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GS-II

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Practice Test-1

Question
63 out of 80
 

At this stage of civilisation, when many nations are brought in to close and vital contact for good and evil, it is essential, as never before, that their gross ignorance of one another should be diminished, that they should begin to understand a little of one another's historical experience and resulting mentality. It is the fault of the English to expect the people of other countries to react as they do, to political and international solutions. Our genuine goodwill and good intentions are often brought to nothing, because we expect other people to be like us. This would be corrected if we knew the history, not necessarily in detail but in broad outlines, of the social and political conditions which have given to each nation its present character.


The character of a nation is the result of its



A mentality

B cultural heritage

C gross ignorance

D socio-political conditions

Ans. D

Practice Test-1 Flashcard List

80 flashcards
1)
भारतीय संविधान को अस्त-व्यस्त या ढीला-ढाला बताया जाता है। इसके पीछे यह धारणा काम करती है कि किसी देश का संविधान एक कसे हुए दस्तावेज के रूप में मौजूद होना चाहिए। लेकिन यह बात संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश के लिए भी सच नहीं है, जहाँ संविधान एक कसे हुए दस्तावेज के रूप में है। सच बात यह है कि किसी देश का संविधान एक दस्तावेज तो होता ही है, इसमें संवैधानिक हैसियत वाले अन्य दस्तावेजों को भी शामिल किया जाता है। इस तरह, इस बात की पूरी सम्भावना है कि कुछ महत्त्वूर्पण संवैधानिक वक्तव्य तथा कायदे उस कसे हुए दस्तावेज से बाहर मिलें जिसे ‘संविधान’ कहा जाता है। जहाँ तक भारत का सवाल है-संवैधानिक हैसियत के ऐसे बहुत-से वक्तव्यों, ब्यौरों और कायदों को एक ही दस्तावेज के अन्दर समेट लिया गया है। एक आलोचना यह है कि भारतीय संविधान एक विदेशी दस्तावेज है। इसका हर अनुच्छेद पश्चिमी संविधानों की नकल है और भारतीय जनता के सांस्कृतिक भावबोध से इसका मेल नहीं बैठता। संविधान सभा में भी बहुत से सदस्यों ने यह बात उठाई थी। इस दृष्टि से भारतीय संविधान अत्यंत भ्रामक है क्योंकि इस संविधान की सांस्कृतिक और मूल्यपरक गति-मति भारत की असली जनता और उसके आचार-विचार की सांस्कृतिक तथा मूल्यपरक गति-मति के अनुकूल नहीं है। यह बात सच है कि भारतीय संविधान आधुनिक और अंशतः पश्चिमी है। लेकिन इससे यह पूरी तरह विदेशी नहीं हो जाता? अनेक भारतीयों ने चिन्तन का न सिर्फ आधुनिक तरीका अपना लिया है बल्कि उसे आत्मसात भी कर लिया है। इन लोगों के लिए पश्चिमीकरण अपनी परम्परा की बुराइयों के विरोध का एक तरीका था। वस्तुतः बहुत पहले यानि वर्ष1841 में ही यह बात जाहिर हो गई थी। उत्तर भारत के तिरस्कृत और अछूत कहलाने वाले ‘दलित’ नए कानूनों का इस्तेमाल करने में जरा भी नहीं हिचकिचाए और इन लोगों ने नई विधि व्यवस्था का सहारा लेकर अपने जमींदारों के खिलाफ मुकदमे दायर किए। इस तरह आधुनिक कानून का सहारा लेकर लोगों ने गरिमा और इंसाफ के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। दूसरे, जब पश्चिमी आधुनिकता का स्थानीय सांस्कृतिक व्यवस्था से टकराव हुआ तो एक किस्म की संकर-संस्कृति उत्पन्न हुई। यह संकर-संस्कृति पश्चिमी आधुनिकता से कुछ लेने और कुछ छोड़ने की रचनात्मक प्रक्रिया का परिणाम थी। ऐसी प्रक्रिया को न तो पश्चिमी आधुनिकता में ढूँढा जा सकता है और न ही देशी परम्परा में। पश्चिमी आधुनिकता और देशी सांस्कृतिक व्यवस्था के संयोग से उत्पन्न इस बहुमुखी परिघटना में वैकल्पिक आधुनिकता का चरित्र है। गैर-पश्चिमी मुल्कों में, लोगों ने सिर्फ अपने अतीत के आचारों से ही छुटकारा पाने की कोशिश नहीं की बल्कि अपने ऊपर थोपी गई पश्चिमी आधुनिकता के एक खास रूप के बंधनों को भी तोड़ना चाहा। इस तरह, जब हम अपना संविधान बना रहे थे तो हमारे मन में परम्परागत भारतीय और पश्चिमी मूल्यों के स्वस्थ मेल का भाव था। यह संविधान सचेत चयन और अनुकूलन का परिणाम है न कि नकल का। इन बातों का यह आशय भी नहीं कि भारत का संविधान हर तरह से पूर्ण और त्रुटिहीन दस्तावेज है। जिन सामाजिक परिस्थितियों में इसका निर्माण हुआ उसे देखते हुए यह बात स्वाभाविक है कि इसमें कुछ विवादास्पद मुद्दे रह जाएँ। ऐसी बातें बच जाएँ जिनके पुनरावलोकन की जरूरत हो। इस संविधान की बहुत-सी ऐसी बातें समय के दबाव में पैदा हुईं। फिर भी, हमें स्वीकार करना चाहिए कि इस संविधान की कुछ सीमाएँ हैं। यह बात स्पष्ट नहीं है कि एक गरीब और विकासशील देश में कुछ बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को मौलिक अधिकारों का अभिन्न हिस्सा बनाने के बजाए उसे राज्य के नीति-निर्देशक तत्व वाले खण्ड में क्यों डाल दिया गया? संविधान की और भी अनेक सीमाओं के कारण को समझना और दूर करना संभव है। लेकिन यहाँ यह बात महत्त्वूपर्ण नहीं है। हमारा तर्क यह है कि संविधान की ये सीमाएँ इतनी गंभीर नहीं है कि ये संविधान के दर्शन के लिए ही खतरा पैदा कर दें। क्या यह कहना सही है कि भारतीय संविधान एक विदेशी दस्तावेज है और इसका अधिकांश अनुच्छेद पश्चिमी संविधानों की नकल है? A हाँ, क्योंकि इस संविधान के सांस्कृतिक एवं मूल्यपरक प्रावधान भारतीय जनता के आचार-विचार के अनुकूल नहीं हैं। B नहीं, क्योंकि भारतीय संविधान आधुनिक है और अंशतः पश्चिमी होने से पूरी तरह विदेशी नहीं हो जाता। C नहीं, क्योंकि भारतीय संविधान सचेत चयन एवं अनुकूलन का परिणाम है, न कि नकल का। D इस बारे में स्पष्ट राय हेतु पर्याप्त तथ्य उपलब्ध नहीं हैं।
2)
भारतीय संविधान को अस्त-व्यस्त या ढीला-ढाला बताया जाता है। इसके पीछे यह धारणा काम करती है कि किसी देश का संविधान एक कसे हुए दस्तावेज के रूप में मौजूद होना चाहिए। लेकिन यह बात संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश के लिए भी सच नहीं है, जहाँ संविधान एक कसे हुए दस्तावेज के रूप में है। सच बात यह है कि किसी देश का संविधान एक दस्तावेज तो होता ही है, इसमें संवैधानिक हैसियत वाले अन्य दस्तावेजों को भी शामिल किया जाता है। इस तरह, इस बात की पूरी सम्भावना है कि कुछ महत्त्वूर्पण संवैधानिक वक्तव्य तथा कायदे उस कसे हुए दस्तावेज से बाहर मिलें जिसे ‘संविधान’ कहा जाता है। जहाँ तक भारत का सवाल है-संवैधानिक हैसियत के ऐसे बहुत-से वक्तव्यों, ब्यौरों और कायदों को एक ही दस्तावेज के अन्दर समेट लिया गया है। एक आलोचना यह है कि भारतीय संविधान एक विदेशी दस्तावेज है। इसका हर अनुच्छेद पश्चिमी संविधानों की नकल है और भारतीय जनता के सांस्कृतिक भावबोध से इसका मेल नहीं बैठता। संविधान सभा में भी बहुत से सदस्यों ने यह बात उठाई थी। इस दृष्टि से भारतीय संविधान अत्यंत भ्रामक है क्योंकि इस संविधान की सांस्कृतिक और मूल्यपरक गति-मति भारत की असली जनता और उसके आचार-विचार की सांस्कृतिक तथा मूल्यपरक गति-मति के अनुकूल नहीं है। यह बात सच है कि भारतीय संविधान आधुनिक और अंशतः पश्चिमी है। लेकिन इससे यह पूरी तरह विदेशी नहीं हो जाता? अनेक भारतीयों ने चिन्तन का न सिर्फ आधुनिक तरीका अपना लिया है बल्कि उसे आत्मसात भी कर लिया है। इन लोगों के लिए पश्चिमीकरण अपनी परम्परा की बुराइयों के विरोध का एक तरीका था। वस्तुतः बहुत पहले यानि वर्ष1841 में ही यह बात जाहिर हो गई थी। उत्तर भारत के तिरस्कृत और अछूत कहलाने वाले ‘दलित’ नए कानूनों का इस्तेमाल करने में जरा भी नहीं हिचकिचाए और इन लोगों ने नई विधि व्यवस्था का सहारा लेकर अपने जमींदारों के खिलाफ मुकदमे दायर किए। इस तरह आधुनिक कानून का सहारा लेकर लोगों ने गरिमा और इंसाफ के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। दूसरे, जब पश्चिमी आधुनिकता का स्थानीय सांस्कृतिक व्यवस्था से टकराव हुआ तो एक किस्म की संकर-संस्कृति उत्पन्न हुई। यह संकर-संस्कृति पश्चिमी आधुनिकता से कुछ लेने और कुछ छोड़ने की रचनात्मक प्रक्रिया का परिणाम थी। ऐसी प्रक्रिया को न तो पश्चिमी आधुनिकता में ढूँढा जा सकता है और न ही देशी परम्परा में। पश्चिमी आधुनिकता और देशी सांस्कृतिक व्यवस्था के संयोग से उत्पन्न इस बहुमुखी परिघटना में वैकल्पिक आधुनिकता का चरित्र है। गैर-पश्चिमी मुल्कों में, लोगों ने सिर्फ अपने अतीत के आचारों से ही छुटकारा पाने की कोशिश नहीं की बल्कि अपने ऊपर थोपी गई पश्चिमी आधुनिकता के एक खास रूप के बंधनों को भी तोड़ना चाहा। इस तरह, जब हम अपना संविधान बना रहे थे तो हमारे मन में परम्परागत भारतीय और पश्चिमी मूल्यों के स्वस्थ मेल का भाव था। यह संविधान सचेत चयन और अनुकूलन का परिणाम है न कि नकल का। इन बातों का यह आशय भी नहीं कि भारत का संविधान हर तरह से पूर्ण और त्रुटिहीन दस्तावेज है। जिन सामाजिक परिस्थितियों में इसका निर्माण हुआ उसे देखते हुए यह बात स्वाभाविक है कि इसमें कुछ विवादास्पद मुद्दे रह जाएँ। ऐसी बातें बच जाएँ जिनके पुनरावलोकन की जरूरत हो। इस संविधान की बहुत-सी ऐसी बातें समय के दबाव में पैदा हुईं। फिर भी, हमें स्वीकार करना चाहिए कि इस संविधान की कुछ सीमाएँ हैं। यह बात स्पष्ट नहीं है कि एक गरीब और विकासशील देश में कुछ बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को मौलिक अधिकारों का अभिन्न हिस्सा बनाने के बजाए उसे राज्य के नीति-निर्देशक तत्व वाले खण्ड में क्यों डाल दिया गया? संविधान की और भी अनेक सीमाओं के कारण को समझना और दूर करना संभव है। लेकिन यहाँ यह बात महत्त्वूपर्ण नहीं है। हमारा तर्क यह है कि संविधान की ये सीमाएँ इतनी गंभीर नहीं है कि ये संविधान के दर्शन के लिए ही खतरा पैदा कर दें। भारतीय समाज के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को किस सर्वश्रेष्ठ रूप में स्पष्ट किया जा सकता है? नीचे दिए गए विकल्पों में से सही जीवन का चयन कीजिए। A भारतीय समाज के सदस्य पश्चिमीकरण के माध्यम से अपनी परम्परा की बुराइयों के विरोध का तरीका अपनाकर आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में प्रवृत्त हुए। B आधुनिक कानून का सहारा लेकर लोगों ने गरिमा एवं इंसाफ के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। C पश्चिमी आधुनिकता का स्थानीय सांस्कृतिक व्यवस्था के साथ टकराव होने से उत्पन्न संकर-संस्कृति पश्चिमी आधुनिकता से कुछ लेने और कुछ छोड़ने की रचनात्मक प्रक्रिया का परिणाम थी। D पश्चिमी आधुनिकता और देशी सांस्कृतिक व्यवस्था के संयोग से उत्पन्न बहुमुखी परिघटना में वैकल्पिक आधुनिकता का चरित्र विद्यमान था, जिसे न तो पश्चिमी आधुनिकता में ढूँढा जा सकता है और न ही देशी परम्परा में।
3)
भारतीय संविधान को अस्त-व्यस्त या ढीला-ढाला बताया जाता है। इसके पीछे यह धारणा काम करती है कि किसी देश का संविधान एक कसे हुए दस्तावेज के रूप में मौजूद होना चाहिए। लेकिन यह बात संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश के लिए भी सच नहीं है, जहाँ संविधान एक कसे हुए दस्तावेज के रूप में है। सच बात यह है कि किसी देश का संविधान एक दस्तावेज तो होता ही है, इसमें संवैधानिक हैसियत वाले अन्य दस्तावेजों को भी शामिल किया जाता है। इस तरह, इस बात की पूरी सम्भावना है कि कुछ महत्त्वूर्पण संवैधानिक वक्तव्य तथा कायदे उस कसे हुए दस्तावेज से बाहर मिलें जिसे ‘संविधान’ कहा जाता है। जहाँ तक भारत का सवाल है-संवैधानिक हैसियत के ऐसे बहुत-से वक्तव्यों, ब्यौरों और कायदों को एक ही दस्तावेज के अन्दर समेट लिया गया है। एक आलोचना यह है कि भारतीय संविधान एक विदेशी दस्तावेज है। इसका हर अनुच्छेद पश्चिमी संविधानों की नकल है और भारतीय जनता के सांस्कृतिक भावबोध से इसका मेल नहीं बैठता। संविधान सभा में भी बहुत से सदस्यों ने यह बात उठाई थी। इस दृष्टि से भारतीय संविधान अत्यंत भ्रामक है क्योंकि इस संविधान की सांस्कृतिक और मूल्यपरक गति-मति भारत की असली जनता और उसके आचार-विचार की सांस्कृतिक तथा मूल्यपरक गति-मति के अनुकूल नहीं है। यह बात सच है कि भारतीय संविधान आधुनिक और अंशतः पश्चिमी है। लेकिन इससे यह पूरी तरह विदेशी नहीं हो जाता? अनेक भारतीयों ने चिन्तन का न सिर्फ आधुनिक तरीका अपना लिया है बल्कि उसे आत्मसात भी कर लिया है। इन लोगों के लिए पश्चिमीकरण अपनी परम्परा की बुराइयों के विरोध का एक तरीका था। वस्तुतः बहुत पहले यानि वर्ष1841 में ही यह बात जाहिर हो गई थी। उत्तर भारत के तिरस्कृत और अछूत कहलाने वाले ‘दलित’ नए कानूनों का इस्तेमाल करने में जरा भी नहीं हिचकिचाए और इन लोगों ने नई विधि व्यवस्था का सहारा लेकर अपने जमींदारों के खिलाफ मुकदमे दायर किए। इस तरह आधुनिक कानून का सहारा लेकर लोगों ने गरिमा और इंसाफ के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। दूसरे, जब पश्चिमी आधुनिकता का स्थानीय सांस्कृतिक व्यवस्था से टकराव हुआ तो एक किस्म की संकर-संस्कृति उत्पन्न हुई। यह संकर-संस्कृति पश्चिमी आधुनिकता से कुछ लेने और कुछ छोड़ने की रचनात्मक प्रक्रिया का परिणाम थी। ऐसी प्रक्रिया को न तो पश्चिमी आधुनिकता में ढूँढा जा सकता है और न ही देशी परम्परा में। पश्चिमी आधुनिकता और देशी सांस्कृतिक व्यवस्था के संयोग से उत्पन्न इस बहुमुखी परिघटना में वैकल्पिक आधुनिकता का चरित्र है। गैर-पश्चिमी मुल्कों में, लोगों ने सिर्फ अपने अतीत के आचारों से ही छुटकारा पाने की कोशिश नहीं की बल्कि अपने ऊपर थोपी गई पश्चिमी आधुनिकता के एक खास रूप के बंधनों को भी तोड़ना चाहा। इस तरह, जब हम अपना संविधान बना रहे थे तो हमारे मन में परम्परागत भारतीय और पश्चिमी मूल्यों के स्वस्थ मेल का भाव था। यह संविधान सचेत चयन और अनुकूलन का परिणाम है न कि नकल का। इन बातों का यह आशय भी नहीं कि भारत का संविधान हर तरह से पूर्ण और त्रुटिहीन दस्तावेज है। जिन सामाजिक परिस्थितियों में इसका निर्माण हुआ उसे देखते हुए यह बात स्वाभाविक है कि इसमें कुछ विवादास्पद मुद्दे रह जाएँ। ऐसी बातें बच जाएँ जिनके पुनरावलोकन की जरूरत हो। इस संविधान की बहुत-सी ऐसी बातें समय के दबाव में पैदा हुईं। फिर भी, हमें स्वीकार करना चाहिए कि इस संविधान की कुछ सीमाएँ हैं। यह बात स्पष्ट नहीं है कि एक गरीब और विकासशील देश में कुछ बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को मौलिक अधिकारों का अभिन्न हिस्सा बनाने के बजाए उसे राज्य के नीति-निर्देशक तत्व वाले खण्ड में क्यों डाल दिया गया? संविधान की और भी अनेक सीमाओं के कारण को समझना और दूर करना संभव है। लेकिन यहाँ यह बात महत्त्वूपर्ण नहीं है। हमारा तर्क यह है कि संविधान की ये सीमाएँ इतनी गंभीर नहीं है कि ये संविधान के दर्शन के लिए ही खतरा पैदा कर दें। परिच्छेद में दिए गए तथ्यों के आधार पर निम्नलिखित कथनों की सत्यता की जाँच कीजिए: 1- भारत जैसे देशों ने आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में सिर्फ अपने अतीत के आचारों से ही छुटकारा पाने की कोशिश नहीं की बल्कि एक विशेष तरह की पश्चिमी आधुनिकता से भी छुटकारा पाना चाहा। 2- संविधान निर्माण के समय भारतीय नेताओं के सामने सिर्फ पश्चिमी मूल्यों के स्वस्थ स्वरूपों का लक्ष्य था। 3- भारत का संविधान हर तरह से पूर्ण एवं त्रुटिहीन दस्तावेज नही है। 4- भारत जैसे गरीब एवं विकासशील देश में कुछ आधारभूत सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को मौलिक अधिकारों का हिस्सा न बनाना आलोचना की विषय-वस्तु नहीं है। कूटों की सहायता से सही विकल्प का चयन कीजिए- A 1, 2 और 3 B 1 और 3 C 3 और 4 D 1 और 4
4)
भारतीय संविधान को अस्त-व्यस्त या ढीला-ढाला बताया जाता है। इसके पीछे यह धारणा काम करती है कि किसी देश का संविधान एक कसे हुए दस्तावेज के रूप में मौजूद होना चाहिए। लेकिन यह बात संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश के लिए भी सच नहीं है, जहाँ संविधान एक कसे हुए दस्तावेज के रूप में है। सच बात यह है कि किसी देश का संविधान एक दस्तावेज तो होता ही है, इसमें संवैधानिक हैसियत वाले अन्य दस्तावेजों को भी शामिल किया जाता है। इस तरह, इस बात की पूरी सम्भावना है कि कुछ महत्त्वूर्पण संवैधानिक वक्तव्य तथा कायदे उस कसे हुए दस्तावेज से बाहर मिलें जिसे ‘संविधान’ कहा जाता है। जहाँ तक भारत का सवाल है-संवैधानिक हैसियत के ऐसे बहुत-से वक्तव्यों, ब्यौरों और कायदों को एक ही दस्तावेज के अन्दर समेट लिया गया है। एक आलोचना यह है कि भारतीय संविधान एक विदेशी दस्तावेज है। इसका हर अनुच्छेद पश्चिमी संविधानों की नकल है और भारतीय जनता के सांस्कृतिक भावबोध से इसका मेल नहीं बैठता। संविधान सभा में भी बहुत से सदस्यों ने यह बात उठाई थी। इस दृष्टि से भारतीय संविधान अत्यंत भ्रामक है क्योंकि इस संविधान की सांस्कृतिक और मूल्यपरक गति-मति भारत की असली जनता और उसके आचार-विचार की सांस्कृतिक तथा मूल्यपरक गति-मति के अनुकूल नहीं है। यह बात सच है कि भारतीय संविधान आधुनिक और अंशतः पश्चिमी है। लेकिन इससे यह पूरी तरह विदेशी नहीं हो जाता? अनेक भारतीयों ने चिन्तन का न सिर्फ आधुनिक तरीका अपना लिया है बल्कि उसे आत्मसात भी कर लिया है। इन लोगों के लिए पश्चिमीकरण अपनी परम्परा की बुराइयों के विरोध का एक तरीका था। वस्तुतः बहुत पहले यानि वर्ष1841 में ही यह बात जाहिर हो गई थी। उत्तर भारत के तिरस्कृत और अछूत कहलाने वाले ‘दलित’ नए कानूनों का इस्तेमाल करने में जरा भी नहीं हिचकिचाए और इन लोगों ने नई विधि व्यवस्था का सहारा लेकर अपने जमींदारों के खिलाफ मुकदमे दायर किए। इस तरह आधुनिक कानून का सहारा लेकर लोगों ने गरिमा और इंसाफ के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। दूसरे, जब पश्चिमी आधुनिकता का स्थानीय सांस्कृतिक व्यवस्था से टकराव हुआ तो एक किस्म की संकर-संस्कृति उत्पन्न हुई। यह संकर-संस्कृति पश्चिमी आधुनिकता से कुछ लेने और कुछ छोड़ने की रचनात्मक प्रक्रिया का परिणाम थी। ऐसी प्रक्रिया को न तो पश्चिमी आधुनिकता में ढूँढा जा सकता है और न ही देशी परम्परा में। पश्चिमी आधुनिकता और देशी सांस्कृतिक व्यवस्था के संयोग से उत्पन्न इस बहुमुखी परिघटना में वैकल्पिक आधुनिकता का चरित्र है। गैर-पश्चिमी मुल्कों में, लोगों ने सिर्फ अपने अतीत के आचारों से ही छुटकारा पाने की कोशिश नहीं की बल्कि अपने ऊपर थोपी गई पश्चिमी आधुनिकता के एक खास रूप के बंधनों को भी तोड़ना चाहा। इस तरह, जब हम अपना संविधान बना रहे थे तो हमारे मन में परम्परागत भारतीय और पश्चिमी मूल्यों के स्वस्थ मेल का भाव था। यह संविधान सचेत चयन और अनुकूलन का परिणाम है न कि नकल का। इन बातों का यह आशय भी नहीं कि भारत का संविधान हर तरह से पूर्ण और त्रुटिहीन दस्तावेज है। जिन सामाजिक परिस्थितियों में इसका निर्माण हुआ उसे देखते हुए यह बात स्वाभाविक है कि इसमें कुछ विवादास्पद मुद्दे रह जाएँ। ऐसी बातें बच जाएँ जिनके पुनरावलोकन की जरूरत हो। इस संविधान की बहुत-सी ऐसी बातें समय के दबाव में पैदा हुईं। फिर भी, हमें स्वीकार करना चाहिए कि इस संविधान की कुछ सीमाएँ हैं। यह बात स्पष्ट नहीं है कि एक गरीब और विकासशील देश में कुछ बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को मौलिक अधिकारों का अभिन्न हिस्सा बनाने के बजाए उसे राज्य के नीति-निर्देशक तत्व वाले खण्ड में क्यों डाल दिया गया? संविधान की और भी अनेक सीमाओं के कारण को समझना और दूर करना संभव है। लेकिन यहाँ यह बात महत्त्वूपर्ण नहीं है। हमारा तर्क यह है कि संविधान की ये सीमाएँ इतनी गंभीर नहीं है कि ये संविधान के दर्शन के लिए ही खतरा पैदा कर दें। दिए गए परिच्छेद का केन्द्रीय भाव निम्न में से कौन सर्वाधिक उपयुक्त हो सकता है? A भारतीय संविधान विश्व के अन्य संविधानों का श्रेष्ठ संचयन है। B भारतीय संविधान तत्कालीन एवं भावी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु देशी एवं पश्चिमी परम्पराओं का सर्वश्रेष्ठ मिश्रण है। C अपनी सीमाओं के बावजूद भारतीय संविधान विश्व का सर्वश्रेष्ठ संविधान है। D देशी एवं पश्चिमी मूल्यों के स्वस्थ मेल से निर्मित भारतीय संविधान भारतीयों की अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रावधान करने वाला अपनी सीमा के साथ उत्कृष्ट दस्तावेज है।
5)
भारतीय संविधान को अस्त-व्यस्त या ढीला-ढाला बताया जाता है। इसके पीछे यह धारणा काम करती है कि किसी देश का संविधान एक कसे हुए दस्तावेज के रूप में मौजूद होना चाहिए। लेकिन यह बात संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश के लिए भी सच नहीं है, जहाँ संविधान एक कसे हुए दस्तावेज के रूप में है। सच बात यह है कि किसी देश का संविधान एक दस्तावेज तो होता ही है, इसमें संवैधानिक हैसियत वाले अन्य दस्तावेजों को भी शामिल किया जाता है। इस तरह, इस बात की पूरी सम्भावना है कि कुछ महत्त्वूर्पण संवैधानिक वक्तव्य तथा कायदे उस कसे हुए दस्तावेज से बाहर मिलें जिसे ‘संविधान’ कहा जाता है। जहाँ तक भारत का सवाल है-संवैधानिक हैसियत के ऐसे बहुत-से वक्तव्यों, ब्यौरों और कायदों को एक ही दस्तावेज के अन्दर समेट लिया गया है। एक आलोचना यह है कि भारतीय संविधान एक विदेशी दस्तावेज है। इसका हर अनुच्छेद पश्चिमी संविधानों की नकल है और भारतीय जनता के सांस्कृतिक भावबोध से इसका मेल नहीं बैठता। संविधान सभा में भी बहुत से सदस्यों ने यह बात उठाई थी। इस दृष्टि से भारतीय संविधान अत्यंत भ्रामक है क्योंकि इस संविधान की सांस्कृतिक और मूल्यपरक गति-मति भारत की असली जनता और उसके आचार-विचार की सांस्कृतिक तथा मूल्यपरक गति-मति के अनुकूल नहीं है। यह बात सच है कि भारतीय संविधान आधुनिक और अंशतः पश्चिमी है। लेकिन इससे यह पूरी तरह विदेशी नहीं हो जाता? अनेक भारतीयों ने चिन्तन का न सिर्फ आधुनिक तरीका अपना लिया है बल्कि उसे आत्मसात भी कर लिया है। इन लोगों के लिए पश्चिमीकरण अपनी परम्परा की बुराइयों के विरोध का एक तरीका था। वस्तुतः बहुत पहले यानि वर्ष1841 में ही यह बात जाहिर हो गई थी। उत्तर भारत के तिरस्कृत और अछूत कहलाने वाले ‘दलित’ नए कानूनों का इस्तेमाल करने में जरा भी नहीं हिचकिचाए और इन लोगों ने नई विधि व्यवस्था का सहारा लेकर अपने जमींदारों के खिलाफ मुकदमे दायर किए। इस तरह आधुनिक कानून का सहारा लेकर लोगों ने गरिमा और इंसाफ के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। दूसरे, जब पश्चिमी आधुनिकता का स्थानीय सांस्कृतिक व्यवस्था से टकराव हुआ तो एक किस्म की संकर-संस्कृति उत्पन्न हुई। यह संकर-संस्कृति पश्चिमी आधुनिकता से कुछ लेने और कुछ छोड़ने की रचनात्मक प्रक्रिया का परिणाम थी। ऐसी प्रक्रिया को न तो पश्चिमी आधुनिकता में ढूँढा जा सकता है और न ही देशी परम्परा में। पश्चिमी आधुनिकता और देशी सांस्कृतिक व्यवस्था के संयोग से उत्पन्न इस बहुमुखी परिघटना में वैकल्पिक आधुनिकता का चरित्र है। गैर-पश्चिमी मुल्कों में, लोगों ने सिर्फ अपने अतीत के आचारों से ही छुटकारा पाने की कोशिश नहीं की बल्कि अपने ऊपर थोपी गई पश्चिमी आधुनिकता के एक खास रूप के बंधनों को भी तोड़ना चाहा। इस तरह, जब हम अपना संविधान बना रहे थे तो हमारे मन में परम्परागत भारतीय और पश्चिमी मूल्यों के स्वस्थ मेल का भाव था। यह संविधान सचेत चयन और अनुकूलन का परिणाम है न कि नकल का। इन बातों का यह आशय भी नहीं कि भारत का संविधान हर तरह से पूर्ण और त्रुटिहीन दस्तावेज है। जिन सामाजिक परिस्थितियों में इसका निर्माण हुआ उसे देखते हुए यह बात स्वाभाविक है कि इसमें कुछ विवादास्पद मुद्दे रह जाएँ। ऐसी बातें बच जाएँ जिनके पुनरावलोकन की जरूरत हो। इस संविधान की बहुत-सी ऐसी बातें समय के दबाव में पैदा हुईं। फिर भी, हमें स्वीकार करना चाहिए कि इस संविधान की कुछ सीमाएँ हैं। यह बात स्पष्ट नहीं है कि एक गरीब और विकासशील देश में कुछ बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को मौलिक अधिकारों का अभिन्न हिस्सा बनाने के बजाए उसे राज्य के नीति-निर्देशक तत्व वाले खण्ड में क्यों डाल दिया गया? संविधान की और भी अनेक सीमाओं के कारण को समझना और दूर करना संभव है। लेकिन यहाँ यह बात महत्त्वूपर्ण नहीं है। हमारा तर्क यह है कि संविधान की ये सीमाएँ इतनी गंभीर नहीं है कि ये संविधान के दर्शन के लिए ही खतरा पैदा कर दें। संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान एक कसे हुए दस्तावेज के रूप में है, क्योंकि- A इसकी प्रत्येक पंक्ति सुस्पष्ट, सार्थक एवं प्रासंगिक है B संविधान में वर्णित सभी अनुच्छेद पूरी तरह स्पष्ट एवं पारदर्शी है। C अमेरिकी संविधान लिखित, व्यापक एवं सारगर्भित है जो वर्तमान समस्याओं का भी पूरी सक्षमता से सामना करता है। D परिच्छेद में दिए गए तथ्यों के आधार पर इस बारे में कुछ भी कहना सम्भव नहीं है।
6)
भारतीय संविधान को अस्त-व्यस्त या ढीला-ढाला बताया जाता है। इसके पीछे यह धारणा काम करती है कि किसी देश का संविधान एक कसे हुए दस्तावेज के रूप में मौजूद होना चाहिए। लेकिन यह बात संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश के लिए भी सच नहीं है, जहाँ संविधान एक कसे हुए दस्तावेज के रूप में है। सच बात यह है कि किसी देश का संविधान एक दस्तावेज तो होता ही है, इसमें संवैधानिक हैसियत वाले अन्य दस्तावेजों को भी शामिल किया जाता है। इस तरह, इस बात की पूरी सम्भावना है कि कुछ महत्त्वूर्पण संवैधानिक वक्तव्य तथा कायदे उस कसे हुए दस्तावेज से बाहर मिलें जिसे ‘संविधान’ कहा जाता है। जहाँ तक भारत का सवाल है-संवैधानिक हैसियत के ऐसे बहुत-से वक्तव्यों, ब्यौरों और कायदों को एक ही दस्तावेज के अन्दर समेट लिया गया है। एक आलोचना यह है कि भारतीय संविधान एक विदेशी दस्तावेज है। इसका हर अनुच्छेद पश्चिमी संविधानों की नकल है और भारतीय जनता के सांस्कृतिक भावबोध से इसका मेल नहीं बैठता। संविधान सभा में भी बहुत से सदस्यों ने यह बात उठाई थी। इस दृष्टि से भारतीय संविधान अत्यंत भ्रामक है क्योंकि इस संविधान की सांस्कृतिक और मूल्यपरक गति-मति भारत की असली जनता और उसके आचार-विचार की सांस्कृतिक तथा मूल्यपरक गति-मति के अनुकूल नहीं है। यह बात सच है कि भारतीय संविधान आधुनिक और अंशतः पश्चिमी है। लेकिन इससे यह पूरी तरह विदेशी नहीं हो जाता? अनेक भारतीयों ने चिन्तन का न सिर्फ आधुनिक तरीका अपना लिया है बल्कि उसे आत्मसात भी कर लिया है। इन लोगों के लिए पश्चिमीकरण अपनी परम्परा की बुराइयों के विरोध का एक तरीका था। वस्तुतः बहुत पहले यानि वर्ष1841 में ही यह बात जाहिर हो गई थी। उत्तर भारत के तिरस्कृत और अछूत कहलाने वाले ‘दलित’ नए कानूनों का इस्तेमाल करने में जरा भी नहीं हिचकिचाए और इन लोगों ने नई विधि व्यवस्था का सहारा लेकर अपने जमींदारों के खिलाफ मुकदमे दायर किए। इस तरह आधुनिक कानून का सहारा लेकर लोगों ने गरिमा और इंसाफ के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। दूसरे, जब पश्चिमी आधुनिकता का स्थानीय सांस्कृतिक व्यवस्था से टकराव हुआ तो एक किस्म की संकर-संस्कृति उत्पन्न हुई। यह संकर-संस्कृति पश्चिमी आधुनिकता से कुछ लेने और कुछ छोड़ने की रचनात्मक प्रक्रिया का परिणाम थी। ऐसी प्रक्रिया को न तो पश्चिमी आधुनिकता में ढूँढा जा सकता है और न ही देशी परम्परा में। पश्चिमी आधुनिकता और देशी सांस्कृतिक व्यवस्था के संयोग से उत्पन्न इस बहुमुखी परिघटना में वैकल्पिक आधुनिकता का चरित्र है। गैर-पश्चिमी मुल्कों में, लोगों ने सिर्फ अपने अतीत के आचारों से ही छुटकारा पाने की कोशिश नहीं की बल्कि अपने ऊपर थोपी गई पश्चिमी आधुनिकता के एक खास रूप के बंधनों को भी तोड़ना चाहा। इस तरह, जब हम अपना संविधान बना रहे थे तो हमारे मन में परम्परागत भारतीय और पश्चिमी मूल्यों के स्वस्थ मेल का भाव था। यह संविधान सचेत चयन और अनुकूलन का परिणाम है न कि नकल का। इन बातों का यह आशय भी नहीं कि भारत का संविधान हर तरह से पूर्ण और त्रुटिहीन दस्तावेज है। जिन सामाजिक परिस्थितियों में इसका निर्माण हुआ उसे देखते हुए यह बात स्वाभाविक है कि इसमें कुछ विवादास्पद मुद्दे रह जाएँ। ऐसी बातें बच जाएँ जिनके पुनरावलोकन की जरूरत हो। इस संविधान की बहुत-सी ऐसी बातें समय के दबाव में पैदा हुईं। फिर भी, हमें स्वीकार करना चाहिए कि इस संविधान की कुछ सीमाएँ हैं। यह बात स्पष्ट नहीं है कि एक गरीब और विकासशील देश में कुछ बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को मौलिक अधिकारों का अभिन्न हिस्सा बनाने के बजाए उसे राज्य के नीति-निर्देशक तत्व वाले खण्ड में क्यों डाल दिया गया? संविधान की और भी अनेक सीमाओं के कारण को समझना और दूर करना संभव है। लेकिन यहाँ यह बात महत्त्वूपर्ण नहीं है। हमारा तर्क यह है कि संविधान की ये सीमाएँ इतनी गंभीर नहीं है कि ये संविधान के दर्शन के लिए ही खतरा पैदा कर दें। वास्तव में भारतीय संविधान भी हर तरह से पूर्ण एवं त्रुटिहीन दस्तावेज नहीं है-इस कथन से सम्बन्धित सर्वाधिक सामग्री व्याख्या निम्न में से कौन है? A भारतीय संविधान की अनेक बातें समय के दबाव में पैदा हुई। B एक विकासशील देश में कुछ बुनियादी सामाजिक आर्थिक अधिकारों को मौलिक अधिकारों का अभिन्न हिस्सा न बनाकर उसे राज्य के नीति-निदेशक तत्व वाले खंड में डाला गया। C इसमें कुछ विवादास्पद मुद्दे रह गए हैं। D परिच्छेद में दिए गए तथ्यों के आधार पर सही उत्तर देना सम्भव नहीं है।
7)
निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। उत्कृष्ट गुण, जो मनुष्य समाज में माननीय होता है, जिनके अभाव से सब ठौर निरादर पाता है और हेठा समझा जाता है, उनके कर्तव्यपरायणता का होना, गुण-सोपान की पहली सीढ़ी है। पहली सीढ़ी इसलिए कहते है कि जब यह मालूम नहीं है कि हमें क्या करना उचित है, हालाँकि इसके करने की जिम्मेदारी हम पर है, त्रुटियाँ-चूक होने से उसका हिसाब अन्तरात्मा को हमें देना होगा, तब हम विद्वान्, बड़े धर्मनिष्ठ भी हुए तो क्या? कर्तव्यपरायणता के कई एक अवान्तर भेद हम यहाँ नहीं लेते, जिनमें भिन्न-भिन्न जाति के लोगों में अलग-अलग मतभेद हैं। कितनी बातें ऐसी हैं, जिन्हें हम हिन्दुस्तान के रहने वाले कर्तव्य मानते हैं, पर इंग्लैंड तथा यूरोप के विभिन्न देशों (फ्रांस, जर्मनी इत्यादि) के लोग उसे अवश्य कर्त्तव्य न समझेंगे। जैसे पुत्र के लिए माता-पिता की सेवा और अपनी सब कमाई उन्हें अर्पण करना या अपने छोटे तथा असमर्थ भाइयों और कुटुम्ब को पालना-पोसना हिन्दुस्तान में एक कर्त्तव्य कर्म है और न करने पर निन्दा है, लेकिन यूरोप के इंग्लैंड, फ्रांस आदि देशों में नहीं। पश्चिम में माता-पिता की कुछ विशेष खबर न लेना और सर्वस्व अपनी मेम साहिबा को सौंप देना, महाकर्तव्यपरायण है, जबकि भारतीय समाज में ऐसा करने से समाज में निन्दा होती है। कर्तव्य पर ध्यान और समय का उचित अनुवर्तन दोनों का साथ है। सच पूछो तो हम इन दोनों से च्युत हो गए हैं। जो ‘अपने समय को’ ठीक रखना या पालन करना जानता है अपने समय को बेजा न खोता है, वहीं कर्तव्यपरायण भी भरपूर रह सकता है। यावत् कर्तव्यों में वर्तमान पतन की दशा से अपना उद्धार महाकर्तव्यपरायणता है किन्तु इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता। प्रत्युत उसी को कर्तव्य मान रहे हैं, जिसमें हमारा अधिक बिगाड़ है और गतानुगतिक ‘न्याय’ के अनुसार ‘भेड़िया धसान’ के समान ‘आँख मूँद’ उधर ही की ओर बराबर चले जाते हैं। परिच्छेद में प्रयुक्त शब्द ‘अनुवर्तन’ से क्या तात्पर्य है? A समय के पीछे-पीछे चलने के संदर्भ में B समय का उचित मूल्यांकन C समय का उचित पालन D उपरोक्त में से कोई नहीं
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। उत्कृष्ट गुण, जो मनुष्य समाज में माननीय होता है, जिनके अभाव से सब ठौर निरादर पाता है और हेठा समझा जाता है, उनके कर्तव्यपरायणता का होना, गुण-सोपान की पहली सीढ़ी है। पहली सीढ़ी इसलिए कहते है कि जब यह मालूम नहीं है कि हमें क्या करना उचित है, हालाँकि इसके करने की जिम्मेदारी हम पर है, त्रुटियाँ-चूक होने से उसका हिसाब अन्तरात्मा को हमें देना होगा, तब हम विद्वान्, बड़े धर्मनिष्ठ भी हुए तो क्या? कर्तव्यपरायणता के कई एक अवान्तर भेद हम यहाँ नहीं लेते, जिनमें भिन्न-भिन्न जाति के लोगों में अलग-अलग मतभेद हैं। कितनी बातें ऐसी हैं, जिन्हें हम हिन्दुस्तान के रहने वाले कर्तव्य मानते हैं, पर इंग्लैंड तथा यूरोप के विभिन्न देशों (फ्रांस, जर्मनी इत्यादि) के लोग उसे अवश्य कर्त्तव्य न समझेंगे। जैसे पुत्र के लिए माता-पिता की सेवा और अपनी सब कमाई उन्हें अर्पण करना या अपने छोटे तथा असमर्थ भाइयों और कुटुम्ब को पालना-पोसना हिन्दुस्तान में एक कर्त्तव्य कर्म है और न करने पर निन्दा है, लेकिन यूरोप के इंग्लैंड, फ्रांस आदि देशों में नहीं। पश्चिम में माता-पिता की कुछ विशेष खबर न लेना और सर्वस्व अपनी मेम साहिबा को सौंप देना, महाकर्तव्यपरायण है, जबकि भारतीय समाज में ऐसा करने से समाज में निन्दा होती है। कर्तव्य पर ध्यान और समय का उचित अनुवर्तन दोनों का साथ है। सच पूछो तो हम इन दोनों से च्युत हो गए हैं। जो ‘अपने समय को’ ठीक रखना या पालन करना जानता है अपने समय को बेजा न खोता है, वहीं कर्तव्यपरायण भी भरपूर रह सकता है। यावत् कर्तव्यों में वर्तमान पतन की दशा से अपना उद्धार महाकर्तव्यपरायणता है किन्तु इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता। प्रत्युत उसी को कर्तव्य मान रहे हैं, जिसमें हमारा अधिक बिगाड़ है और गतानुगतिक ‘न्याय’ के अनुसार ‘भेड़िया धसान’ के समान ‘आँख मूँद’ उधर ही की ओर बराबर चले जाते हैं। दिए गए परिच्छेद में रचनाकार किस बात को कहना चाह रहा है अर्थात् परिच्छेद का मर्म क्या है? A कर्त्तव्यपरायणता पर जोर B ‘समय के अनुरूप कर्तव्यपरायणता’ का स्मरण कराना C भारतीय एवं पश्चिमी समाज के मूल्यों में अन्तर D भारतीयों का भीड़ की तरह व्यवहार करना
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। उत्कृष्ट गुण, जो मनुष्य समाज में माननीय होता है, जिनके अभाव से सब ठौर निरादर पाता है और हेठा समझा जाता है, उनके कर्तव्यपरायणता का होना, गुण-सोपान की पहली सीढ़ी है। पहली सीढ़ी इसलिए कहते है कि जब यह मालूम नहीं है कि हमें क्या करना उचित है, हालाँकि इसके करने की जिम्मेदारी हम पर है, त्रुटियाँ-चूक होने से उसका हिसाब अन्तरात्मा को हमें देना होगा, तब हम विद्वान्, बड़े धर्मनिष्ठ भी हुए तो क्या? कर्तव्यपरायणता के कई एक अवान्तर भेद हम यहाँ नहीं लेते, जिनमें भिन्न-भिन्न जाति के लोगों में अलग-अलग मतभेद हैं। कितनी बातें ऐसी हैं, जिन्हें हम हिन्दुस्तान के रहने वाले कर्तव्य मानते हैं, पर इंग्लैंड तथा यूरोप के विभिन्न देशों (फ्रांस, जर्मनी इत्यादि) के लोग उसे अवश्य कर्त्तव्य न समझेंगे। जैसे पुत्र के लिए माता-पिता की सेवा और अपनी सब कमाई उन्हें अर्पण करना या अपने छोटे तथा असमर्थ भाइयों और कुटुम्ब को पालना-पोसना हिन्दुस्तान में एक कर्त्तव्य कर्म है और न करने पर निन्दा है, लेकिन यूरोप के इंग्लैंड, फ्रांस आदि देशों में नहीं। पश्चिम में माता-पिता की कुछ विशेष खबर न लेना और सर्वस्व अपनी मेम साहिबा को सौंप देना, महाकर्तव्यपरायण है, जबकि भारतीय समाज में ऐसा करने से समाज में निन्दा होती है। कर्तव्य पर ध्यान और समय का उचित अनुवर्तन दोनों का साथ है। सच पूछो तो हम इन दोनों से च्युत हो गए हैं। जो ‘अपने समय को’ ठीक रखना या पालन करना जानता है अपने समय को बेजा न खोता है, वहीं कर्तव्यपरायण भी भरपूर रह सकता है। यावत् कर्तव्यों में वर्तमान पतन की दशा से अपना उद्धार महाकर्तव्यपरायणता है किन्तु इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता। प्रत्युत उसी को कर्तव्य मान रहे हैं, जिसमें हमारा अधिक बिगाड़ है और गतानुगतिक ‘न्याय’ के अनुसार ‘भेड़िया धसान’ के समान ‘आँख मूँद’ उधर ही की ओर बराबर चले जाते हैं। परिच्छेद में दिए गए तथ्यों के आधार पर निम्नलिखित कथनों की सत्यता की जाँच कीजिए: 1- कर्तव्यपरायण एवं धर्मनिष्ठ होना एक ही बात है। 2- भारत के लोगों का कर्त्तव्य अनिवार्य रूप से अन्य देशों के लोगों के कर्तव्यों से अलग होता है। 3- परिच्छेद में प्रयुक्त ‘भेड़िया धसान’ से तात्पर्य है कि अपने व्यक्तित्व को खोकर भीड़ का अंग बन जाना। 4- अपने समय का उचित पालन करने वाला ही सही अर्थों में कर्तव्यपरायण हो सकता है। कूटों की सहायता से सही विकल्प का चयन कीजिए। A 1 और 2 B 3 और 4 C 1, 3 और 4 D 1 और 4
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नीचे दिए गए प्रश्न में एक कथन दिया गया है और उसके नीचे दो पूर्व धारणाएँ I तथा II दी गई हैं। आप दिए गए कथन और दी हुई पूर्वधारणाओं को ध्यान में लेकर उन दो पूर्वधारणाओं में से कौन-सी कथन में अन्तर्निहित है? कथन - मानसून के पहले दो महीनों के दौरान शहर को जल आपूर्ति करने वाली झीलों के जल ग्रहण क्षेत्र में हुई सामान्य से कम वर्षा के बावजूद अधिकारियों ने शहर की जल आपूर्ति पर कोई कटौती नहीं की है। पूर्वधारणाएँ I. मानसून के बाकी बचे हुए समय के दौरान होने वाली वर्षा सामान्य जल-आपूर्ति के लिए पर्याप्त हो सकती है। II. शहर को जल-आपूर्ति करने वाली झीलों का मौजूदा जल-स्तर सामान्य आपूर्ति के लिए पर्याप्त हो सकता है। A केवल पूर्वधारणा I अन्तर्निहित है। B केवल पूर्वधारणा II अन्तर्निहित है। C न तो पूर्वधारणा I और न ही II अन्तर्निहित है। D दोनों पूर्वधारणा I और II अन्तर्निहित हैं।
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। सहयोग, समायोजन, सात्मीकरण, प्रतियोगिता और संघर्ष सामाजिक जीवन की बुनियादी प्रक्रियाएँ हैं। हमें इन प्रक्रियाओं में अन्तर्निहित गत्यात्मकता के गुण को भी पहचानना होगा जो सामाजिक संघटन में बड़ी गहराई तक विद्यमान होता है। अतः यह आश्चर्यजनक नहीं है कि समाज हमेशा परिवर्तन व उथल-पुथल की स्थिति में होता है। इस लिहाज से हम सामाजिक प्रक्रिया की तुलना सरिता-प्रवाह से कर सकते हैं जो हमेशा परिवर्तित होती रहने वाली प्रघटन है। इस पक्ष की ओर संकेत करते हुए हेराक्लीटस ने कहा है ‘‘किसी व्यक्ति के लिए एक ही नदी में दो बार प्रवेश करना असम्भव है क्योंकि दूसरी बार वह व्यक्ति नहीं रह जाता है। पहले और दूसरे प्रवेश के अन्तराल में, चाहे यह कितना भी छोटा क्यों न हो, नदी और मनुष्य दोनों बदल जाते हैं।’’ पार्मेनाइडीज का कथन इसके ठीक विपरीत है। वे कहते हैं ‘‘परिवर्तन एक भ्रम है। सक कुछ पूर्ववत् रहता है और अस्तित्व एकमात्र यथार्थ है।’’ स्थायित्व और परिवर्तन, होना और बनना-इन सबमें से प्रत्येक को अलग-अलग दार्शनिकों ने अधिक महत्त्वपूर्ण और अन्यों की अपेक्षा अधिक व्यापक बताया है। समाज की संरचना और संघटन को दर्शा देने भर से समाजशास्त्र का दायित्व पूरा नहीं हो जाता है। सब कुछ होते हुए भी समाज जिस व्यवस्था का द्योतक है, वह एक परिवर्तनशील व्यवस्था या एक गतिमान संकेतन है। कॉम्ट से लेकर आज तक के समाजशास्त्रियों ने दो सवालों का लगातार सामना किया है जो सामाजिक स्थैर्य व सामाजिक गत्यात्मक प्रकृति को जन्म देती हैं, उन पर बल देते हुए मैकाइवर यह टिप्पणी करते हैं ‘‘समाज सिर्फ एक कालक्रम के रूप में ही जीवित रहता है। यह ‘बनना या हो जाना’ है न कि ‘होना’ है। एक उत्पाद या प्रतिफल होने की अपेक्षा यह एक प्रक्रिया है। दूसरे शब्दों में, ज्योंहि प्रक्रिया समाप्त होती है, प्रतिफल स्वयमेव लुप्त हो जाता है। अगर लोग किसी रस्म या प्रथा का पालन करना छोड़ देते हैं तो वह दुनिया के किसी भी कोने में अस्तित्ववान नहीं रह पाती है। इसकी कोई ऐसी देह नहीं होती जो मौत के बाद भी बची रहे। यह सिर्फ एक क्रिया-व्यवहार के रूप में बच जाती है जो इसका पालन करने वाले लोगों के मस्तिष्कों में संचित होती है। समय के थपेड़ों से किसी सामाजिक ढाँचे को बचाने के लिए इसे किसी संग्रहालय में नहीं रखा जा सकता है। परिच्छेद में प्रयुक्त वाक्य ‘‘यह ‘बनना या हो जाना’ है न कि ‘होना’ है’’, से क्या तात्पर्य है? A समाज एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है न कि कोई परिणाम। B समाज एक अनवरत चलने वाली ऐसी प्रक्रिया है जिसका परिणाम भी साथ-साथ चलता है और प्रक्रिया के समाप्त होते ही परिणाम का अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है। C समाज सिर्फ एक निश्चित अवधि तक ही जीवित रहता है। D परिच्छेद में दिए गए तथ्यों के आधार पर इस बारे में स्पष्ट कह पाना संभव नहीं है।
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। सहयोग, समायोजन, सात्मीकरण, प्रतियोगिता और संघर्ष सामाजिक जीवन की बुनियादी प्रक्रियाएँ हैं। हमें इन प्रक्रियाओं में अन्तर्निहित गत्यात्मकता के गुण को भी पहचानना होगा जो सामाजिक संघटन में बड़ी गहराई तक विद्यमान होता है। अतः यह आश्चर्यजनक नहीं है कि समाज हमेशा परिवर्तन व उथल-पुथल की स्थिति में होता है। इस लिहाज से हम सामाजिक प्रक्रिया की तुलना सरिता-प्रवाह से कर सकते हैं जो हमेशा परिवर्तित होती रहने वाली प्रघटन है। इस पक्ष की ओर संकेत करते हुए हेराक्लीटस ने कहा है ‘‘किसी व्यक्ति के लिए एक ही नदी में दो बार प्रवेश करना असम्भव है क्योंकि दूसरी बार वह व्यक्ति नहीं रह जाता है। पहले और दूसरे प्रवेश के अन्तराल में, चाहे यह कितना भी छोटा क्यों न हो, नदी और मनुष्य दोनों बदल जाते हैं।’’ पार्मेनाइडीज का कथन इसके ठीक विपरीत है। वे कहते हैं ‘‘परिवर्तन एक भ्रम है। सक कुछ पूर्ववत् रहता है और अस्तित्व एकमात्र यथार्थ है।’’ स्थायित्व और परिवर्तन, होना और बनना-इन सबमें से प्रत्येक को अलग-अलग दार्शनिकों ने अधिक महत्त्वपूर्ण और अन्यों की अपेक्षा अधिक व्यापक बताया है। समाज की संरचना और संघटन को दर्शा देने भर से समाजशास्त्र का दायित्व पूरा नहीं हो जाता है। सब कुछ होते हुए भी समाज जिस व्यवस्था का द्योतक है, वह एक परिवर्तनशील व्यवस्था या एक गतिमान संकेतन है। कॉम्ट से लेकर आज तक के समाजशास्त्रियों ने दो सवालों का लगातार सामना किया है जो सामाजिक स्थैर्य व सामाजिक गत्यात्मक प्रकृति को जन्म देती हैं, उन पर बल देते हुए मैकाइवर यह टिप्पणी करते हैं ‘‘समाज सिर्फ एक कालक्रम के रूप में ही जीवित रहता है। यह ‘बनना या हो जाना’ है न कि ‘होना’ है। एक उत्पाद या प्रतिफल होने की अपेक्षा यह एक प्रक्रिया है। दूसरे शब्दों में, ज्योंहि प्रक्रिया समाप्त होती है, प्रतिफल स्वयमेव लुप्त हो जाता है। अगर लोग किसी रस्म या प्रथा का पालन करना छोड़ देते हैं तो वह दुनिया के किसी भी कोने में अस्तित्ववान नहीं रह पाती है। इसकी कोई ऐसी देह नहीं होती जो मौत के बाद भी बची रहे। यह सिर्फ एक क्रिया-व्यवहार के रूप में बच जाती है जो इसका पालन करने वाले लोगों के मस्तिष्कों में संचित होती है। समय के थपेड़ों से किसी सामाजिक ढाँचे को बचाने के लिए इसे किसी संग्रहालय में नहीं रखा जा सकता है। परिच्छेद में दिए गए तथ्यों के आधार पर निम्नलिखित कथनों की सत्यता की जाँच कीजिए: 1- सामाजिक जीवन की बुनियादी प्रक्रियाओं में गतिशीलता के गुण विद्यमान नहीं होते। 2- सामाजिक प्रक्रिया की तुलना सरिता-प्रवाह से करने के पीछे वास्तविक कारण दोनों की परिवर्तनशीलता सम्बन्धी गुणों की समानता है। 3- यदि किसी एक क्षेत्र के निवासी किसी भी प्रथा का पालन करना छोड़़ देते हैं तब भी वह दूसरे क्षेत्र के निवासियों द्वारा जीवित रखी जाती है। कूटों की सहायता से सही विकल्प को चुनिए। A केवल 2 B केवल 3 C 1 और 2 D 1, 2 और 3
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। सहयोग, समायोजन, सात्मीकरण, प्रतियोगिता और संघर्ष सामाजिक जीवन की बुनियादी प्रक्रियाएँ हैं। हमें इन प्रक्रियाओं में अन्तर्निहित गत्यात्मकता के गुण को भी पहचानना होगा जो सामाजिक संघटन में बड़ी गहराई तक विद्यमान होता है। अतः यह आश्चर्यजनक नहीं है कि समाज हमेशा परिवर्तन व उथल-पुथल की स्थिति में होता है। इस लिहाज से हम सामाजिक प्रक्रिया की तुलना सरिता-प्रवाह से कर सकते हैं जो हमेशा परिवर्तित होती रहने वाली प्रघटन है। इस पक्ष की ओर संकेत करते हुए हेराक्लीटस ने कहा है ‘‘किसी व्यक्ति के लिए एक ही नदी में दो बार प्रवेश करना असम्भव है क्योंकि दूसरी बार वह व्यक्ति नहीं रह जाता है। पहले और दूसरे प्रवेश के अन्तराल में, चाहे यह कितना भी छोटा क्यों न हो, नदी और मनुष्य दोनों बदल जाते हैं।’’ पार्मेनाइडीज का कथन इसके ठीक विपरीत है। वे कहते हैं ‘‘परिवर्तन एक भ्रम है। सक कुछ पूर्ववत् रहता है और अस्तित्व एकमात्र यथार्थ है।’’ स्थायित्व और परिवर्तन, होना और बनना-इन सबमें से प्रत्येक को अलग-अलग दार्शनिकों ने अधिक महत्त्वपूर्ण और अन्यों की अपेक्षा अधिक व्यापक बताया है। समाज की संरचना और संघटन को दर्शा देने भर से समाजशास्त्र का दायित्व पूरा नहीं हो जाता है। सब कुछ होते हुए भी समाज जिस व्यवस्था का द्योतक है, वह एक परिवर्तनशील व्यवस्था या एक गतिमान संकेतन है। कॉम्ट से लेकर आज तक के समाजशास्त्रियों ने दो सवालों का लगातार सामना किया है जो सामाजिक स्थैर्य व सामाजिक गत्यात्मक प्रकृति को जन्म देती हैं, उन पर बल देते हुए मैकाइवर यह टिप्पणी करते हैं ‘‘समाज सिर्फ एक कालक्रम के रूप में ही जीवित रहता है। यह ‘बनना या हो जाना’ है न कि ‘होना’ है। एक उत्पाद या प्रतिफल होने की अपेक्षा यह एक प्रक्रिया है। दूसरे शब्दों में, ज्योंहि प्रक्रिया समाप्त होती है, प्रतिफल स्वयमेव लुप्त हो जाता है। अगर लोग किसी रस्म या प्रथा का पालन करना छोड़ देते हैं तो वह दुनिया के किसी भी कोने में अस्तित्ववान नहीं रह पाती है। इसकी कोई ऐसी देह नहीं होती जो मौत के बाद भी बची रहे। यह सिर्फ एक क्रिया-व्यवहार के रूप में बच जाती है जो इसका पालन करने वाले लोगों के मस्तिष्कों में संचित होती है। समय के थपेड़ों से किसी सामाजिक ढाँचे को बचाने के लिए इसे किसी संग्रहालय में नहीं रखा जा सकता है। नीचे दिए गए किस कथन के आधार पर समाज की सर्वाधिक सटीक परिभाषा दी जा सकती है? A समाज जिस व्यवस्था का द्योतक है, वह एक परिवर्तनशील व्यवस्था या एक गतिमान संकेतन है। B समाज सिर्फ एक कालक्रम के रूप में ही जीवित रहता है। यह एक उत्पाद या प्रतिफल होने की अपेक्षा एक प्रक्रिया है। C सदस्यों के क्रिया-व्यवहारों से निर्मित सामाजिक ढँाचे को ही समाज के नाम से जाना जाता है। D इससे संबंधित तथ्य अपर्याप्त हैं।
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। उत्तर आधुनिकतावाद के दौर में क्रान्ति पर सबसे तेज हमले हुए हैं। इन हमलों के आन्तरिक और बाह्य दोनों ही स्वरूप रहे हैं। उत्तर आधुनिकता के दौर में क्रान्ति की अवधारणा के खिलाफ जितना लिखा गया है उतना अन्य किसी अवधारणा के बारे में नहीं लिखा गया है। क्रान्ति संबंधी बहस का वृहत्तर रूप में गहरा संबंध सिद्धान्त और व्यवहार की एकता के साथ है। इस प्रसंग में पहली बात यह कि क्रान्ति का वास्तविक अर्थ इन दिनों विकृत हुआ है। उसका अवमूल्यन हुआ है। क्रान्ति का अर्थ परिवर्तन मान लिया गया है और प्रत्येक परिवर्तन को क्रान्ति कहने का रिवाज चल निकला है। क्रान्ति के अर्थ का यह विकृतिकरण है। क्रान्ति का अर्थ है बुनियादी या आमूल-चूल परिवर्तन। क्रान्ति अनन्त क्षण में नहीं बल्कि समकालिक क्षण में घटित होती है। इसमें प्रत्येक चीज एक-दूसरे से जुड़ी होती है। क्रान्ति का मतलब राजतंत्र या समाजतंत्र का ‘सुधार’ या ‘अल्प सुधार’ नहीं है, क्रान्ति का मतलब किसी काल्पनिक मानसिक जगत में परिवर्तन से नहीं है बल्कि इसका सम्बन्ध आमूल-चूल परिवर्तन से है। ये परिवर्तन एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हैं। क्रान्ति कोई बनी-बनाई परम्परा का निर्माण नहीं है बल्कि मूलभूत परिवर्तनों का पुनरान्वेषण है। क्रान्ति कोई तयशुदा तर्कसंघर्ष नहीं है। इसी प्रसंग में प्रसिद्ध मार्क्सवादी फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा है ‘‘सामाजिक क्रान्ति अनन्त समय का एक क्षण मात्र नहीं है। प्रत्युत समकालिक तंत्र में परिवर्तन की आवश्यकता की पुष्टि है, जिसमें हर चीज एक साथ हैं और एक-दूसरे से अन्तर्सम्बन्धित है। इस प्रकार का तंत्र सम्पूर्ण तंत्रगत परिवर्तन की माँग करता है, न कि अल्प ‘सुधार’, जिसे निन्दात्मक अर्थ में ‘मनोराज्य विषयक’ कहा जाता है, जो भ्रामक है, व्यवहार्य नही। अभिप्राय यह है कि यह तंत्र वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के स्थान पर एक रैडिकल सामाजिक विकल्प की विचारधारात्मक दृष्टि की माँग करता है, ऐसा कुछ जिसे वर्तमान तर्ककूल संघर्ष के अन्तर्गत दिया हुआ या विरासत में मिला नहीं माना जाए, बल्कि जो पुनरान्वेषण की माँग करे। धार्मिक रूढ़िवादी (चाहे वह इस्लामी, इसाई या हिन्दू रूढ़िवादी हो) जो उपभोक्तवाद या ‘अमेरिकी जीवन शैली’ का रैडिकल विकल्प देने का दावा करता है, तभी महत्त्वपूर्ण अस्तित्व प्राप्त करता है जब पारम्परिक वाम विकल्प खासकर मार्क्सवाद और साम्यवाद की महान् क्रान्तिकारी परम्पराएँ अचानक अनुपलब्ध प्रतीत होने लगती हैं।’’ आज क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण एजेण्डा राष्ट्रीय सम्प्रभुता की रक्षा करना है। क्रान्ति एक प्रक्रिया है और समकालिक परवर्ती पूँजीवादी तन्त्र का अवसान भी है। लेकिन इसका प्रस्थान बिन्दु राष्ट्रीय सम्प्रभुता की रक्षा के सवालों से आरंभ होता है। परवर्ती पूँजीवाद के जमाने में राष्ट्रीय सम्प्रभुता ही दाँव पर लगी है। किसी भी देश को स्वतंत्र रूप से अपनी नीतियाँ बनाने और विकास करने का हक नहीं है। क्रान्तिकारी ताकतों का यह विश्व एजेण्डा है। क्रान्तिकारी ताकतों का आन्तरिक एजेण्डा है-हाशिए के लोगों को उनकी जनवादी माँगों के इर्द-गिर्द एकजुट करना। समाज में प्रत्येक व्यक्ति को संघर्ष की अवस्था में इसके या उसके साथ खड़े होने, प्रतिबद्ध होने के लिए तैयार करना। परवर्ती पूँजीवाद ने गैर-प्रतिबद्धता की हवा चला दी है, इस हवा को जनवादी प्रतिबद्धता के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है। आम लोगों को जनवादी विचारों के प्रति प्रतिबद्ध बनाना, हाशिए के लोगों को जनवादी माँगों के आधार पर एकजुट करना, उनके संगठनों और संघर्षों को आयोजित करना, वास्तविक अर्थों में क्रान्ति के मार्ग पर ही चलना है। किस सन्दर्भ में ‘क्रान्ति’ शब्द का अवमूल्यन हुआ है? A उत्तर आधुनिकता के दौर में क्रान्ति की अवधारणा की अत्यधिक आलोचना करने के सन्दर्भ में B क्रान्ति का सामान्य अर्थ परिवर्तन मानकर उसका कहीं भी प्रयोग करने के सन्दर्भ में C क्रान्ति के वास्तविक अर्थ आमूल-चूल परिवर्तन को विकृत करने के सन्दर्भ में D उपरोक्त सभी
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। उत्तर आधुनिकतावाद के दौर में क्रान्ति पर सबसे तेज हमले हुए हैं। इन हमलों के आन्तरिक और बाह्य दोनों ही स्वरूप रहे हैं। उत्तर आधुनिकता के दौर में क्रान्ति की अवधारणा के खिलाफ जितना लिखा गया है उतना अन्य किसी अवधारणा के बारे में नहीं लिखा गया है। क्रान्ति संबंधी बहस का वृहत्तर रूप में गहरा संबंध सिद्धान्त और व्यवहार की एकता के साथ है। इस प्रसंग में पहली बात यह कि क्रान्ति का वास्तविक अर्थ इन दिनों विकृत हुआ है। उसका अवमूल्यन हुआ है। क्रान्ति का अर्थ परिवर्तन मान लिया गया है और प्रत्येक परिवर्तन को क्रान्ति कहने का रिवाज चल निकला है। क्रान्ति के अर्थ का यह विकृतिकरण है। क्रान्ति का अर्थ है बुनियादी या आमूल-चूल परिवर्तन। क्रान्ति अनन्त क्षण में नहीं बल्कि समकालिक क्षण में घटित होती है। इसमें प्रत्येक चीज एक-दूसरे से जुड़ी होती है। क्रान्ति का मतलब राजतंत्र या समाजतंत्र का ‘सुधार’ या ‘अल्प सुधार’ नहीं है, क्रान्ति का मतलब किसी काल्पनिक मानसिक जगत में परिवर्तन से नहीं है बल्कि इसका सम्बन्ध आमूल-चूल परिवर्तन से है। ये परिवर्तन एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हैं। क्रान्ति कोई बनी-बनाई परम्परा का निर्माण नहीं है बल्कि मूलभूत परिवर्तनों का पुनरान्वेषण है। क्रान्ति कोई तयशुदा तर्कसंघर्ष नहीं है। इसी प्रसंग में प्रसिद्ध मार्क्सवादी फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा है ‘‘सामाजिक क्रान्ति अनन्त समय का एक क्षण मात्र नहीं है। प्रत्युत समकालिक तंत्र में परिवर्तन की आवश्यकता की पुष्टि है, जिसमें हर चीज एक साथ हैं और एक-दूसरे से अन्तर्सम्बन्धित है। इस प्रकार का तंत्र सम्पूर्ण तंत्रगत परिवर्तन की माँग करता है, न कि अल्प ‘सुधार’, जिसे निन्दात्मक अर्थ में ‘मनोराज्य विषयक’ कहा जाता है, जो भ्रामक है, व्यवहार्य नही। अभिप्राय यह है कि यह तंत्र वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के स्थान पर एक रैडिकल सामाजिक विकल्प की विचारधारात्मक दृष्टि की माँग करता है, ऐसा कुछ जिसे वर्तमान तर्ककूल संघर्ष के अन्तर्गत दिया हुआ या विरासत में मिला नहीं माना जाए, बल्कि जो पुनरान्वेषण की माँग करे। धार्मिक रूढ़िवादी (चाहे वह इस्लामी, इसाई या हिन्दू रूढ़िवादी हो) जो उपभोक्तवाद या ‘अमेरिकी जीवन शैली’ का रैडिकल विकल्प देने का दावा करता है, तभी महत्त्वपूर्ण अस्तित्व प्राप्त करता है जब पारम्परिक वाम विकल्प खासकर मार्क्सवाद और साम्यवाद की महान् क्रान्तिकारी परम्पराएँ अचानक अनुपलब्ध प्रतीत होने लगती हैं।’’ आज क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण एजेण्डा राष्ट्रीय सम्प्रभुता की रक्षा करना है। क्रान्ति एक प्रक्रिया है और समकालिक परवर्ती पूँजीवादी तन्त्र का अवसान भी है। लेकिन इसका प्रस्थान बिन्दु राष्ट्रीय सम्प्रभुता की रक्षा के सवालों से आरंभ होता है। परवर्ती पूँजीवाद के जमाने में राष्ट्रीय सम्प्रभुता ही दाँव पर लगी है। किसी भी देश को स्वतंत्र रूप से अपनी नीतियाँ बनाने और विकास करने का हक नहीं है। क्रान्तिकारी ताकतों का यह विश्व एजेण्डा है। क्रान्तिकारी ताकतों का आन्तरिक एजेण्डा है-हाशिए के लोगों को उनकी जनवादी माँगों के इर्द-गिर्द एकजुट करना। समाज में प्रत्येक व्यक्ति को संघर्ष की अवस्था में इसके या उसके साथ खड़े होने, प्रतिबद्ध होने के लिए तैयार करना। परवर्ती पूँजीवाद ने गैर-प्रतिबद्धता की हवा चला दी है, इस हवा को जनवादी प्रतिबद्धता के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है। आम लोगों को जनवादी विचारों के प्रति प्रतिबद्ध बनाना, हाशिए के लोगों को जनवादी माँगों के आधार पर एकजुट करना, उनके संगठनों और संघर्षों को आयोजित करना, वास्तविक अर्थों में क्रान्ति के मार्ग पर ही चलना है। परिच्छेद में प्रयुक्त ‘मनोराज्य विषयक’ से क्या तात्पर्य है? A मनोवैज्ञानिक स्तर पर निर्मित राज्यों से सम्बन्धित मुद्दे B समकालिक तंत्र में होने वाला सम्पूर्ण तंत्रगत परिवर्तन C समकालिक तंत्र में होने वाला अल्प सुधार D उपरोक्त में से कोई नहीं
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। उत्तर आधुनिकतावाद के दौर में क्रान्ति पर सबसे तेज हमले हुए हैं। इन हमलों के आन्तरिक और बाह्य दोनों ही स्वरूप रहे हैं। उत्तर आधुनिकता के दौर में क्रान्ति की अवधारणा के खिलाफ जितना लिखा गया है उतना अन्य किसी अवधारणा के बारे में नहीं लिखा गया है। क्रान्ति संबंधी बहस का वृहत्तर रूप में गहरा संबंध सिद्धान्त और व्यवहार की एकता के साथ है। इस प्रसंग में पहली बात यह कि क्रान्ति का वास्तविक अर्थ इन दिनों विकृत हुआ है। उसका अवमूल्यन हुआ है। क्रान्ति का अर्थ परिवर्तन मान लिया गया है और प्रत्येक परिवर्तन को क्रान्ति कहने का रिवाज चल निकला है। क्रान्ति के अर्थ का यह विकृतिकरण है। क्रान्ति का अर्थ है बुनियादी या आमूल-चूल परिवर्तन। क्रान्ति अनन्त क्षण में नहीं बल्कि समकालिक क्षण में घटित होती है। इसमें प्रत्येक चीज एक-दूसरे से जुड़ी होती है। क्रान्ति का मतलब राजतंत्र या समाजतंत्र का ‘सुधार’ या ‘अल्प सुधार’ नहीं है, क्रान्ति का मतलब किसी काल्पनिक मानसिक जगत में परिवर्तन से नहीं है बल्कि इसका सम्बन्ध आमूल-चूल परिवर्तन से है। ये परिवर्तन एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हैं। क्रान्ति कोई बनी-बनाई परम्परा का निर्माण नहीं है बल्कि मूलभूत परिवर्तनों का पुनरान्वेषण है। क्रान्ति कोई तयशुदा तर्कसंघर्ष नहीं है। इसी प्रसंग में प्रसिद्ध मार्क्सवादी फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा है ‘‘सामाजिक क्रान्ति अनन्त समय का एक क्षण मात्र नहीं है। प्रत्युत समकालिक तंत्र में परिवर्तन की आवश्यकता की पुष्टि है, जिसमें हर चीज एक साथ हैं और एक-दूसरे से अन्तर्सम्बन्धित है। इस प्रकार का तंत्र सम्पूर्ण तंत्रगत परिवर्तन की माँग करता है, न कि अल्प ‘सुधार’, जिसे निन्दात्मक अर्थ में ‘मनोराज्य विषयक’ कहा जाता है, जो भ्रामक है, व्यवहार्य नही। अभिप्राय यह है कि यह तंत्र वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के स्थान पर एक रैडिकल सामाजिक विकल्प की विचारधारात्मक दृष्टि की माँग करता है, ऐसा कुछ जिसे वर्तमान तर्ककूल संघर्ष के अन्तर्गत दिया हुआ या विरासत में मिला नहीं माना जाए, बल्कि जो पुनरान्वेषण की माँग करे। धार्मिक रूढ़िवादी (चाहे वह इस्लामी, इसाई या हिन्दू रूढ़िवादी हो) जो उपभोक्तवाद या ‘अमेरिकी जीवन शैली’ का रैडिकल विकल्प देने का दावा करता है, तभी महत्त्वपूर्ण अस्तित्व प्राप्त करता है जब पारम्परिक वाम विकल्प खासकर मार्क्सवाद और साम्यवाद की महान् क्रान्तिकारी परम्पराएँ अचानक अनुपलब्ध प्रतीत होने लगती हैं।’’ आज क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण एजेण्डा राष्ट्रीय सम्प्रभुता की रक्षा करना है। क्रान्ति एक प्रक्रिया है और समकालिक परवर्ती पूँजीवादी तन्त्र का अवसान भी है। लेकिन इसका प्रस्थान बिन्दु राष्ट्रीय सम्प्रभुता की रक्षा के सवालों से आरंभ होता है। परवर्ती पूँजीवाद के जमाने में राष्ट्रीय सम्प्रभुता ही दाँव पर लगी है। किसी भी देश को स्वतंत्र रूप से अपनी नीतियाँ बनाने और विकास करने का हक नहीं है। क्रान्तिकारी ताकतों का यह विश्व एजेण्डा है। क्रान्तिकारी ताकतों का आन्तरिक एजेण्डा है-हाशिए के लोगों को उनकी जनवादी माँगों के इर्द-गिर्द एकजुट करना। समाज में प्रत्येक व्यक्ति को संघर्ष की अवस्था में इसके या उसके साथ खड़े होने, प्रतिबद्ध होने के लिए तैयार करना। परवर्ती पूँजीवाद ने गैर-प्रतिबद्धता की हवा चला दी है, इस हवा को जनवादी प्रतिबद्धता के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है। आम लोगों को जनवादी विचारों के प्रति प्रतिबद्ध बनाना, हाशिए के लोगों को जनवादी माँगों के आधार पर एकजुट करना, उनके संगठनों और संघर्षों को आयोजित करना, वास्तविक अर्थों में क्रान्ति के मार्ग पर ही चलना है। परिच्छेद में दिए गए तथ्यों के आधार पर निम्नलिखित कथनों की सत्यता की जाँच कीजिए: 1- क्रान्तिकारी शक्तियों का विश्व एजेण्डा किसी भी देश को स्वतंत्र रूप से अपनी नीतियाँ बनाने और विकास करने का हक देने के विरुद्ध है। 2- क्रान्तिकारी शक्तियों का आन्तरिक एजेण्डा हाशिए के लोगों को सत्ता के केन्द्र के इर्द गिर्द एकजुट करना है। 3- परवर्ती पूँजीवाद ने गैर-प्रतिबद्धता की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। 4- उत्तर आधुनिकतावाद के दौर में क्रान्ति जैसी अवधारणाएँ अधिक प्रासंगिक नहीं रह गई हैं। कूटों की सहायता से सही विकल्प का चयन कीजिए: A 1 और 3 B 2 और 4 C 1, 2 और 3 D 1, 2, 3 और 4
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निम्नलिखित परिच्छेद को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। नया युग वैज्ञानिक दार्शनिकता का है। इसमें किसी तरह की कट्टरता, मूढ़ता अथवा पागलपन है। मूढ़ताएँ अथवा अन्धताएँ धर्म की हों या जाति की अथवा फिर भाषा या क्षेत्र की, पूरी तरह से बेमानी हो चुकी हैं। लेकिन हमारे यहाँ की राजनीति इतनी भ्रष्ट हो गई है कि उन्हें देश को बाँटने के सिवाय कोई और मुद्दा ही नहीं दिखता। कभी वे अलग राज्य के नाम पर राजनीति कर रहे हैं, तो कभी जाति और धर्म के नाम पर। जिस देश में लोग बिना खाए से जा रहे हों, कुपोषण के शिकार हो रहे हों, लड़कियाँ घर से निकलने पर डर रही हों, उस देश में ऐसे मुद्दों पर राजनीति करना मात्र मूर्खता ही कही जा सकती है। आज से पाँच-छह सौ साल पहले यूरोप जिस अन्धविश्वास, दम्भ एवं धार्मिक बर्बरता के युग में जी रहा था, उस युग में आज अपने देश को घसीटने की पूरी कोशिश की जा रही है जो मूर्खताएँ अब तक हमारे निजी जीवन का नाश कर रही थीं, वहीं अब देशव्यापी प्रांगण में फैलकर हमारी बची-खुची मानवीय संवेदना का ग्रास कर रही हैं। जिनके कारण अभी तक हमारे व्यक्तित्व का पतन होता रहा है, जो हमारी गुलामी का प्रमुख कारण रहीं, अब उन्हीं के कारण हमारा देश एक बार फिर तबाही की राह पर है। धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर और भाषा के नाम पर जो झगड़े खड़े किए जा रहे हैं, उनका हश्र सारा देश देख रहा है। कभी मन्दिर और कभी मस्जिद तो कभी जातीयता को रिझाने की कोशिश। दुःख तो तब और होता है, जब इस तरह के मामलों में शिक्षित वर्ग भी शामिल दिखता है जो स्वयं को समाज का कर्णधार मानते हैं। इन धर्मों एवं जातियों के झगड़ों को, हमारी कमजोरियों को दूर करने का सही तरीका केवल यही है कि देश के कुछ साहसी एवं सत्यनिष्ठ व्यक्ति इन कट्टरताओं की कुटिलता के विरुद्ध एक महासंग्राम छेड़ दें। जब तक यह मूर्खता नष्ट न होगी, तब तक देश का कल्याण पथ प्रशस्त ना होगा। समझौता कर लेने, नौकरियों का बँटवारा कर लेने और अस्थायी सुलह के लिए हाथों में स्याही पोत लेने से या तोड़फोड़ कर लेने से कभी राष्ट्रीयता व मानवीयता का उपवन नहीं महकेगा। हालत आज इतनी भयावह हो गई है कि व्यापक महासंग्राम छेड़े बिना काम चलता नहीं दिखता। धर्म, क्षेत्र एवं जाति का नाम लेकर घृणित व कुत्सित कुचक्र रचने वालों की संख्या रक्तबीज की तरह बढ़ रही है। बीच-बीच में ऐसा अन्धयुग आ ही जाता है, जिसमें धर्म, जाति एवं क्षेत्र के नाम पर झूठे ढकोसले खड़े हो जाते हैं। कतिपय स्वार्थी तत्व ऐसे में लोगों में भ्रान्तियाँ पैदा करने की चेष्टा करने लगते हैं। हिंसा की भावना पहले कभी व्यक्तिगत पूजा-उपक्रमों तक सिमटी थी, बाद में वह समाज व्यापिनी बन गई जिसे कुछ लोग कल तक अपनी व्यक्तिगत हैसियत से करते थे, अब उसे पूरा समाज करने लगा। ऐसे समय एक व्यापक विचार क्रान्ति की जरूरत महसूस हुई है, क्योंकि समाज की आत्मा में भारी विक्षोभ उत्पन्न हुआ है। परिच्छेद के अनुसार, आज हमारे देश को किस क्षेत्र में घसीटने की कोशिश की जा रही है? A धार्मिक कट्टरता के क्षेत्र में B अन्धविश्वास, दम्भ एवं धार्मिक बर्बरता के क्षेत्र में C भारतवासियों के व्यक्तित्व का विघटन D भुखमरी एवं कुपोषण
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निम्नलिखित परिच्छेद को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। नया युग वैज्ञानिक दार्शनिकता का है। इसमें किसी तरह की कट्टरता, मूढ़ता अथवा पागलपन है। मूढ़ताएँ अथवा अन्धताएँ धर्म की हों या जाति की अथवा फिर भाषा या क्षेत्र की, पूरी तरह से बेमानी हो चुकी हैं। लेकिन हमारे यहाँ की राजनीति इतनी भ्रष्ट हो गई है कि उन्हें देश को बाँटने के सिवाय कोई और मुद्दा ही नहीं दिखता। कभी वे अलग राज्य के नाम पर राजनीति कर रहे हैं, तो कभी जाति और धर्म के नाम पर। जिस देश में लोग बिना खाए से जा रहे हों, कुपोषण के शिकार हो रहे हों, लड़कियाँ घर से निकलने पर डर रही हों, उस देश में ऐसे मुद्दों पर राजनीति करना मात्र मूर्खता ही कही जा सकती है। आज से पाँच-छह सौ साल पहले यूरोप जिस अन्धविश्वास, दम्भ एवं धार्मिक बर्बरता के युग में जी रहा था, उस युग में आज अपने देश को घसीटने की पूरी कोशिश की जा रही है जो मूर्खताएँ अब तक हमारे निजी जीवन का नाश कर रही थीं, वहीं अब देशव्यापी प्रांगण में फैलकर हमारी बची-खुची मानवीय संवेदना का ग्रास कर रही हैं। जिनके कारण अभी तक हमारे व्यक्तित्व का पतन होता रहा है, जो हमारी गुलामी का प्रमुख कारण रहीं, अब उन्हीं के कारण हमारा देश एक बार फिर तबाही की राह पर है। धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर और भाषा के नाम पर जो झगड़े खड़े किए जा रहे हैं, उनका हश्र सारा देश देख रहा है। कभी मन्दिर और कभी मस्जिद तो कभी जातीयता को रिझाने की कोशिश। दुःख तो तब और होता है, जब इस तरह के मामलों में शिक्षित वर्ग भी शामिल दिखता है जो स्वयं को समाज का कर्णधार मानते हैं। इन धर्मों एवं जातियों के झगड़ों को, हमारी कमजोरियों को दूर करने का सही तरीका केवल यही है कि देश के कुछ साहसी एवं सत्यनिष्ठ व्यक्ति इन कट्टरताओं की कुटिलता के विरुद्ध एक महासंग्राम छेड़ दें। जब तक यह मूर्खता नष्ट न होगी, तब तक देश का कल्याण पथ प्रशस्त ना होगा। समझौता कर लेने, नौकरियों का बँटवारा कर लेने और अस्थायी सुलह के लिए हाथों में स्याही पोत लेने से या तोड़फोड़ कर लेने से कभी राष्ट्रीयता व मानवीयता का उपवन नहीं महकेगा। हालत आज इतनी भयावह हो गई है कि व्यापक महासंग्राम छेड़े बिना काम चलता नहीं दिखता। धर्म, क्षेत्र एवं जाति का नाम लेकर घृणित व कुत्सित कुचक्र रचने वालों की संख्या रक्तबीज की तरह बढ़ रही है। बीच-बीच में ऐसा अन्धयुग आ ही जाता है, जिसमें धर्म, जाति एवं क्षेत्र के नाम पर झूठे ढकोसले खड़े हो जाते हैं। कतिपय स्वार्थी तत्व ऐसे में लोगों में भ्रान्तियाँ पैदा करने की चेष्टा करने लगते हैं। हिंसा की भावना पहले कभी व्यक्तिगत पूजा-उपक्रमों तक सिमटी थी, बाद में वह समाज व्यापिनी बन गई जिसे कुछ लोग कल तक अपनी व्यक्तिगत हैसियत से करते थे, अब उसे पूरा समाज करने लगा। ऐसे समय एक व्यापक विचार क्रान्ति की जरूरत महसूस हुई है, क्योंकि समाज की आत्मा में भारी विक्षोभ उत्पन्न हुआ है। परिच्छेद में दिए गए तथ्यों के आधार पर निम्नलिखित कथनों की सत्यता की जाँच कीजिए: 1- धर्मगत एवं जातिगत कट्टरता के मामलों में जनसामान्य के साथ शिक्षित वर्ग शामिल नहीं है। 2- साहसी एवं सत्यनिष्ठ व्यक्तियों द्वारा विभिन्न क्षेत्रें की कट्टरताओं की कुटिलता के विरुद्ध एक महासंग्राम छेड़ने की आवश्यकता है। 3- देश की राजनीति मुख्यतः देश की जनता को विभिन्न मुद्दों पर बाँटने का काम करती है। कूटों की सहायता से सही विकल्प का चयन कीजिए। A केवल 2 B केवल 3 C 2 और 3 D 1, 2 और 3
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निम्नलिखित परिच्छेद को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। नया युग वैज्ञानिक दार्शनिकता का है। इसमें किसी तरह की कट्टरता, मूढ़ता अथवा पागलपन है। मूढ़ताएँ अथवा अन्धताएँ धर्म की हों या जाति की अथवा फिर भाषा या क्षेत्र की, पूरी तरह से बेमानी हो चुकी हैं। लेकिन हमारे यहाँ की राजनीति इतनी भ्रष्ट हो गई है कि उन्हें देश को बाँटने के सिवाय कोई और मुद्दा ही नहीं दिखता। कभी वे अलग राज्य के नाम पर राजनीति कर रहे हैं, तो कभी जाति और धर्म के नाम पर। जिस देश में लोग बिना खाए से जा रहे हों, कुपोषण के शिकार हो रहे हों, लड़कियाँ घर से निकलने पर डर रही हों, उस देश में ऐसे मुद्दों पर राजनीति करना मात्र मूर्खता ही कही जा सकती है। आज से पाँच-छह सौ साल पहले यूरोप जिस अन्धविश्वास, दम्भ एवं धार्मिक बर्बरता के युग में जी रहा था, उस युग में आज अपने देश को घसीटने की पूरी कोशिश की जा रही है जो मूर्खताएँ अब तक हमारे निजी जीवन का नाश कर रही थीं, वहीं अब देशव्यापी प्रांगण में फैलकर हमारी बची-खुची मानवीय संवेदना का ग्रास कर रही हैं। जिनके कारण अभी तक हमारे व्यक्तित्व का पतन होता रहा है, जो हमारी गुलामी का प्रमुख कारण रहीं, अब उन्हीं के कारण हमारा देश एक बार फिर तबाही की राह पर है। धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर और भाषा के नाम पर जो झगड़े खड़े किए जा रहे हैं, उनका हश्र सारा देश देख रहा है। कभी मन्दिर और कभी मस्जिद तो कभी जातीयता को रिझाने की कोशिश। दुःख तो तब और होता है, जब इस तरह के मामलों में शिक्षित वर्ग भी शामिल दिखता है जो स्वयं को समाज का कर्णधार मानते हैं। इन धर्मों एवं जातियों के झगड़ों को, हमारी कमजोरियों को दूर करने का सही तरीका केवल यही है कि देश के कुछ साहसी एवं सत्यनिष्ठ व्यक्ति इन कट्टरताओं की कुटिलता के विरुद्ध एक महासंग्राम छेड़ दें। जब तक यह मूर्खता नष्ट न होगी, तब तक देश का कल्याण पथ प्रशस्त ना होगा। समझौता कर लेने, नौकरियों का बँटवारा कर लेने और अस्थायी सुलह के लिए हाथों में स्याही पोत लेने से या तोड़फोड़ कर लेने से कभी राष्ट्रीयता व मानवीयता का उपवन नहीं महकेगा। हालत आज इतनी भयावह हो गई है कि व्यापक महासंग्राम छेड़े बिना काम चलता नहीं दिखता। धर्म, क्षेत्र एवं जाति का नाम लेकर घृणित व कुत्सित कुचक्र रचने वालों की संख्या रक्तबीज की तरह बढ़ रही है। बीच-बीच में ऐसा अन्धयुग आ ही जाता है, जिसमें धर्म, जाति एवं क्षेत्र के नाम पर झूठे ढकोसले खड़े हो जाते हैं। कतिपय स्वार्थी तत्व ऐसे में लोगों में भ्रान्तियाँ पैदा करने की चेष्टा करने लगते हैं। हिंसा की भावना पहले कभी व्यक्तिगत पूजा-उपक्रमों तक सिमटी थी, बाद में वह समाज व्यापिनी बन गई जिसे कुछ लोग कल तक अपनी व्यक्तिगत हैसियत से करते थे, अब उसे पूरा समाज करने लगा। ऐसे समय एक व्यापक विचार क्रान्ति की जरूरत महसूस हुई है, क्योंकि समाज की आत्मा में भारी विक्षोभ उत्पन्न हुआ है। दिए गए परिच्छेद की केन्द्रीय विषयवस्तु क्या है? A देश में व्याप्त विभिन्न प्रकार की कट्टरता B देश की राजनीति का उचित मार्ग से भटकाव C साहसी एवं शिक्षित वर्ग का अपने कर्तव्यों से पलायन D जनसामान्य में विवेकशीलता एवं तार्किकता का अभाव
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निम्नलिखित परिच्छेद को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। नया युग वैज्ञानिक दार्शनिकता का है। इसमें किसी तरह की कट्टरता, मूढ़ता अथवा पागलपन है। मूढ़ताएँ अथवा अन्धताएँ धर्म की हों या जाति की अथवा फिर भाषा या क्षेत्र की, पूरी तरह से बेमानी हो चुकी हैं। लेकिन हमारे यहाँ की राजनीति इतनी भ्रष्ट हो गई है कि उन्हें देश को बाँटने के सिवाय कोई और मुद्दा ही नहीं दिखता। कभी वे अलग राज्य के नाम पर राजनीति कर रहे हैं, तो कभी जाति और धर्म के नाम पर। जिस देश में लोग बिना खाए से जा रहे हों, कुपोषण के शिकार हो रहे हों, लड़कियाँ घर से निकलने पर डर रही हों, उस देश में ऐसे मुद्दों पर राजनीति करना मात्र मूर्खता ही कही जा सकती है। आज से पाँच-छह सौ साल पहले यूरोप जिस अन्धविश्वास, दम्भ एवं धार्मिक बर्बरता के युग में जी रहा था, उस युग में आज अपने देश को घसीटने की पूरी कोशिश की जा रही है जो मूर्खताएँ अब तक हमारे निजी जीवन का नाश कर रही थीं, वहीं अब देशव्यापी प्रांगण में फैलकर हमारी बची-खुची मानवीय संवेदना का ग्रास कर रही हैं। जिनके कारण अभी तक हमारे व्यक्तित्व का पतन होता रहा है, जो हमारी गुलामी का प्रमुख कारण रहीं, अब उन्हीं के कारण हमारा देश एक बार फिर तबाही की राह पर है। धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर और भाषा के नाम पर जो झगड़े खड़े किए जा रहे हैं, उनका हश्र सारा देश देख रहा है। कभी मन्दिर और कभी मस्जिद तो कभी जातीयता को रिझाने की कोशिश। दुःख तो तब और होता है, जब इस तरह के मामलों में शिक्षित वर्ग भी शामिल दिखता है जो स्वयं को समाज का कर्णधार मानते हैं। इन धर्मों एवं जातियों के झगड़ों को, हमारी कमजोरियों को दूर करने का सही तरीका केवल यही है कि देश के कुछ साहसी एवं सत्यनिष्ठ व्यक्ति इन कट्टरताओं की कुटिलता के विरुद्ध एक महासंग्राम छेड़ दें। जब तक यह मूर्खता नष्ट न होगी, तब तक देश का कल्याण पथ प्रशस्त ना होगा। समझौता कर लेने, नौकरियों का बँटवारा कर लेने और अस्थायी सुलह के लिए हाथों में स्याही पोत लेने से या तोड़फोड़ कर लेने से कभी राष्ट्रीयता व मानवीयता का उपवन नहीं महकेगा। हालत आज इतनी भयावह हो गई है कि व्यापक महासंग्राम छेड़े बिना काम चलता नहीं दिखता। धर्म, क्षेत्र एवं जाति का नाम लेकर घृणित व कुत्सित कुचक्र रचने वालों की संख्या रक्तबीज की तरह बढ़ रही है। बीच-बीच में ऐसा अन्धयुग आ ही जाता है, जिसमें धर्म, जाति एवं क्षेत्र के नाम पर झूठे ढकोसले खड़े हो जाते हैं। कतिपय स्वार्थी तत्व ऐसे में लोगों में भ्रान्तियाँ पैदा करने की चेष्टा करने लगते हैं। हिंसा की भावना पहले कभी व्यक्तिगत पूजा-उपक्रमों तक सिमटी थी, बाद में वह समाज व्यापिनी बन गई जिसे कुछ लोग कल तक अपनी व्यक्तिगत हैसियत से करते थे, अब उसे पूरा समाज करने लगा। ऐसे समय एक व्यापक विचार क्रान्ति की जरूरत महसूस हुई है, क्योंकि समाज की आत्मा में भारी विक्षोभ उत्पन्न हुआ है। परिच्छेद में प्रयुक्त वाक्य ‘समाज की आत्मा में भारी विक्षोभ उत्पन्न हुआ है’- से क्या तात्पर्य है? A भारतीय समाज विभिन्न प्रकार की कट्टरताओं से पूरी तरह तंग आ चुका है। B भारतीय समाज वर्तमान राजनीति से ऊब चुका है। C भारतीय समाज में स्वार्थी एवं हिंसक लोगों का बोलबाला हो गया है। D भारतीय समाज विभिन्न क्षेत्रें की समस्याओं से परेशान होकर अपने धैर्य की सीमा खोने के कगार पर पहुँच चुका है।
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निम्नलिखित जानकारियों को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। पाँच दोस्त (यश, नीरज, मेहुल, राम और प्रकाश) पाँच विभिन्न कोर्स (मेडिकल, इंजीनियरिंग, आर्किटेक्ट, कला, मैनेजमेंट) और प्रत्येक विभिन्न वाद्ययंत्र (सितार, तबला, सरोद, गिटार एवं वॉयलिन) बजाते हैं। मेहुल एक मेडिकल छात्र है एवं सरोद, सितार या गिटार नहीं बजाता है। प्रकाश न तो इंजीनियरिंग और न ही मैनेजमेंट का छात्र है। राम, जो तबला बजाता है, कला का छात्र है। न तो प्रकाश, न ही यश गिटार या वॉयलिन बजाते हैं। गिटार बजाने वाले निम्नलिखित में से किस कोर्स के छात्र हैं? A इंजीनियरिंग B या तो इंजीनियरिंग या मैनेजमेंट C आर्किटेक्ट D मेडिकल
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निम्नलिखित परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए इन प्रश्नों के उत्तर केवल परिच्छेद पर ही आधारित होने चाहिएं। हम इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं। यदि हम पीछे की ओर मुड़कर देखें और अपनी सफलताओं-विफलताओं का तलपट तैयार करें तो स्पष्ट पता चलेगा कि विज्ञान और तकनीकी ज्ञान में हम निस्सन्देह आगे बढ़े हैं, किन्तु नैतिक कर्त्तव्यों की हमने काफी अवहेलना की है। हमारे अनैतिक कार्यों की सूची लम्बी होगी। किए गए अनैतिक कार्यों के लिए प्रकृति हमें माफ नहीं कर सकती, अपने दुष्कर्मों का फल हमें तथा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना ही पड़ेगा। इन्हीं अनैतिक कार्यों में एक है पारिस्थितिकी के साथ खुलकर खिलवाड़ करना। हमने भौतिक सुख के लिए मखमली वनस्पति को नष्ट किया_ वनश्री का विनाश कर अट्टालिकाएँ और धुआँ उगलते भीमकाय कल-कारखाने खड़े किए, वन्यजीवों का अंधाधुंध शिकार कर उनकी कितनी ही जातियों-प्रजातियों का खात्मा कर दिया_ प्रशीतन के साधनों का विकास कर क्लोरोफ्रलोरोकार्बन जैसी दूषित गैसों की मात्र बढ़ाई और ओजोन परत में छिद्र उत्पन्न कर न केवल अपना बल्कि समस्त जीवजगत का अस्तित्व खतरे में डाला। हमने जनसंख्या में आशातीत वृद्धि कर पारिस्थितिक ”ह्रास में भी वृद्धि की। आज पारिस्थितिकी संबंधी कितनी ही समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हो गई हैं। प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ पारिस्थितिक असंतुलन के ही परिणाम हैं। पारिस्थितिक सन्तुलन से तात्पर्य है कि पृथ्वी पर सभी जीवों (जिनमें पेड़-पौधे भी सम्मिलित हैं) का अस्तित्व बना रहे, उनकी संख्या स्थिर रहे, उनके जीवन में अवांछनीय बदलाव न आने पाएँ। आधुनिक मानव अपनी बढ़ती संख्या और वैज्ञानिक चमत्कारों से पारिस्थितिक संतुलन बिगाड़ने लगा है। जुलाई, 1962 की घटना है- अमेरिका ने 400 किमी की ऊँचाई से एक शक्तिशाली हाइड्रोजन बम का विस्फोट किया जिससे पृथ्वी के चारों ओर गहन विकिरण की एक नई परत बन गई। इस कृत्रिम विकिरण पट्टी को विसारित होने में दस वर्ष लगे। मई, 1963 में अमेरिका ने अन्तरिक्ष में एक और खतरनाक प्रयोग किया जिसके फलस्वरूप 3220 किमी की ऊँचाई पर पृथ्वी के चारों ओर ताँबे की 40 करोड़ सुइयों की एक पट्टी बन गई। यदि यह प्रयोग इससे वृहत्तर पैमाने पर होता तो इससे रेडियो और प्रकाशीय खगोलविद्या के लिए भारी समस्याएँ पैदा हो जातीं। ये प्रयोग उस ओजोन परत की अखण्डता को नष्ट कर देते हैं जो पृथ्वी के जीवित प्राणियों को घातक पराबैंगनी किरणों से बचाती है। वैज्ञानिक और तकनीकी क्रान्ति ने समसामयिक समाज और पारिस्थितिकी के बीच संबंधों को बड़ा जटिल बना दिया है। इसका एक मुख्य परिणाम प्राकृतिक संसाधनों के गहन उपयोग और औद्योगिकरण तथा नगरीकरण की प्रक्रिया की वजह से प्रकृति पर मनुष्य के प्रभाव में बढ़ोतारी होना है। इससे पारिस्थितिक सन्तुलन के अभाव में कई अवांछित परिणाम दृष्टिगोचर हो रहे हैं_ जैसे-वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण, भू-क्षरण में तेजी, लवणीकरण, दलदल भूमि का निर्माण, वन ”ह्रास, तृणभूमियों का ”ह्रास, मत्स्य क्षेत्रें का घटना और मौसम में बदलाव। पारिस्थितिक सन्तुलन के बिगड़ने से प्रभावित निम्नलिखित परिणामों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कौन है? A वनों का विनाश B क्लोरोफ्रलोरोकार्बन जैसी दूषित गैसों में वृद्धि C ओजोन परत में छिद्र D भू-क्षरण में तेजी
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निम्नलिखित परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए इन प्रश्नों के उत्तर केवल परिच्छेद पर ही आधारित होने चाहिएं। हम इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं। यदि हम पीछे की ओर मुड़कर देखें और अपनी सफलताओं-विफलताओं का तलपट तैयार करें तो स्पष्ट पता चलेगा कि विज्ञान और तकनीकी ज्ञान में हम निस्सन्देह आगे बढ़े हैं, किन्तु नैतिक कर्त्तव्यों की हमने काफी अवहेलना की है। हमारे अनैतिक कार्यों की सूची लम्बी होगी। किए गए अनैतिक कार्यों के लिए प्रकृति हमें माफ नहीं कर सकती, अपने दुष्कर्मों का फल हमें तथा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना ही पड़ेगा। इन्हीं अनैतिक कार्यों में एक है पारिस्थितिकी के साथ खुलकर खिलवाड़ करना। हमने भौतिक सुख के लिए मखमली वनस्पति को नष्ट किया_ वनश्री का विनाश कर अट्टालिकाएँ और धुआँ उगलते भीमकाय कल-कारखाने खड़े किए, वन्यजीवों का अंधाधुंध शिकार कर उनकी कितनी ही जातियों-प्रजातियों का खात्मा कर दिया_ प्रशीतन के साधनों का विकास कर क्लोरोफ्रलोरोकार्बन जैसी दूषित गैसों की मात्र बढ़ाई और ओजोन परत में छिद्र उत्पन्न कर न केवल अपना बल्कि समस्त जीवजगत का अस्तित्व खतरे में डाला। हमने जनसंख्या में आशातीत वृद्धि कर पारिस्थितिक ”ह्रास में भी वृद्धि की। आज पारिस्थितिकी संबंधी कितनी ही समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हो गई हैं। प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ पारिस्थितिक असंतुलन के ही परिणाम हैं। पारिस्थितिक सन्तुलन से तात्पर्य है कि पृथ्वी पर सभी जीवों (जिनमें पेड़-पौधे भी सम्मिलित हैं) का अस्तित्व बना रहे, उनकी संख्या स्थिर रहे, उनके जीवन में अवांछनीय बदलाव न आने पाएँ। आधुनिक मानव अपनी बढ़ती संख्या और वैज्ञानिक चमत्कारों से पारिस्थितिक संतुलन बिगाड़ने लगा है। जुलाई, 1962 की घटना है- अमेरिका ने 400 किमी की ऊँचाई से एक शक्तिशाली हाइड्रोजन बम का विस्फोट किया जिससे पृथ्वी के चारों ओर गहन विकिरण की एक नई परत बन गई। इस कृत्रिम विकिरण पट्टी को विसारित होने में दस वर्ष लगे। मई, 1963 में अमेरिका ने अन्तरिक्ष में एक और खतरनाक प्रयोग किया जिसके फलस्वरूप 3220 किमी की ऊँचाई पर पृथ्वी के चारों ओर ताँबे की 40 करोड़ सुइयों की एक पट्टी बन गई। यदि यह प्रयोग इससे वृहत्तर पैमाने पर होता तो इससे रेडियो और प्रकाशीय खगोलविद्या के लिए भारी समस्याएँ पैदा हो जातीं। ये प्रयोग उस ओजोन परत की अखण्डता को नष्ट कर देते हैं जो पृथ्वी के जीवित प्राणियों को घातक पराबैंगनी किरणों से बचाती है। वैज्ञानिक और तकनीकी क्रान्ति ने समसामयिक समाज और पारिस्थितिकी के बीच संबंधों को बड़ा जटिल बना दिया है। इसका एक मुख्य परिणाम प्राकृतिक संसाधनों के गहन उपयोग और औद्योगिकरण तथा नगरीकरण की प्रक्रिया की वजह से प्रकृति पर मनुष्य के प्रभाव में बढ़ोतारी होना है। इससे पारिस्थितिक सन्तुलन के अभाव में कई अवांछित परिणाम दृष्टिगोचर हो रहे हैं_ जैसे-वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण, भू-क्षरण में तेजी, लवणीकरण, दलदल भूमि का निर्माण, वन ”ह्रास, तृणभूमियों का ”ह्रास, मत्स्य क्षेत्रें का घटना और मौसम में बदलाव। परिच्छेद में दिए गए तथ्यों के आधार पर निम्नलिखित कथनों की सत्यता की जाँच कीजिए: 1- विज्ञान एवं तकनीकी ज्ञान में प्रगति करने के साथ-साथ नैतिक कर्तव्यों का भी हमने भरपूर निर्वहन करने की कोशिश की है। 2- अमेरिका द्वारा किए गए शक्तिशाली हाइड्रोजन बम के विस्फोट से निर्मित कृत्रिम विकिरण पट्टी को विसारित होने में कम-से-कम दस वर्ष लगे। 3- जनसंख्या में होने वाली वृद्धि का पारिस्थितिक ” ह्रास मे वृद्धि से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। 4- पारिस्थितिक सन्तुलन के अभाव में कई अवांछित परिणामों में तृणभूमियों का ” ह्रास, लवणीकरण आदि शामिल है। कूटों की सहायता से सही विकल्प का चयन कीजिए। A 1 और 2 B 2 और 3 C 2, 3 और 4 D 2 और 4
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निम्नलिखित परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए इन प्रश्नों के उत्तर केवल परिच्छेद पर ही आधारित होने चाहिएं। हम इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं। यदि हम पीछे की ओर मुड़कर देखें और अपनी सफलताओं-विफलताओं का तलपट तैयार करें तो स्पष्ट पता चलेगा कि विज्ञान और तकनीकी ज्ञान में हम निस्सन्देह आगे बढ़े हैं, किन्तु नैतिक कर्त्तव्यों की हमने काफी अवहेलना की है। हमारे अनैतिक कार्यों की सूची लम्बी होगी। किए गए अनैतिक कार्यों के लिए प्रकृति हमें माफ नहीं कर सकती, अपने दुष्कर्मों का फल हमें तथा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना ही पड़ेगा। इन्हीं अनैतिक कार्यों में एक है पारिस्थितिकी के साथ खुलकर खिलवाड़ करना। हमने भौतिक सुख के लिए मखमली वनस्पति को नष्ट किया_ वनश्री का विनाश कर अट्टालिकाएँ और धुआँ उगलते भीमकाय कल-कारखाने खड़े किए, वन्यजीवों का अंधाधुंध शिकार कर उनकी कितनी ही जातियों-प्रजातियों का खात्मा कर दिया_ प्रशीतन के साधनों का विकास कर क्लोरोफ्रलोरोकार्बन जैसी दूषित गैसों की मात्र बढ़ाई और ओजोन परत में छिद्र उत्पन्न कर न केवल अपना बल्कि समस्त जीवजगत का अस्तित्व खतरे में डाला। हमने जनसंख्या में आशातीत वृद्धि कर पारिस्थितिक ”ह्रास में भी वृद्धि की। आज पारिस्थितिकी संबंधी कितनी ही समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हो गई हैं। प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ पारिस्थितिक असंतुलन के ही परिणाम हैं। पारिस्थितिक सन्तुलन से तात्पर्य है कि पृथ्वी पर सभी जीवों (जिनमें पेड़-पौधे भी सम्मिलित हैं) का अस्तित्व बना रहे, उनकी संख्या स्थिर रहे, उनके जीवन में अवांछनीय बदलाव न आने पाएँ। आधुनिक मानव अपनी बढ़ती संख्या और वैज्ञानिक चमत्कारों से पारिस्थितिक संतुलन बिगाड़ने लगा है। जुलाई, 1962 की घटना है- अमेरिका ने 400 किमी की ऊँचाई से एक शक्तिशाली हाइड्रोजन बम का विस्फोट किया जिससे पृथ्वी के चारों ओर गहन विकिरण की एक नई परत बन गई। इस कृत्रिम विकिरण पट्टी को विसारित होने में दस वर्ष लगे। मई, 1963 में अमेरिका ने अन्तरिक्ष में एक और खतरनाक प्रयोग किया जिसके फलस्वरूप 3220 किमी की ऊँचाई पर पृथ्वी के चारों ओर ताँबे की 40 करोड़ सुइयों की एक पट्टी बन गई। यदि यह प्रयोग इससे वृहत्तर पैमाने पर होता तो इससे रेडियो और प्रकाशीय खगोलविद्या के लिए भारी समस्याएँ पैदा हो जातीं। ये प्रयोग उस ओजोन परत की अखण्डता को नष्ट कर देते हैं जो पृथ्वी के जीवित प्राणियों को घातक पराबैंगनी किरणों से बचाती है। वैज्ञानिक और तकनीकी क्रान्ति ने समसामयिक समाज और पारिस्थितिकी के बीच संबंधों को बड़ा जटिल बना दिया है। इसका एक मुख्य परिणाम प्राकृतिक संसाधनों के गहन उपयोग और औद्योगिकरण तथा नगरीकरण की प्रक्रिया की वजह से प्रकृति पर मनुष्य के प्रभाव में बढ़ोतारी होना है। इससे पारिस्थितिक सन्तुलन के अभाव में कई अवांछित परिणाम दृष्टिगोचर हो रहे हैं_ जैसे-वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण, भू-क्षरण में तेजी, लवणीकरण, दलदल भूमि का निर्माण, वन ”ह्रास, तृणभूमियों का ”ह्रास, मत्स्य क्षेत्रें का घटना और मौसम में बदलाव। दिए गए परिच्छेद का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक निम्नलिखित में से कौन-सा हो सकता है? A पारिस्थितिक असंतुलन के परिणाम B पारिस्थितिक सन्तुलन में अभाव से उत्पन्न चुनौतियाँ C पारिस्थितिक असंतुलन के कारण एवं परिणाम D पारिस्थितिक असंतुलन की प्रकृति
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निम्नलिखित परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए इन प्रश्नों के उत्तर केवल परिच्छेद पर ही आधारित होने चाहिएं। भौतिक पूँजी किसी भी अन्य वस्तु की भाँति दृश्य होती है। उसे किसी भी वस्तु की तरह बाजार में बेचा जा सकता है। मानव पूँजी अदृश्य होती है- यह धारक के शरीर और मस्तिष्क में रची-बसी होती है। बाजार में मानव पूँजी को बेचा नहीं जा सकता, केवल उसकी सेवाओं की बिक्री की जा सकती है इसलिए मानव पूँजी के स्वामी को उसके उत्पादन के स्थान पर उपस्थित होना आवश्यक होता है। भौतिक पूँजी को उसके स्वामी से पृथक् किया जा सकता है, किन्तु मानव पूँजी का स्वामी से पृथक्करण सम्भव नहीं होता। दोनों प्रकार की पूँजियों में उनके स्थानों की गतिशीलता के आधार पर अन्तर होता है। प्रायः कुछ कृत्रिम अपवादों को छोड़ भौतिक पूँजी का विश्व भर में निर्बाध आवागमन चलता रहता है। किन्तु मानव पूँजी का प्रवाह इतना निर्बाध नहीं होता, इसके मार्ग में राष्ट्रीयता और संस्कृति की ऊँची बाधाएँ आ जाती हैं। अतः भौतिक पूँजी का निर्माण तो आयात के सहारे भी हो जाता है, किन्तु मानवीय पूँजी की रचना तो समाज तथा अर्थव्यवस्था की अन्तर्भूत विशेषताओं के अनुरूप सुविचारित नीति निर्धारण संबंधी निर्णयों तथा सरकार और व्यक्तिगत व्यय के आधार पर होती है। समय के साथ-साथ दोनों ही प्रकार की पूँजियों में मूल्य हृास होता है। किसी मशीन के निरन्तर प्रयोग से वह घिस जाती है और प्रौद्योगिकीय परिवर्तन उसे पुराना घोषित कर देते हैं। मानव पूँजी में आयु के अनुसार कुछ ‘”ह्रास’ आता है। किन्तु शिक्षण और स्वास्थ्य सेवाओं में निरन्तर निवेश से उस ‘”ह्रास’ का काफी सीमा तक निराकरण हो सकता है। यह निवेश मानव पूँजी को प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों का सामना करने योग्य भी बना देता है किन्तु भौतिक पूँजी में किसी भी प्रकार से प्रौद्योगिकीय परिवर्तन का सामना करने की क्षमता नहीं आ पाती। मानव पूँजी द्वारा सृजित हित लाभ के प्रवाह का स्वरूप भी भौतिक पूँजी से अलग होता है। मानव पूँजी से केवल उसका स्वामी ही नहीं वरन् सारा समाज लाभान्वित होता है। इसे एक बाह्य हित लाभ कहा जा सकता है। एक सुशिक्षित व्यक्ति लोकतांत्रिक प्रक्रिया में प्रभावपूर्ण भागीदारी के माध्यम से राष्ट्र की सामाजिक, आर्थिक प्रगति में योगदान करता है। एक स्वस्थ व्यक्ति अपने वैयक्तिक स्तर पर तथा आस-पास की सफाई आदि के माध्यम से रोगों का संक्रमण रोक उन्हें महामारियों का रूप धारण नहीं करने देता। मानवीय पूँजी से व्यक्तिगत के साथ-साथ सामाजिक हित लाभों का भी सृजन होता है। किन्तु भौतिक पूँजी तो प्रायः निजी लाभ को ही जन्म दे पाती है। पूँजीगत पदार्थों के लाभ उन्हीं को मिल पाते हैं जो उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की कीमत चुका सकें। मानव पूँजी का प्रवाह भौतिक पूँजी जितना निर्बाध नहीं होता। ‘‘इसके मार्ग में राष्ट्रीयता और संस्कृति की ऊँची बाधाएँ आ जाती हैं’’- इस कथन का क्या अभिप्राय है? A मानव पूँजी का सम्बन्ध व्यक्ति विशेष से होता है, अतः उसकी सेवाएँ लेने में कई तथ्यों का ध्यान रखना पड़ता है। B मानव पूँजी व्यक्ति से संबंधित होने के कारण किसी अन्य देश द्वारा उस व्यक्ति विशेष की राष्ट्रीयता एवं संस्कृति को ध्यान में रखते हुए ही सेवाएँ आदान-प्रदान की जा सकती है। C राष्ट्रीयता का सन्दर्भ आदान-प्रदान करने वाले देशों के बीच के राजनीतिक संबंधों से जुड़ा है, जबकि संस्कृति का सन्दर्भ योगदान देने वाले व्यक्ति के मूल्यों एवं प्रतिमानों का योगदान लेने वाले व्यक्ति या देश के मूल्यों एवं प्रतिमानों से संबंधित है। D उपरोक्त सभी
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निम्नलिखित परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए इन प्रश्नों के उत्तर केवल परिच्छेद पर ही आधारित होने चाहिएं। भौतिक पूँजी किसी भी अन्य वस्तु की भाँति दृश्य होती है। उसे किसी भी वस्तु की तरह बाजार में बेचा जा सकता है। मानव पूँजी अदृश्य होती है- यह धारक के शरीर और मस्तिष्क में रची-बसी होती है। बाजार में मानव पूँजी को बेचा नहीं जा सकता, केवल उसकी सेवाओं की बिक्री की जा सकती है इसलिए मानव पूँजी के स्वामी को उसके उत्पादन के स्थान पर उपस्थित होना आवश्यक होता है। भौतिक पूँजी को उसके स्वामी से पृथक् किया जा सकता है, किन्तु मानव पूँजी का स्वामी से पृथक्करण सम्भव नहीं होता। दोनों प्रकार की पूँजियों में उनके स्थानों की गतिशीलता के आधार पर अन्तर होता है। प्रायः कुछ कृत्रिम अपवादों को छोड़ भौतिक पूँजी का विश्व भर में निर्बाध आवागमन चलता रहता है। किन्तु मानव पूँजी का प्रवाह इतना निर्बाध नहीं होता, इसके मार्ग में राष्ट्रीयता और संस्कृति की ऊँची बाधाएँ आ जाती हैं। अतः भौतिक पूँजी का निर्माण तो आयात के सहारे भी हो जाता है, किन्तु मानवीय पूँजी की रचना तो समाज तथा अर्थव्यवस्था की अन्तर्भूत विशेषताओं के अनुरूप सुविचारित नीति निर्धारण संबंधी निर्णयों तथा सरकार और व्यक्तिगत व्यय के आधार पर होती है। समय के साथ-साथ दोनों ही प्रकार की पूँजियों में मूल्य हृास होता है। किसी मशीन के निरन्तर प्रयोग से वह घिस जाती है और प्रौद्योगिकीय परिवर्तन उसे पुराना घोषित कर देते हैं। मानव पूँजी में आयु के अनुसार कुछ ‘”ह्रास’ आता है। किन्तु शिक्षण और स्वास्थ्य सेवाओं में निरन्तर निवेश से उस ‘”ह्रास’ का काफी सीमा तक निराकरण हो सकता है। यह निवेश मानव पूँजी को प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों का सामना करने योग्य भी बना देता है किन्तु भौतिक पूँजी में किसी भी प्रकार से प्रौद्योगिकीय परिवर्तन का सामना करने की क्षमता नहीं आ पाती। मानव पूँजी द्वारा सृजित हित लाभ के प्रवाह का स्वरूप भी भौतिक पूँजी से अलग होता है। मानव पूँजी से केवल उसका स्वामी ही नहीं वरन् सारा समाज लाभान्वित होता है। इसे एक बाह्य हित लाभ कहा जा सकता है। एक सुशिक्षित व्यक्ति लोकतांत्रिक प्रक्रिया में प्रभावपूर्ण भागीदारी के माध्यम से राष्ट्र की सामाजिक, आर्थिक प्रगति में योगदान करता है। एक स्वस्थ व्यक्ति अपने वैयक्तिक स्तर पर तथा आस-पास की सफाई आदि के माध्यम से रोगों का संक्रमण रोक उन्हें महामारियों का रूप धारण नहीं करने देता। मानवीय पूँजी से व्यक्तिगत के साथ-साथ सामाजिक हित लाभों का भी सृजन होता है। किन्तु भौतिक पूँजी तो प्रायः निजी लाभ को ही जन्म दे पाती है। पूँजीगत पदार्थों के लाभ उन्हीं को मिल पाते हैं जो उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की कीमत चुका सकें। परिच्छेद में दिए गए तथ्यों के आधार पर निम्न कथनों की सत्यता की जाँच कीजिए: 1- भौतिक पूँजी को किसी भी वस्तु की तरह बाजार में बेचा जा सकता है, जबकि मानव पूँजी को बेचा नहीं जा सकता, सिर्फ उसकी सेवाओं की बिक्री की जा सकती है। 2- भौतिक पूँजी को उसके स्वामी से पृथक किया जा सकता है, जबकि मानव पूँजी को उसके स्वामी से पृथक नहीं किया जा सकता। 3- भौतिक पूँजी की तरह ही मानव पूँजी से सिर्फ उसका स्वामी ही लाभान्वित होता है जिसने उसकी सेवा का क्रय किया है। 4- समय के साथ-साथ भौतिक पूँजी एवं मानव पूँजी दोनों में मूल्य ”ह्रास होता है। कूटों की सहायता से सही विकल्प का चयन कीजिए। A 1, 2 और 4 B 1, 2 और 3 C 1, 3 और 4 D 1, 2, 3 और 4
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निम्नलिखित परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए इन प्रश्नों के उत्तर केवल परिच्छेद पर ही आधारित होने चाहिएं। भौतिक पूँजी किसी भी अन्य वस्तु की भाँति दृश्य होती है। उसे किसी भी वस्तु की तरह बाजार में बेचा जा सकता है। मानव पूँजी अदृश्य होती है- यह धारक के शरीर और मस्तिष्क में रची-बसी होती है। बाजार में मानव पूँजी को बेचा नहीं जा सकता, केवल उसकी सेवाओं की बिक्री की जा सकती है इसलिए मानव पूँजी के स्वामी को उसके उत्पादन के स्थान पर उपस्थित होना आवश्यक होता है। भौतिक पूँजी को उसके स्वामी से पृथक् किया जा सकता है, किन्तु मानव पूँजी का स्वामी से पृथक्करण सम्भव नहीं होता। दोनों प्रकार की पूँजियों में उनके स्थानों की गतिशीलता के आधार पर अन्तर होता है। प्रायः कुछ कृत्रिम अपवादों को छोड़ भौतिक पूँजी का विश्व भर में निर्बाध आवागमन चलता रहता है। किन्तु मानव पूँजी का प्रवाह इतना निर्बाध नहीं होता, इसके मार्ग में राष्ट्रीयता और संस्कृति की ऊँची बाधाएँ आ जाती हैं। अतः भौतिक पूँजी का निर्माण तो आयात के सहारे भी हो जाता है, किन्तु मानवीय पूँजी की रचना तो समाज तथा अर्थव्यवस्था की अन्तर्भूत विशेषताओं के अनुरूप सुविचारित नीति निर्धारण संबंधी निर्णयों तथा सरकार और व्यक्तिगत व्यय के आधार पर होती है। समय के साथ-साथ दोनों ही प्रकार की पूँजियों में मूल्य हृास होता है। किसी मशीन के निरन्तर प्रयोग से वह घिस जाती है और प्रौद्योगिकीय परिवर्तन उसे पुराना घोषित कर देते हैं। मानव पूँजी में आयु के अनुसार कुछ ‘”ह्रास’ आता है। किन्तु शिक्षण और स्वास्थ्य सेवाओं में निरन्तर निवेश से उस ‘”ह्रास’ का काफी सीमा तक निराकरण हो सकता है। यह निवेश मानव पूँजी को प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों का सामना करने योग्य भी बना देता है किन्तु भौतिक पूँजी में किसी भी प्रकार से प्रौद्योगिकीय परिवर्तन का सामना करने की क्षमता नहीं आ पाती। मानव पूँजी द्वारा सृजित हित लाभ के प्रवाह का स्वरूप भी भौतिक पूँजी से अलग होता है। मानव पूँजी से केवल उसका स्वामी ही नहीं वरन् सारा समाज लाभान्वित होता है। इसे एक बाह्य हित लाभ कहा जा सकता है। एक सुशिक्षित व्यक्ति लोकतांत्रिक प्रक्रिया में प्रभावपूर्ण भागीदारी के माध्यम से राष्ट्र की सामाजिक, आर्थिक प्रगति में योगदान करता है। एक स्वस्थ व्यक्ति अपने वैयक्तिक स्तर पर तथा आस-पास की सफाई आदि के माध्यम से रोगों का संक्रमण रोक उन्हें महामारियों का रूप धारण नहीं करने देता। मानवीय पूँजी से व्यक्तिगत के साथ-साथ सामाजिक हित लाभों का भी सृजन होता है। किन्तु भौतिक पूँजी तो प्रायः निजी लाभ को ही जन्म दे पाती है। पूँजीगत पदार्थों के लाभ उन्हीं को मिल पाते हैं जो उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की कीमत चुका सकें। प्रस्तुत परिच्छेद का निम्नलिखित में से कौन सर्वाधिक उचित केन्द्रीय भाव है? A भौतिक पूँजी और मानव पूँजी की विशेषताएँ B भौतिक पूँजी एवं मानव पूँजी की सीमाएँ C भौतिक एवं मानव पूँजी से तात्पर्य D भौतिक एवं मानव पूँजी में अन्तर
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आप आयकर आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं। आपको अपने कुछ विश्वस्त विभागीय कर्मचारियों से पता चलता है कि आपके क्षेत्र की एक नामी-गिरामी फर्म द्वारा लगातार कई सालों से टैक्स की चोरी की जा रही है जबकि आपकी नजर में वह एक प्रतिष्ठित एवं बेदाग छवि वाली फर्म है। दूसरी ओर, जिस अधिकारी ने आपको उक्त खबर दी है, वह भी आपके अनुसार विश्वसनीय एवं ईमानदार है। ऐसे में आप क्या करेंगे? A सूचना प्राप्त करते हुए उक्त फर्म पर छापा मारने के लिए निकल पड़ेंगे। B अपने पूर्वाधिकारी से, जोकि उक्त क्षेत्र में लंबे समय तक कार्यरत रहा हो, इस बारे में सलाह-मशवरा करेंगे क्योंकि इससे आपको सही दिशा में कार्यवाही करने में सहायता मिलेगी। C उक्त फर्म को एक नोटिस भेजेंगे। D अपने विश्वसनीय अधिकारियों के साथ एक मीटिंग करके समस्त आवश्यक जानकारियों को इकट्ठा करेंगे और फिर कोई उपयुक्त निर्णय लेंगे।
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आप किसी क्षेत्र के पुलिस अधीक्षक हैं। आप एक अत्यावश्यक जाँच कार्य से जा रहे हैं। यात्र के दौरान, आपको एक इंसान गंभीर रूप से घायल मिलता है। आप क्या करेंगे? A उसे वहीं छोड़ देंगे और अपने काम से आगे निकल जाएँगे क्योंकि उस व्यक्ति की जान से ज्यादा जरूरी आपका काम है। B घायल व्यक्ति को तुरंत ले जाकर अस्पताल में भर्ती करेंगे। C एक कैब किराए पर लेकर घायल व्यक्ति को पहले अस्पताल भेजेंगे और फिर अपने काम पर निकलेंगे। D अपने किसी एक अधीनस्थ को उक्त व्यक्ति के उचित उपचार हेतु आवश्यक पैसे देकर उसके साथ अस्पताल भेजेंगे और फिर अपने काम पर जाएँगे।
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आपका एक कार्यालयी सहयोगी, जोकि आपके बगल वाली सीट पर बैठता है, वैसे तो अपने काम में काफी कुशल एवं दक्ष है और समय पर उन्हें पूरा भी करता है, किन्तु समस्या यह है कि वह अपना काम पूरा कर लेने के बाद पूरे दिन बैठकर इधर-उधर की बातें अथवा ऑफिस के अन्य कर्मचारियों की शिकायतें किया करता है। इससे आपको परेशानी होती है और आप अक्सर अपने काम में छोटी-मोटी चूक कर देते हैं। आप इस स्थिति से निपटने के लिए क्या करेंगे? A अपने बॉस से तुरंत इस बात की शिकायत करेंगे और अपने बगल से उसकी सीट को शिफ्रट करवाने के लिए निवेदन करेंगे। B रोजाना सुबह एक घंटे प्राणायाम करना शुरू कर देंगे ताकि अपने काम में अधिक मन लगा सकें। C यह सोचकर बॉस से शिकायत नहीं करेंगे कि गॉसिप करने के बावजूद वह सहयोगी अपना काम समय पर पूरा करता है, इसलिए बॉस उसे कुछ नहीं कहेगा। D बॉस से शिकायत करने के बजाए अपने स्तर से उक्त सहयोगी को समझाने का प्रयास करेंगे।
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आपने अपनी कॉलोनी के एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से वहाँ की टूटी-फूटी सड़कों की मरम्मत के लिए राज्य सिविल कार्य विभाग से अनुरोध किया है। पिछले कई वर्षों से इनकी मरम्मत का काम नहीं किया गया है जबकि ठेकेदार का कहना है कि लगभग हर साल मरम्मत की जाती है। आपने इस बारे में अधिक जानने के लिए जब कार्यपालक अभियन्ता से मिलने का प्रयास किया, तो वह किसी भी तरह से आपको टालना चाह रहा है। दूसरी ओर, ठेकेदार आपको धमकी दे रहा है कि यदि आपने इस संबंध में कोई कार्यवाही की तो आपको इसके कठोर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। उसने आपसे कहा है कि यदि आप खामोश रहे तो वह आपके घर के आस-पास के इलाके की मरम्मत करवा देगा। ऐसे में आप क्या करेंगे? A धमकी की परवाह न करते हुए कार्यपालक अभियन्ता एवं ठेकेदार के विरूद्ध लिखित शिकायत दर्ज करेंगे। B चुप रहेंगे और यह सोचकर ठेकेदार के प्रस्ताव को मान लेंगे कि आपके घर के आस-पास की सड़क तो मरम्मत हो रही है न, बाकी से आपको क्या लेना-देना है। C आप पहले स्वरूप कॉलोनी के सभी लोगों को इकट्ठा करके उस ठेकेदार तथा कार्यपालक अभियन्ता के विरूद्ध एक संयुक्त ज्ञापन दायर करेंगे। D अपना घर एक बेहतर एवं व्यवस्थित इलाके में शिफ्रट करने की कोशिश करेंगे जहाँ अधिक उत्तरदायी एवं बेहतर नागरिक एजेन्सी की सुविधाएँ उपलब्ध हों।
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आप किसी क्षेत्र के प्रभारी प्रशासनिक अधिकारी हैं। आपको सूचना मिलती है कि नेशनल हाइवे पर एलपीजी सिलेण्डरों से भरा एक ट्रक पलट गया है। घटनास्थल के निकट ही एक छोटा-सा कस्बा है जिसकी आबादी लगभग4000 है। सूचना देने वाला व्यक्ति उक्त घटना का प्रत्यक्षदर्शी है जोकि ट्रक में सवार था। आप क्या करेंगे? A निकटवर्ती पुलिस स्टेशन को सूचित करेंगे ताकि पुलिस वाले घटनास्थल पर पहुँचकर स्थिति की जाँच करे। B किसी भी तरह की आपातकालीन स्थिति से बचने के लिए अग्निशमन की गाड़ियों को बुलवाएँगे। C तुरंत दल-बल के साथ घटनास्थल पर पहुँचेंगे। D उस व्यक्ति की बात पर विश्वास न करते हुए अपने कुछ अधीनस्थ अधिकारियों को घटना की वास्तविकता की जाँच करने के लिए भेजेंगे।
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। एक महत्त्वपूर्ण अधिकारिक बैठक में उपस्थित न होने के कारण आपसे इसका स्पष्टीकरण माँगा गया है। आपके आसन्न अधिकारी ने आपको इस बैठक की जानकारी नहीं दी थी, परंतु अब वह आप पर यह दबाव डाल रहा है कि आप इसका दोष उस पर नहीं डालें। ऐसे में आप क्या करेंगे? A तथ्य की व्याख्या करते हुए अपना लिखित उत्तर भेजेंगे। B अपने सर्वोच्च अधिकारी को स्थिति से अवगत करवाने के लिए उससे भेंट का समय लेंगे। C स्थिति को सम्भालने के लिए अपना दोष स्वीकार कर लेंगे। D बैठक के समन्वयक पर इसका दायित्व डाल देंगे कि उसने आपको बैठक की जानकारी नहीं दी।
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। एक नागरिक के रूप में आपको एक सरकारी विभाग से कुछ काम है। सम्बद्ध अधिकारी बार-बार आपको बुलाता है और प्रत्यक्षतः बिना कुछ कहे रिश्वत देने का इशारा करता है। आप अपना कार्य शीघ्र करवाना चाहते हैं। आप क्या करेंगे? A रिश्वत दे देंगे। B ऐसा व्यवहार करेंगे मानो आप उसके इशारे नहीं समझ रहे हैं और अपने आवेदन पर डटे रहेंगे। C रिश्वत के इशारों के संबंध में मौखिक शिकायत के साथ उच्चतर अधिकारी के पास सहायता के लिए जाएँगे। D एक औपचारिक लिखित शिकायत दर्ज करेंगे।
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। मान लीजिए, आप किसी कम्पनी की भर्ती शाखा के प्रबंध हैं और आप अपनी कंपनी के मार्केटिंग विभाग के रिक्त पदों हेतु साक्षात्कार ले रहे हैं। एक प्रत्याशी मुकुल, जोकि बेहद मेहनती एवं उक्त पद हेतु सभी अपेक्षित योग्यताओं को रखता है, आपके समक्ष उपस्थित हुआ है किन्तु उसकी एक प्रमुख समस्या यह है कि हिन्दी भाषी माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर पाने के कारण वह धाराप्रवाह रूप से अंग्रेजी नहीं बोल पाता है जबकि मार्केटिंग के जॉब हेतु यह एक अनिवार्य योग्यता है। ऐसे में निम्नलिखित विकल्पों में से आप किस विकल्प का चयन करेंगे? A किसी भी कीमत पर मुकुल का चयन कर लेंगे। B मुकुल का चयन उत्पादन एवं वित्त विभाग हेतु कर लेंगे_ क्योंकि मार्केटिंग जॉब हेतु बेहतर संचार कौशल की आवश्यकता होती है। C आप उसका चयन नहीं करेंगे क्योंकि वह कंपनी हेतु एक बोझ बन सकता है। D आप मुकुल का चयन उस कार्य के लिए कर लेंगे जिसमें वह दक्ष है तथा उसे अपेक्षित पद हेतु आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करेंगे।