, शलभ, ततैया, पिस्सू, जूँ और कुटकी सम्मिलित हैं), में और उनके साथ-साथ अपतृण तथा वनस्पति रोगाणुओं में प्रतिरोधकता दर्ज हुई है। कपास के शलभ कीट, एलाबामा पर्ण कृमि का ही उदाहरण लें, विश्व के एक या अधिक क्षेत्रें में उसमें ऐल्ड्रिन, DDT, डील्ड्रिन, ऐन्ड्रिन, लिन्डेन और टॉक्साफीन के प्रति प्रतिरोधकता विकसित हो गई है। यदि रासायनिक कीटनाशक केवल समस्याओं के उत्प्रेरक होते - यदि उनका प्रयोग मूलतः और घोर रूप से अधारणीय होता - तब उनका व्यापक प्रयोग कब का बंद हो चुका होता। ऐसा नहीं हुआ, इसके विपरीत, उनकी उत्पादन दर तेजी से बढ़ी है। किसी कृषि उत्पादक के लिए आज भी लागत-लाभ का अनुपात कीटनाशकों के प्रयोग के पक्ष में ही बना हुआ है। USA में कीटनाशकों से कृषि उत्पादों का प्रति $1 लागत मिलने वाला अनुमानितलाभ $5 है। इसके अतिरिक्त, बहुत से गरीब देशों में सन्निकट सामूहिक भुखमरी अथवा जानपदिक रोग के आसार इतने भयावह हैं कि कीटनाशक प्रयोग करने की सामाजिक और स्वास्थ्य सम्बन्धी लागत की अवहेलना करनी पड़ती है। कीटनाशकों के प्रयोग को साधारणतया ‘कितने जीवन बच सकें’, ‘खाद्य उत्पादन की आर्थिकदक्षता’ और ‘कल खाद्य उत्पादन’ जैसे यथार्थ मापों के आधार पर न्यायसंगत ठहराया जाता है। इन बिलकुल मूलभूत अर्थों में उनके प्रयोग को धारणीय माना जा सकता है। आचरण में, धारणीयता निरन्तर ऐसे नए कीटनाशकों को विकसित करने पर निर्भर करती है जो कीटों से कम-से-कम एक कदम आगे रहें- ऐसे कीटनाशक जो अल्प स्थायी हों, जैवनिम्नीकरणीय (बायोडिग्रेडेबल) हों और कीटों पर अधिक सधा हुआ लक्ष्य बाँध सकें, यद्यपि रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग से सम्बद्ध, समस्याएं लम्बे समय से जानी जाती रही हैं, तथापि उनका व्यापक प्रयोग समय के साथ कम नही हुआ है क्यों?A रासायनिक कीटनाशकों के कोई विकल्प विद्यमान नहीं हैंB नए कीटनाशकों का आविष्कार ही नहीं होताC कीटनाशक जैवनिम्नीकरणीय (बायोडिग्रेडेबल) होते हैंD उपर्युक्त (a), (b), तथा (c), में से कोई भी कथन सही नहीं है
7)
यदि कीटप्रतिरोधकता विकसित कर लें तो रासायनिक कीटनाशक धारणीय कृषि में अपना महत्व गँवा देते हैं, कीटनाशक प्रतिरोधकता का विकास मात्र प्राकृतिक वरण की क्रिया है। जब आनुवंशिकता वैविध्य जनसंख्या की बहुत बड़ी संख्या नष्ट हो जाती है, तब इसका घटित होना लगभग सुनिश्चित है। एक अथवा कुछ कीट असामान्य रूप से प्रतिरोधी हो सकते हैं (यह सम्भवतः इसलिए कि उनमें एक ऐसा एन्जाइम होता है जो कीटनाशक को निराविषकारी बना सकता है) यदि यह कीटनाशक बार-बार प्रयोग किया जाता है, तो कीट की हर उत्तरोतर पीढ़ी में प्रतिरोधी कीटों का अनुपात बढ़ता जाता है। कीटों की आन्तर प्रजनन दर ठेठ रूप से बहुत अधिक होती है, अतः एक पीढ़ी के कुछ ही कीट अपनी अगली पीढ़ी में सैकड़ों या हजारों कीटों को जन्म दे सकते हैं, और इससे कीटों की आबादी में प्रतिरोधकता बहुत तेजी से फैल जाती है। पूर्व समय से इस समस्या की प्रायः अवहेलना होती रही, यद्यपि DDT (डाइक्लोरोडाइफिनाइलट्राइक्लोरोएथेन) प्रतिरोधकता के पहले मामले की सूचना1946 में ही प्राप्त हो गई थी। ऐसे अकशेरुकी जीवों की संख्या जिनमें प्रतिरोधकता का विकास हुआ है तथा ऐसे कीटनाशकों की संख्या जिनके विरुद्ध प्रतिरोधकता का विकास हुआ है, में घातांकी वृद्धि हुई है। संधिपाट कीटों के प्रत्येक कुल (जिनमें द्विपंखी जैसे कि मच्छर-मक्खियाँ तथा भृंग, शलभ, ततैया, पिस्सू, जूँ और कुटकी सम्मिलित हैं), में और उनके साथ-साथ अपतृण तथा वनस्पति रोगाणुओं में प्रतिरोधकता दर्ज हुई है। कपास के शलभ कीट, एलाबामा पर्ण कृमि का ही उदाहरण लें, विश्व के एक या अधिक क्षेत्रें में उसमें ऐल्ड्रिन, DDT, डील्ड्रिन, ऐन्ड्रिन, लिन्डेन और टॉक्साफीन के प्रति प्रतिरोधकता विकसित हो गई है। यदि रासायनिक कीटनाशक केवल समस्याओं के उत्प्रेरक होते - यदि उनका प्रयोग मूलतः और घोर रूप से अधारणीय होता - तब उनका व्यापक प्रयोग कब का बंद हो चुका होता। ऐसा नहीं हुआ, इसके विपरीत, उनकी उत्पादन दर तेजी से बढ़ी है। किसी कृषि उत्पादक के लिए आज भी लागत-लाभ का अनुपात कीटनाशकों के प्रयोग के पक्ष में ही बना हुआ है। USA में कीटनाशकों से कृषि उत्पादों का प्रति $1 लागत मिलने वाला अनुमानितलाभ $5 है। इसके अतिरिक्त, बहुत से गरीब देशों में सन्निकट सामूहिक भुखमरी अथवा जानपदिक रोग के आसार इतने भयावह हैं कि कीटनाशक प्रयोग करने की सामाजिक और स्वास्थ्य सम्बन्धी लागत की अवहेलना करनी पड़ती है। कीटनाशकों के प्रयोग को साधारणतया ‘कितने जीवन बच सकें’, ‘खाद्य उत्पादन की आर्थिकदक्षता’ और ‘कल खाद्य उत्पादन’ जैसे यथार्थ मापों के आधार पर न्यायसंगत ठहराया जाता है। इन बिलकुल मूलभूत अर्थों में उनके प्रयोग को धारणीय माना जा सकता है। आचरण में, धारणीयता निरन्तर ऐसे नए कीटनाशकों को विकसित करने पर निर्भर करती है जो कीटों से कम-से-कम एक कदम आगे रहें- ऐसे कीटनाशक जो अल्प स्थायी हों, जैवनिम्नीकरणीय (बायोडिग्रेडेबल) हों और कीटों पर अधिक सधा हुआ लक्ष्य बाँध सकें, कीटनाशक किसी कीट आबादी में प्रतिरोधक जीवों के वरण के अभिकर्ता के रूप में कैसे कार्य करते हैं? 1- सम्भव है कि किसी कीट आबादी में कुछ विशिष्ट कीटों का व्यवहार उनकी अपनी आनुवंशिक (जैनेटिक) संरचना के कारण दूसरों से भिन्न होता है 2- कीटों में कीटनाशकों को निराविष्कारी बना सकने का सामर्थ्य होता है। 3- कीटनाशक प्रतिरोधकता का विकास कीट आबादी में समान रूप से वितरित होता है। उपर्युक्त में से कौनसा/से कथन सही है/हैं?A केवल 1B केवल 1 और 2C केवल 3D 1, 2 और 3
8)
यदि कीटप्रतिरोधकता विकसित कर लें तो रासायनिक कीटनाशक धारणीय कृषि में अपना महत्व गँवा देते हैं, कीटनाशक प्रतिरोधकता का विकास मात्र प्राकृतिक वरण की क्रिया है। जब आनुवंशिकता वैविध्य जनसंख्या की बहुत बड़ी संख्या नष्ट हो जाती है, तब इसका घटित होना लगभग सुनिश्चित है। एक अथवा कुछ कीट असामान्य रूप से प्रतिरोधी हो सकते हैं (यह सम्भवतः इसलिए कि उनमें एक ऐसा एन्जाइम होता है जो कीटनाशक को निराविषकारी बना सकता है) यदि यह कीटनाशक बार-बार प्रयोग किया जाता है, तो कीट की हर उत्तरोतर पीढ़ी में प्रतिरोधी कीटों का अनुपात बढ़ता जाता है। कीटों की आन्तर प्रजनन दर ठेठ रूप से बहुत अधिक होती है, अतः एक पीढ़ी के कुछ ही कीट अपनी अगली पीढ़ी में सैकड़ों या हजारों कीटों को जन्म दे सकते हैं, और इससे कीटों की आबादी में प्रतिरोधकता बहुत तेजी से फैल जाती है। पूर्व समय से इस समस्या की प्रायः अवहेलना होती रही, यद्यपि DDT (डाइक्लोरोडाइफिनाइलट्राइक्लोरोएथेन) प्रतिरोधकता के पहले मामले की सूचना1946 में ही प्राप्त हो गई थी। ऐसे अकशेरुकी जीवों की संख्या जिनमें प्रतिरोधकता का विकास हुआ है तथा ऐसे कीटनाशकों की संख्या जिनके विरुद्ध प्रतिरोधकता का विकास हुआ है, में घातांकी वृद्धि हुई है। संधिपाट कीटों के प्रत्येक कुल (जिनमें द्विपंखी जैसे कि मच्छर-मक्खियाँ तथा भृंग, शलभ, ततैया, पिस्सू, जूँ और कुटकी सम्मिलित हैं), में और उनके साथ-साथ अपतृण तथा वनस्पति रोगाणुओं में प्रतिरोधकता दर्ज हुई है। कपास के शलभ कीट, एलाबामा पर्ण कृमि का ही उदाहरण लें, विश्व के एक या अधिक क्षेत्रें में उसमें ऐल्ड्रिन, DDT, डील्ड्रिन, ऐन्ड्रिन, लिन्डेन और टॉक्साफीन के प्रति प्रतिरोधकता विकसित हो गई है। यदि रासायनिक कीटनाशक केवल समस्याओं के उत्प्रेरक होते - यदि उनका प्रयोग मूलतः और घोर रूप से अधारणीय होता - तब उनका व्यापक प्रयोग कब का बंद हो चुका होता। ऐसा नहीं हुआ, इसके विपरीत, उनकी उत्पादन दर तेजी से बढ़ी है। किसी कृषि उत्पादक के लिए आज भी लागत-लाभ का अनुपात कीटनाशकों के प्रयोग के पक्ष में ही बना हुआ है। USA में कीटनाशकों से कृषि उत्पादों का प्रति $1 लागत मिलने वाला अनुमानितलाभ $5 है। इसके अतिरिक्त, बहुत से गरीब देशों में सन्निकट सामूहिक भुखमरी अथवा जानपदिक रोग के आसार इतने भयावह हैं कि कीटनाशक प्रयोग करने की सामाजिक और स्वास्थ्य सम्बन्धी लागत की अवहेलना करनी पड़ती है। कीटनाशकों के प्रयोग को साधारणतया ‘कितने जीवन बच सकें’, ‘खाद्य उत्पादन की आर्थिकदक्षता’ और ‘कल खाद्य उत्पादन’ जैसे यथार्थ मापों के आधार पर न्यायसंगत ठहराया जाता है। इन बिलकुल मूलभूत अर्थों में उनके प्रयोग को धारणीय माना जा सकता है। आचरण में, धारणीयता निरन्तर ऐसे नए कीटनाशकों को विकसित करने पर निर्भर करती है जो कीटों से कम-से-कम एक कदम आगे रहें- ऐसे कीटनाशक जो अल्प स्थायी हों, जैवनिम्नीकरणीय (बायोडिग्रेडेबल) हों और कीटों पर अधिक सधा हुआ लक्ष्य बाँध सकें, रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग को सामान्यतः गरीब और विकासशील देशों का उदाहरण देकर न्यायसंगत क्यों ठहराया जाता है? 1- विकसित देश जैव-कृषि का अनुकूलन कर कीटनाशकों के प्रयोग से मुक्त होने का सामर्थ्य रखते हैं, किन्तु गरीब और विकासशील देशों के लिए रासायनिक कीटनाशक का प्रयोग अनिवार्य है। 2- गरीब और विकासशील देशों, में कीटनाशकों के प्रयोग के फसलों के जानपदिक रोगों की समस्या का समाधान हो जाता है और खाद्य समस्या कुछ हद तक दूर की जा सकती है। 3- गरीब और विकासशील देशों में प्रायः कीटनाशक प्रयोग करने की सामाजिक और स्वास्थ्य सम्बन्धी लागत की अवहेलना कर दी जाती है। उपर्युक्त में से कौनसा/से कथन सही है/हैं?A केवल 1B केवल 1 और 2C केवल 3D 1, 2 और 3
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यदि कीटप्रतिरोधकता विकसित कर लें तो रासायनिक कीटनाशक धारणीय कृषि में अपना महत्व गँवा देते हैं, कीटनाशक प्रतिरोधकता का विकास मात्र प्राकृतिक वरण की क्रिया है। जब आनुवंशिकता वैविध्य जनसंख्या की बहुत बड़ी संख्या नष्ट हो जाती है, तब इसका घटित होना लगभग सुनिश्चित है। एक अथवा कुछ कीट असामान्य रूप से प्रतिरोधी हो सकते हैं (यह सम्भवतः इसलिए कि उनमें एक ऐसा एन्जाइम होता है जो कीटनाशक को निराविषकारी बना सकता है) यदि यह कीटनाशक बार-बार प्रयोग किया जाता है, तो कीट की हर उत्तरोतर पीढ़ी में प्रतिरोधी कीटों का अनुपात बढ़ता जाता है। कीटों की आन्तर प्रजनन दर ठेठ रूप से बहुत अधिक होती है, अतः एक पीढ़ी के कुछ ही कीट अपनी अगली पीढ़ी में सैकड़ों या हजारों कीटों को जन्म दे सकते हैं, और इससे कीटों की आबादी में प्रतिरोधकता बहुत तेजी से फैल जाती है। पूर्व समय से इस समस्या की प्रायः अवहेलना होती रही, यद्यपि DDT (डाइक्लोरोडाइफिनाइलट्राइक्लोरोएथेन) प्रतिरोधकता के पहले मामले की सूचना1946 में ही प्राप्त हो गई थी। ऐसे अकशेरुकी जीवों की संख्या जिनमें प्रतिरोधकता का विकास हुआ है तथा ऐसे कीटनाशकों की संख्या जिनके विरुद्ध प्रतिरोधकता का विकास हुआ है, में घातांकी वृद्धि हुई है। संधिपाट कीटों के प्रत्येक कुल (जिनमें द्विपंखी जैसे कि मच्छर-मक्खियाँ तथा भृंग, शलभ, ततैया, पिस्सू, जूँ और कुटकी सम्मिलित हैं), में और उनके साथ-साथ अपतृण तथा वनस्पति रोगाणुओं में प्रतिरोधकता दर्ज हुई है। कपास के शलभ कीट, एलाबामा पर्ण कृमि का ही उदाहरण लें, विश्व के एक या अधिक क्षेत्रें में उसमें ऐल्ड्रिन, DDT, डील्ड्रिन, ऐन्ड्रिन, लिन्डेन और टॉक्साफीन के प्रति प्रतिरोधकता विकसित हो गई है। यदि रासायनिक कीटनाशक केवल समस्याओं के उत्प्रेरक होते - यदि उनका प्रयोग मूलतः और घोर रूप से अधारणीय होता - तब उनका व्यापक प्रयोग कब का बंद हो चुका होता। ऐसा नहीं हुआ, इसके विपरीत, उनकी उत्पादन दर तेजी से बढ़ी है। किसी कृषि उत्पादक के लिए आज भी लागत-लाभ का अनुपात कीटनाशकों के प्रयोग के पक्ष में ही बना हुआ है। USA में कीटनाशकों से कृषि उत्पादों का प्रति $1 लागत मिलने वाला अनुमानितलाभ $5 है। इसके अतिरिक्त, बहुत से गरीब देशों में सन्निकट सामूहिक भुखमरी अथवा जानपदिक रोग के आसार इतने भयावह हैं कि कीटनाशक प्रयोग करने की सामाजिक और स्वास्थ्य सम्बन्धी लागत की अवहेलना करनी पड़ती है। कीटनाशकों के प्रयोग को साधारणतया ‘कितने जीवन बच सकें’, ‘खाद्य उत्पादन की आर्थिकदक्षता’ और ‘कल खाद्य उत्पादन’ जैसे यथार्थ मापों के आधार पर न्यायसंगत ठहराया जाता है। इन बिलकुल मूलभूत अर्थों में उनके प्रयोग को धारणीय माना जा सकता है। आचरण में, धारणीयता निरन्तर ऐसे नए कीटनाशकों को विकसित करने पर निर्भर करती है जो कीटों से कम-से-कम एक कदम आगे रहें- ऐसे कीटनाशक जो अल्प स्थायी हों, जैवनिम्नीकरणीय (बायोडिग्रेडेबल) हों और कीटों पर अधिक सधा हुआ लक्ष्य बाँध सकें, इस परिच्छेद का क्या तात्पर्य है?A रासायनिक कीटनाशकों के विकल्पों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता हैB रसायनों का अत्यधिक प्रयोग पारिस्थितिक-तंत्र के लिए अच्छा नहीं हैC कीटनाशकों में सुधार और उनके प्रयोग को धारणीय बनाने की कोई गुंजाइश नहीं हैD उपर्युक्त कथन (A) तथा (B) दोनों सही हैं।
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अमरीका जैसे विकसित देशों की बीते समय की आय के स्तर पर वर्तमान विकासशील अर्थव्यवस्थाएं प्रति व्यक्ति कहीं कम ऊर्जा की खपत कर रही हैं, जिससे यह सम्भावना प्रबल होती है कि कार्बन-वृद्धि पर अंकुश रखते हुए भी विकास किया जा सकता है। एक ऐसी जलवायु-अनुकूल विकास रणनीति बनाने की आवश्यकता है जिसमें अनूकुलनशीलता तथा अल्पीकरण समन्वित हो, और उससे समुत्थान शक्ति का विकास हो, वैश्विक तपन के गहराते संकट की आशंका में कमी हो और विकास परिणाम में सुधार लाया जा सके अनुकूलनशीलता तथा अल्पीकरण उपाय अपनाने से विकास को बढ़ावा मिल सकता है, और आर्थिक समृद्धता आने से आय बढ़ सकती हैं और बेहतर संस्थाओं को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। बेहतर निर्मित घरों में रह रही एक स्वस्थ जनसंख्या जिसे सामाजिक सुरक्षा और बैंक ट्टण लेने की सुविधा प्राप्त है बदलती जलवायु और उसके प्रभावों से निपटने के लिए बेहतर सजि्जत होती है। आज समुत्थानशील संतुलित विकास नीतियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है जो अनुकूलनशीलता को प्रोत्साहित करें क्योंकि प्रारम्भ हो चुके जलवायु परिवर्तन अल्प अवधि में ही बढ़ने वाले हैं। आर्थिक समृद्धता का प्रसार सदा से परिवर्तनशील पारिस्थितिकीय परिस्थितियों के साथ अनुकूलनशीलता से गुथा रहा है। किन्तु वृद्धि ने जैसे-जेसे पर्यावरण को परिवर्तित किया है और पर्यावरणीय परिवर्तन जैसे-जैसे त्वरित हुआ है, वृद्धि और अनुकूलनशीलता को कायम रखने के लिए हमारे पर्यावरण को समझने की बेहतर क्षमता तथा नई अनुकूलनशील प्रौद्योगिकियाँ और आचरण विकसित करने और उन्हें व्यापक रूप से विसरित करने की आवश्यकता है। जैसी कि आर्थिक इतिहासकारों ने व्याख्या की है, मनुष्य जाति की अधिकांश सृजनात्मक अन्तःशक्ति परिवर्तनशील दुनिया के प्रति अनुकूलनशील बने रहने की ओर उन्मुख रही है। किन्तु यह अनुकूलनशीलता जलवायु परिवर्तन के सभी संघातों का सामना करने में समर्थ नहीं है, विशेषकर जब दीर्घ अवधि में अधिक विस्तृत परिवर्तन सामने आएंगे। देश इस परिवर्तनशील जलवायु से सामंजस्य रखते हुए उतनी तेजी से इस क्षति के मार्ग में मुक्त नही हो सकते। वृद्धि की कुछ रणनीतियाँ, चाहें वे सरकार या बाजार द्वारा संचालित हो, भी इस भेद्यता को बढ़ा सकती हैं, विशेषकर यदि वे प्राकृतिक संसाधनों का अतिशोषण करती हैं, सोवियत विकास योजना के अन्तर्गत सिंचित कपास की खेती का विस्तार अल्प जलधारी मध्य एशिया में किया गया जिससे अरल सागर लुप्त प्राय हो गया और मछुआरों पशुपालकों और कृषकों की आजीविका संकट में पड़ गई। इसी प्रकार मैंग्रोव, जो तूफानी लहरों के विरुद्ध प्राकृतिक तटीय प्रतिरोधक हैं, का गहन कृषि या आवासीय विकास के लिए प्रयोग में लाना, तटीय बस्तियों की भौतिक भेद्यता को बढ़ाता है, फिर चाहे यह गिनि में या लूइजिआना में हो। निम्नलिखित में से कौनसी वृद्धि की परिस्थितियाँ भेद्यता बढ़ा सकती है? 1- जब वृद्धि के लिए खनिज संसाधनों और जंगलों का अतिशोषण होता है। 2- जब वृद्धि मानव जाति की सृजनात्मक अन्तःशक्ति में परिवर्तन लाती है। 3- जब वृद्धि की सोच केवल लोगों को आवास और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने तथा सीमित होती है। 4- जब वृद्धि केवल कृषि पर जोर देने में मूर्त होती है। नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर चुनिए-A केवल 1B केवल 2, 3 और 4C केवल 1 और 4D 1, 2, 3 और 4
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अमरीका जैसे विकसित देशों की बीते समय की आय के स्तर पर वर्तमान विकासशील अर्थव्यवस्थाएं प्रति व्यक्ति कहीं कम ऊर्जा की खपत कर रही हैं, जिससे यह सम्भावना प्रबल होती है कि कार्बन-वृद्धि पर अंकुश रखते हुए भी विकास किया जा सकता है। एक ऐसी जलवायु-अनुकूल विकास रणनीति बनाने की आवश्यकता है जिसमें अनूकुलनशीलता तथा अल्पीकरण समन्वित हो, और उससे समुत्थान शक्ति का विकास हो, वैश्विक तपन के गहराते संकट की आशंका में कमी हो और विकास परिणाम में सुधार लाया जा सके अनुकूलनशीलता तथा अल्पीकरण उपाय अपनाने से विकास को बढ़ावा मिल सकता है, और आर्थिक समृद्धता आने से आय बढ़ सकती हैं और बेहतर संस्थाओं को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। बेहतर निर्मित घरों में रह रही एक स्वस्थ जनसंख्या जिसे सामाजिक सुरक्षा और बैंक ट्टण लेने की सुविधा प्राप्त है बदलती जलवायु और उसके प्रभावों से निपटने के लिए बेहतर सजि्जत होती है। आज समुत्थानशील संतुलित विकास नीतियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है जो अनुकूलनशीलता को प्रोत्साहित करें क्योंकि प्रारम्भ हो चुके जलवायु परिवर्तन अल्प अवधि में ही बढ़ने वाले हैं। आर्थिक समृद्धता का प्रसार सदा से परिवर्तनशील पारिस्थितिकीय परिस्थितियों के साथ अनुकूलनशीलता से गुथा रहा है। किन्तु वृद्धि ने जैसे-जेसे पर्यावरण को परिवर्तित किया है और पर्यावरणीय परिवर्तन जैसे-जैसे त्वरित हुआ है, वृद्धि और अनुकूलनशीलता को कायम रखने के लिए हमारे पर्यावरण को समझने की बेहतर क्षमता तथा नई अनुकूलनशील प्रौद्योगिकियाँ और आचरण विकसित करने और उन्हें व्यापक रूप से विसरित करने की आवश्यकता है। जैसी कि आर्थिक इतिहासकारों ने व्याख्या की है, मनुष्य जाति की अधिकांश सृजनात्मक अन्तःशक्ति परिवर्तनशील दुनिया के प्रति अनुकूलनशील बने रहने की ओर उन्मुख रही है। किन्तु यह अनुकूलनशीलता जलवायु परिवर्तन के सभी संघातों का सामना करने में समर्थ नहीं है, विशेषकर जब दीर्घ अवधि में अधिक विस्तृत परिवर्तन सामने आएंगे। देश इस परिवर्तनशील जलवायु से सामंजस्य रखते हुए उतनी तेजी से इस क्षति के मार्ग में मुक्त नही हो सकते। वृद्धि की कुछ रणनीतियाँ, चाहें वे सरकार या बाजार द्वारा संचालित हो, भी इस भेद्यता को बढ़ा सकती हैं, विशेषकर यदि वे प्राकृतिक संसाधनों का अतिशोषण करती हैं, सोवियत विकास योजना के अन्तर्गत सिंचित कपास की खेती का विस्तार अल्प जलधारी मध्य एशिया में किया गया जिससे अरल सागर लुप्त प्राय हो गया और मछुआरों पशुपालकों और कृषकों की आजीविका संकट में पड़ गई। इसी प्रकार मैंग्रोव, जो तूफानी लहरों के विरुद्ध प्राकृतिक तटीय प्रतिरोधक हैं, का गहन कृषि या आवासीय विकास के लिए प्रयोग में लाना, तटीय बस्तियों की भौतिक भेद्यता को बढ़ाता है, फिर चाहे यह गिनि में या लूइजिआना में हो। वर्तमान संदर्भ में निम्नलिखित कार्बन-वृद्धि का तात्पर्य क्या है? 1- ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों के उपयोग पर अधिक बल देना 2- विनिर्माण क्षेत्र पर कम बल देकर कृषि के क्षेत्र पर अधिक बल देना 3- एक धासस्यन पद्धति को त्याग कर मिश्रित कृषि अपनाना। 4- वस्तुओं और सेवाओं की माँग में कमी लाना नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर चुनिए-A केवल 1B केवल 2, 3 और 4C केवल 1 और 4D उपर्युक्त में से कोई भी निम्न कार्बन-वृद्धि का द्योतक नहीं है
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अमरीका जैसे विकसित देशों की बीते समय की आय के स्तर पर वर्तमान विकासशील अर्थव्यवस्थाएं प्रति व्यक्ति कहीं कम ऊर्जा की खपत कर रही हैं, जिससे यह सम्भावना प्रबल होती है कि कार्बन-वृद्धि पर अंकुश रखते हुए भी विकास किया जा सकता है। एक ऐसी जलवायु-अनुकूल विकास रणनीति बनाने की आवश्यकता है जिसमें अनूकुलनशीलता तथा अल्पीकरण समन्वित हो, और उससे समुत्थान शक्ति का विकास हो, वैश्विक तपन के गहराते संकट की आशंका में कमी हो और विकास परिणाम में सुधार लाया जा सके अनुकूलनशीलता तथा अल्पीकरण उपाय अपनाने से विकास को बढ़ावा मिल सकता है, और आर्थिक समृद्धता आने से आय बढ़ सकती हैं और बेहतर संस्थाओं को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। बेहतर निर्मित घरों में रह रही एक स्वस्थ जनसंख्या जिसे सामाजिक सुरक्षा और बैंक ट्टण लेने की सुविधा प्राप्त है बदलती जलवायु और उसके प्रभावों से निपटने के लिए बेहतर सजि्जत होती है। आज समुत्थानशील संतुलित विकास नीतियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है जो अनुकूलनशीलता को प्रोत्साहित करें क्योंकि प्रारम्भ हो चुके जलवायु परिवर्तन अल्प अवधि में ही बढ़ने वाले हैं। आर्थिक समृद्धता का प्रसार सदा से परिवर्तनशील पारिस्थितिकीय परिस्थितियों के साथ अनुकूलनशीलता से गुथा रहा है। किन्तु वृद्धि ने जैसे-जेसे पर्यावरण को परिवर्तित किया है और पर्यावरणीय परिवर्तन जैसे-जैसे त्वरित हुआ है, वृद्धि और अनुकूलनशीलता को कायम रखने के लिए हमारे पर्यावरण को समझने की बेहतर क्षमता तथा नई अनुकूलनशील प्रौद्योगिकियाँ और आचरण विकसित करने और उन्हें व्यापक रूप से विसरित करने की आवश्यकता है। जैसी कि आर्थिक इतिहासकारों ने व्याख्या की है, मनुष्य जाति की अधिकांश सृजनात्मक अन्तःशक्ति परिवर्तनशील दुनिया के प्रति अनुकूलनशील बने रहने की ओर उन्मुख रही है। किन्तु यह अनुकूलनशीलता जलवायु परिवर्तन के सभी संघातों का सामना करने में समर्थ नहीं है, विशेषकर जब दीर्घ अवधि में अधिक विस्तृत परिवर्तन सामने आएंगे। देश इस परिवर्तनशील जलवायु से सामंजस्य रखते हुए उतनी तेजी से इस क्षति के मार्ग में मुक्त नही हो सकते। वृद्धि की कुछ रणनीतियाँ, चाहें वे सरकार या बाजार द्वारा संचालित हो, भी इस भेद्यता को बढ़ा सकती हैं, विशेषकर यदि वे प्राकृतिक संसाधनों का अतिशोषण करती हैं, सोवियत विकास योजना के अन्तर्गत सिंचित कपास की खेती का विस्तार अल्प जलधारी मध्य एशिया में किया गया जिससे अरल सागर लुप्त प्राय हो गया और मछुआरों पशुपालकों और कृषकों की आजीविका संकट में पड़ गई। इसी प्रकार मैंग्रोव, जो तूफानी लहरों के विरुद्ध प्राकृतिक तटीय प्रतिरोधक हैं, का गहन कृषि या आवासीय विकास के लिए प्रयोग में लाना, तटीय बस्तियों की भौतिक भेद्यता को बढ़ाता है, फिर चाहे यह गिनि में या लूइजिआना में हो। निम्नलिखित में से कौन सी परिस्थिति/परिस्थितियाँ धारणीय विकास के लिए अनिवार्य है/हैं? 1- आर्थिक समृद्धता का व्यापक प्रसार 2- अनुकूलनशील प्रौद्योगिकियों का व्यापक प्रसार/लोकप्रियकरण 3- अनुकूलनशील तथा अल्पीकरणशील प्रौद्योगिकियों के शोध में निवेश नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर चुनिए-A केवल 1B केवल 2 और 3C केवल 1 और 3D 1, 2 और 3
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अमरीका जैसे विकसित देशों की बीते समय की आय के स्तर पर वर्तमान विकासशील अर्थव्यवस्थाएं प्रति व्यक्ति कहीं कम ऊर्जा की खपत कर रही हैं, जिससे यह सम्भावना प्रबल होती है कि कार्बन-वृद्धि पर अंकुश रखते हुए भी विकास किया जा सकता है। एक ऐसी जलवायु-अनुकूल विकास रणनीति बनाने की आवश्यकता है जिसमें अनूकुलनशीलता तथा अल्पीकरण समन्वित हो, और उससे समुत्थान शक्ति का विकास हो, वैश्विक तपन के गहराते संकट की आशंका में कमी हो और विकास परिणाम में सुधार लाया जा सके अनुकूलनशीलता तथा अल्पीकरण उपाय अपनाने से विकास को बढ़ावा मिल सकता है, और आर्थिक समृद्धता आने से आय बढ़ सकती हैं और बेहतर संस्थाओं को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। बेहतर निर्मित घरों में रह रही एक स्वस्थ जनसंख्या जिसे सामाजिक सुरक्षा और बैंक ट्टण लेने की सुविधा प्राप्त है बदलती जलवायु और उसके प्रभावों से निपटने के लिए बेहतर सजि्जत होती है। आज समुत्थानशील संतुलित विकास नीतियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है जो अनुकूलनशीलता को प्रोत्साहित करें क्योंकि प्रारम्भ हो चुके जलवायु परिवर्तन अल्प अवधि में ही बढ़ने वाले हैं। आर्थिक समृद्धता का प्रसार सदा से परिवर्तनशील पारिस्थितिकीय परिस्थितियों के साथ अनुकूलनशीलता से गुथा रहा है। किन्तु वृद्धि ने जैसे-जेसे पर्यावरण को परिवर्तित किया है और पर्यावरणीय परिवर्तन जैसे-जैसे त्वरित हुआ है, वृद्धि और अनुकूलनशीलता को कायम रखने के लिए हमारे पर्यावरण को समझने की बेहतर क्षमता तथा नई अनुकूलनशील प्रौद्योगिकियाँ और आचरण विकसित करने और उन्हें व्यापक रूप से विसरित करने की आवश्यकता है। जैसी कि आर्थिक इतिहासकारों ने व्याख्या की है, मनुष्य जाति की अधिकांश सृजनात्मक अन्तःशक्ति परिवर्तनशील दुनिया के प्रति अनुकूलनशील बने रहने की ओर उन्मुख रही है। किन्तु यह अनुकूलनशीलता जलवायु परिवर्तन के सभी संघातों का सामना करने में समर्थ नहीं है, विशेषकर जब दीर्घ अवधि में अधिक विस्तृत परिवर्तन सामने आएंगे। देश इस परिवर्तनशील जलवायु से सामंजस्य रखते हुए उतनी तेजी से इस क्षति के मार्ग में मुक्त नही हो सकते। वृद्धि की कुछ रणनीतियाँ, चाहें वे सरकार या बाजार द्वारा संचालित हो, भी इस भेद्यता को बढ़ा सकती हैं, विशेषकर यदि वे प्राकृतिक संसाधनों का अतिशोषण करती हैं, सोवियत विकास योजना के अन्तर्गत सिंचित कपास की खेती का विस्तार अल्प जलधारी मध्य एशिया में किया गया जिससे अरल सागर लुप्त प्राय हो गया और मछुआरों पशुपालकों और कृषकों की आजीविका संकट में पड़ गई। इसी प्रकार मैंग्रोव, जो तूफानी लहरों के विरुद्ध प्राकृतिक तटीय प्रतिरोधक हैं, का गहन कृषि या आवासीय विकास के लिए प्रयोग में लाना, तटीय बस्तियों की भौतिक भेद्यता को बढ़ाता है, फिर चाहे यह गिनि में या लूइजिआना में हो। इस परिच्छेद से निम्नलिखित में से क्या निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं? 1- सिंचित क्षेत्रें में वर्षा-प्रधान फसलों की खेती नहीं की जानी चाहिए। 2- जल-अभाव क्षेत्रें में खेती करना विकास रणनीति का अंग नहीं होना चाहिए। नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर चुनिए-A केवल 1B केवल 2C 1 और 2 दोनोंD न तो 1, न ही 2
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अमरीका जैसे विकसित देशों की बीते समय की आय के स्तर पर वर्तमान विकासशील अर्थव्यवस्थाएं प्रति व्यक्ति कहीं कम ऊर्जा की खपत कर रही हैं, जिससे यह सम्भावना प्रबल होती है कि कार्बन-वृद्धि पर अंकुश रखते हुए भी विकास किया जा सकता है। एक ऐसी जलवायु-अनुकूल विकास रणनीति बनाने की आवश्यकता है जिसमें अनूकुलनशीलता तथा अल्पीकरण समन्वित हो, और उससे समुत्थान शक्ति का विकास हो, वैश्विक तपन के गहराते संकट की आशंका में कमी हो और विकास परिणाम में सुधार लाया जा सके अनुकूलनशीलता तथा अल्पीकरण उपाय अपनाने से विकास को बढ़ावा मिल सकता है, और आर्थिक समृद्धता आने से आय बढ़ सकती हैं और बेहतर संस्थाओं को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। बेहतर निर्मित घरों में रह रही एक स्वस्थ जनसंख्या जिसे सामाजिक सुरक्षा और बैंक ट्टण लेने की सुविधा प्राप्त है बदलती जलवायु और उसके प्रभावों से निपटने के लिए बेहतर सजि्जत होती है। आज समुत्थानशील संतुलित विकास नीतियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है जो अनुकूलनशीलता को प्रोत्साहित करें क्योंकि प्रारम्भ हो चुके जलवायु परिवर्तन अल्प अवधि में ही बढ़ने वाले हैं। आर्थिक समृद्धता का प्रसार सदा से परिवर्तनशील पारिस्थितिकीय परिस्थितियों के साथ अनुकूलनशीलता से गुथा रहा है। किन्तु वृद्धि ने जैसे-जेसे पर्यावरण को परिवर्तित किया है और पर्यावरणीय परिवर्तन जैसे-जैसे त्वरित हुआ है, वृद्धि और अनुकूलनशीलता को कायम रखने के लिए हमारे पर्यावरण को समझने की बेहतर क्षमता तथा नई अनुकूलनशील प्रौद्योगिकियाँ और आचरण विकसित करने और उन्हें व्यापक रूप से विसरित करने की आवश्यकता है। जैसी कि आर्थिक इतिहासकारों ने व्याख्या की है, मनुष्य जाति की अधिकांश सृजनात्मक अन्तःशक्ति परिवर्तनशील दुनिया के प्रति अनुकूलनशील बने रहने की ओर उन्मुख रही है। किन्तु यह अनुकूलनशीलता जलवायु परिवर्तन के सभी संघातों का सामना करने में समर्थ नहीं है, विशेषकर जब दीर्घ अवधि में अधिक विस्तृत परिवर्तन सामने आएंगे। देश इस परिवर्तनशील जलवायु से सामंजस्य रखते हुए उतनी तेजी से इस क्षति के मार्ग में मुक्त नही हो सकते। वृद्धि की कुछ रणनीतियाँ, चाहें वे सरकार या बाजार द्वारा संचालित हो, भी इस भेद्यता को बढ़ा सकती हैं, विशेषकर यदि वे प्राकृतिक संसाधनों का अतिशोषण करती हैं, सोवियत विकास योजना के अन्तर्गत सिंचित कपास की खेती का विस्तार अल्प जलधारी मध्य एशिया में किया गया जिससे अरल सागर लुप्त प्राय हो गया और मछुआरों पशुपालकों और कृषकों की आजीविका संकट में पड़ गई। इसी प्रकार मैंग्रोव, जो तूफानी लहरों के विरुद्ध प्राकृतिक तटीय प्रतिरोधक हैं, का गहन कृषि या आवासीय विकास के लिए प्रयोग में लाना, तटीय बस्तियों की भौतिक भेद्यता को बढ़ाता है, फिर चाहे यह गिनि में या लूइजिआना में हो। निम्नलिखित मान्यताओं पर विचार कीजिए- 1- धारणीय आर्थिक विकास के लिए मनुष्य की सृजनात्मक अन्तःशक्ति के प्रयोग की आवश्यकता है। 2- गहन कृषि से पारिस्थितिकीय प्रतिक्षेप (बैकलेश) हो सकता है। 3- आर्थिक समृद्धि का प्रसार पारिस्थितिकी तथा पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। प्रस्तुत परिच्छेद के संदर्भ में कौनसी उपुर्यक्त मान्यता/मान्यताएं वैध है/हैं?A केवल 1B केवल 2 और 3C केवल 1 और 3D 1, 2 और 3
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अमरीका जैसे विकसित देशों की बीते समय की आय के स्तर पर वर्तमान विकासशील अर्थव्यवस्थाएं प्रति व्यक्ति कहीं कम ऊर्जा की खपत कर रही हैं, जिससे यह सम्भावना प्रबल होती है कि कार्बन-वृद्धि पर अंकुश रखते हुए भी विकास किया जा सकता है। एक ऐसी जलवायु-अनुकूल विकास रणनीति बनाने की आवश्यकता है जिसमें अनूकुलनशीलता तथा अल्पीकरण समन्वित हो, और उससे समुत्थान शक्ति का विकास हो, वैश्विक तपन के गहराते संकट की आशंका में कमी हो और विकास परिणाम में सुधार लाया जा सके अनुकूलनशीलता तथा अल्पीकरण उपाय अपनाने से विकास को बढ़ावा मिल सकता है, और आर्थिक समृद्धता आने से आय बढ़ सकती हैं और बेहतर संस्थाओं को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। बेहतर निर्मित घरों में रह रही एक स्वस्थ जनसंख्या जिसे सामाजिक सुरक्षा और बैंक ट्टण लेने की सुविधा प्राप्त है बदलती जलवायु और उसके प्रभावों से निपटने के लिए बेहतर सजि्जत होती है। आज समुत्थानशील संतुलित विकास नीतियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है जो अनुकूलनशीलता को प्रोत्साहित करें क्योंकि प्रारम्भ हो चुके जलवायु परिवर्तन अल्प अवधि में ही बढ़ने वाले हैं। आर्थिक समृद्धता का प्रसार सदा से परिवर्तनशील पारिस्थितिकीय परिस्थितियों के साथ अनुकूलनशीलता से गुथा रहा है। किन्तु वृद्धि ने जैसे-जेसे पर्यावरण को परिवर्तित किया है और पर्यावरणीय परिवर्तन जैसे-जैसे त्वरित हुआ है, वृद्धि और अनुकूलनशीलता को कायम रखने के लिए हमारे पर्यावरण को समझने की बेहतर क्षमता तथा नई अनुकूलनशील प्रौद्योगिकियाँ और आचरण विकसित करने और उन्हें व्यापक रूप से विसरित करने की आवश्यकता है। जैसी कि आर्थिक इतिहासकारों ने व्याख्या की है, मनुष्य जाति की अधिकांश सृजनात्मक अन्तःशक्ति परिवर्तनशील दुनिया के प्रति अनुकूलनशील बने रहने की ओर उन्मुख रही है। किन्तु यह अनुकूलनशीलता जलवायु परिवर्तन के सभी संघातों का सामना करने में समर्थ नहीं है, विशेषकर जब दीर्घ अवधि में अधिक विस्तृत परिवर्तन सामने आएंगे। देश इस परिवर्तनशील जलवायु से सामंजस्य रखते हुए उतनी तेजी से इस क्षति के मार्ग में मुक्त नही हो सकते। वृद्धि की कुछ रणनीतियाँ, चाहें वे सरकार या बाजार द्वारा संचालित हो, भी इस भेद्यता को बढ़ा सकती हैं, विशेषकर यदि वे प्राकृतिक संसाधनों का अतिशोषण करती हैं, सोवियत विकास योजना के अन्तर्गत सिंचित कपास की खेती का विस्तार अल्प जलधारी मध्य एशिया में किया गया जिससे अरल सागर लुप्त प्राय हो गया और मछुआरों पशुपालकों और कृषकों की आजीविका संकट में पड़ गई। इसी प्रकार मैंग्रोव, जो तूफानी लहरों के विरुद्ध प्राकृतिक तटीय प्रतिरोधक हैं, का गहन कृषि या आवासीय विकास के लिए प्रयोग में लाना, तटीय बस्तियों की भौतिक भेद्यता को बढ़ाता है, फिर चाहे यह गिनि में या लूइजिआना में हो। निम्नलिखित में से कौन सा कथन इस परिच्छेद का मूल विषय इंगित करता है?A आर्थिक रूप से अधिक समृद्ध देश जलवायु परिवर्तन के परिणामों से निपटने के लिए बेहतर सुसज्जित हैंB अनुकूलनशीलता तथा अल्पीकरण को विकास रणनीतियों से समन्वित होना चाहिएC विकसित और विकासशील दोनों ही प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं को तीव्र आर्थिक विकास के पीछे नहीं पड़ना चाहिएD कुछ देश तीव्र विकास की तलाश में प्राकृतिक संसाधनों के अतिशोषण का सहारा लेते हैं
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नीचे दिए गए कथनों का परीक्षण कीजिए- 1- एक पक्षी-निरीक्षक क्लब में केवल उन्हें ही सदस्यता मिलती है जिनके पात्र द्विनेत्री (बाइनोक्यूलर) हो। 2- पक्षी-निरीक्षक क्लब के कुछ सदस्यों के पास कैमरे भी होते हैं। 3- जिन सदस्यों के पास कैमरे होते हैं वे फोटो-प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ऊपर के कथनों से निम्नलिखित में से कौन सा निष्कर्ष निकाला जा सकता है?A जिनके पास द्विनेत्री (बाइनोक्यूलर) होता है वे सभी पक्षी-निरीक्षक क्लब के सदस्य होते हैंB पक्षी-निरीक्षक क्लब के सभी सदस्यों के पास द्विनेत्री (बाइनोक्यूलर) होता है।C जो फोटो-प्रतियोगिता में भाग लेते हैं वे सभी पक्षी-निरीक्षक क्लब के सदस्य होते हैंD कोई भी निष्कर्ष निकाला नहीं जा सकता
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पिछली ग्रीष्मकाल की छुट्टियों के दौरान, अंकित एक ग्रीष्म शिविर में गया जहाँ उसने पदयात्र, तैराकी और नौका चालन में भाग लिया। इस ग्रीष्मकाल में उसने एक संगीत शिविर में जाने का मन बनाया है जहाँ वह गाने, नाचने और गिटारवादन सीखने की चाह रखता है। उपर्युक्त सूचना के आधार पर नीचे दिए गए चार निष्कर्ष निकाले गए हैं। इनमें से कौन सा एक उपर्युक्त सूचना में तर्कसंगत रूप से अनुगमित होता है?A अंकित के माता-पिता चाहते हैं कि वह गिटार बजाएB अंकित बाहरी गतिविधियों की अपेक्षा संगीत ज्यादा पसन्द करता हैC अंकित हर ग्रीष्मकाल में किसी-न-किसी प्रकार के शिविर में जाता हैD अंकित गाना और नाचना पसन्द करता है
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निम्नलिखित परिच्छेद और उसके उपरान्त इसी परिच्छेद के आधार पर दिए गए दो कथनों को पढ़िए- दिल्ली हवाई अड्डे पर मुम्बई की उड़ान के लिए चार व्यक्ति प्रतीक्षा कर रहे हैं। दो डॉक्टर हैं और शेष दो व्यापारी हैं। दो गुजराती बोलते हैं और दो तमिल। किसी भी एक व्यवसाय के दो व्यक्ति एक भाषा नहीं बोलते। दो मुसलमान हैं और दो ईसाई। किसी भी एक धर्म के दो व्यक्ति एक व्यवसाय में नहीं हैं, न ही एक भाषा बोलते हैं। तमिल बोलने वाला डॉक्टर ईसाई हैं। 1- इर्साई व्यापारी गुजराती बोलता है 2- गुजराती बोलने वाला डॉक्टर मुसलमान है। उपर्युक्त में से कौनसा/कौन से कथन सही निष्कर्ष है/हैं?A केवल 1B केवल 2C 1 और 2 दोनोंD न तो 1, न ही 2
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निम्निलखित तीन परिच्छेदों को पढ़िए और उसके उपरान्त प्रत्येक परिच्छेद के आधार पर दिए गए प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए इन प्रश्नांशों के आपके उत्तर केवल परिच्छेदों पर ही आधारित होने चाहिए। नए भौगोलिक क्षेत्रें में कभी-कभी मानव हस्तक्षेप के बिना ही विदेशज जातियों का प्राकृतिक रूप से संक्रमण हो जाता है। तथापि मानव क्रिया-कलापों ने इसे अल्प से वृहद् संक्रमण में परिवर्तित कर दिया है। मानव-जनित यह प्रवेश या तो मनुष्य के अप्रत्याशित आवागमन से अथवा समझ बूझ कर अवैधानिक रूप से किसी व्यक्तिगत उद्देश्य की पूर्ति करते हुए अथवा वैधानिक रूप से सर्वसाधारण के आशांकित लाभ हेतु, यथा किसी कीट को नियंत्रण में लाते हुए, नए कृषि उत्पादों को उत्पन्न करते हुए या मनोरंजन के नवीन साधन उपलब्ध कराते हुए हो सकते हैं। बहुत सी प्रदेशज जातियाँ बिना अधिक प्रत्यक्ष प्रभाव के समुदाय में समाहित हो जाती हैं, किन्तु उनमें से कुछ जातियाँ देशज जातियों और प्राकृतिक समुदायों में नाटकीय परिवर्तन के लिए उत्तरदायी होती हैं। उदाहरणार्थ, प्रशान्त महासागर में बसे गुआम द्वीप में भूरे वृक्ष सर्प बोइगा इररेगुलेरिस के अप्रत्याशित प्रवेश और उसके द्वारा नीड़ परभक्षण करने में 10 देशज वन पक्षी जातियाँ विलोपन के कगार पर पहुँच गई हैं। संसार में विद्यमान विशाल जैवविविधता का एक प्रमुख कारण है विशेषक्षेत्री केन्द्रों की उपस्थिति जिससे संसार के विभिन्न भागों में एक जैसे आवासों में भी अलग-अलग समूहों की जातियाँ विकसित हुई हैं। यदि प्रत्येक जाति संसार के हर हिस्से में प्राकृतिक रूप से प्रवेश कर पाती, तो हम यह अपेक्षा कर सकते थे कि कुछ चंद सफल जातियाँ ही प्रत्येक जीवोम में प्रबल बन जातीं। यह समजातीकरण जिसे पैमाने पर प्राकृतिक रूप से हो सकता है, उस पर उन प्रकीर्णन के भौतिक अवरोधों के कारण अधिकांश जातियों की सीमित प्रकीर्णन शक्ति द्वारा रोक लगी हुई है। मानव द्वारा प्रदत्त आवागमन के अवसरों से ये प्राकृत्तिक अवरोध, अनवरत वृद्धि-उन्मुख विदेशज जातियों द्वारा भंग किए जा रहे हैं। इन प्रवेशणों के प्रभावस्वरूप विशाल वैविध्यपूर्ण स्थानीय सामुदायिक संयोजन, कहीं अधिक समजातीय संयोजनों में परिवर्तित हो गए हैं। यह निष्कर्ष निकालना तथापि त्रुटिपूर्ण होगा कि किसी क्षेत्र में जातियों का प्रवेशण वहाँ की जातीय समृद्धता को अपरिहार्य रूप से क्षीण कर देता है। उदाहरणार्थ, यूरोपीय महाद्वीप में पौधों, अकशेरुकियों तथा कशेरुकियों की अनेक जातियाँ पाई जाती हैं जो ब्रिटिश द्वीपसमूह में नदारद हैं (क्योंकि उनमें से बहुत सी जातियाँ अन्तिम हिमयुग के पश्चात् अब तक अपने को पुनर्विवेशन करने में विफल रही हैं) उनके प्रवेशण से ब्रिटिश द्वीपसमूह में जैवविविधता का संवर्धन हो सकता है। उपर्युक्त अर्थपूर्ण क्षतिकारक प्रभाव, अभी उपजता है जब आक्रामक जातियाँ उन देशज जीवजात के सम्मुख नई चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं जिनसे जूझने की क्षमता उनमें नहीं होती। उपर्युक्त परिच्छेद के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन सा सही है?A नए भौगोलिक क्षेत्रें में विदेशज जातियों का प्रवेशण सदैव जैवविविधता को घटाता हैB नए क्षेत्रें में मानव द्वारा विदेशज जातियों को प्रवेश कराने से सदैव स्थानीय पारिस्थितिक-तंत्र में वृहत् परिवर्तन हुए हैंC मानव ही वह अकेला कारक है जिसने विशाल वैविध्यपूर्ण स्थानीय सामुदायिक संयोजनों को कहीं अधिक समजातीय संयोजनों में परिवर्तित कर डाला हैD इस संदर्भ में, उपर्युक्त (A), (B) एवं (C) कथनों में से कोई भी सही नहीं है
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निम्निलखित तीन परिच्छेदों को पढ़िए और उसके उपरान्त प्रत्येक परिच्छेद के आधार पर दिए गए प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए इन प्रश्नांशों के आपके उत्तर केवल परिच्छेदों पर ही आधारित होने चाहिए। नए भौगोलिक क्षेत्रें में कभी-कभी मानव हस्तक्षेप के बिना ही विदेशज जातियों का प्राकृतिक रूप से संक्रमण हो जाता है। तथापि मानव क्रिया-कलापों ने इसे अल्प से वृहद् संक्रमण में परिवर्तित कर दिया है। मानव-जनित यह प्रवेश या तो मनुष्य के अप्रत्याशित आवागमन से अथवा समझ बूझ कर अवैधानिक रूप से किसी व्यक्तिगत उद्देश्य की पूर्ति करते हुए अथवा वैधानिक रूप से सर्वसाधारण के आशांकित लाभ हेतु, यथा किसी कीट को नियंत्रण में लाते हुए, नए कृषि उत्पादों को उत्पन्न करते हुए या मनोरंजन के नवीन साधन उपलब्ध कराते हुए हो सकते हैं। बहुत सी प्रदेशज जातियाँ बिना अधिक प्रत्यक्ष प्रभाव के समुदाय में समाहित हो जाती हैं, किन्तु उनमें से कुछ जातियाँ देशज जातियों और प्राकृतिक समुदायों में नाटकीय परिवर्तन के लिए उत्तरदायी होती हैं। उदाहरणार्थ, प्रशान्त महासागर में बसे गुआम द्वीप में भूरे वृक्ष सर्प बोइगा इररेगुलेरिस के अप्रत्याशित प्रवेश और उसके द्वारा नीड़ परभक्षण करने में 10 देशज वन पक्षी जातियाँ विलोपन के कगार पर पहुँच गई हैं। संसार में विद्यमान विशाल जैवविविधता का एक प्रमुख कारण है विशेषक्षेत्री केन्द्रों की उपस्थिति जिससे संसार के विभिन्न भागों में एक जैसे आवासों में भी अलग-अलग समूहों की जातियाँ विकसित हुई हैं। यदि प्रत्येक जाति संसार के हर हिस्से में प्राकृतिक रूप से प्रवेश कर पाती, तो हम यह अपेक्षा कर सकते थे कि कुछ चंद सफल जातियाँ ही प्रत्येक जीवोम में प्रबल बन जातीं। यह समजातीकरण जिसे पैमाने पर प्राकृतिक रूप से हो सकता है, उस पर उन प्रकीर्णन के भौतिक अवरोधों के कारण अधिकांश जातियों की सीमित प्रकीर्णन शक्ति द्वारा रोक लगी हुई है। मानव द्वारा प्रदत्त आवागमन के अवसरों से ये प्राकृत्तिक अवरोध, अनवरत वृद्धि-उन्मुख विदेशज जातियों द्वारा भंग किए जा रहे हैं। इन प्रवेशणों के प्रभावस्वरूप विशाल वैविध्यपूर्ण स्थानीय सामुदायिक संयोजन, कहीं अधिक समजातीय संयोजनों में परिवर्तित हो गए हैं। यह निष्कर्ष निकालना तथापि त्रुटिपूर्ण होगा कि किसी क्षेत्र में जातियों का प्रवेशण वहाँ की जातीय समृद्धता को अपरिहार्य रूप से क्षीण कर देता है। उदाहरणार्थ, यूरोपीय महाद्वीप में पौधों, अकशेरुकियों तथा कशेरुकियों की अनेक जातियाँ पाई जाती हैं जो ब्रिटिश द्वीपसमूह में नदारद हैं (क्योंकि उनमें से बहुत सी जातियाँ अन्तिम हिमयुग के पश्चात् अब तक अपने को पुनर्विवेशन करने में विफल रही हैं) उनके प्रवेशण से ब्रिटिश द्वीपसमूह में जैवविविधता का संवर्धन हो सकता है। उपर्युक्त अर्थपूर्ण क्षतिकारक प्रभाव, अभी उपजता है जब आक्रामक जातियाँ उन देशज जीवजात के सम्मुख नई चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं जिनसे जूझने की क्षमता उनमें नहीं होती। मानव नए भौगोलिक क्षेत्रें में विदेशज जातियों का क्यों प्रवेशण करता है? 1- स्थानीय जातियों के साथ विदेशज जातियों के प्रजनन के लिए 2- कृषि उत्पादकता में वृद्धि लाने के लिए। 3- सौन्दर्यीकरण और भुदृश्यन के लिए। उपर्युक्त में से कौन सा / से कथन सही है / हैं?A केवल 1B केवल 2 और 3C केवल 1 और 3D 1, 2 और 3
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निम्निलखित तीन परिच्छेदों को पढ़िए और उसके उपरान्त प्रत्येक परिच्छेद के आधार पर दिए गए प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए इन प्रश्नांशों के आपके उत्तर केवल परिच्छेदों पर ही आधारित होने चाहिए। नए भौगोलिक क्षेत्रें में कभी-कभी मानव हस्तक्षेप के बिना ही विदेशज जातियों का प्राकृतिक रूप से संक्रमण हो जाता है। तथापि मानव क्रिया-कलापों ने इसे अल्प से वृहद् संक्रमण में परिवर्तित कर दिया है। मानव-जनित यह प्रवेश या तो मनुष्य के अप्रत्याशित आवागमन से अथवा समझ बूझ कर अवैधानिक रूप से किसी व्यक्तिगत उद्देश्य की पूर्ति करते हुए अथवा वैधानिक रूप से सर्वसाधारण के आशांकित लाभ हेतु, यथा किसी कीट को नियंत्रण में लाते हुए, नए कृषि उत्पादों को उत्पन्न करते हुए या मनोरंजन के नवीन साधन उपलब्ध कराते हुए हो सकते हैं। बहुत सी प्रदेशज जातियाँ बिना अधिक प्रत्यक्ष प्रभाव के समुदाय में समाहित हो जाती हैं, किन्तु उनमें से कुछ जातियाँ देशज जातियों और प्राकृतिक समुदायों में नाटकीय परिवर्तन के लिए उत्तरदायी होती हैं। उदाहरणार्थ, प्रशान्त महासागर में बसे गुआम द्वीप में भूरे वृक्ष सर्प बोइगा इररेगुलेरिस के अप्रत्याशित प्रवेश और उसके द्वारा नीड़ परभक्षण करने में 10 देशज वन पक्षी जातियाँ विलोपन के कगार पर पहुँच गई हैं। संसार में विद्यमान विशाल जैवविविधता का एक प्रमुख कारण है विशेषक्षेत्री केन्द्रों की उपस्थिति जिससे संसार के विभिन्न भागों में एक जैसे आवासों में भी अलग-अलग समूहों की जातियाँ विकसित हुई हैं। यदि प्रत्येक जाति संसार के हर हिस्से में प्राकृतिक रूप से प्रवेश कर पाती, तो हम यह अपेक्षा कर सकते थे कि कुछ चंद सफल जातियाँ ही प्रत्येक जीवोम में प्रबल बन जातीं। यह समजातीकरण जिसे पैमाने पर प्राकृतिक रूप से हो सकता है, उस पर उन प्रकीर्णन के भौतिक अवरोधों के कारण अधिकांश जातियों की सीमित प्रकीर्णन शक्ति द्वारा रोक लगी हुई है। मानव द्वारा प्रदत्त आवागमन के अवसरों से ये प्राकृत्तिक अवरोध, अनवरत वृद्धि-उन्मुख विदेशज जातियों द्वारा भंग किए जा रहे हैं। इन प्रवेशणों के प्रभावस्वरूप विशाल वैविध्यपूर्ण स्थानीय सामुदायिक संयोजन, कहीं अधिक समजातीय संयोजनों में परिवर्तित हो गए हैं। यह निष्कर्ष निकालना तथापि त्रुटिपूर्ण होगा कि किसी क्षेत्र में जातियों का प्रवेशण वहाँ की जातीय समृद्धता को अपरिहार्य रूप से क्षीण कर देता है। उदाहरणार्थ, यूरोपीय महाद्वीप में पौधों, अकशेरुकियों तथा कशेरुकियों की अनेक जातियाँ पाई जाती हैं जो ब्रिटिश द्वीपसमूह में नदारद हैं (क्योंकि उनमें से बहुत सी जातियाँ अन्तिम हिमयुग के पश्चात् अब तक अपने को पुनर्विवेशन करने में विफल रही हैं) उनके प्रवेशण से ब्रिटिश द्वीपसमूह में जैवविविधता का संवर्धन हो सकता है। उपर्युक्त अर्थपूर्ण क्षतिकारक प्रभाव, अभी उपजता है जब आक्रामक जातियाँ उन देशज जीवजात के सम्मुख नई चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं जिनसे जूझने की क्षमता उनमें नहीं होती। प्राकृतिक परिस्थितियों में समजातीय-करण पर कैसे अंकुश लगा रहता है?A स्थानीय आवासों के लिए विशिष्ट जाति समूहों के विकास सेB समुद्री तथा पर्वतीय श्रेणियों की उपस्थिति सेC जाति समूहों के स्थानीय भौतिक और जलवायविक परिस्थितियों के प्रति प्रबल अनुकूलन सेD इस संदर्भ में उपर्युक्त सभी कथन (a), (b) और (c) सही हैं
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निम्निलखित तीन परिच्छेदों को पढ़िए और उसके उपरान्त प्रत्येक परिच्छेद के आधार पर दिए गए प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए इन प्रश्नांशों के आपके उत्तर केवल परिच्छेदों पर ही आधारित होने चाहिए। नए भौगोलिक क्षेत्रें में कभी-कभी मानव हस्तक्षेप के बिना ही विदेशज जातियों का प्राकृतिक रूप से संक्रमण हो जाता है। तथापि मानव क्रिया-कलापों ने इसे अल्प से वृहद् संक्रमण में परिवर्तित कर दिया है। मानव-जनित यह प्रवेश या तो मनुष्य के अप्रत्याशित आवागमन से अथवा समझ बूझ कर अवैधानिक रूप से किसी व्यक्तिगत उद्देश्य की पूर्ति करते हुए अथवा वैधानिक रूप से सर्वसाधारण के आशांकित लाभ हेतु, यथा किसी कीट को नियंत्रण में लाते हुए, नए कृषि उत्पादों को उत्पन्न करते हुए या मनोरंजन के नवीन साधन उपलब्ध कराते हुए हो सकते हैं। बहुत सी प्रदेशज जातियाँ बिना अधिक प्रत्यक्ष प्रभाव के समुदाय में समाहित हो जाती हैं, किन्तु उनमें से कुछ जातियाँ देशज जातियों और प्राकृतिक समुदायों में नाटकीय परिवर्तन के लिए उत्तरदायी होती हैं। उदाहरणार्थ, प्रशान्त महासागर में बसे गुआम द्वीप में भूरे वृक्ष सर्प बोइगा इररेगुलेरिस के अप्रत्याशित प्रवेश और उसके द्वारा नीड़ परभक्षण करने में 10 देशज वन पक्षी जातियाँ विलोपन के कगार पर पहुँच गई हैं। संसार में विद्यमान विशाल जैवविविधता का एक प्रमुख कारण है विशेषक्षेत्री केन्द्रों की उपस्थिति जिससे संसार के विभिन्न भागों में एक जैसे आवासों में भी अलग-अलग समूहों की जातियाँ विकसित हुई हैं। यदि प्रत्येक जाति संसार के हर हिस्से में प्राकृतिक रूप से प्रवेश कर पाती, तो हम यह अपेक्षा कर सकते थे कि कुछ चंद सफल जातियाँ ही प्रत्येक जीवोम में प्रबल बन जातीं। यह समजातीकरण जिसे पैमाने पर प्राकृतिक रूप से हो सकता है, उस पर उन प्रकीर्णन के भौतिक अवरोधों के कारण अधिकांश जातियों की सीमित प्रकीर्णन शक्ति द्वारा रोक लगी हुई है। मानव द्वारा प्रदत्त आवागमन के अवसरों से ये प्राकृत्तिक अवरोध, अनवरत वृद्धि-उन्मुख विदेशज जातियों द्वारा भंग किए जा रहे हैं। इन प्रवेशणों के प्रभावस्वरूप विशाल वैविध्यपूर्ण स्थानीय सामुदायिक संयोजन, कहीं अधिक समजातीय संयोजनों में परिवर्तित हो गए हैं। यह निष्कर्ष निकालना तथापि त्रुटिपूर्ण होगा कि किसी क्षेत्र में जातियों का प्रवेशण वहाँ की जातीय समृद्धता को अपरिहार्य रूप से क्षीण कर देता है। उदाहरणार्थ, यूरोपीय महाद्वीप में पौधों, अकशेरुकियों तथा कशेरुकियों की अनेक जातियाँ पाई जाती हैं जो ब्रिटिश द्वीपसमूह में नदारद हैं (क्योंकि उनमें से बहुत सी जातियाँ अन्तिम हिमयुग के पश्चात् अब तक अपने को पुनर्विवेशन करने में विफल रही हैं) उनके प्रवेशण से ब्रिटिश द्वीपसमूह में जैवविविधता का संवर्धन हो सकता है। उपर्युक्त अर्थपूर्ण क्षतिकारक प्रभाव, अभी उपजता है जब आक्रामक जातियाँ उन देशज जीवजात के सम्मुख नई चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं जिनसे जूझने की क्षमता उनमें नहीं होती। मानव ने जैवविविधता को कैसे प्रभावित किया है? 1- जीवित जीवों की तस्करी द्वारा 2- राजमार्गों के निर्माण द्वारा 3- पारिस्थितिक-तंत्र को संवेदनशील बनाकर जिससे कि नई जातियाँ उसमें प्रवेश न कर सकें। 4- यह सुनिश्चित करके कि नई जातियों का स्थानीय जातियों पर अधिक प्रभाव न पड़ सके। उपर्युक्त में से कौन से कथन सही हैं?A 1 और 2B 2 और 3C 1 और 3D 2 और 4
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निम्निलखित तीन परिच्छेदों को पढ़िए और उसके उपरान्त प्रत्येक परिच्छेद के आधार पर दिए गए प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए इन प्रश्नांशों के आपके उत्तर केवल परिच्छेदों पर ही आधारित होने चाहिए। नए भौगोलिक क्षेत्रें में कभी-कभी मानव हस्तक्षेप के बिना ही विदेशज जातियों का प्राकृतिक रूप से संक्रमण हो जाता है। तथापि मानव क्रिया-कलापों ने इसे अल्प से वृहद् संक्रमण में परिवर्तित कर दिया है। मानव-जनित यह प्रवेश या तो मनुष्य के अप्रत्याशित आवागमन से अथवा समझ बूझ कर अवैधानिक रूप से किसी व्यक्तिगत उद्देश्य की पूर्ति करते हुए अथवा वैधानिक रूप से सर्वसाधारण के आशांकित लाभ हेतु, यथा किसी कीट को नियंत्रण में लाते हुए, नए कृषि उत्पादों को उत्पन्न करते हुए या मनोरंजन के नवीन साधन उपलब्ध कराते हुए हो सकते हैं। बहुत सी प्रदेशज जातियाँ बिना अधिक प्रत्यक्ष प्रभाव के समुदाय में समाहित हो जाती हैं, किन्तु उनमें से कुछ जातियाँ देशज जातियों और प्राकृतिक समुदायों में नाटकीय परिवर्तन के लिए उत्तरदायी होती हैं। उदाहरणार्थ, प्रशान्त महासागर में बसे गुआम द्वीप में भूरे वृक्ष सर्प बोइगा इररेगुलेरिस के अप्रत्याशित प्रवेश और उसके द्वारा नीड़ परभक्षण करने में 10 देशज वन पक्षी जातियाँ विलोपन के कगार पर पहुँच गई हैं। संसार में विद्यमान विशाल जैवविविधता का एक प्रमुख कारण है विशेषक्षेत्री केन्द्रों की उपस्थिति जिससे संसार के विभिन्न भागों में एक जैसे आवासों में भी अलग-अलग समूहों की जातियाँ विकसित हुई हैं। यदि प्रत्येक जाति संसार के हर हिस्से में प्राकृतिक रूप से प्रवेश कर पाती, तो हम यह अपेक्षा कर सकते थे कि कुछ चंद सफल जातियाँ ही प्रत्येक जीवोम में प्रबल बन जातीं। यह समजातीकरण जिसे पैमाने पर प्राकृतिक रूप से हो सकता है, उस पर उन प्रकीर्णन के भौतिक अवरोधों के कारण अधिकांश जातियों की सीमित प्रकीर्णन शक्ति द्वारा रोक लगी हुई है। मानव द्वारा प्रदत्त आवागमन के अवसरों से ये प्राकृत्तिक अवरोध, अनवरत वृद्धि-उन्मुख विदेशज जातियों द्वारा भंग किए जा रहे हैं। इन प्रवेशणों के प्रभावस्वरूप विशाल वैविध्यपूर्ण स्थानीय सामुदायिक संयोजन, कहीं अधिक समजातीय संयोजनों में परिवर्तित हो गए हैं। यह निष्कर्ष निकालना तथापि त्रुटिपूर्ण होगा कि किसी क्षेत्र में जातियों का प्रवेशण वहाँ की जातीय समृद्धता को अपरिहार्य रूप से क्षीण कर देता है। उदाहरणार्थ, यूरोपीय महाद्वीप में पौधों, अकशेरुकियों तथा कशेरुकियों की अनेक जातियाँ पाई जाती हैं जो ब्रिटिश द्वीपसमूह में नदारद हैं (क्योंकि उनमें से बहुत सी जातियाँ अन्तिम हिमयुग के पश्चात् अब तक अपने को पुनर्विवेशन करने में विफल रही हैं) उनके प्रवेशण से ब्रिटिश द्वीपसमूह में जैवविविधता का संवर्धन हो सकता है। उपर्युक्त अर्थपूर्ण क्षतिकारक प्रभाव, अभी उपजता है जब आक्रामक जातियाँ उन देशज जीवजात के सम्मुख नई चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं जिनसे जूझने की क्षमता उनमें नहीं होती। विदेशज जातियों के संक्रमण का पारिस्थितिक-तंत्र पर क्या प्रभाव हो सकता है? 1- देशज जातियों का क्षरण। 2- पारिस्थितिक-तंत्र समुदाय के जाति संघटन में परिवर्तन। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-A केवल 1B केवल 2C 1 और 2 दोनोंD न तो 1, न ही 2
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लोकतंत्र के अधिकांश हिमायती भी यह सुझाने में बल्कि वाक्संयम बरतते रहे हैं कि लोकतंत्र स्वयं ही विकास को और समाज-कल्याण-संवृद्धि को बढ़ाता है- उनकी प्रवृत्ति इन्हें अच्छे किन्तु सुस्पष्टतः अलग और व्यापक रूप से स्वतंत्र लक्ष्यों के रूप में देखने की हुई है। दूसरी ओर, लोकतंत्र के निंन्दक जिसे लोकतंत्र और विकास के बीच गम्भीर तनावों के रूप में देखते हैं, उस पर अपना निदानात्मक विचार व्यक्त करने के लिए काफी इच्छुक प्रतीत हुए हैं, फ्मन बनाइए, आपको लोकतंत्र चाहिए, या इसकी जगह, आप विकास चाहते हैं- बहुधा इस व्यावहारिक विभाजन वाले सिद्धान्तवादी, कम-से-कम प्रारम्भ में, पूर्वी एशियाइ्र देशों से आए, और जैसे-जैसे1970 वे 1980 के दशकों के पूरे दौर में व बाद में भी- ये अनेक देश लोकतंत्र का अनुसरण किए बगैर आर्थिक विकास के संवर्धन में अत्यधिक कामयाब होते गए, उनके इस मत का प्रभाव बढ़ता गया है। इस मुद्दों के सम्बन्ध में हमें खास ध्यान इन दोनों अंतर्विषयों पर देना पड़ेगा कि विकास किसे कहा जा सकता है और लोकतंत्र की व्याख्या क्या है (विशेषकर मतदान और जनविवेक की अपनी-अपनी भूमिकाओं के संदर्भ में), विकास का मूल्यांकन, लोग जो जीवन जी पाते हैं और जिस वास्तविक स्वतंत्रता का वे उपभोग करते हैं, उससे पृथक् नहीं किया जा सकता। विकास, विरले ही, सुविधा की निर्जीव वस्तुओं की संवृद्धि के आधार पर देखा जा सकता है, जैसे कि GPN (या व्यक्तिगत आमदनी) या औद्योगीकरण में वृद्धि-चाहे ये वास्तविक लक्ष्यों के साधनों के रूप में कितने ही महत्वपूर्ण हों, इनका मूल्य इस बात पर निर्भर करता है कि ये सम्बन्धित लोगों की जिन्दगियों व उनकी स्वतंत्रता पर क्या प्रभाव डालते हैं, जो कि विकास के विचार का केन्द्रबिदु होना ही चाहिए। यदि विकास को, अपेक्षाकृत अधिक व्यापक ढंग से, मनुष्य की जिन्दगियों पर संकेन्द्रित कर समझा जाए, तो यह तत्काल स्पष्ट हो जाता है कि विकास व लोकतंत्र के बीच के सम्बन्ध को अंशतः उनके मूलभूत संयोजन के आधार पर देखा जाना चाहिए न कि मात्र उनके बाह्य सम्पर्कों के द्वारा, यद्यपि अक्सर यह सवाल भी पूछा जाता रहा है कि क्या राजनैतिक स्वतंत्रताएं एवं लोकतांत्रिक अधिकार विकास के ‘संघटक अवयवों’ में से हैं। विकास हेतु इनकी प्रासंगिकता अप्रत्यक्षतः GPN की अभिवृद्धि में उनके योगदान के द्वारा प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं होती। परिच्छेद के अनुसार लोकतंत्र के निंदक लोकतंत्र व विकास के मध्य क्यों एक गम्भीर तनाव समझते हैं?A लोकतंत्र व विकास सुस्पष्ट और पृथक, लक्ष्य हैंB आर्थिक अभिवृद्धि को, शासन की लोकतंत्रीय प्रणाली का अनुसरण किए बगैर भी सफलतापूर्वक उन्नत किया जा सकता हैC गैर-लोकतांत्रिक शासन-प्रणालियाँ आर्थिक अभिवृद्धि को, लोकतांत्रिक शासन-प्रणालियों की तुलना में, अधिक तीव्र गति से तथा अधिक सफलतापूर्वक प्रदान करती हैंD ऊपर दिए गए सभी (a), (b) व (c) कथन इस संदर्भ में सही हैं
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लोकतंत्र के अधिकांश हिमायती भी यह सुझाने में बल्कि वाक्संयम बरतते रहे हैं कि लोकतंत्र स्वयं ही विकास को और समाज-कल्याण-संवृद्धि को बढ़ाता है- उनकी प्रवृत्ति इन्हें अच्छे किन्तु सुस्पष्टतः अलग और व्यापक रूप से स्वतंत्र लक्ष्यों के रूप में देखने की हुई है। दूसरी ओर, लोकतंत्र के निंन्दक जिसे लोकतंत्र और विकास के बीच गम्भीर तनावों के रूप में देखते हैं, उस पर अपना निदानात्मक विचार व्यक्त करने के लिए काफी इच्छुक प्रतीत हुए हैं, फ्मन बनाइए, आपको लोकतंत्र चाहिए, या इसकी जगह, आप विकास चाहते हैं- बहुधा इस व्यावहारिक विभाजन वाले सिद्धान्तवादी, कम-से-कम प्रारम्भ में, पूर्वी एशियाइ्र देशों से आए, और जैसे-जैसे1970 वे 1980 के दशकों के पूरे दौर में व बाद में भी- ये अनेक देश लोकतंत्र का अनुसरण किए बगैर आर्थिक विकास के संवर्धन में अत्यधिक कामयाब होते गए, उनके इस मत का प्रभाव बढ़ता गया है। इस मुद्दों के सम्बन्ध में हमें खास ध्यान इन दोनों अंतर्विषयों पर देना पड़ेगा कि विकास किसे कहा जा सकता है और लोकतंत्र की व्याख्या क्या है (विशेषकर मतदान और जनविवेक की अपनी-अपनी भूमिकाओं के संदर्भ में), विकास का मूल्यांकन, लोग जो जीवन जी पाते हैं और जिस वास्तविक स्वतंत्रता का वे उपभोग करते हैं, उससे पृथक् नहीं किया जा सकता। विकास, विरले ही, सुविधा की निर्जीव वस्तुओं की संवृद्धि के आधार पर देखा जा सकता है, जैसे कि GPN (या व्यक्तिगत आमदनी) या औद्योगीकरण में वृद्धि-चाहे ये वास्तविक लक्ष्यों के साधनों के रूप में कितने ही महत्वपूर्ण हों, इनका मूल्य इस बात पर निर्भर करता है कि ये सम्बन्धित लोगों की जिन्दगियों व उनकी स्वतंत्रता पर क्या प्रभाव डालते हैं, जो कि विकास के विचार का केन्द्रबिदु होना ही चाहिए। यदि विकास को, अपेक्षाकृत अधिक व्यापक ढंग से, मनुष्य की जिन्दगियों पर संकेन्द्रित कर समझा जाए, तो यह तत्काल स्पष्ट हो जाता है कि विकास व लोकतंत्र के बीच के सम्बन्ध को अंशतः उनके मूलभूत संयोजन के आधार पर देखा जाना चाहिए न कि मात्र उनके बाह्य सम्पर्कों के द्वारा, यद्यपि अक्सर यह सवाल भी पूछा जाता रहा है कि क्या राजनैतिक स्वतंत्रताएं एवं लोकतांत्रिक अधिकार विकास के ‘संघटक अवयवों’ में से हैं। विकास हेतु इनकी प्रासंगिकता अप्रत्यक्षतः GPN की अभिवृद्धि में उनके योगदान के द्वारा प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं होती। परिच्छेद के अनुसार, विकास का अन्तिम मूल्यांकन/लक्ष्य/दृष्टि क्या होना चाहिए?A प्रति व्यक्ति आय व औद्योगिक संवृद्धि दरों में वृद्धिB मानव विकास सूचकांक तथा GNP में सुधारC बचतों व उपभोग प्रवृतियों में वृद्धिD उस वास्तविक स्वतंत्रता का विस्तार जिसका नागरिक उपभोग करते हैं
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लोकतंत्र के अधिकांश हिमायती भी यह सुझाने में बल्कि वाक्संयम बरतते रहे हैं कि लोकतंत्र स्वयं ही विकास को और समाज-कल्याण-संवृद्धि को बढ़ाता है- उनकी प्रवृत्ति इन्हें अच्छे किन्तु सुस्पष्टतः अलग और व्यापक रूप से स्वतंत्र लक्ष्यों के रूप में देखने की हुई है। दूसरी ओर, लोकतंत्र के निंन्दक जिसे लोकतंत्र और विकास के बीच गम्भीर तनावों के रूप में देखते हैं, उस पर अपना निदानात्मक विचार व्यक्त करने के लिए काफी इच्छुक प्रतीत हुए हैं, फ्मन बनाइए, आपको लोकतंत्र चाहिए, या इसकी जगह, आप विकास चाहते हैं- बहुधा इस व्यावहारिक विभाजन वाले सिद्धान्तवादी, कम-से-कम प्रारम्भ में, पूर्वी एशियाइ्र देशों से आए, और जैसे-जैसे1970 वे 1980 के दशकों के पूरे दौर में व बाद में भी- ये अनेक देश लोकतंत्र का अनुसरण किए बगैर आर्थिक विकास के संवर्धन में अत्यधिक कामयाब होते गए, उनके इस मत का प्रभाव बढ़ता गया है। इस मुद्दों के सम्बन्ध में हमें खास ध्यान इन दोनों अंतर्विषयों पर देना पड़ेगा कि विकास किसे कहा जा सकता है और लोकतंत्र की व्याख्या क्या है (विशेषकर मतदान और जनविवेक की अपनी-अपनी भूमिकाओं के संदर्भ में), विकास का मूल्यांकन, लोग जो जीवन जी पाते हैं और जिस वास्तविक स्वतंत्रता का वे उपभोग करते हैं, उससे पृथक् नहीं किया जा सकता। विकास, विरले ही, सुविधा की निर्जीव वस्तुओं की संवृद्धि के आधार पर देखा जा सकता है, जैसे कि GPN (या व्यक्तिगत आमदनी) या औद्योगीकरण में वृद्धि-चाहे ये वास्तविक लक्ष्यों के साधनों के रूप में कितने ही महत्वपूर्ण हों, इनका मूल्य इस बात पर निर्भर करता है कि ये सम्बन्धित लोगों की जिन्दगियों व उनकी स्वतंत्रता पर क्या प्रभाव डालते हैं, जो कि विकास के विचार का केन्द्रबिदु होना ही चाहिए। यदि विकास को, अपेक्षाकृत अधिक व्यापक ढंग से, मनुष्य की जिन्दगियों पर संकेन्द्रित कर समझा जाए, तो यह तत्काल स्पष्ट हो जाता है कि विकास व लोकतंत्र के बीच के सम्बन्ध को अंशतः उनके मूलभूत संयोजन के आधार पर देखा जाना चाहिए न कि मात्र उनके बाह्य सम्पर्कों के द्वारा, यद्यपि अक्सर यह सवाल भी पूछा जाता रहा है कि क्या राजनैतिक स्वतंत्रताएं एवं लोकतांत्रिक अधिकार विकास के ‘संघटक अवयवों’ में से हैं। विकास हेतु इनकी प्रासंगिकता अप्रत्यक्षतः GPN की अभिवृद्धि में उनके योगदान के द्वारा प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं होती। लोकतंत्र व विकास के मध्य ‘मूलभूत’ संयोजन का क्या निहितार्थ है?A इनके मध्य सम्बन्ध को बाह्य सम्पर्कों के माध्यम से देखा जाना चाहिएB केवल राजनैतिक व नागरिक अधिकार ही आर्थिक विकास की ओर ले जा सकते हैंC राजनैतिक स्वतंत्रताएं एवं लोकतांत्रिक अधिकार विकास के सारभूत तत्त्व हैंD ऊपर दिए गए कथन (a), (b) व (c) में से कोई भी कथन इस संदर्भ में सही नहीं है
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प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के उदारीकरण के साथ प्रतियोगिता नियम की आवश्यकता और संपुष्ट हो जाती है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रभाव सदैव प्रतियोगिता के पक्ष में नहीं होता। बहुधा, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, किसी घरेलू प्रतिष्ठान का अधिग्रहण कर अथवा किसी प्रतिष्ठान के साथ संयुक्त उद्यम की स्थापना कर, एक विदेशी निगम का रूप ले लेता है। इस प्रकार का अधिग्रहण करने से विदेशी निवेशक प्रतियोगिता को पर्याप्त रूप से कम कर सकता है और संगत बाजार में प्रबल स्थान हासिल कर सकता है और इस प्रकार ऊँची कीमतें प्रभावित कर सकता है, दूसरा वह दृश्य है जहाँ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के उदारीकरण के अनुगमन में दो भिन्न बहुराष्ट्रीय कम्पनियों (MNCs) के सम्बद्ध पक्ष एक विशेष विकासशील अर्थव्यवस्था में एक दूसरे के साथ प्रतियोगिता में स्थापित हुए हों। बाद में जनक कम्पनियों का, जो विदेश में हैं विलय हो जाता है। जब कम्पनियों के सम्बद्ध पक्ष स्वतंत्र नहीं रह जाते, मेजबान देश में प्रतियोगिता वास्तव में समाप्त हो सकती है और उत्पादों की कीमतों में कृत्रिम स्फीति आ सकती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा किए गए अधिग्रहणों और विलयनों के इन अधिकांश विपरीत परिणामों को काफी हद तक, एक प्रभावी प्रतियोगिता नियम को ला कर, टाला जा सकता है। साथ ही, एक ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसने एक प्रभावी प्रतियोगिता नियम को कार्यान्वित किया हो, इसे कार्यान्वित न करने वाली अर्थव्यवस्था की तुलना में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित कर पाने के लिए बेहतर स्थिति में होती है। ऐसा केवल इसलिए नहीं है कि ज्यादातर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से अपने गृह देश में इस प्रकार के नियम के प्रचालन के अभ्यस्त हो जाने और इस प्रकार के मामलों से निबटने में सक्षम होने की प्रत्याशा की जाती है। अपितु इसलिए भी, कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी प्रतियोगिता के प्राधिकरणों से यह प्रत्याशा रखती हैं कि वे घरेलू और विदेशी प्रतिष्ठानों के बीच समस्तरीय दशाओं पर प्रतियोगिता सुनिश्चित करेंगे। इस परिच्छेद के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए- 1- यह वांछनीय है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रभाव प्रतियोगिता के पक्ष में हो। 2- विदेशी निवेशकों के प्रवेश से, आवश्यक रूप से घरेलू बाजारों की कीमतों में स्फीति आती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन सा / से सही है / हैं?A केवल 1B केवल 2C 1 और 2 दोनोंD न तो 1, न ही 2
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प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के उदारीकरण के साथ प्रतियोगिता नियम की आवश्यकता और संपुष्ट हो जाती है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रभाव सदैव प्रतियोगिता के पक्ष में नहीं होता। बहुधा, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, किसी घरेलू प्रतिष्ठान का अधिग्रहण कर अथवा किसी प्रतिष्ठान के साथ संयुक्त उद्यम की स्थापना कर, एक विदेशी निगम का रूप ले लेता है। इस प्रकार का अधिग्रहण करने से विदेशी निवेशक प्रतियोगिता को पर्याप्त रूप से कम कर सकता है और संगत बाजार में प्रबल स्थान हासिल कर सकता है और इस प्रकार ऊँची कीमतें प्रभावित कर सकता है, दूसरा वह दृश्य है जहाँ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के उदारीकरण के अनुगमन में दो भिन्न बहुराष्ट्रीय कम्पनियों (MNCs) के सम्बद्ध पक्ष एक विशेष विकासशील अर्थव्यवस्था में एक दूसरे के साथ प्रतियोगिता में स्थापित हुए हों। बाद में जनक कम्पनियों का, जो विदेश में हैं विलय हो जाता है। जब कम्पनियों के सम्बद्ध पक्ष स्वतंत्र नहीं रह जाते, मेजबान देश में प्रतियोगिता वास्तव में समाप्त हो सकती है और उत्पादों की कीमतों में कृत्रिम स्फीति आ सकती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा किए गए अधिग्रहणों और विलयनों के इन अधिकांश विपरीत परिणामों को काफी हद तक, एक प्रभावी प्रतियोगिता नियम को ला कर, टाला जा सकता है। साथ ही, एक ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसने एक प्रभावी प्रतियोगिता नियम को कार्यान्वित किया हो, इसे कार्यान्वित न करने वाली अर्थव्यवस्था की तुलना में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित कर पाने के लिए बेहतर स्थिति में होती है। ऐसा केवल इसलिए नहीं है कि ज्यादातर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से अपने गृह देश में इस प्रकार के नियम के प्रचालन के अभ्यस्त हो जाने और इस प्रकार के मामलों से निबटने में सक्षम होने की प्रत्याशा की जाती है। अपितु इसलिए भी, कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी प्रतियोगिता के प्राधिकरणों से यह प्रत्याशा रखती हैं कि वे घरेलू और विदेशी प्रतिष्ठानों के बीच समस्तरीय दशाओं पर प्रतियोगिता सुनिश्चित करेंगे। इस परिच्छेद के अनुसार, किस प्रकार एक विदेशी निवेशक संगत घरेलू बाजार पर प्रबलता स्थापित कर लेता है? 1- बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ घरेलू नियमों की अभ्यस्त हो जाती हैं। 2- विदेशी कम्पनियाँ, घरेलू कम्पनियों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित कर लेती हैं। 3- एक विशेष बाजार / क्षेत्रक के सम्बद्ध पक्ष अपनी स्वतंत्रता खो देते हैं क्योंकि उनकी विदेश स्थित जनक कम्पनियाँ आपस में विलय कर लेती हैं। 4- विदेशी कम्पनियाँ अपने उत्पादों की लागत की घरेलू कम्पनियों के उत्पादों की लागत की तुलना में घटा देती हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन से सही हैं?A केवल 1 और 2B केवल 2 और 3C केवल 1, 2 और 3D 1, 2, 3 और 4
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प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के उदारीकरण के साथ प्रतियोगिता नियम की आवश्यकता और संपुष्ट हो जाती है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रभाव सदैव प्रतियोगिता के पक्ष में नहीं होता। बहुधा, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, किसी घरेलू प्रतिष्ठान का अधिग्रहण कर अथवा किसी प्रतिष्ठान के साथ संयुक्त उद्यम की स्थापना कर, एक विदेशी निगम का रूप ले लेता है। इस प्रकार का अधिग्रहण करने से विदेशी निवेशक प्रतियोगिता को पर्याप्त रूप से कम कर सकता है और संगत बाजार में प्रबल स्थान हासिल कर सकता है और इस प्रकार ऊँची कीमतें प्रभावित कर सकता है, दूसरा वह दृश्य है जहाँ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के उदारीकरण के अनुगमन में दो भिन्न बहुराष्ट्रीय कम्पनियों (MNCs) के सम्बद्ध पक्ष एक विशेष विकासशील अर्थव्यवस्था में एक दूसरे के साथ प्रतियोगिता में स्थापित हुए हों। बाद में जनक कम्पनियों का, जो विदेश में हैं विलय हो जाता है। जब कम्पनियों के सम्बद्ध पक्ष स्वतंत्र नहीं रह जाते, मेजबान देश में प्रतियोगिता वास्तव में समाप्त हो सकती है और उत्पादों की कीमतों में कृत्रिम स्फीति आ सकती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा किए गए अधिग्रहणों और विलयनों के इन अधिकांश विपरीत परिणामों को काफी हद तक, एक प्रभावी प्रतियोगिता नियम को ला कर, टाला जा सकता है। साथ ही, एक ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसने एक प्रभावी प्रतियोगिता नियम को कार्यान्वित किया हो, इसे कार्यान्वित न करने वाली अर्थव्यवस्था की तुलना में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित कर पाने के लिए बेहतर स्थिति में होती है। ऐसा केवल इसलिए नहीं है कि ज्यादातर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से अपने गृह देश में इस प्रकार के नियम के प्रचालन के अभ्यस्त हो जाने और इस प्रकार के मामलों से निबटने में सक्षम होने की प्रत्याशा की जाती है। अपितु इसलिए भी, कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी प्रतियोगिता के प्राधिकरणों से यह प्रत्याशा रखती हैं कि वे घरेलू और विदेशी प्रतिष्ठानों के बीच समस्तरीय दशाओं पर प्रतियोगिता सुनिश्चित करेंगे। इस परिच्छेद का क्या निष्कर्ष है?A विदेशी निवेशक और बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ घरेलू बाजार पर सदैव प्रबलता स्थापित कर लेती हैंB कम्पनियों का विलय होने देना घरेलू अर्थव्यवस्था के सर्वश्रेष्ठ हितों में से नहीं हैC प्रतियोगिता नियम के द्वारा, घरेलू और विदेशी प्रतिष्ठानों के बीच प्रतियोगिता हेतु समस्तरीय दशाएं सुनिश्चित करना सरल हो जाता हैD खुली अर्थव्यवस्था वाले देशों के लिए, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश विकास हेतु आवश्यक है।
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W, X, Y, Y एवं Z चार राजनीतिक दलों ने आगामी संसदीय चुनावों के लिए संयुक्त उम्मीदवार खड़ा करने का निर्णय लिया है। किसी भी उम्मीदवार का सबसे अधिक दलों द्वारा स्वीकार किया जाना ही उम्मीदवार के चयन का आधार है। A, B, C एवं D चार प्रार्थी उम्मीदवार इन दलों के पास टिकट पाने के लिए आते हैं। A उम्मीदवार W को स्वीकार्य है किन्तु Z को नहीं हैं। B उम्मीदवार Y को स्वीकार्य है किन्तु X को नहीं हैं C उम्मीदवार W एवं Y को स्वीकार्य है। D उम्मीदवार W एवं X को स्वीकार्य है। जब B उम्मीदवार को W एवं Z ने पसन्द किया, C उम्मीदवार को X एवं Z ने पसन्द किया और A उम्मीदवार X को स्वीकार्य था किन्तु Y को नहीं था_ तो टिकट किसे मिली?A AB BC CD D
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़िए और उसके उपरान्त प्रत्येक परिच्छेद के आधार पर दिए गए प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए। इन प्रश्नांशों के आपके उत्तर केवल परिच्छेदों पर ही आधारित होने चाहिए। निर्धनों को, खासकरबाजार अर्थव्यवस्थाओं में, उस क्षमता की आवश्यकता होती है, जिसे समूहन, उनके सामाजिक-आर्थिक कल्याण और अभिव्यक्ति के संवर्धन के लिए तथा मुक्त बाजार व्यक्तिवाद के विरुद्ध एक संरक्षण के रूप में, अपने लिए अधिक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अवसर सृजित करने के लिए प्रदान हैं। यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि कृषि का समूह उपागम, विशेषतः ऊर्ध्वागामी कृषि-उत्पाद समूहनों के रूप में कृषि उत्पादकता वृद्धि के साथ-साथ निर्धनता-उन्मूलन तथा निर्धनों के सशक्तीकरण के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। तथापि, इस सम्भावना को साकार करने हेतु, आवश्यक होगा कि समूह की प्रकृति स्वैच्छिक, आकार छोटा, निर्णयन में सहभागिता तथा कार्य-आवंटन और लाभ-संवितरण में साम्यमूलकता हो, विविध संदर्भों में, जैसे संक्रमण अर्थव्यवस्थाओं में, ऐसे समहूनों के अनेक उल्लेखनीय उदाहरण हैं। ये सभी निश्चित परिस्थितियों में, सफल सहभागिता की सम्भावनाओं के साक्ष्य वहन करते हैं, औ यद्यपि संक्रमण अर्थव्यवस्थाओं में परिवार सहकारिताओं का लिंग-प्रभाव अनिश्चित है, किन्तु महिला-मात्र आधारित समूह कृषि के भारतीय उदाहरण महिलाओं को लाभान्वित करने की पर्याप्त सम्भावनाओं को बताते हैं। कृषि समूहन, जैसे कि समूह आधारित कृषि, ग्रामीण निर्धनों को- 1- सशक्तीकरण प्रदान कर सकते हैं। 2- वर्धित कृषि उत्पादकता प्रदान कर सकते हैं। 3- शोषणपरक बाजारों के विरुद्ध सुरक्षण प्रदान कर सकते हैं। 4- कृषि वस्तुओं का अतिरेक उत्पादक प्रदान कर सकते हैं। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-A 1, 2, 3 और 4B केवल 1, 2 और 3C केवल 2 और 4D केवल 1, 3 और 4
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़िए और उसके उपरान्त प्रत्येक परिच्छेद के आधार पर दिए गए प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए। इन प्रश्नांशों के आपके उत्तर केवल परिच्छेदों पर ही आधारित होने चाहिए। निर्धनों को, खासकरबाजार अर्थव्यवस्थाओं में, उस क्षमता की आवश्यकता होती है, जिसे समूहन, उनके सामाजिक-आर्थिक कल्याण और अभिव्यक्ति के संवर्धन के लिए तथा मुक्त बाजार व्यक्तिवाद के विरुद्ध एक संरक्षण के रूप में, अपने लिए अधिक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अवसर सृजित करने के लिए प्रदान हैं। यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि कृषि का समूह उपागम, विशेषतः ऊर्ध्वागामी कृषि-उत्पाद समूहनों के रूप में कृषि उत्पादकता वृद्धि के साथ-साथ निर्धनता-उन्मूलन तथा निर्धनों के सशक्तीकरण के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। तथापि, इस सम्भावना को साकार करने हेतु, आवश्यक होगा कि समूह की प्रकृति स्वैच्छिक, आकार छोटा, निर्णयन में सहभागिता तथा कार्य-आवंटन और लाभ-संवितरण में साम्यमूलकता हो, विविध संदर्भों में, जैसे संक्रमण अर्थव्यवस्थाओं में, ऐसे समहूनों के अनेक उल्लेखनीय उदाहरण हैं। ये सभी निश्चित परिस्थितियों में, सफल सहभागिता की सम्भावनाओं के साक्ष्य वहन करते हैं, औ यद्यपि संक्रमण अर्थव्यवस्थाओं में परिवार सहकारिताओं का लिंग-प्रभाव अनिश्चित है, किन्तु महिला-मात्र आधारित समूह कृषि के भारतीय उदाहरण महिलाओं को लाभान्वित करने की पर्याप्त सम्भावनाओं को बताते हैं। ‘लिंग प्रभाव’ से लेखक का क्या तात्पर्य है?A महिलाएं सहकारिताओं में संदेहास्पद सहभागी हैंB परिवार-सहकारिताओं में महिलाएं सम्मिलित नहीं भी हो सकती हैंC समूह कृषि से लाभान्वित होती महिलाएंD संक्रमण अर्थव्यवस्थाओं में महिलाओं की भूमिका अत्यन्त प्रतिबंधात्मक है
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़िए और उसके उपरान्त प्रत्येक परिच्छेद के आधार पर दिए गए प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए। इन प्रश्नांशों के आपके उत्तर केवल परिच्छेदों पर ही आधारित होने चाहिए। निर्धनों को, खासकरबाजार अर्थव्यवस्थाओं में, उस क्षमता की आवश्यकता होती है, जिसे समूहन, उनके सामाजिक-आर्थिक कल्याण और अभिव्यक्ति के संवर्धन के लिए तथा मुक्त बाजार व्यक्तिवाद के विरुद्ध एक संरक्षण के रूप में, अपने लिए अधिक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अवसर सृजित करने के लिए प्रदान हैं। यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि कृषि का समूह उपागम, विशेषतः ऊर्ध्वागामी कृषि-उत्पाद समूहनों के रूप में कृषि उत्पादकता वृद्धि के साथ-साथ निर्धनता-उन्मूलन तथा निर्धनों के सशक्तीकरण के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। तथापि, इस सम्भावना को साकार करने हेतु, आवश्यक होगा कि समूह की प्रकृति स्वैच्छिक, आकार छोटा, निर्णयन में सहभागिता तथा कार्य-आवंटन और लाभ-संवितरण में साम्यमूलकता हो, विविध संदर्भों में, जैसे संक्रमण अर्थव्यवस्थाओं में, ऐसे समहूनों के अनेक उल्लेखनीय उदाहरण हैं। ये सभी निश्चित परिस्थितियों में, सफल सहभागिता की सम्भावनाओं के साक्ष्य वहन करते हैं, औ यद्यपि संक्रमण अर्थव्यवस्थाओं में परिवार सहकारिताओं का लिंग-प्रभाव अनिश्चित है, किन्तु महिला-मात्र आधारित समूह कृषि के भारतीय उदाहरण महिलाओं को लाभान्वित करने की पर्याप्त सम्भावनाओं को बताते हैं। निम्नलिखित धारणाओं पर विचार कीजिए- 1- संक्रमण अर्थव्यवस्थाओं में कृषि समूहनों का होना अनिवार्य है। 2- कृषि के प्रति समूह उपागम से कृषि उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है। उपर्युक्त परिच्छेद के संदर्भ में, इस धारणाओं में से कौनसा / से वैध है / हैं?A केवल 1B केवल 2C 1 और 2 दोनोंD न तो 1, न ही 2
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विशिष्ट पश्चिमी उदारवादी संदर्भ में, लोकतंत्र का और गहरा होना ‘उदारवादी मूल्यों’ के समेकन की ओर ले जाता है। भारतीय संदर्भ में, लोकतंत्रीकरण लोगों की वृहत्तर भागीदारी में परिणत होता है, जिसमें लोग व्यक्तियों’ के रूप में नहीं, जो कि उदारवादी चिन्तन का मुख्य विषय है, बल्कि समुदायों या समूहों के रूप में शामिल होते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में व्यक्ति ‘व्यष्टिक’ व्यक्तियों के रूप में नहीं, बल्कि धर्म या जाति की पहचान के आधार पर बने आद्य समुदायों के सदस्यों के रूप में शामिल हो रहे हैं, सामुदायिक-पहचान एक नियंत्रक बल होती प्रतीत होती है। अतः आश्चर्यजनक नहीं है, कि तथाकथित परिधीय समूह राजनैतिक प्रक्रियाओं में शामिल होते समय अपनी पहचानों को सामाजिक समूहों, (जाति, धर्म या पंथ) से, जिनके वे सदस्य हैं, जोड़ कर बनाए रखना जारी रखते हैं, यद्यपि उन सभी के राजनैतिक लक्ष्य न्यूनाधिक समान बने रहते हैं। भारत में लोकतंत्र ने उपांतीय लोगों की राजनैतिक आवाज को सुस्पष्ट करने में सहायता कर, ‘सामाजिक निकोचों को शिथिल करने’ की ओर प्रेरित किया है और उपातीय लोगों को यह शक्ति प्रदान की है कि वे जिन सामाजिक-आर्थिक दशाओं में हैं उन्हें सुधारने की अपनी योग्यता के बारे में आश्वस्त हों यह एक महत्वपूर्ण राजनैतिक प्रक्रिया है जो लोक-शासन के लोकतांत्रिक ढाँचे के अन्दर, उच्चतर जाति के अभिजनों से विभिन्न उपाश्रित समूहों में सार्थक शक्ति-हस्तांतरण करने के माध्यम से एक मूहक क्रांति का कारण बनी थी। पश्चिमी संदर्भ में, लोकतंत्र के और गहरे होने’ से क्या आशय है?A समूह एवं वर्ग पहचानों का समेकनB लोगों की वृहत्तर भागीदारी में परिणत लोकतंत्रीकरणC सावर्जनिक क्षेत्र में व्यक्तियों की ‘व्यष्टिक’ रूप में वृहत्तर भागीदारी के रूप में लोकतंत्रीकरणD इस संदर्भ में उपर्युक्त कथनों (A), (B) और (C), में से कोई भी सही नहीं है।
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विशिष्ट पश्चिमी उदारवादी संदर्भ में, लोकतंत्र का और गहरा होना ‘उदारवादी मूल्यों’ के समेकन की ओर ले जाता है। भारतीय संदर्भ में, लोकतंत्रीकरण लोगों की वृहत्तर भागीदारी में परिणत होता है, जिसमें लोग व्यक्तियों’ के रूप में नहीं, जो कि उदारवादी चिन्तन का मुख्य विषय है, बल्कि समुदायों या समूहों के रूप में शामिल होते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में व्यक्ति ‘व्यष्टिक’ व्यक्तियों के रूप में नहीं, बल्कि धर्म या जाति की पहचान के आधार पर बने आद्य समुदायों के सदस्यों के रूप में शामिल हो रहे हैं, सामुदायिक-पहचान एक नियंत्रक बल होती प्रतीत होती है। अतः आश्चर्यजनक नहीं है, कि तथाकथित परिधीय समूह राजनैतिक प्रक्रियाओं में शामिल होते समय अपनी पहचानों को सामाजिक समूहों, (जाति, धर्म या पंथ) से, जिनके वे सदस्य हैं, जोड़ कर बनाए रखना जारी रखते हैं, यद्यपि उन सभी के राजनैतिक लक्ष्य न्यूनाधिक समान बने रहते हैं। भारत में लोकतंत्र ने उपांतीय लोगों की राजनैतिक आवाज को सुस्पष्ट करने में सहायता कर, ‘सामाजिक निकोचों को शिथिल करने’ की ओर प्रेरित किया है और उपातीय लोगों को यह शक्ति प्रदान की है कि वे जिन सामाजिक-आर्थिक दशाओं में हैं उन्हें सुधारने की अपनी योग्यता के बारे में आश्वस्त हों यह एक महत्वपूर्ण राजनैतिक प्रक्रिया है जो लोक-शासन के लोकतांत्रिक ढाँचे के अन्दर, उच्चतर जाति के अभिजनों से विभिन्न उपाश्रित समूहों में सार्थक शक्ति-हस्तांतरण करने के माध्यम से एक मूहक क्रांति का कारण बनी थी। भारत में वृहत्तर लोकतंत्रीकरण किसका अनिवार्य रूप से कारण नहीं बना है?A सार्वजनिक क्षेत्र जाति एवं सामुदायिक पहचानों का मंद होनाB भारतीय राजनीति में नियंत्रक बल के रूप में समुदाय पहचान का असंगत होनाC समाज में अभिजन समूहों का उपांतीय होनाD वर्ग पहचानों के ऊपर वंशागत पहचानों की सापेक्ष महत्वहीनता होना
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विशिष्ट पश्चिमी उदारवादी संदर्भ में, लोकतंत्र का और गहरा होना ‘उदारवादी मूल्यों’ के समेकन की ओर ले जाता है। भारतीय संदर्भ में, लोकतंत्रीकरण लोगों की वृहत्तर भागीदारी में परिणत होता है, जिसमें लोग व्यक्तियों’ के रूप में नहीं, जो कि उदारवादी चिन्तन का मुख्य विषय है, बल्कि समुदायों या समूहों के रूप में शामिल होते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में व्यक्ति ‘व्यष्टिक’ व्यक्तियों के रूप में नहीं, बल्कि धर्म या जाति की पहचान के आधार पर बने आद्य समुदायों के सदस्यों के रूप में शामिल हो रहे हैं, सामुदायिक-पहचान एक नियंत्रक बल होती प्रतीत होती है। अतः आश्चर्यजनक नहीं है, कि तथाकथित परिधीय समूह राजनैतिक प्रक्रियाओं में शामिल होते समय अपनी पहचानों को सामाजिक समूहों, (जाति, धर्म या पंथ) से, जिनके वे सदस्य हैं, जोड़ कर बनाए रखना जारी रखते हैं, यद्यपि उन सभी के राजनैतिक लक्ष्य न्यूनाधिक समान बने रहते हैं। भारत में लोकतंत्र ने उपांतीय लोगों की राजनैतिक आवाज को सुस्पष्ट करने में सहायता कर, ‘सामाजिक निकोचों को शिथिल करने’ की ओर प्रेरित किया है और उपातीय लोगों को यह शक्ति प्रदान की है कि वे जिन सामाजिक-आर्थिक दशाओं में हैं उन्हें सुधारने की अपनी योग्यता के बारे में आश्वस्त हों यह एक महत्वपूर्ण राजनैतिक प्रक्रिया है जो लोक-शासन के लोकतांत्रिक ढाँचे के अन्दर, उच्चतर जाति के अभिजनों से विभिन्न उपाश्रित समूहों में सार्थक शक्ति-हस्तांतरण करने के माध्यम से एक मूहक क्रांति का कारण बनी थी। वह ‘मूक क्रांति क्या है जो भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में घटित हुई है?A राजनीतिक प्रक्रियाओं में जाति एवं वर्ग सोपानों की असंगतताB मतदान व्यवहार एवं प्रतिरूपों में सामाजिक निकोचों का ढीला होनाC उच्चतर जाति अभिजन से उपाश्रित समूहों में शक्ति-हस्तांतरण के माध्यम से सामाजिक परिवर्तनD इस संदर्भ में सभी उपर्युक्त कथन (A), (B) और (C), सही हैं
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नीचे दिए गए परिच्छेद में दी गई सूचना पर विचार कीजिए और उसके नीचे दिए गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए- पाँच विषयों, जैसे कि अर्थशास्त्र, इतिहास, सांख्यिकी, अंग्रेजी और गणित, पर एक सप्ताह में सोमवार से शुक्रवार तक अतिथि व्याख्यानों का इंतजाम करना है, प्रत्येक दिन केवल एक व्याख्यान का इंतजाम किया जा सकता है। अर्थशास्त्र को मंगलवार को अनुसूचित नहीं किया जा सकता। इतिहास का अतिथि प्राध्यापक केवल मंगलवार को उपलब्ध है। गणित का व्याख्यान, अर्थशास्त्र के व्याख्यान के दिन के ठीक अगले दिन ही अनुसूचित करना है। अंग्रेजी का व्याख्यान अर्थशास्त्र के व्याख्यान वाले दिन के ठीक एक दिन पहले अनुसूचित करना है। सोमवार को कौनसा व्याख्यान अनुसूचित है?A इतिहासB अर्थशास्त्रC गणितD सांख्यिकी
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नीचे दिए गए परिच्छेद में दी गई सूचना पर विचार कीजिए और उसके नीचे दिए गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए- पाँच विषयों, जैसे कि अर्थशास्त्र, इतिहास, सांख्यिकी, अंग्रेजी और गणित, पर एक सप्ताह में सोमवार से शुक्रवार तक अतिथि व्याख्यानों का इंतजाम करना है, प्रत्येक दिन केवल एक व्याख्यान का इंतजाम किया जा सकता है। अर्थशास्त्र को मंगलवार को अनुसूचित नहीं किया जा सकता। इतिहास का अतिथि प्राध्यापक केवल मंगलवार को उपलब्ध है। गणित का व्याख्यान, अर्थशास्त्र के व्याख्यान के दिन के ठीक अगले दिन ही अनुसूचित करना है। अंग्रेजी का व्याख्यान अर्थशास्त्र के व्याख्यान वाले दिन के ठीक एक दिन पहले अनुसूचित करना है। सांख्यिकी और अंग्रेजी के बीच में कौन सा व्याख्यान अनुसूचित है?A अर्थशास्त्रB इतिहासC गणितD कोई व्याख्यान नहीं
59)
नीचे दिए गए परिच्छेद में दी गई सूचना पर विचार कीजिए और उसके नीचे दिए गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए- पाँच विषयों, जैसे कि अर्थशास्त्र, इतिहास, सांख्यिकी, अंग्रेजी और गणित, पर एक सप्ताह में सोमवार से शुक्रवार तक अतिथि व्याख्यानों का इंतजाम करना है, प्रत्येक दिन केवल एक व्याख्यान का इंतजाम किया जा सकता है। अर्थशास्त्र को मंगलवार को अनुसूचित नहीं किया जा सकता। इतिहास का अतिथि प्राध्यापक केवल मंगलवार को उपलब्ध है। गणित का व्याख्यान, अर्थशास्त्र के व्याख्यान के दिन के ठीक अगले दिन ही अनुसूचित करना है। अंग्रेजी का व्याख्यान अर्थशास्त्र के व्याख्यान वाले दिन के ठीक एक दिन पहले अनुसूचित करना है। सप्ताह में कौन सा व्याख्यान अन्तिम है?A इतिहासB अंग्रेजीC गणितD अर्थशास्त्र
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नीचे दिए गए परिच्छेद में दी गई सूचना पर विचार कीजिए और उसके नीचे दिए गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए- पाँच विषयों, जैसे कि अर्थशास्त्र, इतिहास, सांख्यिकी, अंग्रेजी और गणित, पर एक सप्ताह में सोमवार से शुक्रवार तक अतिथि व्याख्यानों का इंतजाम करना है, प्रत्येक दिन केवल एक व्याख्यान का इंतजाम किया जा सकता है। अर्थशास्त्र को मंगलवार को अनुसूचित नहीं किया जा सकता। इतिहास का अतिथि प्राध्यापक केवल मंगलवार को उपलब्ध है। गणित का व्याख्यान, अर्थशास्त्र के व्याख्यान के दिन के ठीक अगले दिन ही अनुसूचित करना है। अंग्रेजी का व्याख्यान अर्थशास्त्र के व्याख्यान वाले दिन के ठीक एक दिन पहले अनुसूचित करना है। बुधवार को कौन सा व्याख्यान अनुसूचित है?A सांख्यिकीB अर्थशास्त्रC गणितD इतिहास
61)
नीचे दिए गए परिच्छेद में दी गई सूचना पर विचार कीजिए और उसके नीचे दिए गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए- पाँच विषयों, जैसे कि अर्थशास्त्र, इतिहास, सांख्यिकी, अंग्रेजी और गणित, पर एक सप्ताह में सोमवार से शुक्रवार तक अतिथि व्याख्यानों का इंतजाम करना है, प्रत्येक दिन केवल एक व्याख्यान का इंतजाम किया जा सकता है। अर्थशास्त्र को मंगलवार को अनुसूचित नहीं किया जा सकता। इतिहास का अतिथि प्राध्यापक केवल मंगलवार को उपलब्ध है। गणित का व्याख्यान, अर्थशास्त्र के व्याख्यान के दिन के ठीक अगले दिन ही अनुसूचित करना है। अंग्रेजी का व्याख्यान अर्थशास्त्र के व्याख्यान वाले दिन के ठीक एक दिन पहले अनुसूचित करना है। गणित के व्याख्यान के पहले कौन सा व्याख्यान अनुसूचित है?A अर्थशास्त्रB इतिहासC सांख्यिकीD अंग्रेजी
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पाँच फ्रलेटों में, जो एकदूसरे के ऊपर स्थित हैं, पाँच व्यवसायी रहते हैं। एक प्रोफेसर है जिसे अपने IAS अधिकारी मित्र से मिलने के लिए ऊपर जाना पड़ता है। एक डॉक्टर है, जिसकी सभी से समान रूप से मित्रता है, उसे जितनी बार ऊपर जाना पड़ता है उतनी ही बार नीचे उतरना पड़ता है। एक इंजीनियर है जिसे अपने MLA मित्र से मिलने के लिए ऊपर जाना पड़ता है, जिसके फ्रलेट के ऊपर प्रोफेसर का मित्र रहता है। ये पाँच व्यवसायी सबसे निचले तल से सबसे ऊपर तल तक किस क्रम में रहते हैं?A इंजीनियर, प्रोफेसर, डॉक्टर, IAS अधिकारी, MLAB प्रोफेसर, इंजीनियर, डॉक्टर, IAS अधिकारी, MLAC IAS अधिकारी, इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेसर, MLAD प्रोफेसर, इंजीनियर, डॉक्टर, MLA, IAS अधिकारी
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नीचे 7 (सात) प्रश्नांश दिए गए हैं। प्रत्येक प्रश्नांश में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार सम्भव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे आप अपने उत्तर के रूप में अंकित कीजिए। प्रत्येक प्रश्नांश के लिए केवल एक ही उत्तर चुनिए। उत्तरों का मूल्यांकन, दी गई स्थिति के लिए उपयुक्तता के स्तर के आधा?र पर किया जाएगा। कृपया सभी प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए। इन सात प्रश्नांशों के लिए गलत उत्तरों के कोई दण्ड नहीं है। अपने अधीनस्थ द्वारा तैयार किए गए अंतिम प्रतिवेदन के सम्बन्ध में, जिसे अतिशीघ्र प्रस्तुत किया जाना है, आपके अभिमत भिन्न है आपका अधीनस्थ प्रतिवेदन में दी गई सूचना को उचित ठहरा रहा है। आप क्या करेंगे?A अपने अधीनस्थ से स्वीकार कराएंगे कि वह गलत हैB उसको परिणामों पर पुनर्विचार करने हेतु कहेंगेC प्रतिवेदन में आप स्वयं संशोधन कर लेंगेD अधीनस्थ को कहेंगे कि अपनी गलती को उचित न ठहराए
75)
नीचे 7 (सात) प्रश्नांश दिए गए हैं। प्रत्येक प्रश्नांश में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार सम्भव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे आप अपने उत्तर के रूप में अंकित कीजिए। प्रत्येक प्रश्नांश के लिए केवल एक ही उत्तर चुनिए। उत्तरों का मूल्यांकन, दी गई स्थिति के लिए उपयुक्तता के स्तर के आधा?र पर किया जाएगा। कृपया सभी प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए। इन सात प्रश्नांशों के लिए गलत उत्तरों के कोई दण्ड नहीं है। एक प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए, जिसका निर्धारण एक मौखिक प्रस्तुतीकरण के आधार पर होना है, आप अपने ही बैच के किसी सहकर्मी (बैच-मेट) के साथ प्रतियोगिता कर रहे हैं। प्रत्येक प्रस्तुतीकरण के लिए दस मिनट का समय रखा गया है, समिति ने आपको प्रस्तुतीकरण को ठीक समय से समाप्त करने को कहा है, जबकि, आपके मित्र को अनुबद्ध समयावधि से अधिक समय दिया जाता है। आप क्या करेंगे?A इस भेदभाव के लिए अध्यक्ष के पास एक शिकायत दर्ज कराएंगेB समिति द्वारा दिए गए किसी भी औचित्य को नहीं सुनेंगेC अपना नाम प्रतियोगिता से वापस लेने की माँग करेंगे।D विरोध करते हुए उस स्थान को छोड़ देंगे।
76)
नीचे 7 (सात) प्रश्नांश दिए गए हैं। प्रत्येक प्रश्नांश में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार सम्भव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे आप अपने उत्तर के रूप में अंकित कीजिए। प्रत्येक प्रश्नांश के लिए केवल एक ही उत्तर चुनिए। उत्तरों का मूल्यांकन, दी गई स्थिति के लिए उपयुक्तता के स्तर के आधा?र पर किया जाएगा। कृपया सभी प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए। इन सात प्रश्नांशों के लिए गलत उत्तरों के कोई दण्ड नहीं है। आप एक समयबद्ध परियोजना पर कार्य कर रहे हैं, परियोजना की पुनरीक्षण बैठक के दौरान आप पाते हैं कि आपके समूह के सदस्यों की ओर से सहयोग में कमी होने के कारण परियोजना विलम्बित हो सकती है। आप क्या करेंगे?A अपने समूह के सदस्यों को उनके असहयोग के लिए चेतावनी देंगेB असहयोग के कारणों की जाँच-पड़ताल करेंगेC समूह के सदस्यों को प्रतिस्थापित करने की माँग करेंगेD कारण प्रस्तुत करते हुए समय सीमा बढ़ाने की माँग करेंगे।
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नीचे 7 (सात) प्रश्नांश दिए गए हैं। प्रत्येक प्रश्नांश में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार सम्भव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे आप अपने उत्तर के रूप में अंकित कीजिए। प्रत्येक प्रश्नांश के लिए केवल एक ही उत्तर चुनिए। उत्तरों का मूल्यांकन, दी गई स्थिति के लिए उपयुक्तता के स्तर के आधा?र पर किया जाएगा। कृपया सभी प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए। इन सात प्रश्नांशों के लिए गलत उत्तरों के कोई दण्ड नहीं है। आप एक राज्य क्रीड़ा समिति के अध्यक्ष हैं, आपको एक शिकायत मिली है और बाद में यह पाया गया है कि कनिष्ठ आयु वर्ग के किसी पदक जीतने वाले एथलीट की आयु, आयु के दिए मानदण्ड से पाँच दिन अधिक हो गई है। आप क्या करेंगे?A छानबीन समिति से स्पष्टीकरण देने को कहेंगेB एथलीट से पदक वापस करने को कहेंगेC एथलीट को अपनी आयु की घोषणा करते हुए न्यायालय से शपथ-पत्र लाने को कहेंगेD क्रीड़ा समिति के सदस्यों से उनकी राय माँगेंगे
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नीचे 7 (सात) प्रश्नांश दिए गए हैं। प्रत्येक प्रश्नांश में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार सम्भव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे आप अपने उत्तर के रूप में अंकित कीजिए। प्रत्येक प्रश्नांश के लिए केवल एक ही उत्तर चुनिए। उत्तरों का मूल्यांकन, दी गई स्थिति के लिए उपयुक्तता के स्तर के आधा?र पर किया जाएगा। कृपया सभी प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए। इन सात प्रश्नांशों के लिए गलत उत्तरों के कोई दण्ड नहीं है। आप एक प्राथमिकता परियोजना पर कार्य कर रहे हैं और सभी अन्तिम तिथियों को पूरी तरह निभा रहे हैं और इस आधार पर परियोजना के दौरान अवकाश लेने की योजना बना रहे हैं, आपका आसन्न अधिकारी परियोजना की अविलम्बता बता कर आपके अवकाश को अनुमोदित नहीं करता है। आप क्या करेंगे?A मंजूरी की प्रतीक्षा किए बिना अवकाश पर चले जाएंगेB बीमारी का बहाना बना कर अवकाश पर चले जाएंगेC अवकाश के आवेदन पर पुनर्विचार करने हेतु उच्चतर अधिकारी से बात करेंगे।D आसन्न अधिकारी को बताएंगे कि यह न्यायसंगत नहीं है
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नीचे 7 (सात) प्रश्नांश दिए गए हैं। प्रत्येक प्रश्नांश में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार सम्भव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे आप अपने उत्तर के रूप में अंकित कीजिए। प्रत्येक प्रश्नांश के लिए केवल एक ही उत्तर चुनिए। उत्तरों का मूल्यांकन, दी गई स्थिति के लिए उपयुक्तता के स्तर के आधा?र पर किया जाएगा। कृपया सभी प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए। इन सात प्रश्नांशों के लिए गलत उत्तरों के कोई दण्ड नहीं है। आप सुदूर क्षेत्र में एक जल पूर्ति परियोजना स्थापित करने हेतु कार्य कर रहे हैं किसी भी हालत में परियोजना की पूरी लागत वसूल कर पाना असम्भव है। उस क्षेत्र में आय का स्तर बहुत नीचा है और 25 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे है। जलापूर्ति की कीमत निर्धारण का निर्णय लेते समय आप क्या करेंगे?A यह अनुशंसा करेंगे कि पूरी तरह जलापूर्ति निःशुल्क होB यह अनुशंसा करेंगे कि सभी प्रयोगकर्ता नल लगाने हेतु एक बार तय एक-मुश्त राशि का भुगतान करें और पानी का उपयोग निःशुल्क होC यह अनुशंसा करेंगे कि गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों के लिए एक तय मासिक शुल्क लगाया जाए और गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों हेतु जलापूर्ति निःशुल्क होD यह अनुशंसा करेंगे कि प्रयोगकर्ता जल के उपभोग पर आधारित शुल्क का भुगतान करें जिसमें गरीबी रेखा से ऊपर तथा नीचे के परिवारों हेतु विभेदीकृत शुल्क निश्चित किया जाए।
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नीचे 7 (सात) प्रश्नांश दिए गए हैं। प्रत्येक प्रश्नांश में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार सम्भव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे आप अपने उत्तर के रूप में अंकित कीजिए। प्रत्येक प्रश्नांश के लिए केवल एक ही उत्तर चुनिए। उत्तरों का मूल्यांकन, दी गई स्थिति के लिए उपयुक्तता के स्तर के आधा?र पर किया जाएगा। कृपया सभी प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए। इन सात प्रश्नांशों के लिए गलत उत्तरों के कोई दण्ड नहीं है। एक नागरिक के रूप में आपको एक सरकारी विभाग से कुछ काम है। सम्बद्ध अधिकारी आपको बार-बार बुलाता है_ और आपसे प्रत्यक्षतः बिना कुछ कहे रिश्वत देने के इशारे करता है। आप अपना कार्य कराना चाहते हैं। आप क्या करेंगे?A रिश्वत दे देंगेB ऐसा व्यवहार करेंगे मानो आप उसके इशारे नहीं समझ रहे हैं और अपने आवेदन पर डटे रहेंगेC रिश्वत के इशारों के सम्बन्ध में मौखिक शिकायत के साथ उच्चतर अधिकारी के पास सहायता के लिए जाएंगेD एक औपचारिक शिकायत भेजेंगे