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GS-II

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Practice Test-4

Question
40 out of 80
 

It is not luck but labour that makes a man. Luck, says an American writer, is ever waiting for something to turn up; labour with keen eyes and strong will always turns up something. Luck lies in bed and wishes the postman would bring him news of a legacy; labour turns out at six and with busy pen and ringing hammer lays the foundation of competence. Luck whines, labour watches. Luck relies on chance, labour on character. Luck slips downwords to self- indulgence; labour strides upwards and aspires to independece. The conviction, therefore, is extending that diligence is the mother of good luck. In other words, that a man's success in life will be proportionate to his efforts, to his industry, to his attention to small 
things.


Which one of the statement is true about the passage?



A Luck is necessary for success.

B Success depends only on hard luck.

C Expectation of good luck always meets with dis-appointment.

D Success is exactly proportionate to hard work.

Ans. D

Practice Test-4 Flashcard List

80 flashcards
1)
निम्नलिखित लेखांश को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। ऐसा लगा था कि कांग्रेस के कई उदीयमान सितारों ने इस आंदोलन और अन्ना हजारे के बारे में जो सुभाषित कहे थे उनके मद्देनजर प्रधानमंत्री सार्वजनिक जीवन के स्तर पर भी कुछ टिप्पणी करेंगे और अपनी पार्टी की असभ्यता के लिए अफसोस प्रकट करेंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी कहना उन्होंने जरूरी नहीं समझा लेकिन वे देर तक भ्रष्टाचार के बारे में अर्थहीन बातें और दावे करते रहे। उन्होंने यह भी कहा कि अनशन आदि का रास्ता ठीक नहीं हैं। संसद को ही कानून बनाने का अधिकार है और उसे वह काम करने दिया जाना चाहिए। लालकिले से प्रधानमंत्री तो उतर चले, लेकिन उनकी बातें वहीं टंगी रही। बातें ऐसी जिनका जवाब मिलना ही चाहिए। आखिर कब तक हमारे देश में लोग नहीं कुर्सियां बोलती रहेंगी? कपिल सिब्बल कहते हैं कि अन्ना तो इस बात के भूखे हैं कि उन पर टीवी के कैमरे लगे रहें, अंबिका सोनी कहती हैं कि उनके पत्र की भाषा गांधीवादी नहीं है, गुलाम नबी आजाद कहते हैं कि अन्ना हजारे हैं कौन-न किसी ने उनको चुना है और न वे संसद के प्रति जवाबदेह हैं। चिदंबरम फरमाते हैं कि दुनिया में कहीं भी किसी भी प्रदर्शन के लिए आपको प्रतिबंध तो स्वीकार करने ही पड़ते हैं। मनमोहन सिंह अन्ना हजारे को जवाब देते हैं कि आपको जो भी बात करनी हो दिल्ली पुलिस से करिए। इससे नीचे के स्तर की बातें करने वाले बहादुरों पर कोई टिप्पणी न की जाए तो भी प्रधानमंत्री से पूछा ही जाना चाहिए कि क्या यह देश किसी पुलिसिया राज में तब्दील कर दिया गया है, जहाँ नागरिकों को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन की बात पुलिस से करनी पड़े? अगर पुलिस ही अधिकारों का हनन कर रही हो तो नागरिक कहाँ जाएँ? प्रधानमंत्री को हम अब तक देश से जोड़ कर देखते थे, उन्होंने ऐसा रूख अपनाया मानो वे किसी थाने के प्रभारी भर हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि संसद को ही कानून बनाने का अधिकार है। ठीक है, तो उससे उसका यह अधिकार छीन कौन रहा है? शिकायत तो यह है कि यह सरकार संसद को कानून बनाने का मौका ही नहीं देना चाहती थी और जब जनलोकपाल का जवाब असह्य हो गया तब उसने चालाकी से एक ऐसा मसविदा संसद के सामने पेश कर दिया जिसका न सिर है, न पैर! जब सिर और पैर नहीं है तो दांत होने का सवाल ही कहँा है? अन्ना हजारे यही तो कह रहे हैं कि संसद के सामने आप सही विधेयक रखें और इसकी हिम्मत न हो रही हो तो दोनों विधेयकों का मसविदा विचार के लिए रखें और फिर फैसला हो कि किस आधार पर संसद कानून बनाए। अगर प्रधानमंत्री को अपनी संसद की परिपक्वता पर इतना भरोसा है तो उन्हें इसमें हिचक क्यों होनी चाहिए? संसद की काबलियत और उसके अधिकार पर प्रश्नचिन्ह तो सरकार ही लगा रही है। ‘उदीयमान’ शब्द का अर्थ क्या होगा? A उभरते हुए B उद्दीपन C उदारवादी D उपरोक्त में से कोई नहीं
2)
निम्नलिखित लेखांश को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। ऐसा लगा था कि कांग्रेस के कई उदीयमान सितारों ने इस आंदोलन और अन्ना हजारे के बारे में जो सुभाषित कहे थे उनके मद्देनजर प्रधानमंत्री सार्वजनिक जीवन के स्तर पर भी कुछ टिप्पणी करेंगे और अपनी पार्टी की असभ्यता के लिए अफसोस प्रकट करेंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी कहना उन्होंने जरूरी नहीं समझा लेकिन वे देर तक भ्रष्टाचार के बारे में अर्थहीन बातें और दावे करते रहे। उन्होंने यह भी कहा कि अनशन आदि का रास्ता ठीक नहीं हैं। संसद को ही कानून बनाने का अधिकार है और उसे वह काम करने दिया जाना चाहिए। लालकिले से प्रधानमंत्री तो उतर चले, लेकिन उनकी बातें वहीं टंगी रही। बातें ऐसी जिनका जवाब मिलना ही चाहिए। आखिर कब तक हमारे देश में लोग नहीं कुर्सियां बोलती रहेंगी? कपिल सिब्बल कहते हैं कि अन्ना तो इस बात के भूखे हैं कि उन पर टीवी के कैमरे लगे रहें, अंबिका सोनी कहती हैं कि उनके पत्र की भाषा गांधीवादी नहीं है, गुलाम नबी आजाद कहते हैं कि अन्ना हजारे हैं कौन-न किसी ने उनको चुना है और न वे संसद के प्रति जवाबदेह हैं। चिदंबरम फरमाते हैं कि दुनिया में कहीं भी किसी भी प्रदर्शन के लिए आपको प्रतिबंध तो स्वीकार करने ही पड़ते हैं। मनमोहन सिंह अन्ना हजारे को जवाब देते हैं कि आपको जो भी बात करनी हो दिल्ली पुलिस से करिए। इससे नीचे के स्तर की बातें करने वाले बहादुरों पर कोई टिप्पणी न की जाए तो भी प्रधानमंत्री से पूछा ही जाना चाहिए कि क्या यह देश किसी पुलिसिया राज में तब्दील कर दिया गया है, जहाँ नागरिकों को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन की बात पुलिस से करनी पड़े? अगर पुलिस ही अधिकारों का हनन कर रही हो तो नागरिक कहाँ जाएँ? प्रधानमंत्री को हम अब तक देश से जोड़ कर देखते थे, उन्होंने ऐसा रूख अपनाया मानो वे किसी थाने के प्रभारी भर हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि संसद को ही कानून बनाने का अधिकार है। ठीक है, तो उससे उसका यह अधिकार छीन कौन रहा है? शिकायत तो यह है कि यह सरकार संसद को कानून बनाने का मौका ही नहीं देना चाहती थी और जब जनलोकपाल का जवाब असह्य हो गया तब उसने चालाकी से एक ऐसा मसविदा संसद के सामने पेश कर दिया जिसका न सिर है, न पैर! जब सिर और पैर नहीं है तो दांत होने का सवाल ही कहँा है? अन्ना हजारे यही तो कह रहे हैं कि संसद के सामने आप सही विधेयक रखें और इसकी हिम्मत न हो रही हो तो दोनों विधेयकों का मसविदा विचार के लिए रखें और फिर फैसला हो कि किस आधार पर संसद कानून बनाए। अगर प्रधानमंत्री को अपनी संसद की परिपक्वता पर इतना भरोसा है तो उन्हें इसमें हिचक क्यों होनी चाहिए? संसद की काबलियत और उसके अधिकार पर प्रश्नचिन्ह तो सरकार ही लगा रही है। परिच्छेद में कानून बनाने का अधिकार किसको दिया गया है? A प्रधानमंत्री को B सरकार व जनता दोनो को C जनता को D संसद को
3)
निम्नलिखित लेखांश को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। ऐसा लगा था कि कांग्रेस के कई उदीयमान सितारों ने इस आंदोलन और अन्ना हजारे के बारे में जो सुभाषित कहे थे उनके मद्देनजर प्रधानमंत्री सार्वजनिक जीवन के स्तर पर भी कुछ टिप्पणी करेंगे और अपनी पार्टी की असभ्यता के लिए अफसोस प्रकट करेंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी कहना उन्होंने जरूरी नहीं समझा लेकिन वे देर तक भ्रष्टाचार के बारे में अर्थहीन बातें और दावे करते रहे। उन्होंने यह भी कहा कि अनशन आदि का रास्ता ठीक नहीं हैं। संसद को ही कानून बनाने का अधिकार है और उसे वह काम करने दिया जाना चाहिए। लालकिले से प्रधानमंत्री तो उतर चले, लेकिन उनकी बातें वहीं टंगी रही। बातें ऐसी जिनका जवाब मिलना ही चाहिए। आखिर कब तक हमारे देश में लोग नहीं कुर्सियां बोलती रहेंगी? कपिल सिब्बल कहते हैं कि अन्ना तो इस बात के भूखे हैं कि उन पर टीवी के कैमरे लगे रहें, अंबिका सोनी कहती हैं कि उनके पत्र की भाषा गांधीवादी नहीं है, गुलाम नबी आजाद कहते हैं कि अन्ना हजारे हैं कौन-न किसी ने उनको चुना है और न वे संसद के प्रति जवाबदेह हैं। चिदंबरम फरमाते हैं कि दुनिया में कहीं भी किसी भी प्रदर्शन के लिए आपको प्रतिबंध तो स्वीकार करने ही पड़ते हैं। मनमोहन सिंह अन्ना हजारे को जवाब देते हैं कि आपको जो भी बात करनी हो दिल्ली पुलिस से करिए। इससे नीचे के स्तर की बातें करने वाले बहादुरों पर कोई टिप्पणी न की जाए तो भी प्रधानमंत्री से पूछा ही जाना चाहिए कि क्या यह देश किसी पुलिसिया राज में तब्दील कर दिया गया है, जहाँ नागरिकों को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन की बात पुलिस से करनी पड़े? अगर पुलिस ही अधिकारों का हनन कर रही हो तो नागरिक कहाँ जाएँ? प्रधानमंत्री को हम अब तक देश से जोड़ कर देखते थे, उन्होंने ऐसा रूख अपनाया मानो वे किसी थाने के प्रभारी भर हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि संसद को ही कानून बनाने का अधिकार है। ठीक है, तो उससे उसका यह अधिकार छीन कौन रहा है? शिकायत तो यह है कि यह सरकार संसद को कानून बनाने का मौका ही नहीं देना चाहती थी और जब जनलोकपाल का जवाब असह्य हो गया तब उसने चालाकी से एक ऐसा मसविदा संसद के सामने पेश कर दिया जिसका न सिर है, न पैर! जब सिर और पैर नहीं है तो दांत होने का सवाल ही कहँा है? अन्ना हजारे यही तो कह रहे हैं कि संसद के सामने आप सही विधेयक रखें और इसकी हिम्मत न हो रही हो तो दोनों विधेयकों का मसविदा विचार के लिए रखें और फिर फैसला हो कि किस आधार पर संसद कानून बनाए। अगर प्रधानमंत्री को अपनी संसद की परिपक्वता पर इतना भरोसा है तो उन्हें इसमें हिचक क्यों होनी चाहिए? संसद की काबलियत और उसके अधिकार पर प्रश्नचिन्ह तो सरकार ही लगा रही है। लेखक ऐसा क्यों कहता है कि लोग नहीं कुर्सी बोलती है? A कुर्सी ने बोलना शुरू कर दिया B लोगों ने बोलना बंद कर दिया C लोकतांत्रिक प्रणाली में जबाव देही खत्म हो रही है D उपर्युक्त में से कोई भी नहीं
4)
निम्नलिखित लेखांश को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। ऐसा लगा था कि कांग्रेस के कई उदीयमान सितारों ने इस आंदोलन और अन्ना हजारे के बारे में जो सुभाषित कहे थे उनके मद्देनजर प्रधानमंत्री सार्वजनिक जीवन के स्तर पर भी कुछ टिप्पणी करेंगे और अपनी पार्टी की असभ्यता के लिए अफसोस प्रकट करेंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी कहना उन्होंने जरूरी नहीं समझा लेकिन वे देर तक भ्रष्टाचार के बारे में अर्थहीन बातें और दावे करते रहे। उन्होंने यह भी कहा कि अनशन आदि का रास्ता ठीक नहीं हैं। संसद को ही कानून बनाने का अधिकार है और उसे वह काम करने दिया जाना चाहिए। लालकिले से प्रधानमंत्री तो उतर चले, लेकिन उनकी बातें वहीं टंगी रही। बातें ऐसी जिनका जवाब मिलना ही चाहिए। आखिर कब तक हमारे देश में लोग नहीं कुर्सियां बोलती रहेंगी? कपिल सिब्बल कहते हैं कि अन्ना तो इस बात के भूखे हैं कि उन पर टीवी के कैमरे लगे रहें, अंबिका सोनी कहती हैं कि उनके पत्र की भाषा गांधीवादी नहीं है, गुलाम नबी आजाद कहते हैं कि अन्ना हजारे हैं कौन-न किसी ने उनको चुना है और न वे संसद के प्रति जवाबदेह हैं। चिदंबरम फरमाते हैं कि दुनिया में कहीं भी किसी भी प्रदर्शन के लिए आपको प्रतिबंध तो स्वीकार करने ही पड़ते हैं। मनमोहन सिंह अन्ना हजारे को जवाब देते हैं कि आपको जो भी बात करनी हो दिल्ली पुलिस से करिए। इससे नीचे के स्तर की बातें करने वाले बहादुरों पर कोई टिप्पणी न की जाए तो भी प्रधानमंत्री से पूछा ही जाना चाहिए कि क्या यह देश किसी पुलिसिया राज में तब्दील कर दिया गया है, जहाँ नागरिकों को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन की बात पुलिस से करनी पड़े? अगर पुलिस ही अधिकारों का हनन कर रही हो तो नागरिक कहाँ जाएँ? प्रधानमंत्री को हम अब तक देश से जोड़ कर देखते थे, उन्होंने ऐसा रूख अपनाया मानो वे किसी थाने के प्रभारी भर हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि संसद को ही कानून बनाने का अधिकार है। ठीक है, तो उससे उसका यह अधिकार छीन कौन रहा है? शिकायत तो यह है कि यह सरकार संसद को कानून बनाने का मौका ही नहीं देना चाहती थी और जब जनलोकपाल का जवाब असह्य हो गया तब उसने चालाकी से एक ऐसा मसविदा संसद के सामने पेश कर दिया जिसका न सिर है, न पैर! जब सिर और पैर नहीं है तो दांत होने का सवाल ही कहँा है? अन्ना हजारे यही तो कह रहे हैं कि संसद के सामने आप सही विधेयक रखें और इसकी हिम्मत न हो रही हो तो दोनों विधेयकों का मसविदा विचार के लिए रखें और फिर फैसला हो कि किस आधार पर संसद कानून बनाए। अगर प्रधानमंत्री को अपनी संसद की परिपक्वता पर इतना भरोसा है तो उन्हें इसमें हिचक क्यों होनी चाहिए? संसद की काबलियत और उसके अधिकार पर प्रश्नचिन्ह तो सरकार ही लगा रही है। लेखांश में विषय-वस्तु क्या है? A प्रधानमंत्री व सरकार B सरकार की दिशाहीनता C भ्रष्टाचार व सरकार D संसद और जनांदोलन
5)
निम्नलिखित लेखांश को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। ऐसा लगा था कि कांग्रेस के कई उदीयमान सितारों ने इस आंदोलन और अन्ना हजारे के बारे में जो सुभाषित कहे थे उनके मद्देनजर प्रधानमंत्री सार्वजनिक जीवन के स्तर पर भी कुछ टिप्पणी करेंगे और अपनी पार्टी की असभ्यता के लिए अफसोस प्रकट करेंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी कहना उन्होंने जरूरी नहीं समझा लेकिन वे देर तक भ्रष्टाचार के बारे में अर्थहीन बातें और दावे करते रहे। उन्होंने यह भी कहा कि अनशन आदि का रास्ता ठीक नहीं हैं। संसद को ही कानून बनाने का अधिकार है और उसे वह काम करने दिया जाना चाहिए। लालकिले से प्रधानमंत्री तो उतर चले, लेकिन उनकी बातें वहीं टंगी रही। बातें ऐसी जिनका जवाब मिलना ही चाहिए। आखिर कब तक हमारे देश में लोग नहीं कुर्सियां बोलती रहेंगी? कपिल सिब्बल कहते हैं कि अन्ना तो इस बात के भूखे हैं कि उन पर टीवी के कैमरे लगे रहें, अंबिका सोनी कहती हैं कि उनके पत्र की भाषा गांधीवादी नहीं है, गुलाम नबी आजाद कहते हैं कि अन्ना हजारे हैं कौन-न किसी ने उनको चुना है और न वे संसद के प्रति जवाबदेह हैं। चिदंबरम फरमाते हैं कि दुनिया में कहीं भी किसी भी प्रदर्शन के लिए आपको प्रतिबंध तो स्वीकार करने ही पड़ते हैं। मनमोहन सिंह अन्ना हजारे को जवाब देते हैं कि आपको जो भी बात करनी हो दिल्ली पुलिस से करिए। इससे नीचे के स्तर की बातें करने वाले बहादुरों पर कोई टिप्पणी न की जाए तो भी प्रधानमंत्री से पूछा ही जाना चाहिए कि क्या यह देश किसी पुलिसिया राज में तब्दील कर दिया गया है, जहाँ नागरिकों को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन की बात पुलिस से करनी पड़े? अगर पुलिस ही अधिकारों का हनन कर रही हो तो नागरिक कहाँ जाएँ? प्रधानमंत्री को हम अब तक देश से जोड़ कर देखते थे, उन्होंने ऐसा रूख अपनाया मानो वे किसी थाने के प्रभारी भर हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि संसद को ही कानून बनाने का अधिकार है। ठीक है, तो उससे उसका यह अधिकार छीन कौन रहा है? शिकायत तो यह है कि यह सरकार संसद को कानून बनाने का मौका ही नहीं देना चाहती थी और जब जनलोकपाल का जवाब असह्य हो गया तब उसने चालाकी से एक ऐसा मसविदा संसद के सामने पेश कर दिया जिसका न सिर है, न पैर! जब सिर और पैर नहीं है तो दांत होने का सवाल ही कहँा है? अन्ना हजारे यही तो कह रहे हैं कि संसद के सामने आप सही विधेयक रखें और इसकी हिम्मत न हो रही हो तो दोनों विधेयकों का मसविदा विचार के लिए रखें और फिर फैसला हो कि किस आधार पर संसद कानून बनाए। अगर प्रधानमंत्री को अपनी संसद की परिपक्वता पर इतना भरोसा है तो उन्हें इसमें हिचक क्यों होनी चाहिए? संसद की काबलियत और उसके अधिकार पर प्रश्नचिन्ह तो सरकार ही लगा रही है। कथन (A) : संसद को कानून बनाने का अधिकार है। कारण (R): सरकार संसद को कानून बनाने का मौका देना नहीं चाहती है। निम्नांकित कूटों की सहायता से सही उत्तर का चयन कीजिएः A (A) और (R) दोनों सही है और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है। B (A)और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है। C (R) सही है परंतु (A) गलत है। D (A) सही है परंतु (R) गलत है।
6)
निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।   अदालत की भाषा के मामले में यह संवैधानिक प्रावधान किया गया कि जब तक वहाँ हिंदी के प्रयोग की व्यवस्था नहीं होती तभी तक अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाए। मगर आजादी के इतने सालों बाद भी ऊपरी अदालतें िहंदी को सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पाई हैं तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। न्यायपालिका में कामकाज का संबंध केवल वकीलों के बीच होने वाली बहस और न्यायाधीश के फैसले तक सीमित नहीं होता। फरियादी और आरोपी भी न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े होते हैं बल्कि उनके अपने-अपने पक्ष ही मुकदमे का आधार बनते हैं। इसलिए कागजात, बहस और फैसले की भाषा ऐसी हो जिसे वादी-प्रतिवादी समझ पाएँ। यह नहीं माना जा सकता कि सभी फरियादी और आरोपी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखते होंगे। इसलिए उचित ही बसपा के एक सांसद ने लोकसभा में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हिंदी को कामकाज की भाषा बनाने की मांग उठाई। हिंदी भाषी प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में बहस और कामकाज कुछ हद तक जरूर हिंदी में होते हैं, बाकी प्रदेशों में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै ख्ांडपीठ के वकीलों ने तमिल में बहस की इजाजत देने की मांग को लेकर आंदोलन चलाया था। कई दिन के धरने के बाद खंडपीठ के जजों ने इसकी अनौपचारिक मंजूरी दे दी, पर यह भी कहा कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बगैर इसका वैधानिक प्रावधान संभव नहीं है। अदालतों में अंग्रेजी का वर्चस्व भी एक बड़ा कारण है कि हमारे यहाँ मामूली कानूनी मसलों में भी लोग वकीलों पर निर्भर होते गए हैं। अदालतों मेंं अंग्रेजी के दबदबे से केवल वादी-प्रतिवादी को परेशानी नहीं उठानी पड़ती। जिन वकीलों ने हिंदी या दूसरी भारतीय भाषा के माध्यम से कानून की पढ़ाई की है, वे कठिनाई महसूस करते हैं। तमाम वाजिब दलीलों के बावजूद कई बार अंग्रेजी न बोल पाने के कारण उनका पक्ष कमजोर रह जाता है। इस स्थिति को न्यायपूर्ण मानने में किसी को भी संकोच नहीं होगा। दरअसल, ऊपरी अदालतों में कामकाज की भाषा केवल कुछ न्यायाधीशों और वकीलों के बनाए माहौल का नतीजा नहीं है। संसद खुद कानून अंग्रेजी में तैयार करती है। कानून में आज भी ब्रिटिश जमाने और उससे भी पहले की तकनीकी शब्दावली इस्तेमाल की जाती है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दे दिया गया, मगर इसे शासन और कानून की भाषा बनाने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए। यों तकनीकी शब्दावली आयोग ने कानून में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का हिंदी कोष तैयार किया, मगर वे शब्द इस कदर दुरूह हैं कि आज लोगों के लिए उनका अर्थ समझना मुश्किल है। यही वजह है कि जहँा अदालती कामकाज में हिन्दी का इस्तेमाल होता है, वहां भी दलीलों और फैसलों को सहज रूप से समझ पाना संभव नहीं होता। अदालतों में हिंदी के इस्तेमाल का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उसे महज अनुवाद की भाषा बना दिया जाए। आखिर न्याय की भाषा ऐसी क्यों हो कि उसे सामान्य लोग आसानी से समझ न पाएँ। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सर्वोच्च न्यायालय में अनेक न्यायाधीशों को हिंदी समझने में दिक्कत पेश आ सकती है, क्योंकि जरूरी नहीं कि वे हिंदी भाषी हों, उनकी पढ़ाई-लिखाई हिंदी में हुई हो या हिंदी की तकनीकी शब्दावली से परिचित हों। लेकिन अगर कानून बनने की प्रक्रिया से ही इसका माहौल बने तो सकारात्मक नतीजे निकल सकते हैं। ­प्रस्तुत परिच्छेद का विषय है- A अदालती भाषा B न्याय की भाषा C अंग्रेजी का वर्चस्व D हिंदी भाषा
7)
निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।   अदालत की भाषा के मामले में यह संवैधानिक प्रावधान किया गया कि जब तक वहाँ हिंदी के प्रयोग की व्यवस्था नहीं होती तभी तक अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाए। मगर आजादी के इतने सालों बाद भी ऊपरी अदालतें िहंदी को सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पाई हैं तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। न्यायपालिका में कामकाज का संबंध केवल वकीलों के बीच होने वाली बहस और न्यायाधीश के फैसले तक सीमित नहीं होता। फरियादी और आरोपी भी न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े होते हैं बल्कि उनके अपने-अपने पक्ष ही मुकदमे का आधार बनते हैं। इसलिए कागजात, बहस और फैसले की भाषा ऐसी हो जिसे वादी-प्रतिवादी समझ पाएँ। यह नहीं माना जा सकता कि सभी फरियादी और आरोपी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखते होंगे। इसलिए उचित ही बसपा के एक सांसद ने लोकसभा में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हिंदी को कामकाज की भाषा बनाने की मांग उठाई। हिंदी भाषी प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में बहस और कामकाज कुछ हद तक जरूर हिंदी में होते हैं, बाकी प्रदेशों में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै ख्ांडपीठ के वकीलों ने तमिल में बहस की इजाजत देने की मांग को लेकर आंदोलन चलाया था। कई दिन के धरने के बाद खंडपीठ के जजों ने इसकी अनौपचारिक मंजूरी दे दी, पर यह भी कहा कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बगैर इसका वैधानिक प्रावधान संभव नहीं है। अदालतों में अंग्रेजी का वर्चस्व भी एक बड़ा कारण है कि हमारे यहाँ मामूली कानूनी मसलों में भी लोग वकीलों पर निर्भर होते गए हैं। अदालतों मेंं अंग्रेजी के दबदबे से केवल वादी-प्रतिवादी को परेशानी नहीं उठानी पड़ती। जिन वकीलों ने हिंदी या दूसरी भारतीय भाषा के माध्यम से कानून की पढ़ाई की है, वे कठिनाई महसूस करते हैं। तमाम वाजिब दलीलों के बावजूद कई बार अंग्रेजी न बोल पाने के कारण उनका पक्ष कमजोर रह जाता है। इस स्थिति को न्यायपूर्ण मानने में किसी को भी संकोच नहीं होगा। दरअसल, ऊपरी अदालतों में कामकाज की भाषा केवल कुछ न्यायाधीशों और वकीलों के बनाए माहौल का नतीजा नहीं है। संसद खुद कानून अंग्रेजी में तैयार करती है। कानून में आज भी ब्रिटिश जमाने और उससे भी पहले की तकनीकी शब्दावली इस्तेमाल की जाती है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दे दिया गया, मगर इसे शासन और कानून की भाषा बनाने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए। यों तकनीकी शब्दावली आयोग ने कानून में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का हिंदी कोष तैयार किया, मगर वे शब्द इस कदर दुरूह हैं कि आज लोगों के लिए उनका अर्थ समझना मुश्किल है। यही वजह है कि जहँा अदालती कामकाज में हिन्दी का इस्तेमाल होता है, वहां भी दलीलों और फैसलों को सहज रूप से समझ पाना संभव नहीं होता। अदालतों में हिंदी के इस्तेमाल का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उसे महज अनुवाद की भाषा बना दिया जाए। आखिर न्याय की भाषा ऐसी क्यों हो कि उसे सामान्य लोग आसानी से समझ न पाएँ। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सर्वोच्च न्यायालय में अनेक न्यायाधीशों को हिंदी समझने में दिक्कत पेश आ सकती है, क्योंकि जरूरी नहीं कि वे हिंदी भाषी हों, उनकी पढ़ाई-लिखाई हिंदी में हुई हो या हिंदी की तकनीकी शब्दावली से परिचित हों। लेकिन अगर कानून बनने की प्रक्रिया से ही इसका माहौल बने तो सकारात्मक नतीजे निकल सकते हैं। संसद का कानून किस भाषा में तैयार किया जाता है? A अंग्रेजी भाषा में B हिंदी भाषा में C दोनों भाषा में D दोनों में से किसी भाषा में नहीं
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।   अदालत की भाषा के मामले में यह संवैधानिक प्रावधान किया गया कि जब तक वहाँ हिंदी के प्रयोग की व्यवस्था नहीं होती तभी तक अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाए। मगर आजादी के इतने सालों बाद भी ऊपरी अदालतें िहंदी को सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पाई हैं तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। न्यायपालिका में कामकाज का संबंध केवल वकीलों के बीच होने वाली बहस और न्यायाधीश के फैसले तक सीमित नहीं होता। फरियादी और आरोपी भी न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े होते हैं बल्कि उनके अपने-अपने पक्ष ही मुकदमे का आधार बनते हैं। इसलिए कागजात, बहस और फैसले की भाषा ऐसी हो जिसे वादी-प्रतिवादी समझ पाएँ। यह नहीं माना जा सकता कि सभी फरियादी और आरोपी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखते होंगे। इसलिए उचित ही बसपा के एक सांसद ने लोकसभा में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हिंदी को कामकाज की भाषा बनाने की मांग उठाई। हिंदी भाषी प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में बहस और कामकाज कुछ हद तक जरूर हिंदी में होते हैं, बाकी प्रदेशों में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै ख्ांडपीठ के वकीलों ने तमिल में बहस की इजाजत देने की मांग को लेकर आंदोलन चलाया था। कई दिन के धरने के बाद खंडपीठ के जजों ने इसकी अनौपचारिक मंजूरी दे दी, पर यह भी कहा कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बगैर इसका वैधानिक प्रावधान संभव नहीं है। अदालतों में अंग्रेजी का वर्चस्व भी एक बड़ा कारण है कि हमारे यहाँ मामूली कानूनी मसलों में भी लोग वकीलों पर निर्भर होते गए हैं। अदालतों मेंं अंग्रेजी के दबदबे से केवल वादी-प्रतिवादी को परेशानी नहीं उठानी पड़ती। जिन वकीलों ने हिंदी या दूसरी भारतीय भाषा के माध्यम से कानून की पढ़ाई की है, वे कठिनाई महसूस करते हैं। तमाम वाजिब दलीलों के बावजूद कई बार अंग्रेजी न बोल पाने के कारण उनका पक्ष कमजोर रह जाता है। इस स्थिति को न्यायपूर्ण मानने में किसी को भी संकोच नहीं होगा। दरअसल, ऊपरी अदालतों में कामकाज की भाषा केवल कुछ न्यायाधीशों और वकीलों के बनाए माहौल का नतीजा नहीं है। संसद खुद कानून अंग्रेजी में तैयार करती है। कानून में आज भी ब्रिटिश जमाने और उससे भी पहले की तकनीकी शब्दावली इस्तेमाल की जाती है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दे दिया गया, मगर इसे शासन और कानून की भाषा बनाने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए। यों तकनीकी शब्दावली आयोग ने कानून में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का हिंदी कोष तैयार किया, मगर वे शब्द इस कदर दुरूह हैं कि आज लोगों के लिए उनका अर्थ समझना मुश्किल है। यही वजह है कि जहँा अदालती कामकाज में हिन्दी का इस्तेमाल होता है, वहां भी दलीलों और फैसलों को सहज रूप से समझ पाना संभव नहीं होता। अदालतों में हिंदी के इस्तेमाल का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उसे महज अनुवाद की भाषा बना दिया जाए। आखिर न्याय की भाषा ऐसी क्यों हो कि उसे सामान्य लोग आसानी से समझ न पाएँ। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सर्वोच्च न्यायालय में अनेक न्यायाधीशों को हिंदी समझने में दिक्कत पेश आ सकती है, क्योंकि जरूरी नहीं कि वे हिंदी भाषी हों, उनकी पढ़ाई-लिखाई हिंदी में हुई हो या हिंदी की तकनीकी शब्दावली से परिचित हों। लेकिन अगर कानून बनने की प्रक्रिया से ही इसका माहौल बने तो सकारात्मक नतीजे निकल सकते हैं। अदालतों में हिन्दी में कामकाज का अर्थ है- (1) दलीलों और फैसलों को सहज रूप में समझ पाना (2) अनुवाद की भाषा बनाना (3) हिंदी तकनीकी शब्दावली से परिचित होना ऊपर दिए गए तथ्यों में से सही कथन कौन-सा/से है? A केवल 1 B केवल 2 C उपरोक्त सभी D उपरोक्त में से कोई नहीं
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।   अदालत की भाषा के मामले में यह संवैधानिक प्रावधान किया गया कि जब तक वहाँ हिंदी के प्रयोग की व्यवस्था नहीं होती तभी तक अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाए। मगर आजादी के इतने सालों बाद भी ऊपरी अदालतें िहंदी को सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पाई हैं तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। न्यायपालिका में कामकाज का संबंध केवल वकीलों के बीच होने वाली बहस और न्यायाधीश के फैसले तक सीमित नहीं होता। फरियादी और आरोपी भी न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े होते हैं बल्कि उनके अपने-अपने पक्ष ही मुकदमे का आधार बनते हैं। इसलिए कागजात, बहस और फैसले की भाषा ऐसी हो जिसे वादी-प्रतिवादी समझ पाएँ। यह नहीं माना जा सकता कि सभी फरियादी और आरोपी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखते होंगे। इसलिए उचित ही बसपा के एक सांसद ने लोकसभा में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हिंदी को कामकाज की भाषा बनाने की मांग उठाई। हिंदी भाषी प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में बहस और कामकाज कुछ हद तक जरूर हिंदी में होते हैं, बाकी प्रदेशों में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै ख्ांडपीठ के वकीलों ने तमिल में बहस की इजाजत देने की मांग को लेकर आंदोलन चलाया था। कई दिन के धरने के बाद खंडपीठ के जजों ने इसकी अनौपचारिक मंजूरी दे दी, पर यह भी कहा कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बगैर इसका वैधानिक प्रावधान संभव नहीं है। अदालतों में अंग्रेजी का वर्चस्व भी एक बड़ा कारण है कि हमारे यहाँ मामूली कानूनी मसलों में भी लोग वकीलों पर निर्भर होते गए हैं। अदालतों मेंं अंग्रेजी के दबदबे से केवल वादी-प्रतिवादी को परेशानी नहीं उठानी पड़ती। जिन वकीलों ने हिंदी या दूसरी भारतीय भाषा के माध्यम से कानून की पढ़ाई की है, वे कठिनाई महसूस करते हैं। तमाम वाजिब दलीलों के बावजूद कई बार अंग्रेजी न बोल पाने के कारण उनका पक्ष कमजोर रह जाता है। इस स्थिति को न्यायपूर्ण मानने में किसी को भी संकोच नहीं होगा। दरअसल, ऊपरी अदालतों में कामकाज की भाषा केवल कुछ न्यायाधीशों और वकीलों के बनाए माहौल का नतीजा नहीं है। संसद खुद कानून अंग्रेजी में तैयार करती है। कानून में आज भी ब्रिटिश जमाने और उससे भी पहले की तकनीकी शब्दावली इस्तेमाल की जाती है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दे दिया गया, मगर इसे शासन और कानून की भाषा बनाने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए। यों तकनीकी शब्दावली आयोग ने कानून में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का हिंदी कोष तैयार किया, मगर वे शब्द इस कदर दुरूह हैं कि आज लोगों के लिए उनका अर्थ समझना मुश्किल है। यही वजह है कि जहँा अदालती कामकाज में हिन्दी का इस्तेमाल होता है, वहां भी दलीलों और फैसलों को सहज रूप से समझ पाना संभव नहीं होता। अदालतों में हिंदी के इस्तेमाल का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उसे महज अनुवाद की भाषा बना दिया जाए। आखिर न्याय की भाषा ऐसी क्यों हो कि उसे सामान्य लोग आसानी से समझ न पाएँ। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सर्वोच्च न्यायालय में अनेक न्यायाधीशों को हिंदी समझने में दिक्कत पेश आ सकती है, क्योंकि जरूरी नहीं कि वे हिंदी भाषी हों, उनकी पढ़ाई-लिखाई हिंदी में हुई हो या हिंदी की तकनीकी शब्दावली से परिचित हों। लेकिन अगर कानून बनने की प्रक्रिया से ही इसका माहौल बने तो सकारात्मक नतीजे निकल सकते हैं। प्रस्तुत लेखांश का सही शीर्षक क्या है? A हिंदी राजभाषा व अदालत B भाषा और अदालत C हिंदी शासन व कानून की भाषा D न्याय की भाषा व आम आदमी
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।   अदालत की भाषा के मामले में यह संवैधानिक प्रावधान किया गया कि जब तक वहाँ हिंदी के प्रयोग की व्यवस्था नहीं होती तभी तक अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाए। मगर आजादी के इतने सालों बाद भी ऊपरी अदालतें िहंदी को सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पाई हैं तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। न्यायपालिका में कामकाज का संबंध केवल वकीलों के बीच होने वाली बहस और न्यायाधीश के फैसले तक सीमित नहीं होता। फरियादी और आरोपी भी न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े होते हैं बल्कि उनके अपने-अपने पक्ष ही मुकदमे का आधार बनते हैं। इसलिए कागजात, बहस और फैसले की भाषा ऐसी हो जिसे वादी-प्रतिवादी समझ पाएँ। यह नहीं माना जा सकता कि सभी फरियादी और आरोपी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखते होंगे। इसलिए उचित ही बसपा के एक सांसद ने लोकसभा में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हिंदी को कामकाज की भाषा बनाने की मांग उठाई। हिंदी भाषी प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में बहस और कामकाज कुछ हद तक जरूर हिंदी में होते हैं, बाकी प्रदेशों में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै ख्ांडपीठ के वकीलों ने तमिल में बहस की इजाजत देने की मांग को लेकर आंदोलन चलाया था। कई दिन के धरने के बाद खंडपीठ के जजों ने इसकी अनौपचारिक मंजूरी दे दी, पर यह भी कहा कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बगैर इसका वैधानिक प्रावधान संभव नहीं है। अदालतों में अंग्रेजी का वर्चस्व भी एक बड़ा कारण है कि हमारे यहाँ मामूली कानूनी मसलों में भी लोग वकीलों पर निर्भर होते गए हैं। अदालतों मेंं अंग्रेजी के दबदबे से केवल वादी-प्रतिवादी को परेशानी नहीं उठानी पड़ती। जिन वकीलों ने हिंदी या दूसरी भारतीय भाषा के माध्यम से कानून की पढ़ाई की है, वे कठिनाई महसूस करते हैं। तमाम वाजिब दलीलों के बावजूद कई बार अंग्रेजी न बोल पाने के कारण उनका पक्ष कमजोर रह जाता है। इस स्थिति को न्यायपूर्ण मानने में किसी को भी संकोच नहीं होगा। दरअसल, ऊपरी अदालतों में कामकाज की भाषा केवल कुछ न्यायाधीशों और वकीलों के बनाए माहौल का नतीजा नहीं है। संसद खुद कानून अंग्रेजी में तैयार करती है। कानून में आज भी ब्रिटिश जमाने और उससे भी पहले की तकनीकी शब्दावली इस्तेमाल की जाती है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दे दिया गया, मगर इसे शासन और कानून की भाषा बनाने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए। यों तकनीकी शब्दावली आयोग ने कानून में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का हिंदी कोष तैयार किया, मगर वे शब्द इस कदर दुरूह हैं कि आज लोगों के लिए उनका अर्थ समझना मुश्किल है। यही वजह है कि जहँा अदालती कामकाज में हिन्दी का इस्तेमाल होता है, वहां भी दलीलों और फैसलों को सहज रूप से समझ पाना संभव नहीं होता। अदालतों में हिंदी के इस्तेमाल का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उसे महज अनुवाद की भाषा बना दिया जाए। आखिर न्याय की भाषा ऐसी क्यों हो कि उसे सामान्य लोग आसानी से समझ न पाएँ। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सर्वोच्च न्यायालय में अनेक न्यायाधीशों को हिंदी समझने में दिक्कत पेश आ सकती है, क्योंकि जरूरी नहीं कि वे हिंदी भाषी हों, उनकी पढ़ाई-लिखाई हिंदी में हुई हो या हिंदी की तकनीकी शब्दावली से परिचित हों। लेकिन अगर कानून बनने की प्रक्रिया से ही इसका माहौल बने तो सकारात्मक नतीजे निकल सकते हैं। कथन (A): अदालती कामकाज में हिंदी का इस्तेमाल होता है। कारण (R) : सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों को हिन्दी समझने में दिक्कत आती है। निम्नांकित कूटों की सहायता से सही उत्तर का चयन कीजिएः A (A)और (R) दोनों सही है और (R), (A)की सही व्याख्या नहीं करता है। B (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है। C (R) सही है परंतु (A) गलत है। D (A) सही है परंतु (R) गलत है।
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दिल्ली में अन्ना हजारे को अनशन पर बैठने की इजाजत न देना केन्द्र सरकार का एक निहायत अलोकतांत्रिक कदम है। लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव नहीं होता, बल्कि असहमति और विरोध जताने का अधिकार भी होता है। यह बेहद चिंता की बात है कि इस हक के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है। इस अधिकार को सत्ता में बैठे लोग अपनी सुविधा के हिसाब से परिभाषित कर रहे हैं। दिल्ली पुलिस का कहना है कि उन्होने सोलह अगस्त से अन्ना हजारे और उनके साथियों को अनशन-करने की अनुमति इसलिए नहीं दी, क्योंकि उसकी ओर से पेश शर्तनामे की सभी बातें नहीं मानी गई। पुलिस ने दो-चार नहीं, 22 शर्तें रखी थी। इनमें से सोलह शर्तें अन्ना समूह को मंजूर थीं। समूह को केवल उन बातों पर एतराज था जो नागरिक अधिकारों से मेल नहीं खातीं। दिल्ली पुलिस यह लिखित आश्वासन चाहती थी कि तीसरे दिन आबंटित जगह खाली कर दी जाएगी और वहँा इकट्ठा होने वालों की संख्या पांच हजार से अधिक नहीं होगी। मानो आंदोलन के लिए नहीं, किसी बारात के ठहरने के लिए जगह मांगी जा रही हो। जब जंतर-मंतर पर अन्ना का अनशन हुआ तो इस तरह की कोई शर्त नहीं थी। अनशन खत्म करने की घोषणा पुलिस के किसी शर्तनामे के मुताबिक इसलिए नहीं की गई क्योंकि केन्द्र सरकार लोकपाल विधेयक के मसविदे के लिए साझा समिति बनाने पर राजी हो गई थी। सरकार में बैठे लोग कह रहे हैं कि अनशन के लिए जगह न देने का फैसला केवल दिल्ली पुलिस का है, लेकिन यह बात शायद ही किसी के गले उतरे। सच तो यह है कि अन्ना को देश भर से जैसा भारी जन-समर्थन मिल रहा है उससे सरकार घबराई हुई है। इसीलिए किसी भी कीमत पर उन्हें अनशन पर न बैठने देने और अगर बैठ जाएँ तो जल्दी ही अनशन समाप्त करा देने की योजना बनाई गई। दिल्ली पुलिस ने पहले जंतर-मंतर से मना किया, इस दलील पर कि दूसरे संगठनों को भी इस जगह का इस्तेमाल करने का हक है, इसलिए यहँा अनिश्चिकालीन अनशन या धरने की इजाजत नहीं दी जा सकती। फिर अन्ना समूह ने पांच वैकल्पिक स्थान सुझाए मगर उन्हें अनुमति पाने के लिए एक विभाग से दूसरे विभाग दौड़ाया जाता रहा। आखिरकार जेपी पार्क की बात हुई। फिर घोर अलोकतांत्रिक और अव्यावहारिक शर्तें थोप दी गईं। यही नहीं, अन्ना हजारे के खिलाफ कांग्रेस और केन्द्र सरकार के कुछ मंत्रियों ने दुष्प्रचार की मुहिम छेड़ दी। पहले कहा जाता रहा कि अन्ना के आंदोलन के पीछे संघ परिवार का हाथ है। यह कथित सेलुलर कार्ड नहीं चला तो अब कांग्रेस ने सावंत आयोग का गड़ा मुर्दा उखाड़ कर खुद अन्ना के भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे होने का आरोप जड़ दिया। आयोग की रिपोर्ट2005 में ही आ गई थी। उसके बाद हुई जांच में तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें क्लीन चिट भी दे दी। सवाल उठता है कि अगर कांग्रेस और उसकी सरकार की निगाह में अन्ना पाक-साफ नहीं तो उनके साथ साझा समिति गठित कर लोकपाल कानून के मसविदे पर बातचीत का सिलसिला क्यों चलाया गया? कुछ मंत्री अन्ना के खिलाफ धमकी भरे अंदाज में बोले तो एक रोज बाद लाल किले से प्रधानमंत्री ने नसीहत दी कि अनशन और भूख हड़ताल का तरीका ठीक नहीं है। ममता बनर्जी ने सिंगूर के लिए पचीस दिन तक अनशन किया था। तब मनमोहन सिंह या कांग्रेस के किसी और नेता ने इस पर एतराज क्यों नहीं किया? आज अन्ना के खिलाफ कांग्रेस ऐसी भाषा बोल रही है जैसी कि वह एक समय जेपी के खिलाफ बोलती थी। लगता है कि उसने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया। लोकतंत्र का अर्थ है - A असहमति और विरोध जताने का अधिकार B चुनाव का अधिकार C लोकतंत्र व असहमति विरोध D लोकतंत्र व चुनाव
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दिल्ली में अन्ना हजारे को अनशन पर बैठने की इजाजत न देना केन्द्र सरकार का एक निहायत अलोकतांत्रिक कदम है। लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव नहीं होता, बल्कि असहमति और विरोध जताने का अधिकार भी होता है। यह बेहद चिंता की बात है कि इस हक के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है। इस अधिकार को सत्ता में बैठे लोग अपनी सुविधा के हिसाब से परिभाषित कर रहे हैं। दिल्ली पुलिस का कहना है कि उन्होने सोलह अगस्त से अन्ना हजारे और उनके साथियों को अनशन-करने की अनुमति इसलिए नहीं दी, क्योंकि उसकी ओर से पेश शर्तनामे की सभी बातें नहीं मानी गई। पुलिस ने दो-चार नहीं, 22 शर्तें रखी थी। इनमें से सोलह शर्तें अन्ना समूह को मंजूर थीं। समूह को केवल उन बातों पर एतराज था जो नागरिक अधिकारों से मेल नहीं खातीं। दिल्ली पुलिस यह लिखित आश्वासन चाहती थी कि तीसरे दिन आबंटित जगह खाली कर दी जाएगी और वहँा इकट्ठा होने वालों की संख्या पांच हजार से अधिक नहीं होगी। मानो आंदोलन के लिए नहीं, किसी बारात के ठहरने के लिए जगह मांगी जा रही हो। जब जंतर-मंतर पर अन्ना का अनशन हुआ तो इस तरह की कोई शर्त नहीं थी। अनशन खत्म करने की घोषणा पुलिस के किसी शर्तनामे के मुताबिक इसलिए नहीं की गई क्योंकि केन्द्र सरकार लोकपाल विधेयक के मसविदे के लिए साझा समिति बनाने पर राजी हो गई थी। सरकार में बैठे लोग कह रहे हैं कि अनशन के लिए जगह न देने का फैसला केवल दिल्ली पुलिस का है, लेकिन यह बात शायद ही किसी के गले उतरे। सच तो यह है कि अन्ना को देश भर से जैसा भारी जन-समर्थन मिल रहा है उससे सरकार घबराई हुई है। इसीलिए किसी भी कीमत पर उन्हें अनशन पर न बैठने देने और अगर बैठ जाएँ तो जल्दी ही अनशन समाप्त करा देने की योजना बनाई गई। दिल्ली पुलिस ने पहले जंतर-मंतर से मना किया, इस दलील पर कि दूसरे संगठनों को भी इस जगह का इस्तेमाल करने का हक है, इसलिए यहँा अनिश्चिकालीन अनशन या धरने की इजाजत नहीं दी जा सकती। फिर अन्ना समूह ने पांच वैकल्पिक स्थान सुझाए मगर उन्हें अनुमति पाने के लिए एक विभाग से दूसरे विभाग दौड़ाया जाता रहा। आखिरकार जेपी पार्क की बात हुई। फिर घोर अलोकतांत्रिक और अव्यावहारिक शर्तें थोप दी गईं। यही नहीं, अन्ना हजारे के खिलाफ कांग्रेस और केन्द्र सरकार के कुछ मंत्रियों ने दुष्प्रचार की मुहिम छेड़ दी। पहले कहा जाता रहा कि अन्ना के आंदोलन के पीछे संघ परिवार का हाथ है। यह कथित सेलुलर कार्ड नहीं चला तो अब कांग्रेस ने सावंत आयोग का गड़ा मुर्दा उखाड़ कर खुद अन्ना के भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे होने का आरोप जड़ दिया। आयोग की रिपोर्ट2005 में ही आ गई थी। उसके बाद हुई जांच में तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें क्लीन चिट भी दे दी। सवाल उठता है कि अगर कांग्रेस और उसकी सरकार की निगाह में अन्ना पाक-साफ नहीं तो उनके साथ साझा समिति गठित कर लोकपाल कानून के मसविदे पर बातचीत का सिलसिला क्यों चलाया गया? कुछ मंत्री अन्ना के खिलाफ धमकी भरे अंदाज में बोले तो एक रोज बाद लाल किले से प्रधानमंत्री ने नसीहत दी कि अनशन और भूख हड़ताल का तरीका ठीक नहीं है। ममता बनर्जी ने सिंगूर के लिए पचीस दिन तक अनशन किया था। तब मनमोहन सिंह या कांग्रेस के किसी और नेता ने इस पर एतराज क्यों नहीं किया? आज अन्ना के खिलाफ कांग्रेस ऐसी भाषा बोल रही है जैसी कि वह एक समय जेपी के खिलाफ बोलती थी। लगता है कि उसने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया। कथन (A): अनशन खत्म करने की घोषणा की गई थी कारण (R): केन्द्र सरकार लोकपाल विधेयक के मसविदे पर साझा समिति बनाने के लिए राजी हो गई थी। उपरोक्त को पढ़कर निम्न में से सही विकल्प को छँाटिएः A (A) और (R) दोनों सही है और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है। B (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है। C (R) सही है परंतु (A) गलत है। D (A) सही है परंतु (R) गलत है
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दिल्ली में अन्ना हजारे को अनशन पर बैठने की इजाजत न देना केन्द्र सरकार का एक निहायत अलोकतांत्रिक कदम है। लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव नहीं होता, बल्कि असहमति और विरोध जताने का अधिकार भी होता है। यह बेहद चिंता की बात है कि इस हक के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है। इस अधिकार को सत्ता में बैठे लोग अपनी सुविधा के हिसाब से परिभाषित कर रहे हैं। दिल्ली पुलिस का कहना है कि उन्होने सोलह अगस्त से अन्ना हजारे और उनके साथियों को अनशन-करने की अनुमति इसलिए नहीं दी, क्योंकि उसकी ओर से पेश शर्तनामे की सभी बातें नहीं मानी गई। पुलिस ने दो-चार नहीं, 22 शर्तें रखी थी। इनमें से सोलह शर्तें अन्ना समूह को मंजूर थीं। समूह को केवल उन बातों पर एतराज था जो नागरिक अधिकारों से मेल नहीं खातीं। दिल्ली पुलिस यह लिखित आश्वासन चाहती थी कि तीसरे दिन आबंटित जगह खाली कर दी जाएगी और वहँा इकट्ठा होने वालों की संख्या पांच हजार से अधिक नहीं होगी। मानो आंदोलन के लिए नहीं, किसी बारात के ठहरने के लिए जगह मांगी जा रही हो। जब जंतर-मंतर पर अन्ना का अनशन हुआ तो इस तरह की कोई शर्त नहीं थी। अनशन खत्म करने की घोषणा पुलिस के किसी शर्तनामे के मुताबिक इसलिए नहीं की गई क्योंकि केन्द्र सरकार लोकपाल विधेयक के मसविदे के लिए साझा समिति बनाने पर राजी हो गई थी। सरकार में बैठे लोग कह रहे हैं कि अनशन के लिए जगह न देने का फैसला केवल दिल्ली पुलिस का है, लेकिन यह बात शायद ही किसी के गले उतरे। सच तो यह है कि अन्ना को देश भर से जैसा भारी जन-समर्थन मिल रहा है उससे सरकार घबराई हुई है। इसीलिए किसी भी कीमत पर उन्हें अनशन पर न बैठने देने और अगर बैठ जाएँ तो जल्दी ही अनशन समाप्त करा देने की योजना बनाई गई। दिल्ली पुलिस ने पहले जंतर-मंतर से मना किया, इस दलील पर कि दूसरे संगठनों को भी इस जगह का इस्तेमाल करने का हक है, इसलिए यहँा अनिश्चिकालीन अनशन या धरने की इजाजत नहीं दी जा सकती। फिर अन्ना समूह ने पांच वैकल्पिक स्थान सुझाए मगर उन्हें अनुमति पाने के लिए एक विभाग से दूसरे विभाग दौड़ाया जाता रहा। आखिरकार जेपी पार्क की बात हुई। फिर घोर अलोकतांत्रिक और अव्यावहारिक शर्तें थोप दी गईं। यही नहीं, अन्ना हजारे के खिलाफ कांग्रेस और केन्द्र सरकार के कुछ मंत्रियों ने दुष्प्रचार की मुहिम छेड़ दी। पहले कहा जाता रहा कि अन्ना के आंदोलन के पीछे संघ परिवार का हाथ है। यह कथित सेलुलर कार्ड नहीं चला तो अब कांग्रेस ने सावंत आयोग का गड़ा मुर्दा उखाड़ कर खुद अन्ना के भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे होने का आरोप जड़ दिया। आयोग की रिपोर्ट2005 में ही आ गई थी। उसके बाद हुई जांच में तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें क्लीन चिट भी दे दी। सवाल उठता है कि अगर कांग्रेस और उसकी सरकार की निगाह में अन्ना पाक-साफ नहीं तो उनके साथ साझा समिति गठित कर लोकपाल कानून के मसविदे पर बातचीत का सिलसिला क्यों चलाया गया? कुछ मंत्री अन्ना के खिलाफ धमकी भरे अंदाज में बोले तो एक रोज बाद लाल किले से प्रधानमंत्री ने नसीहत दी कि अनशन और भूख हड़ताल का तरीका ठीक नहीं है। ममता बनर्जी ने सिंगूर के लिए पचीस दिन तक अनशन किया था। तब मनमोहन सिंह या कांग्रेस के किसी और नेता ने इस पर एतराज क्यों नहीं किया? आज अन्ना के खिलाफ कांग्रेस ऐसी भाषा बोल रही है जैसी कि वह एक समय जेपी के खिलाफ बोलती थी। लगता है कि उसने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया। अन्ना हजारे के आंदोलन का उद्देश्य - (1) लोकतंत्र में जागरूकता लाना (2) भ्रष्टाचार को दूर करना (3) जन आंदोलन करना (4) जन आक्रोश को उत्तेजित करना नीचे दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प चुनें: A 1 और 2 B उपरोक्त सभी C केवल 1 D 1, 2 और 3
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दिल्ली में अन्ना हजारे को अनशन पर बैठने की इजाजत न देना केन्द्र सरकार का एक निहायत अलोकतांत्रिक कदम है। लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव नहीं होता, बल्कि असहमति और विरोध जताने का अधिकार भी होता है। यह बेहद चिंता की बात है कि इस हक के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है। इस अधिकार को सत्ता में बैठे लोग अपनी सुविधा के हिसाब से परिभाषित कर रहे हैं। दिल्ली पुलिस का कहना है कि उन्होने सोलह अगस्त से अन्ना हजारे और उनके साथियों को अनशन-करने की अनुमति इसलिए नहीं दी, क्योंकि उसकी ओर से पेश शर्तनामे की सभी बातें नहीं मानी गई। पुलिस ने दो-चार नहीं, 22 शर्तें रखी थी। इनमें से सोलह शर्तें अन्ना समूह को मंजूर थीं। समूह को केवल उन बातों पर एतराज था जो नागरिक अधिकारों से मेल नहीं खातीं। दिल्ली पुलिस यह लिखित आश्वासन चाहती थी कि तीसरे दिन आबंटित जगह खाली कर दी जाएगी और वहँा इकट्ठा होने वालों की संख्या पांच हजार से अधिक नहीं होगी। मानो आंदोलन के लिए नहीं, किसी बारात के ठहरने के लिए जगह मांगी जा रही हो। जब जंतर-मंतर पर अन्ना का अनशन हुआ तो इस तरह की कोई शर्त नहीं थी। अनशन खत्म करने की घोषणा पुलिस के किसी शर्तनामे के मुताबिक इसलिए नहीं की गई क्योंकि केन्द्र सरकार लोकपाल विधेयक के मसविदे के लिए साझा समिति बनाने पर राजी हो गई थी। सरकार में बैठे लोग कह रहे हैं कि अनशन के लिए जगह न देने का फैसला केवल दिल्ली पुलिस का है, लेकिन यह बात शायद ही किसी के गले उतरे। सच तो यह है कि अन्ना को देश भर से जैसा भारी जन-समर्थन मिल रहा है उससे सरकार घबराई हुई है। इसीलिए किसी भी कीमत पर उन्हें अनशन पर न बैठने देने और अगर बैठ जाएँ तो जल्दी ही अनशन समाप्त करा देने की योजना बनाई गई। दिल्ली पुलिस ने पहले जंतर-मंतर से मना किया, इस दलील पर कि दूसरे संगठनों को भी इस जगह का इस्तेमाल करने का हक है, इसलिए यहँा अनिश्चिकालीन अनशन या धरने की इजाजत नहीं दी जा सकती। फिर अन्ना समूह ने पांच वैकल्पिक स्थान सुझाए मगर उन्हें अनुमति पाने के लिए एक विभाग से दूसरे विभाग दौड़ाया जाता रहा। आखिरकार जेपी पार्क की बात हुई। फिर घोर अलोकतांत्रिक और अव्यावहारिक शर्तें थोप दी गईं। यही नहीं, अन्ना हजारे के खिलाफ कांग्रेस और केन्द्र सरकार के कुछ मंत्रियों ने दुष्प्रचार की मुहिम छेड़ दी। पहले कहा जाता रहा कि अन्ना के आंदोलन के पीछे संघ परिवार का हाथ है। यह कथित सेलुलर कार्ड नहीं चला तो अब कांग्रेस ने सावंत आयोग का गड़ा मुर्दा उखाड़ कर खुद अन्ना के भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे होने का आरोप जड़ दिया। आयोग की रिपोर्ट2005 में ही आ गई थी। उसके बाद हुई जांच में तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें क्लीन चिट भी दे दी। सवाल उठता है कि अगर कांग्रेस और उसकी सरकार की निगाह में अन्ना पाक-साफ नहीं तो उनके साथ साझा समिति गठित कर लोकपाल कानून के मसविदे पर बातचीत का सिलसिला क्यों चलाया गया? कुछ मंत्री अन्ना के खिलाफ धमकी भरे अंदाज में बोले तो एक रोज बाद लाल किले से प्रधानमंत्री ने नसीहत दी कि अनशन और भूख हड़ताल का तरीका ठीक नहीं है। ममता बनर्जी ने सिंगूर के लिए पचीस दिन तक अनशन किया था। तब मनमोहन सिंह या कांग्रेस के किसी और नेता ने इस पर एतराज क्यों नहीं किया? आज अन्ना के खिलाफ कांग्रेस ऐसी भाषा बोल रही है जैसी कि वह एक समय जेपी के खिलाफ बोलती थी। लगता है कि उसने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया। प्रस्तुत लेखांश का उपयुक्त शीर्षक क्या है? A लोकतंत्र व चुनाव B लोकतंत्र व असहमति और विरोध C आंदोलन व बारात D लोकतंत्र व पुलिस और सरकार
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दिल्ली में अन्ना हजारे को अनशन पर बैठने की इजाजत न देना केन्द्र सरकार का एक निहायत अलोकतांत्रिक कदम है। लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव नहीं होता, बल्कि असहमति और विरोध जताने का अधिकार भी होता है। यह बेहद चिंता की बात है कि इस हक के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है। इस अधिकार को सत्ता में बैठे लोग अपनी सुविधा के हिसाब से परिभाषित कर रहे हैं। दिल्ली पुलिस का कहना है कि उन्होने सोलह अगस्त से अन्ना हजारे और उनके साथियों को अनशन-करने की अनुमति इसलिए नहीं दी, क्योंकि उसकी ओर से पेश शर्तनामे की सभी बातें नहीं मानी गई। पुलिस ने दो-चार नहीं, 22 शर्तें रखी थी। इनमें से सोलह शर्तें अन्ना समूह को मंजूर थीं। समूह को केवल उन बातों पर एतराज था जो नागरिक अधिकारों से मेल नहीं खातीं। दिल्ली पुलिस यह लिखित आश्वासन चाहती थी कि तीसरे दिन आबंटित जगह खाली कर दी जाएगी और वहँा इकट्ठा होने वालों की संख्या पांच हजार से अधिक नहीं होगी। मानो आंदोलन के लिए नहीं, किसी बारात के ठहरने के लिए जगह मांगी जा रही हो। जब जंतर-मंतर पर अन्ना का अनशन हुआ तो इस तरह की कोई शर्त नहीं थी। अनशन खत्म करने की घोषणा पुलिस के किसी शर्तनामे के मुताबिक इसलिए नहीं की गई क्योंकि केन्द्र सरकार लोकपाल विधेयक के मसविदे के लिए साझा समिति बनाने पर राजी हो गई थी। सरकार में बैठे लोग कह रहे हैं कि अनशन के लिए जगह न देने का फैसला केवल दिल्ली पुलिस का है, लेकिन यह बात शायद ही किसी के गले उतरे। सच तो यह है कि अन्ना को देश भर से जैसा भारी जन-समर्थन मिल रहा है उससे सरकार घबराई हुई है। इसीलिए किसी भी कीमत पर उन्हें अनशन पर न बैठने देने और अगर बैठ जाएँ तो जल्दी ही अनशन समाप्त करा देने की योजना बनाई गई। दिल्ली पुलिस ने पहले जंतर-मंतर से मना किया, इस दलील पर कि दूसरे संगठनों को भी इस जगह का इस्तेमाल करने का हक है, इसलिए यहँा अनिश्चिकालीन अनशन या धरने की इजाजत नहीं दी जा सकती। फिर अन्ना समूह ने पांच वैकल्पिक स्थान सुझाए मगर उन्हें अनुमति पाने के लिए एक विभाग से दूसरे विभाग दौड़ाया जाता रहा। आखिरकार जेपी पार्क की बात हुई। फिर घोर अलोकतांत्रिक और अव्यावहारिक शर्तें थोप दी गईं। यही नहीं, अन्ना हजारे के खिलाफ कांग्रेस और केन्द्र सरकार के कुछ मंत्रियों ने दुष्प्रचार की मुहिम छेड़ दी। पहले कहा जाता रहा कि अन्ना के आंदोलन के पीछे संघ परिवार का हाथ है। यह कथित सेलुलर कार्ड नहीं चला तो अब कांग्रेस ने सावंत आयोग का गड़ा मुर्दा उखाड़ कर खुद अन्ना के भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे होने का आरोप जड़ दिया। आयोग की रिपोर्ट2005 में ही आ गई थी। उसके बाद हुई जांच में तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें क्लीन चिट भी दे दी। सवाल उठता है कि अगर कांग्रेस और उसकी सरकार की निगाह में अन्ना पाक-साफ नहीं तो उनके साथ साझा समिति गठित कर लोकपाल कानून के मसविदे पर बातचीत का सिलसिला क्यों चलाया गया? कुछ मंत्री अन्ना के खिलाफ धमकी भरे अंदाज में बोले तो एक रोज बाद लाल किले से प्रधानमंत्री ने नसीहत दी कि अनशन और भूख हड़ताल का तरीका ठीक नहीं है। ममता बनर्जी ने सिंगूर के लिए पचीस दिन तक अनशन किया था। तब मनमोहन सिंह या कांग्रेस के किसी और नेता ने इस पर एतराज क्यों नहीं किया? आज अन्ना के खिलाफ कांग्रेस ऐसी भाषा बोल रही है जैसी कि वह एक समय जेपी के खिलाफ बोलती थी। लगता है कि उसने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया। ‘बारात’ शब्द का इस्तेमाल किसके लिए किया गया है? A पुलिसB सरकार C लोकतंत्रD आंदोलन
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। तीन शब्द- प्रशासन, संगठन और प्रबंधन- का प्रयोग प्रायः एक दूसरे के लिए किया जाता है, तथापि इनके अर्थों में एक विशेष अंतर है। विलियम सुल्जे ने इस अंतर को स्पष्ट रूप से बताया है। उनके अनुसार, ‘कोई संगठन और उसका प्रबंधन जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए और जिन व्यापक नीतियों के अंतर्गत कार्य करते हैं, उनका निर्धारण करने वाली शक्ति का नाम प्रशासन है। संगठन का तात्पर्य आवश्यक जन-बल, सामग्री, उपकरण, साजो-सामान, कार्यक्षेत्र ओर अन्य आवश्यक वस्तुओं के उस सम्मिलित रूप से है जिसे व्यवस्थित और प्रभावी ढंग से सामंजस्य बिठाते हुए कुछ वांछनीय उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए इकट्ठा किया गया हो। प्रबंधन उसे कहते हैं जो एक पूर्व निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किसी संगठन का मार्गदर्शन एवं नेतृत्व करता है।’’ इसी प्रकार ओलिवर शेल्डन का कहना है, ‘‘किसी उद्योग में नीति-निर्धारण का कार्य प्रशासन है। एक उद्योग में प्रबंधन वह कार्य है, जिसका संबंध प्रशासन द्वारा निर्धारित की गई सीमाओं के भीतर नीति क्रियान्वयन से और संगठन को उसके निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति हेतु काम पर लगाने से है---- संगठन मूलतः एक प्रभावी कार्यदल के लिए एक प्रभावी यांत्रिक प्रबंधन का निर्माण और उसका प्रभावी दिशायुक्त प्रशासन है। प्रशासन के द्वारा संगठन का निर्धारण होता है, प्रबंधन उसका उपयोग करता है। प्रशासन लक्ष्य परिभाषित करता है, प्रबंधन उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है। प्रबंधन की उस मशीन को संगठन कहते है, जिसका प्रयोग प्रशासन द्वारा तय किए गए उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए होता हैं।’’ इस प्रकार प्रशासन एक व्यापक अवधारणा है। इसके भीतर संगठन और प्रबंधन दोनों शामिल हैं। निम्न में से कौन-सा वाक्य सुल्जे के प्रशासन को सबसे बढ़िया ढंग से अभिव्यक्त करता है A प्रशासन वह उद्देश्य है जिसे प्राप्त करने के लिए संगठन और प्रबंधन प्रयास करते हैं। B प्रशासन वह ध्येय, ताकत या बल है जो प्रबंधन और संगठन द्वारा प्राप्त किए जाने वाले लक्ष्य को तय करता है। C प्रशासन वह शक्ति है जिसके द्वारा किसी संगठन का उद्देश्य और उन नीतियों का निर्धारण किया जाता है जिनके भीतर संगठन को काम करना है D यह वह भार है जो उद्देश्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य की भौतिक गतिविधियों को नियंत्रित करता है।
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। तीन शब्द- प्रशासन, संगठन और प्रबंधन- का प्रयोग प्रायः एक दूसरे के लिए किया जाता है, तथापि इनके अर्थों में एक विशेष अंतर है। विलियम सुल्जे ने इस अंतर को स्पष्ट रूप से बताया है। उनके अनुसार, ‘कोई संगठन और उसका प्रबंधन जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए और जिन व्यापक नीतियों के अंतर्गत कार्य करते हैं, उनका निर्धारण करने वाली शक्ति का नाम प्रशासन है। संगठन का तात्पर्य आवश्यक जन-बल, सामग्री, उपकरण, साजो-सामान, कार्यक्षेत्र ओर अन्य आवश्यक वस्तुओं के उस सम्मिलित रूप से है जिसे व्यवस्थित और प्रभावी ढंग से सामंजस्य बिठाते हुए कुछ वांछनीय उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए इकट्ठा किया गया हो। प्रबंधन उसे कहते हैं जो एक पूर्व निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किसी संगठन का मार्गदर्शन एवं नेतृत्व करता है।’’ इसी प्रकार ओलिवर शेल्डन का कहना है, ‘‘किसी उद्योग में नीति-निर्धारण का कार्य प्रशासन है। एक उद्योग में प्रबंधन वह कार्य है, जिसका संबंध प्रशासन द्वारा निर्धारित की गई सीमाओं के भीतर नीति क्रियान्वयन से और संगठन को उसके निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति हेतु काम पर लगाने से है---- संगठन मूलतः एक प्रभावी कार्यदल के लिए एक प्रभावी यांत्रिक प्रबंधन का निर्माण और उसका प्रभावी दिशायुक्त प्रशासन है। प्रशासन के द्वारा संगठन का निर्धारण होता है, प्रबंधन उसका उपयोग करता है। प्रशासन लक्ष्य परिभाषित करता है, प्रबंधन उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है। प्रबंधन की उस मशीन को संगठन कहते है, जिसका प्रयोग प्रशासन द्वारा तय किए गए उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए होता हैं।’’ इस प्रकार प्रशासन एक व्यापक अवधारणा है। इसके भीतर संगठन और प्रबंधन दोनों शामिल हैं। संगठन के बारे में निम्न में से कौन-सा वाक्य सही है? A संगठन मूलतः एक प्रभावी कार्यदल के लिए एक प्रभावी यांत्रिक प्रबंधन का निर्माण और उसका प्रभावी दिशायुक्त प्रशासन है। B संगठन वह शक्ति है जो प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्यों को निर्धारित करती है। C किसी पूर्व निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मार्गदर्शन करने और नेतृत्व करने का काम संगठन करता है। D उपरोक्त सभी।
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। तीन शब्द- प्रशासन, संगठन और प्रबंधन- का प्रयोग प्रायः एक दूसरे के लिए किया जाता है, तथापि इनके अर्थों में एक विशेष अंतर है। विलियम सुल्जे ने इस अंतर को स्पष्ट रूप से बताया है। उनके अनुसार, ‘कोई संगठन और उसका प्रबंधन जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए और जिन व्यापक नीतियों के अंतर्गत कार्य करते हैं, उनका निर्धारण करने वाली शक्ति का नाम प्रशासन है। संगठन का तात्पर्य आवश्यक जन-बल, सामग्री, उपकरण, साजो-सामान, कार्यक्षेत्र ओर अन्य आवश्यक वस्तुओं के उस सम्मिलित रूप से है जिसे व्यवस्थित और प्रभावी ढंग से सामंजस्य बिठाते हुए कुछ वांछनीय उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए इकट्ठा किया गया हो। प्रबंधन उसे कहते हैं जो एक पूर्व निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किसी संगठन का मार्गदर्शन एवं नेतृत्व करता है।’’ इसी प्रकार ओलिवर शेल्डन का कहना है, ‘‘किसी उद्योग में नीति-निर्धारण का कार्य प्रशासन है। एक उद्योग में प्रबंधन वह कार्य है, जिसका संबंध प्रशासन द्वारा निर्धारित की गई सीमाओं के भीतर नीति क्रियान्वयन से और संगठन को उसके निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति हेतु काम पर लगाने से है---- संगठन मूलतः एक प्रभावी कार्यदल के लिए एक प्रभावी यांत्रिक प्रबंधन का निर्माण और उसका प्रभावी दिशायुक्त प्रशासन है। प्रशासन के द्वारा संगठन का निर्धारण होता है, प्रबंधन उसका उपयोग करता है। प्रशासन लक्ष्य परिभाषित करता है, प्रबंधन उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है। प्रबंधन की उस मशीन को संगठन कहते है, जिसका प्रयोग प्रशासन द्वारा तय किए गए उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए होता हैं।’’ इस प्रकार प्रशासन एक व्यापक अवधारणा है। इसके भीतर संगठन और प्रबंधन दोनों शामिल हैं। लेखक के अनुसार प्रशासन एवं प्रबंधन में क्या अंतर है? A प्रशासन उद्देश्य निर्धारित करता है– प्रबंधन उन्हें प्राप्त करने का प्रयास करता है। B प्रशासन का संबंध नीति निर्धारण की प्रक्रिया से है जबकि प्रबंधन का जुड़ाव उन नीतियों के क्रियान्वयन से है। C A. और B. दोनों D उपरोक्त में से कोई नहीं।
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।   इस तथ्य, उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत की उत्पत्ति और विकास मौखिक संस्कृति के माध्यम से हुआ है, का आशय यह है कि इस संगीत की सार्थकता और अलग सौंदर्य है, और इस सौंदर्य का पश्चिमी शास्त्रीय संगीत से भिन्न नीतिशास्त्र है। पश्चिमी परंपरा में संगीत की कोई रचना, कम से कम इसकी सर्वप्रमुख विशेषता और लोकप्रिय संकल्पना में, इसके संगीतकार में उत्पन्न होती है। इन दोनों के बीच संबंध, संगीतकार और संगीत की रचना के बीच, अपेक्षाकृत स्पष्ट होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि संगीतकार, अपनी रचना को संकेत चिह्नों में लिखता है, ठीक वैसे ही जैसे एक कवि अपनी कविता लिखता है और प्रकाशित करता है। यद्यपि, अधिकार की धारणा, ‘जीनियस’ (­प्रतिभाशाली) की पश्चिमी संकल्पना के मूल में निहित है, जो लैटिन ‘जिनैरे’ अथवा ‘उत्पन्न होना’ से ली गई है। अतः पश्चिमी शास्त्रीय संगीत में प्रतिभावान (जीनियस), अपने कार्य का प्रवर्तक, जनक और स्वामी होता है- मुद्रित नोटेटेड शीट जो उसके उत्पाद और उसकी शक्ति पर उसके प्राधिकार को प्रमाणित करती है, वह न केवल अभिव्यक्ति अथवा कल्पना से संबंधित है, बल्कि व्युत्पत्ति से भी है। संगीत-निर्देशक इस संपत्ति का अभिरक्षक और संरक्षक होता है। यह एक संयोग है कि मैंडलस्टेम-संगीत निर्देशक की छड़ी की तुलना पुलिसमैन के डंडे से, यह कहते हुए करता है कि, ऑर्केस्ट्रा का सारा संगीत इसके भीतर ही मौन रहता है, जो ऑडिटोरियम में इसके प्रथम प्रदर्शन की प्रतीक्षा करता है। मौखिक साधनों (छंदों) के माध्यम से संप्रेषित राग– एक तरह से किसी की संपत्ति नहीं है। इसके स्त्रेत को बांधना और इसके मूल सूत्र अथवा उत्पत्ति वास्तव में कहां है, यह जानना आसान नहीं है। पश्चिमी परंपरा (जहां संगीतकार अपनी रचना को जन्म देता है, स्वरांकित करता है और अपने स्वामित्व व अवशेषों के रूप में मुहर लगाता है, परिणामतः उसकी कृतियों से बड़ा होता है, अथवा जन्मदाता होता है, इस परंपरा से भिन्न उत्तर भारतीय शास्त्रीय परंपरा में राग, जो एक मूर्तरूपता, संगीतकार अथवा निष्पादक में सीमित नहीं होता, आवश्यक रूप से उसके प्रणेता कलाकार से अधिक महान होता है। यह उस सौंदर्यबोध, जो निष्पादन के अस्थायी क्षण और प्रारंभ को प्रतिभा के नियंत्रक प्राधिकार और स्थायी अभिलेख से ज्यादा महत्व देता है, को व्याख्या और मूल्यांकन के बहुत भिन्न नीतिशास्त्र की ओर ले जाता है। इस प्रकार, यह परंपरा, निष्पादक को, उस संगीतकार से अधिक महत्त्व देती है, वह संगीतकार जो इसे व्युत्पत्ति करने वाला माना जाता है जो प्रभावी रूप से, एक अकेले व्यक्ति में उत्पन्न नहीं हो सकती, क्योंकि राग संस्कृति की विरासत है। लेखक के कथन, कि अधिकार की धारणा प्रतिभा की पश्चिमी संकल्पना में रहती है, निम्न से किसके द्वारा अच्छी तरह इंगित किया गया है? A एक प्रतिभा का सृजनात्मक आउटपुट निरपवाद रूप से लिखा और रिकॉर्ड किया जाता है B सृजक और उसके आउटपुट के मध्य संबंध स्पष्ट होता है। C ‘जीनियस (प्रतिभा)’ शब्द एक लैटिन शब्द से लिया गया है, जिसका आशय ‘उत्पन्न होना’ होता है। D संगीतकार अपने संगीत को स्वरांकित करता है और इस प्रकार एक विशिष्ट संगीत रचना का ‘जन्मदाता’ बन जाता है।
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।   इस तथ्य, उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत की उत्पत्ति और विकास मौखिक संस्कृति के माध्यम से हुआ है, का आशय यह है कि इस संगीत की सार्थकता और अलग सौंदर्य है, और इस सौंदर्य का पश्चिमी शास्त्रीय संगीत से भिन्न नीतिशास्त्र है। पश्चिमी परंपरा में संगीत की कोई रचना, कम से कम इसकी सर्वप्रमुख विशेषता और लोकप्रिय संकल्पना में, इसके संगीतकार में उत्पन्न होती है। इन दोनों के बीच संबंध, संगीतकार और संगीत की रचना के बीच, अपेक्षाकृत स्पष्ट होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि संगीतकार, अपनी रचना को संकेत चिह्नों में लिखता है, ठीक वैसे ही जैसे एक कवि अपनी कविता लिखता है और प्रकाशित करता है। यद्यपि, अधिकार की धारणा, ‘जीनियस’ (­प्रतिभाशाली) की पश्चिमी संकल्पना के मूल में निहित है, जो लैटिन ‘जिनैरे’ अथवा ‘उत्पन्न होना’ से ली गई है। अतः पश्चिमी शास्त्रीय संगीत में प्रतिभावान (जीनियस), अपने कार्य का प्रवर्तक, जनक और स्वामी होता है- मुद्रित नोटेटेड शीट जो उसके उत्पाद और उसकी शक्ति पर उसके प्राधिकार को प्रमाणित करती है, वह न केवल अभिव्यक्ति अथवा कल्पना से संबंधित है, बल्कि व्युत्पत्ति से भी है। संगीत-निर्देशक इस संपत्ति का अभिरक्षक और संरक्षक होता है। यह एक संयोग है कि मैंडलस्टेम-संगीत निर्देशक की छड़ी की तुलना पुलिसमैन के डंडे से, यह कहते हुए करता है कि, ऑर्केस्ट्रा का सारा संगीत इसके भीतर ही मौन रहता है, जो ऑडिटोरियम में इसके प्रथम प्रदर्शन की प्रतीक्षा करता है। मौखिक साधनों (छंदों) के माध्यम से संप्रेषित राग– एक तरह से किसी की संपत्ति नहीं है। इसके स्त्रेत को बांधना और इसके मूल सूत्र अथवा उत्पत्ति वास्तव में कहां है, यह जानना आसान नहीं है। पश्चिमी परंपरा (जहां संगीतकार अपनी रचना को जन्म देता है, स्वरांकित करता है और अपने स्वामित्व व अवशेषों के रूप में मुहर लगाता है, परिणामतः उसकी कृतियों से बड़ा होता है, अथवा जन्मदाता होता है, इस परंपरा से भिन्न उत्तर भारतीय शास्त्रीय परंपरा में राग, जो एक मूर्तरूपता, संगीतकार अथवा निष्पादक में सीमित नहीं होता, आवश्यक रूप से उसके प्रणेता कलाकार से अधिक महान होता है। यह उस सौंदर्यबोध, जो निष्पादन के अस्थायी क्षण और प्रारंभ को प्रतिभा के नियंत्रक प्राधिकार और स्थायी अभिलेख से ज्यादा महत्व देता है, को व्याख्या और मूल्यांकन के बहुत भिन्न नीतिशास्त्र की ओर ले जाता है। इस प्रकार, यह परंपरा, निष्पादक को, उस संगीतकार से अधिक महत्त्व देती है, वह संगीतकार जो इसे व्युत्पत्ति करने वाला माना जाता है जो प्रभावी रूप से, एक अकेले व्यक्ति में उत्पन्न नहीं हो सकती, क्योंकि राग संस्कृति की विरासत है। अवतरण के अनुसार, उत्तर भारतीय शास्त्रीय परंपरा में राग उसके प्रणेता कलाकार से अधिक महान होता है। इसका अर्थ है कि ऐसा सौंदर्यबोध जोः A निष्पादन और प्रारंभ को प्रतिभा के प्राधिकार और स्थायी अभिलेख से ज्यादा महत्व देता है। B संगीत को किसी एक की संपत्ति नहीं बनाता। C संगीतकार को निष्पादक से अधिक महत्त्व देता है। D परंपरागत संगीत के मौखिक संचरण का समर्थन करता है।
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।   इस तथ्य, उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत की उत्पत्ति और विकास मौखिक संस्कृति के माध्यम से हुआ है, का आशय यह है कि इस संगीत की सार्थकता और अलग सौंदर्य है, और इस सौंदर्य का पश्चिमी शास्त्रीय संगीत से भिन्न नीतिशास्त्र है। पश्चिमी परंपरा में संगीत की कोई रचना, कम से कम इसकी सर्वप्रमुख विशेषता और लोकप्रिय संकल्पना में, इसके संगीतकार में उत्पन्न होती है। इन दोनों के बीच संबंध, संगीतकार और संगीत की रचना के बीच, अपेक्षाकृत स्पष्ट होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि संगीतकार, अपनी रचना को संकेत चिह्नों में लिखता है, ठीक वैसे ही जैसे एक कवि अपनी कविता लिखता है और प्रकाशित करता है। यद्यपि, अधिकार की धारणा, ‘जीनियस’ (­प्रतिभाशाली) की पश्चिमी संकल्पना के मूल में निहित है, जो लैटिन ‘जिनैरे’ अथवा ‘उत्पन्न होना’ से ली गई है। अतः पश्चिमी शास्त्रीय संगीत में प्रतिभावान (जीनियस), अपने कार्य का प्रवर्तक, जनक और स्वामी होता है- मुद्रित नोटेटेड शीट जो उसके उत्पाद और उसकी शक्ति पर उसके प्राधिकार को प्रमाणित करती है, वह न केवल अभिव्यक्ति अथवा कल्पना से संबंधित है, बल्कि व्युत्पत्ति से भी है। संगीत-निर्देशक इस संपत्ति का अभिरक्षक और संरक्षक होता है। यह एक संयोग है कि मैंडलस्टेम-संगीत निर्देशक की छड़ी की तुलना पुलिसमैन के डंडे से, यह कहते हुए करता है कि, ऑर्केस्ट्रा का सारा संगीत इसके भीतर ही मौन रहता है, जो ऑडिटोरियम में इसके प्रथम प्रदर्शन की प्रतीक्षा करता है। मौखिक साधनों (छंदों) के माध्यम से संप्रेषित राग– एक तरह से किसी की संपत्ति नहीं है। इसके स्त्रेत को बांधना और इसके मूल सूत्र अथवा उत्पत्ति वास्तव में कहां है, यह जानना आसान नहीं है। पश्चिमी परंपरा (जहां संगीतकार अपनी रचना को जन्म देता है, स्वरांकित करता है और अपने स्वामित्व व अवशेषों के रूप में मुहर लगाता है, परिणामतः उसकी कृतियों से बड़ा होता है, अथवा जन्मदाता होता है, इस परंपरा से भिन्न उत्तर भारतीय शास्त्रीय परंपरा में राग, जो एक मूर्तरूपता, संगीतकार अथवा निष्पादक में सीमित नहीं होता, आवश्यक रूप से उसके प्रणेता कलाकार से अधिक महान होता है। यह उस सौंदर्यबोध, जो निष्पादन के अस्थायी क्षण और प्रारंभ को प्रतिभा के नियंत्रक प्राधिकार और स्थायी अभिलेख से ज्यादा महत्व देता है, को व्याख्या और मूल्यांकन के बहुत भिन्न नीतिशास्त्र की ओर ले जाता है। इस प्रकार, यह परंपरा, निष्पादक को, उस संगीतकार से अधिक महत्त्व देती है, वह संगीतकार जो इसे व्युत्पत्ति करने वाला माना जाता है जो प्रभावी रूप से, एक अकेले व्यक्ति में उत्पन्न नहीं हो सकती, क्योंकि राग संस्कृति की विरासत है। पश्चिमी परंपरा में, संगीत उसके संगीतकार में उत्पन्न होता है, की धारणा पर लेखक की व्याख्या से निम्न में से क्या निष्कर्ष नहीं निकलता? A पश्चिमी शास्त्रीय संगीत की रचना को एक दूरवर्ती स्थान पर अंतरित करना आसान है। B पश्चिमी परंपरा में संगीत निर्देशक, एक अभिरक्षक के रूप में, संगीत को सुधार सकता है, चूंकि यह उसकी छड़ी में ‘मौन रहता’ है। C पश्चिमी शास्त्रीय संगीतकार का अपनी संगीत रचना पर प्राधिकार स्पष्ट होता है। D पश्चिमी शास्त्रीय संगीतकार की शक्ति उसकी संगीत की अभिव्यक्ति तक फैली होती है।
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। नियत दिन आ गया है- नियति द्वारा निश्चित दिन-भारत आज फिर लम्बी निद्रा और संघर्ष के बाद जागृत, सशक्त, मुक्त तथा स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में सामने खड़ा है। हमारा अतीत आज भी कई तरह से हमसे लिपटा हुआ है और हमें हमारी कसमों को पूरा करने के लिए बहुत कुछ करना है। हमारा अतीत हमारा संधिकाल है और हमारे लिए इतिहास फिर से आरंभ हुआ है, ऐसा इतिहास जिसे हम जिएंगे और सृजित करेंगे तथा दूसरे इसके विषय में लिखेंगे। यह भारत, एशिया और स्वतंत्र विश्व सभी के लिए सौभाग्यशाली क्षण है। एक नए सितारे का उदय हुआ है, पूर्व में स्वतंत्रता के सितारे का उदय, नई आशाएं जन्म ले रही हैं, एक लम्बे समय से देखा जा रहा स्वप्न सच हुआ है। यह सितारा कभी न अस्त हो और आशाएं, कभी न टूटे हम स्वतंत्रता का जश्न मनाएं, हालांकि संकट के बादल अभी भी मंडरा रहे हैं, हमारे बहुत से साथी शोकग्रस्त हैं और चारों तरफ विकट समस्याएं हैं परन्तु स्वतंत्रता जिम्मेदारियां और भार साथ लाती है और हमें स्वतंत्र और अनुशासित जन-भावना के साथ इनका सामना करना है। इस पावन दिन पर हमारे विचार इस आजादी के निर्माता राष्ट्रपिता को समर्पित हैं जो भारत की आदि-काल की भावना के प्रतीक हैं तथा जिन्होंने हमारे चारों तरफ व्याप्त अंधकार को दूर भगाया और आजादी की मशाल को जलाए रखा। हम प्रायः उनके सिद्धान्तों का पालन नहीं करते और उनके बताए मार्ग से भटक जाते हैं, परन्तु ना सिर्फ हम अपितु आने वाली कई पीढ़ियां उनके सन्देश को याद रखेंगी और विश्वास एवं शक्ति, साहस तथा मानवता के गुणों के प्रतीक भारत माता के महान सपूत की मूर्ति अपने हृदय स्थल में सज़ा कर रखेंगी। हमें आजादी की मशाल को कभी भी बुझने नहीं देना है, चाहे तूफान कितना ही तेज और शक्तिशाली क्यों न हो। भविष्य हमें बुलाता है। हमे कहां जाना है या हमारे क्या प्रयास होने चाहिए? भारत के आम आदमी, किसानों और श्रमिकों को स्वतंत्रता और अवसर उपलब्ध कराना, (निर्धनता और अज्ञान और रोग से लड़ना, एक समृद्ध, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील राष्ट्र बनाना, तथा ऐसे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थान बनाना जो प्रत्येक महिला और पुरूष के लिए न्याय और जीवन की पूर्णता को सुनिश्चित करे)। हमारे सामने कठिनाइयों का पहाड़ है। हमारे पास विश्राम का समय नहीं है जब तक कि हम अपनी कसमों को पूरा न कर लें, जब कि भारत के सभी लोगों को ऐसा न बना दे जैसा भाग्य ने उनके लिए सोचा है। हम एक महान देश के नागरिक हैं और एक साहसिक उन्नति के सामने खड़े हैं तथा हमें उच्च मानकों के स्तर को बनाए रखना है। शीर्षक में किस नियत दिन का उल्लेख किया गया है? A यह वह दिन है जिस दिन भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की थी। B इस दिन भारत संयुक्त राष्ट्र में शामिल हुआ था। C इस दिन भारत का संविधान लागू हुआ था। D उपरोक्त में कोई नहीं।
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। नियत दिन आ गया है- नियति द्वारा निश्चित दिन-भारत आज फिर लम्बी निद्रा और संघर्ष के बाद जागृत, सशक्त, मुक्त तथा स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में सामने खड़ा है। हमारा अतीत आज भी कई तरह से हमसे लिपटा हुआ है और हमें हमारी कसमों को पूरा करने के लिए बहुत कुछ करना है। हमारा अतीत हमारा संधिकाल है और हमारे लिए इतिहास फिर से आरंभ हुआ है, ऐसा इतिहास जिसे हम जिएंगे और सृजित करेंगे तथा दूसरे इसके विषय में लिखेंगे। यह भारत, एशिया और स्वतंत्र विश्व सभी के लिए सौभाग्यशाली क्षण है। एक नए सितारे का उदय हुआ है, पूर्व में स्वतंत्रता के सितारे का उदय, नई आशाएं जन्म ले रही हैं, एक लम्बे समय से देखा जा रहा स्वप्न सच हुआ है। यह सितारा कभी न अस्त हो और आशाएं, कभी न टूटे हम स्वतंत्रता का जश्न मनाएं, हालांकि संकट के बादल अभी भी मंडरा रहे हैं, हमारे बहुत से साथी शोकग्रस्त हैं और चारों तरफ विकट समस्याएं हैं परन्तु स्वतंत्रता जिम्मेदारियां और भार साथ लाती है और हमें स्वतंत्र और अनुशासित जन-भावना के साथ इनका सामना करना है। इस पावन दिन पर हमारे विचार इस आजादी के निर्माता राष्ट्रपिता को समर्पित हैं जो भारत की आदि-काल की भावना के प्रतीक हैं तथा जिन्होंने हमारे चारों तरफ व्याप्त अंधकार को दूर भगाया और आजादी की मशाल को जलाए रखा। हम प्रायः उनके सिद्धान्तों का पालन नहीं करते और उनके बताए मार्ग से भटक जाते हैं, परन्तु ना सिर्फ हम अपितु आने वाली कई पीढ़ियां उनके सन्देश को याद रखेंगी और विश्वास एवं शक्ति, साहस तथा मानवता के गुणों के प्रतीक भारत माता के महान सपूत की मूर्ति अपने हृदय स्थल में सज़ा कर रखेंगी। हमें आजादी की मशाल को कभी भी बुझने नहीं देना है, चाहे तूफान कितना ही तेज और शक्तिशाली क्यों न हो। भविष्य हमें बुलाता है। हमे कहां जाना है या हमारे क्या प्रयास होने चाहिए? भारत के आम आदमी, किसानों और श्रमिकों को स्वतंत्रता और अवसर उपलब्ध कराना, (निर्धनता और अज्ञान और रोग से लड़ना, एक समृद्ध, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील राष्ट्र बनाना, तथा ऐसे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थान बनाना जो प्रत्येक महिला और पुरूष के लिए न्याय और जीवन की पूर्णता को सुनिश्चित करे)। हमारे सामने कठिनाइयों का पहाड़ है। हमारे पास विश्राम का समय नहीं है जब तक कि हम अपनी कसमों को पूरा न कर लें, जब कि भारत के सभी लोगों को ऐसा न बना दे जैसा भाग्य ने उनके लिए सोचा है। हम एक महान देश के नागरिक हैं और एक साहसिक उन्नति के सामने खड़े हैं तथा हमें उच्च मानकों के स्तर को बनाए रखना है। लेखक द्वारा ‘नया सितारा’ किसे कहा गया है? A यह भारत की स्वतंत्रता को दर्शाता है। B यह भारत के लोगों की नई आशा को दर्शाता है जो साम्राज्यवाद से स्वतंत्रता का प्रतीक है। C दोनों A और B D न ही A और न B
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। नियत दिन आ गया है- नियति द्वारा निश्चित दिन-भारत आज फिर लम्बी निद्रा और संघर्ष के बाद जागृत, सशक्त, मुक्त तथा स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में सामने खड़ा है। हमारा अतीत आज भी कई तरह से हमसे लिपटा हुआ है और हमें हमारी कसमों को पूरा करने के लिए बहुत कुछ करना है। हमारा अतीत हमारा संधिकाल है और हमारे लिए इतिहास फिर से आरंभ हुआ है, ऐसा इतिहास जिसे हम जिएंगे और सृजित करेंगे तथा दूसरे इसके विषय में लिखेंगे। यह भारत, एशिया और स्वतंत्र विश्व सभी के लिए सौभाग्यशाली क्षण है। एक नए सितारे का उदय हुआ है, पूर्व में स्वतंत्रता के सितारे का उदय, नई आशाएं जन्म ले रही हैं, एक लम्बे समय से देखा जा रहा स्वप्न सच हुआ है। यह सितारा कभी न अस्त हो और आशाएं, कभी न टूटे हम स्वतंत्रता का जश्न मनाएं, हालांकि संकट के बादल अभी भी मंडरा रहे हैं, हमारे बहुत से साथी शोकग्रस्त हैं और चारों तरफ विकट समस्याएं हैं परन्तु स्वतंत्रता जिम्मेदारियां और भार साथ लाती है और हमें स्वतंत्र और अनुशासित जन-भावना के साथ इनका सामना करना है। इस पावन दिन पर हमारे विचार इस आजादी के निर्माता राष्ट्रपिता को समर्पित हैं जो भारत की आदि-काल की भावना के प्रतीक हैं तथा जिन्होंने हमारे चारों तरफ व्याप्त अंधकार को दूर भगाया और आजादी की मशाल को जलाए रखा। हम प्रायः उनके सिद्धान्तों का पालन नहीं करते और उनके बताए मार्ग से भटक जाते हैं, परन्तु ना सिर्फ हम अपितु आने वाली कई पीढ़ियां उनके सन्देश को याद रखेंगी और विश्वास एवं शक्ति, साहस तथा मानवता के गुणों के प्रतीक भारत माता के महान सपूत की मूर्ति अपने हृदय स्थल में सज़ा कर रखेंगी। हमें आजादी की मशाल को कभी भी बुझने नहीं देना है, चाहे तूफान कितना ही तेज और शक्तिशाली क्यों न हो। भविष्य हमें बुलाता है। हमे कहां जाना है या हमारे क्या प्रयास होने चाहिए? भारत के आम आदमी, किसानों और श्रमिकों को स्वतंत्रता और अवसर उपलब्ध कराना, (निर्धनता और अज्ञान और रोग से लड़ना, एक समृद्ध, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील राष्ट्र बनाना, तथा ऐसे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थान बनाना जो प्रत्येक महिला और पुरूष के लिए न्याय और जीवन की पूर्णता को सुनिश्चित करे)। हमारे सामने कठिनाइयों का पहाड़ है। हमारे पास विश्राम का समय नहीं है जब तक कि हम अपनी कसमों को पूरा न कर लें, जब कि भारत के सभी लोगों को ऐसा न बना दे जैसा भाग्य ने उनके लिए सोचा है। हम एक महान देश के नागरिक हैं और एक साहसिक उन्नति के सामने खड़े हैं तथा हमें उच्च मानकों के स्तर को बनाए रखना है। हमारे चारों तरफ छाए बादल किस के प्रतीक हैं? A भारत में मानसून की घनघोर वर्षा। B साम्राज्यवाद और दासता के बादल। C भारत के लोगों के दुःख, गरीबी और समस्याएं। D भारत के राष्ट्रपिता की जघन्य हत्या के बाद शोक के बादल।
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एक विस्तृत मोबाइल फोन नेटवर्क से संबंधित आँकड़ों के दीर्घकालिक अध्ययन से एक बेहद मनोरंजक तथ्य की जानकारी मिली है जो कि महामारी विज्ञानियों तथा सामाजिक विज्ञानियों के लिए बेहद उपयोगी हो सकती है। शोधकर्त्ताओं के अनुसार, प्राप्त आँकड़े इस सन्दर्भ में कुछ प्रकाश डाल सकते हैं, उदाहरण के लिए, सामाजिक संजाल के माध्यम से रोग तथा सूचनाएं किस तरह से प्रसारित होती है। शोधकर्त्ताओं ने दूरसंचार उपयोगकर्त्ताओं के एक युग्म के मध्य एक-दूसरे से बातचीत करने हेतु व्यतीत किये गये समय के आधार पर इस शृंखला को श्रेणीबद्ध किया है। ‘मजबूत’ शृंखला एक समीपवर्ती सामाजिक समूह के सदस्यों के मध्य पाई जाती है, जबकि कमजोर शृंखला अधिक दीर्घ प्रसार की ओर प्रवृत्त होती है और विभिन्न सामाजिक समूह के लोगों को आपस में जोड़ती है। शोधकर्त्ताओं ने श्रेणीक्रम से संजाल की शृंखला को जब हटाया तो उन्हें नाटकीय रूप से एक भिन्न प्रभाव देखने को मिला, जो इस तथ्य पर आधारित था कि उन्होंने सबसे मजबूत श्रंखला से शुरुआत करते हुए श्रेणियों को हटाया था या सबसे कमजोर श्रंखला से। उनके विस्मय हेतु, मजबूत शृंखला को पहले हटाने से संजाल के सम्पूर्ण ढांचे पर बहुत ही प्रभाव पड़ता है। लेकिन कमजोर शृंखला को पहले हटाने पर संजाल पहले असम्बन्धित ऊत्तकों की शृंखला में विभाजित होता है जिसमें व्यक्तिगत उपयोगकर्त्ता अन्य दूरसंचार उपयोगकर्त्ता के लघु समूह के साथ सम्बन्धित होते हैं। अतः शोधकर्त्ताओं ने यह परिकल्पना की है कि कमजोर शृंखला विस्तृत सामाजिक सम्बद्धता को बनाए रखने में बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। यदि आप अनौपचारिक परिचितों से सम्पर्क खो देते हैं, तो इससे आपका सामजिक दायरा विखंडित हो सकता है, लेकिन यदि आप अपने भाई से बात करना बन्द कर देते हैं, तो इसका आपके सामाजिक नेटवर्क की रूपरेखा पर अत्यन्त निम्न प्रभाव द्रष्टव्य हो सकता है। यह लेखांश निम्नलिखित में से किस अवस्थिति का समर्थन करता है? A ‘कमजोर’ शृंखलाएं ‘मजबूत’ श्रंखलाओं से अधिक महत्वपूर्ण होती हैं। B ‘कमजोर’ श्रंखलाओं को हटा देने से पारिवारिक सदस्यों के मध्य की श्रंखलाओं के बाधित होने की सम्भावना काफी कम होती है। C कुछ लोग यह मानते हैं कि दूरसंचार नेटवर्क का पैटर्न सामाजिक वैज्ञानिकों के लिए लाभकारी हो सकता है। D दूरसंचार नेटवर्क के माध्यम से किया जाने वाला प्रसारण, आमने-सामने के सम्पर्क द्वारा किये जाने वाले सूचना-प्रसारण के लगभग समान ही होता है।
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एक विस्तृत मोबाइल फोन नेटवर्क से संबंधित आँकड़ों के दीर्घकालिक अध्ययन से एक बेहद मनोरंजक तथ्य की जानकारी मिली है जो कि महामारी विज्ञानियों तथा सामाजिक विज्ञानियों के लिए बेहद उपयोगी हो सकती है। शोधकर्त्ताओं के अनुसार, प्राप्त आँकड़े इस सन्दर्भ में कुछ प्रकाश डाल सकते हैं, उदाहरण के लिए, सामाजिक संजाल के माध्यम से रोग तथा सूचनाएं किस तरह से प्रसारित होती है। शोधकर्त्ताओं ने दूरसंचार उपयोगकर्त्ताओं के एक युग्म के मध्य एक-दूसरे से बातचीत करने हेतु व्यतीत किये गये समय के आधार पर इस शृंखला को श्रेणीबद्ध किया है। ‘मजबूत’ शृंखला एक समीपवर्ती सामाजिक समूह के सदस्यों के मध्य पाई जाती है, जबकि कमजोर शृंखला अधिक दीर्घ प्रसार की ओर प्रवृत्त होती है और विभिन्न सामाजिक समूह के लोगों को आपस में जोड़ती है। शोधकर्त्ताओं ने श्रेणीक्रम से संजाल की शृंखला को जब हटाया तो उन्हें नाटकीय रूप से एक भिन्न प्रभाव देखने को मिला, जो इस तथ्य पर आधारित था कि उन्होंने सबसे मजबूत श्रंखला से शुरुआत करते हुए श्रेणियों को हटाया था या सबसे कमजोर श्रंखला से। उनके विस्मय हेतु, मजबूत शृंखला को पहले हटाने से संजाल के सम्पूर्ण ढांचे पर बहुत ही प्रभाव पड़ता है। लेकिन कमजोर शृंखला को पहले हटाने पर संजाल पहले असम्बन्धित ऊत्तकों की शृंखला में विभाजित होता है जिसमें व्यक्तिगत उपयोगकर्त्ता अन्य दूरसंचार उपयोगकर्त्ता के लघु समूह के साथ सम्बन्धित होते हैं। अतः शोधकर्त्ताओं ने यह परिकल्पना की है कि कमजोर शृंखला विस्तृत सामाजिक सम्बद्धता को बनाए रखने में बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। यदि आप अनौपचारिक परिचितों से सम्पर्क खो देते हैं, तो इससे आपका सामजिक दायरा विखंडित हो सकता है, लेकिन यदि आप अपने भाई से बात करना बन्द कर देते हैं, तो इसका आपके सामाजिक नेटवर्क की रूपरेखा पर अत्यन्त निम्न प्रभाव द्रष्टव्य हो सकता है। अन्तिम वाक्य में, स्पष्ट रूप से लेखक यह कहना चाहता है कि A पाठकों की समझ को बढ़ाने के विचारों में अधिक विशिष्टता लाई जाए B शोधकर्त्ताओं के निष्कर्षों को पुनर्बलित किया जाए C एक मजबूत शृंखला के अर्थ की व्यावहारिक व्याख्या प्रस्तुत की जाए D तर्क को अधिक आकर्षक बनाने हेतु इसका सामान्यीकरण किया जाए।
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एक विस्तृत मोबाइल फोन नेटवर्क से संबंधित आँकड़ों के दीर्घकालिक अध्ययन से एक बेहद मनोरंजक तथ्य की जानकारी मिली है जो कि महामारी विज्ञानियों तथा सामाजिक विज्ञानियों के लिए बेहद उपयोगी हो सकती है। शोधकर्त्ताओं के अनुसार, प्राप्त आँकड़े इस सन्दर्भ में कुछ प्रकाश डाल सकते हैं, उदाहरण के लिए, सामाजिक संजाल के माध्यम से रोग तथा सूचनाएं किस तरह से प्रसारित होती है। शोधकर्त्ताओं ने दूरसंचार उपयोगकर्त्ताओं के एक युग्म के मध्य एक-दूसरे से बातचीत करने हेतु व्यतीत किये गये समय के आधार पर इस शृंखला को श्रेणीबद्ध किया है। ‘मजबूत’ शृंखला एक समीपवर्ती सामाजिक समूह के सदस्यों के मध्य पाई जाती है, जबकि कमजोर शृंखला अधिक दीर्घ प्रसार की ओर प्रवृत्त होती है और विभिन्न सामाजिक समूह के लोगों को आपस में जोड़ती है। शोधकर्त्ताओं ने श्रेणीक्रम से संजाल की शृंखला को जब हटाया तो उन्हें नाटकीय रूप से एक भिन्न प्रभाव देखने को मिला, जो इस तथ्य पर आधारित था कि उन्होंने सबसे मजबूत श्रंखला से शुरुआत करते हुए श्रेणियों को हटाया था या सबसे कमजोर श्रंखला से। उनके विस्मय हेतु, मजबूत शृंखला को पहले हटाने से संजाल के सम्पूर्ण ढांचे पर बहुत ही प्रभाव पड़ता है। लेकिन कमजोर शृंखला को पहले हटाने पर संजाल पहले असम्बन्धित ऊत्तकों की शृंखला में विभाजित होता है जिसमें व्यक्तिगत उपयोगकर्त्ता अन्य दूरसंचार उपयोगकर्त्ता के लघु समूह के साथ सम्बन्धित होते हैं। अतः शोधकर्त्ताओं ने यह परिकल्पना की है कि कमजोर शृंखला विस्तृत सामाजिक सम्बद्धता को बनाए रखने में बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। यदि आप अनौपचारिक परिचितों से सम्पर्क खो देते हैं, तो इससे आपका सामजिक दायरा विखंडित हो सकता है, लेकिन यदि आप अपने भाई से बात करना बन्द कर देते हैं, तो इसका आपके सामाजिक नेटवर्क की रूपरेखा पर अत्यन्त निम्न प्रभाव द्रष्टव्य हो सकता है। इस लेखांश के आधार पर निम्नलिखित में से कौन-सा अनुमान लगाया जा सकता है? A शोधकर्त्ताओं ने कमजोर श्रंखलाओं को हटाए जाने के विशिष्ट प्रभाव का पूर्वानुमान नहीं किया था। B दूरसंचार नेटवर्क के अध्ययनों के अंतर्गत पूरी अवधि के दौरान समान संख्या में उपयोगकर्त्ता सम्मिलित थे। C दूरसंचार उपयोगकर्त्ता अध्ययन से अनभिज्ञ थे। D उपरोक्त में से कोई नहीं।
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एक विस्तृत मोबाइल फोन नेटवर्क से संबंधित आँकड़ों के दीर्घकालिक अध्ययन से एक बेहद मनोरंजक तथ्य की जानकारी मिली है जो कि महामारी विज्ञानियों तथा सामाजिक विज्ञानियों के लिए बेहद उपयोगी हो सकती है। शोधकर्त्ताओं के अनुसार, प्राप्त आँकड़े इस सन्दर्भ में कुछ प्रकाश डाल सकते हैं, उदाहरण के लिए, सामाजिक संजाल के माध्यम से रोग तथा सूचनाएं किस तरह से प्रसारित होती है। शोधकर्त्ताओं ने दूरसंचार उपयोगकर्त्ताओं के एक युग्म के मध्य एक-दूसरे से बातचीत करने हेतु व्यतीत किये गये समय के आधार पर इस शृंखला को श्रेणीबद्ध किया है। ‘मजबूत’ शृंखला एक समीपवर्ती सामाजिक समूह के सदस्यों के मध्य पाई जाती है, जबकि कमजोर शृंखला अधिक दीर्घ प्रसार की ओर प्रवृत्त होती है और विभिन्न सामाजिक समूह के लोगों को आपस में जोड़ती है। शोधकर्त्ताओं ने श्रेणीक्रम से संजाल की शृंखला को जब हटाया तो उन्हें नाटकीय रूप से एक भिन्न प्रभाव देखने को मिला, जो इस तथ्य पर आधारित था कि उन्होंने सबसे मजबूत श्रंखला से शुरुआत करते हुए श्रेणियों को हटाया था या सबसे कमजोर श्रंखला से। उनके विस्मय हेतु, मजबूत शृंखला को पहले हटाने से संजाल के सम्पूर्ण ढांचे पर बहुत ही प्रभाव पड़ता है। लेकिन कमजोर शृंखला को पहले हटाने पर संजाल पहले असम्बन्धित ऊत्तकों की शृंखला में विभाजित होता है जिसमें व्यक्तिगत उपयोगकर्त्ता अन्य दूरसंचार उपयोगकर्त्ता के लघु समूह के साथ सम्बन्धित होते हैं। अतः शोधकर्त्ताओं ने यह परिकल्पना की है कि कमजोर शृंखला विस्तृत सामाजिक सम्बद्धता को बनाए रखने में बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। यदि आप अनौपचारिक परिचितों से सम्पर्क खो देते हैं, तो इससे आपका सामजिक दायरा विखंडित हो सकता है, लेकिन यदि आप अपने भाई से बात करना बन्द कर देते हैं, तो इसका आपके सामाजिक नेटवर्क की रूपरेखा पर अत्यन्त निम्न प्रभाव द्रष्टव्य हो सकता है। कमजोर श्रंखलाएं अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होती है क्योंकि A ये विभिन्न सामाजिक समूहों के लोगों को आपस में जोड़ती हैं। B ये अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत हैं। C यह सामाजिक समूहों के मध्य बेहतर सम्बन्ध बनाए रखने की दृष्टि से अच्छी हैं। D उपरोक्त में से कोई नहीं।
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विज्ञान की मानक विधियाँ नियन्त्रित परिस्थितियों में प्रमुख परिकल्पनाओं के परीक्षण हेतु निरीक्षणों से परिकल्पनाओं की दिशा में अग्रसर होती है। फिर भी, यह अनुमान लगाना गलत होगा कि प्रत्येक परिकल्पना, जो कि इन निरीक्षणों से प्राप्त होती है, का परिशुद्ध वैज्ञानिक अनुसंधानों में अहम् योगदान होता है। वास्तव में, बहुत से प्रश्न, विज्ञान के सन्दर्भ में पूछे जा सकते हैं जिनका विज्ञान किन्हीं एक अथवा अन्य कारणों से उत्तर देने की स्थिति में नही है। मेलानोमा आवरण (त्वचा कैंसर से संबंधित) के ऊपर हाल ही में छिड़ी बहस ‘परा-विज्ञान’, जैसा कि कुछ प्रख्यात विचारकों ने इसे नाम दिया है, अथवा ‘विज्ञान जो कि वैज्ञानिक नहीं है’ के इस क्षेत्र में मनोरंजक उदाहरण प्रस्तुत करती है। आइए निरीक्षणों से इसकी शुरुआत करें। पिछले बीस वर्षों के दौरान आरम्भिक-व्यवस्था वाले मेलानोमा से सम्बन्धित मामलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। प्रतिवेदनों/रिपोर्टों की संख्या के परिणामस्वरूप कुछ चिकित्सक मेलानोमा की जांच का सुझाव देते हैं। इस तथ्य में जो ‘परिकल्पना’ अन्तर्निहित है, वह यह है कि मेलानोमा की जांच करने से इस रोग से मरने वाले लोगों की संख्या दर में कमी आएगी। लेकिन हम इसका परीक्षण करते कैसे हैं। किसी चिकित्सीय तकनीक के प्रभाव का मूल्यांकन करने का पारम्परिक तरीका द्वि-अंध प्रयास विधि है। इसमें, कुछ लोगों को जांच करवाने के लिए तैयार करना होगा और कुछ नियंत्रित समूह के लोगों की जांच नहीं की जाएगी। फिर हम दोनों समूहों में मेलानोमा से होने वाली मृत्यु दर की जांच करेंगे। दोनों ही समस्याएं तार्किक एवं नैतिक हैं। यदि जवाब सांख्यिकीय महत्ता तक पहुंचने का है, तो हमें बहुत बड़ी संख्याओं की जरूरत होगी और हमें जीवन भर लोगों का अनुसरण करने की भी जरुरत होगी और इनमें से कोई भी व्यावहारिक नहीं है। हम यह कैसे तय करेंंगे कि इसका फायदा किसे मिल सकता है दीर्घकालिक जांच कराने वालों को अथवा उन्हें जो इसके सम्भावित फायदों की अनदेखी करेंगे ? लेखक स्पष्ट तौर पर इनमें से किस कथन से सहमत है? A मेलानोमा हेतु की जाने वाली जाँच का प्रभाव सत्यापित नहीं है B द्वि-अंध परीक्षण मूल्यांकन की सर्वश्रेष्ठ पद्धति है C मेलानोमा से होने वाले मृत्यु-दर में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है D उपरोक्त में से कोई नहीं
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विज्ञान की मानक विधियाँ नियन्त्रित परिस्थितियों में प्रमुख परिकल्पनाओं के परीक्षण हेतु निरीक्षणों से परिकल्पनाओं की दिशा में अग्रसर होती है। फिर भी, यह अनुमान लगाना गलत होगा कि प्रत्येक परिकल्पना, जो कि इन निरीक्षणों से प्राप्त होती है, का परिशुद्ध वैज्ञानिक अनुसंधानों में अहम् योगदान होता है। वास्तव में, बहुत से प्रश्न, विज्ञान के सन्दर्भ में पूछे जा सकते हैं जिनका विज्ञान किन्हीं एक अथवा अन्य कारणों से उत्तर देने की स्थिति में नही है। मेलानोमा आवरण (त्वचा कैंसर से संबंधित) के ऊपर हाल ही में छिड़ी बहस ‘परा-विज्ञान’, जैसा कि कुछ प्रख्यात विचारकों ने इसे नाम दिया है, अथवा ‘विज्ञान जो कि वैज्ञानिक नहीं है’ के इस क्षेत्र में मनोरंजक उदाहरण प्रस्तुत करती है। आइए निरीक्षणों से इसकी शुरुआत करें। पिछले बीस वर्षों के दौरान आरम्भिक-व्यवस्था वाले मेलानोमा से सम्बन्धित मामलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। प्रतिवेदनों/रिपोर्टों की संख्या के परिणामस्वरूप कुछ चिकित्सक मेलानोमा की जांच का सुझाव देते हैं। इस तथ्य में जो ‘परिकल्पना’ अन्तर्निहित है, वह यह है कि मेलानोमा की जांच करने से इस रोग से मरने वाले लोगों की संख्या दर में कमी आएगी। लेकिन हम इसका परीक्षण करते कैसे हैं। किसी चिकित्सीय तकनीक के प्रभाव का मूल्यांकन करने का पारम्परिक तरीका द्वि-अंध प्रयास विधि है। इसमें, कुछ लोगों को जांच करवाने के लिए तैयार करना होगा और कुछ नियंत्रित समूह के लोगों की जांच नहीं की जाएगी। फिर हम दोनों समूहों में मेलानोमा से होने वाली मृत्यु दर की जांच करेंगे। दोनों ही समस्याएं तार्किक एवं नैतिक हैं। यदि जवाब सांख्यिकीय महत्ता तक पहुंचने का है, तो हमें बहुत बड़ी संख्याओं की जरूरत होगी और हमें जीवन भर लोगों का अनुसरण करने की भी जरुरत होगी और इनमें से कोई भी व्यावहारिक नहीं है। हम यह कैसे तय करेंंगे कि इसका फायदा किसे मिल सकता है दीर्घकालिक जांच कराने वालों को अथवा उन्हें जो इसके सम्भावित फायदों की अनदेखी करेंगे ? विपरीत अल्प विराम (inverted commas) के अन्दर लिखा हुआ गाढ़ा शब्द A यह सुझाता है कि उस वाक्य में निहित कथन का वैज्ञानिक रीति से परीक्षण्ा नहीं किया जा सकता है B सही तरीके से परिकल्पनाओं के निर्माण की महत्ता पर बल डालता है C वाक्य के मुख्य शब्द की ओर ध्यान आकर्षित करता है D यह दर्शाता है कि लेखक किसी और के विचारों का उपयोग कर रहा है।
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विज्ञान की मानक विधियाँ नियन्त्रित परिस्थितियों में प्रमुख परिकल्पनाओं के परीक्षण हेतु निरीक्षणों से परिकल्पनाओं की दिशा में अग्रसर होती है। फिर भी, यह अनुमान लगाना गलत होगा कि प्रत्येक परिकल्पना, जो कि इन निरीक्षणों से प्राप्त होती है, का परिशुद्ध वैज्ञानिक अनुसंधानों में अहम् योगदान होता है। वास्तव में, बहुत से प्रश्न, विज्ञान के सन्दर्भ में पूछे जा सकते हैं जिनका विज्ञान किन्हीं एक अथवा अन्य कारणों से उत्तर देने की स्थिति में नही है। मेलानोमा आवरण (त्वचा कैंसर से संबंधित) के ऊपर हाल ही में छिड़ी बहस ‘परा-विज्ञान’, जैसा कि कुछ प्रख्यात विचारकों ने इसे नाम दिया है, अथवा ‘विज्ञान जो कि वैज्ञानिक नहीं है’ के इस क्षेत्र में मनोरंजक उदाहरण प्रस्तुत करती है। आइए निरीक्षणों से इसकी शुरुआत करें। पिछले बीस वर्षों के दौरान आरम्भिक-व्यवस्था वाले मेलानोमा से सम्बन्धित मामलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। प्रतिवेदनों/रिपोर्टों की संख्या के परिणामस्वरूप कुछ चिकित्सक मेलानोमा की जांच का सुझाव देते हैं। इस तथ्य में जो ‘परिकल्पना’ अन्तर्निहित है, वह यह है कि मेलानोमा की जांच करने से इस रोग से मरने वाले लोगों की संख्या दर में कमी आएगी। लेकिन हम इसका परीक्षण करते कैसे हैं। किसी चिकित्सीय तकनीक के प्रभाव का मूल्यांकन करने का पारम्परिक तरीका द्वि-अंध प्रयास विधि है। इसमें, कुछ लोगों को जांच करवाने के लिए तैयार करना होगा और कुछ नियंत्रित समूह के लोगों की जांच नहीं की जाएगी। फिर हम दोनों समूहों में मेलानोमा से होने वाली मृत्यु दर की जांच करेंगे। दोनों ही समस्याएं तार्किक एवं नैतिक हैं। यदि जवाब सांख्यिकीय महत्ता तक पहुंचने का है, तो हमें बहुत बड़ी संख्याओं की जरूरत होगी और हमें जीवन भर लोगों का अनुसरण करने की भी जरुरत होगी और इनमें से कोई भी व्यावहारिक नहीं है। हम यह कैसे तय करेंंगे कि इसका फायदा किसे मिल सकता है दीर्घकालिक जांच कराने वालों को अथवा उन्हें जो इसके सम्भावित फायदों की अनदेखी करेंगे ? इनमें से किसे लेखक वाक्य में उल्लेखित ‘कारणों’ के उदाहरण/ उदाहरणों के रूप में प्रस्तुत करता है– ‘वास्तव में कई ऐसे प्रश्न हैं जिन्हें विज्ञान के सन्दर्भ में पूछा जा सकता है कि एक या अन्य कारणों से विज्ञान इसका उत्तर देने की स्थिति में क्यों नहीं है? A. प्रतिदर्श आकार की अपर्याप्तता B. नैतिक मुद्दे/मामले C. अस्पष्ट आँकड़े D. उपरोक्त में से कोई नहीं A केवल A B केवल A तथा B C A, B तथा C D केवल D
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विज्ञान की मानक विधियाँ नियन्त्रित परिस्थितियों में प्रमुख परिकल्पनाओं के परीक्षण हेतु निरीक्षणों से परिकल्पनाओं की दिशा में अग्रसर होती है। फिर भी, यह अनुमान लगाना गलत होगा कि प्रत्येक परिकल्पना, जो कि इन निरीक्षणों से प्राप्त होती है, का परिशुद्ध वैज्ञानिक अनुसंधानों में अहम् योगदान होता है। वास्तव में, बहुत से प्रश्न, विज्ञान के सन्दर्भ में पूछे जा सकते हैं जिनका विज्ञान किन्हीं एक अथवा अन्य कारणों से उत्तर देने की स्थिति में नही है। मेलानोमा आवरण (त्वचा कैंसर से संबंधित) के ऊपर हाल ही में छिड़ी बहस ‘परा-विज्ञान’, जैसा कि कुछ प्रख्यात विचारकों ने इसे नाम दिया है, अथवा ‘विज्ञान जो कि वैज्ञानिक नहीं है’ के इस क्षेत्र में मनोरंजक उदाहरण प्रस्तुत करती है। आइए निरीक्षणों से इसकी शुरुआत करें। पिछले बीस वर्षों के दौरान आरम्भिक-व्यवस्था वाले मेलानोमा से सम्बन्धित मामलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। प्रतिवेदनों/रिपोर्टों की संख्या के परिणामस्वरूप कुछ चिकित्सक मेलानोमा की जांच का सुझाव देते हैं। इस तथ्य में जो ‘परिकल्पना’ अन्तर्निहित है, वह यह है कि मेलानोमा की जांच करने से इस रोग से मरने वाले लोगों की संख्या दर में कमी आएगी। लेकिन हम इसका परीक्षण करते कैसे हैं। किसी चिकित्सीय तकनीक के प्रभाव का मूल्यांकन करने का पारम्परिक तरीका द्वि-अंध प्रयास विधि है। इसमें, कुछ लोगों को जांच करवाने के लिए तैयार करना होगा और कुछ नियंत्रित समूह के लोगों की जांच नहीं की जाएगी। फिर हम दोनों समूहों में मेलानोमा से होने वाली मृत्यु दर की जांच करेंगे। दोनों ही समस्याएं तार्किक एवं नैतिक हैं। यदि जवाब सांख्यिकीय महत्ता तक पहुंचने का है, तो हमें बहुत बड़ी संख्याओं की जरूरत होगी और हमें जीवन भर लोगों का अनुसरण करने की भी जरुरत होगी और इनमें से कोई भी व्यावहारिक नहीं है। हम यह कैसे तय करेंंगे कि इसका फायदा किसे मिल सकता है दीर्घकालिक जांच कराने वालों को अथवा उन्हें जो इसके सम्भावित फायदों की अनदेखी करेंगे ? लेखक ने ‘परा-विज्ञान’ शब्द का उपयोग क्यों किया है? A उन परिकल्पनाओं को दर्शाने हेतु जिनके विषय में कोई जानकारी नहीं है B उन परिकल्पनाओं को दर्शाने हेतु जिनके विषय में विज्ञान अब तक मौन है C उन परिकल्पनाओं को स्पष्ट करने के लिए जिनके विषय मे विज्ञान में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है D यह बताने के लिए कि विज्ञान ही सभी चीजों का समाधान नहीं है
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आप कोयला मंत्रलय में संयुक्त सचिव के रूप में कार्य कर रहें हैं। आपको थर्मल पॉवर प्लांट में कोयले की बर्बादी पर पाबन्दी लगाने का कार्य सौंपा गया है, जैसे कि कोयले के निम्न उष्मीय मूल्य के कारण होने वाली बर्बादी, कोयले की खदानों अथवा उसके परिवहन के दौरान होने वाली कोयले की चोरी----इत्यादि। आप क्या करेंगे? A एक नया थर्मल पॉवर प्लांट कोयले के खाद्यान्न के पास ही स्थापित करेंगे B कोयले के उत्पादन पर प्रतिबंध लगाएँगे तथा उसकी मांग में आयात के जरिए सन्तुलन स्थापित करेंगे C स्थानीय कम्पनियों को खुद ही कोयले की खुदाई करने की अनुमति देंगे और कोयले की खदानों अथवा परिवहन के दौरान उसकी चोरी करने वालों के गिरफ्रतार करने के लिए समस्त सम्भावित सहायता उपलब्ध कराएँगे D एक ही साथ कोयले का उत्पादन एवं प्रेषण, दोनों करेंगे और खादानों में कोयले के भण्डारण को कम करेंगे
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आप एक राज्य के आपदा प्रबन्धक है। आपके राज्य के एक भाग में बाढ़ का प्रकोप है और आप तथा आपकी टीम यहां विनाश प्रबन्धन कर रही है। एक विशेष गांव का निरीक्षण करने पर आपको बताया गया कि संकट में सहायता के लिए आवश्यक नावें यहां पहुंची ही नहीं हैं और जांच करने पर आपको एक घोटाले का पता चला है-क्योंकि फाइल में दिखाया गया है कि गांव की सहायता हेतु 28 नावें किराए पर ली गई हैं और उसके लिए भुगतान भी कर दिया गया है। आप A आप इसके बारे में सम्बन्धित विभाग को तुरन्त ही सूचित करेंगे B सभी जोखिमधारी विभागों के सम्बन्धित अधिकारियों को ध्यान में यह बात लाने के लिए तत्काल कदम उठाएंगे और राज्य के राजनैतिक आकाओं के सामने भी मामला रखेंगे C आवाज उठाने से पहले मामले की तह तक जाकर यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि वह सम्बन्धित अधिकारी कौन-से हैं जिन्होंने यह घोटाला किया है D अपने अधिकारियों को बताएंगे कि आपने क्या देखा है और उनसे उचित कार्रवाई करने के लिए कहेंगे।