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GS-II

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Practice Test-3

Question
38 out of 80
 

Read each of the following two passages and answers to these items that follow. Your answers to these items should be based on the passage only.

Most of us would like to live a long and healthy life. Increasingly, doctors are telling us that, in order to do so, we must eat a healthy diet. Too often we ignore the advice.

In most countries of the developed world there is no shortage of food, but their inhabitants could be suffering from a form of malnutrition. This is something that we are accustomed to associate with poor countries which regularly suffer from famine, caused by primitive agricultural methods and over-population.

The problem in the developed countries is that all too many of us are eating food which is far from being nutritious and which is lacking in many of the vitamins essential to health. Because of our busy way of life, we rely too much on convenience foods, not taking the time to prepare a nourishing meal for ourselves. Instead, we grab something from the supermarket shelves of freezer and put it in the microwave.

Even when we decide to eat in a restaurant, many of us decide that we have very little time and that our food must be served instantly. It is for this reason that there are, in many countries, so many restaurants that specialise in serving fast food. Unfortunately, much of this food is also junk food, and even more unfortunately many children have become addicted to this, refusing to eat healthier alternatives.

In general, we are eating too much processed food and not enough wholefood. Ideally, we should eat more cereal products in order to increase our intake of fibre, since there is some evidence that this reduces the risk of certain cancers. Antioxidants, too, are thought to have some effect in preventing cancer and these are found in significant quantities in fruit and vegetables.

Formerly, it was considered important to eat plenty of eggs and dairy products to remain healthy. Such foods are now known to be high in cholesterol, which can be a contributory factor in heart disease.

Fashions in healthy eating may have changed, but the message remains the same. Watch what you eat!


Which of the following sentences is incorrect in the context of the passage?



A Malnutrition is associated with shortage of food

B Malnutrition is a condition largely found in developing and urban-developed countries

C Backward methods of agriculture and over­population cannot be related to malnutrition

D Malnutrition can be linked to the lifestyle in developed countries

Ans. C

Practice Test-3 Flashcard List

80 flashcards
1)
निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।  थाईलैण्ड व कम्बोडिया के बीच अपनी साझा सीमा पर स्थित लगभग नौ सौ वर्ष पुराने एक हिन्दू मंदिर को लेकर एक बार पुनः तनाव की स्थिति आ बनी है। 4 फरवरी, 2011 को इस ऐतिहासिक मंदिर को लेकर दोनों देशों के सैनिकों में एक बार पुनः टकराव हो गया। कई घण्टे तक चले इस संघर्ष में दो कम्बोडियाई सैनिक मारे गए। प्रिया विहार नाम के इस शिव मंदिर पर दोनों ही देश दावा करते हैं तथा इसे लेकर दोनों देशों के बीच कई टकराव हो चुके हैं। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय ने1962 में इस मंदिर पर कम्बोडिया के दावे को सही ठहराया था, किन्तु उसके आसपास के क्षेत्र को लेकर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है। यूनेस्को ने वर्ष 2008 में इस मंदिर को विश्व विरासत घोषित किया था। मंदिर पर स्वामित्व का यह विवाद उस समय और गहरा गया जब कम्बोडिया ने इस मामले के समाधान के लिए होने वाली संयुक्त सीमा आयोग की बैठक में शामिल होने से इंकार कर दिया। कम्बोडिया ने इस मामले में थाईलैण्ड द्वारा आक्रामक रुख अपनाए जाने को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् अथवा किसी अन्य तीसरे पक्ष के समक्ष प्रस्तुत करने की बात कही है। थाईलैण्ड व कम्बोडिया की साझा सीमा पर स्थित हिन्दू मंदिर किस नाम से जाना जाता है? A प्रिया विहार B अनुकम्पा टेम्पल C शांति कुंज D बैकुण्ठ धाम
2)
निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।  थाईलैण्ड व कम्बोडिया के बीच अपनी साझा सीमा पर स्थित लगभग नौ सौ वर्ष पुराने एक हिन्दू मंदिर को लेकर एक बार पुनः तनाव की स्थिति आ बनी है। 4 फरवरी, 2011 को इस ऐतिहासिक मंदिर को लेकर दोनों देशों के सैनिकों में एक बार पुनः टकराव हो गया। कई घण्टे तक चले इस संघर्ष में दो कम्बोडियाई सैनिक मारे गए। प्रिया विहार नाम के इस शिव मंदिर पर दोनों ही देश दावा करते हैं तथा इसे लेकर दोनों देशों के बीच कई टकराव हो चुके हैं। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय ने1962 में इस मंदिर पर कम्बोडिया के दावे को सही ठहराया था, किन्तु उसके आसपास के क्षेत्र को लेकर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है। यूनेस्को ने वर्ष 2008 में इस मंदिर को विश्व विरासत घोषित किया था। मंदिर पर स्वामित्व का यह विवाद उस समय और गहरा गया जब कम्बोडिया ने इस मामले के समाधान के लिए होने वाली संयुक्त सीमा आयोग की बैठक में शामिल होने से इंकार कर दिया। कम्बोडिया ने इस मामले में थाईलैण्ड द्वारा आक्रामक रुख अपनाए जाने को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् अथवा किसी अन्य तीसरे पक्ष के समक्ष प्रस्तुत करने की बात कही है। प्रिया विहार क्या है? A थाईलैण्ड एवं कम्बोडिया की सीमा B नौका स्थल C शिव मंदिर D बौद्ध मंदिर
3)
निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।  थाईलैण्ड व कम्बोडिया के बीच अपनी साझा सीमा पर स्थित लगभग नौ सौ वर्ष पुराने एक हिन्दू मंदिर को लेकर एक बार पुनः तनाव की स्थिति आ बनी है। 4 फरवरी, 2011 को इस ऐतिहासिक मंदिर को लेकर दोनों देशों के सैनिकों में एक बार पुनः टकराव हो गया। कई घण्टे तक चले इस संघर्ष में दो कम्बोडियाई सैनिक मारे गए। प्रिया विहार नाम के इस शिव मंदिर पर दोनों ही देश दावा करते हैं तथा इसे लेकर दोनों देशों के बीच कई टकराव हो चुके हैं। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय ने1962 में इस मंदिर पर कम्बोडिया के दावे को सही ठहराया था, किन्तु उसके आसपास के क्षेत्र को लेकर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है। यूनेस्को ने वर्ष 2008 में इस मंदिर को विश्व विरासत घोषित किया था। मंदिर पर स्वामित्व का यह विवाद उस समय और गहरा गया जब कम्बोडिया ने इस मामले के समाधान के लिए होने वाली संयुक्त सीमा आयोग की बैठक में शामिल होने से इंकार कर दिया। कम्बोडिया ने इस मामले में थाईलैण्ड द्वारा आक्रामक रुख अपनाए जाने को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् अथवा किसी अन्य तीसरे पक्ष के समक्ष प्रस्तुत करने की बात कही है। थाईलैण्ड एवं कम्बोडिया के बीच मंदिर को लेकर विवाद का मुख्य कारण क्या है? A मंदिर में पुजारी रखने का मामला B मंदिर स्थित ट्रस्ट की अकूत संपदा C मंदिर प्रबंधन तंत्र में अपनी-अपनी भागीदारी D मंदिर पर दोनों देशों की स्वामित्व संबंधी दावेदारी
4)
निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।  थाईलैण्ड व कम्बोडिया के बीच अपनी साझा सीमा पर स्थित लगभग नौ सौ वर्ष पुराने एक हिन्दू मंदिर को लेकर एक बार पुनः तनाव की स्थिति आ बनी है। 4 फरवरी, 2011 को इस ऐतिहासिक मंदिर को लेकर दोनों देशों के सैनिकों में एक बार पुनः टकराव हो गया। कई घण्टे तक चले इस संघर्ष में दो कम्बोडियाई सैनिक मारे गए। प्रिया विहार नाम के इस शिव मंदिर पर दोनों ही देश दावा करते हैं तथा इसे लेकर दोनों देशों के बीच कई टकराव हो चुके हैं। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय ने1962 में इस मंदिर पर कम्बोडिया के दावे को सही ठहराया था, किन्तु उसके आसपास के क्षेत्र को लेकर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है। यूनेस्को ने वर्ष 2008 में इस मंदिर को विश्व विरासत घोषित किया था। मंदिर पर स्वामित्व का यह विवाद उस समय और गहरा गया जब कम्बोडिया ने इस मामले के समाधान के लिए होने वाली संयुक्त सीमा आयोग की बैठक में शामिल होने से इंकार कर दिया। कम्बोडिया ने इस मामले में थाईलैण्ड द्वारा आक्रामक रुख अपनाए जाने को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् अथवा किसी अन्य तीसरे पक्ष के समक्ष प्रस्तुत करने की बात कही है। मंदिर विवाद का तात्कालिक कारण क्या है? A थाईलैण्ड द्वारा संयुक्त सीमा आयोग की बैठक में शामिल होने से मना कर देना B कम्बोडिया द्वारा संयुक्त सीमा आयोग की बैठक में शामिल होने से मना कर देना C दोनों देशों के बीच पारम्परिक कटुता D उपर्युक्त सभी
5)
निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।  थाईलैण्ड व कम्बोडिया के बीच अपनी साझा सीमा पर स्थित लगभग नौ सौ वर्ष पुराने एक हिन्दू मंदिर को लेकर एक बार पुनः तनाव की स्थिति आ बनी है। 4 फरवरी, 2011 को इस ऐतिहासिक मंदिर को लेकर दोनों देशों के सैनिकों में एक बार पुनः टकराव हो गया। कई घण्टे तक चले इस संघर्ष में दो कम्बोडियाई सैनिक मारे गए। प्रिया विहार नाम के इस शिव मंदिर पर दोनों ही देश दावा करते हैं तथा इसे लेकर दोनों देशों के बीच कई टकराव हो चुके हैं। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय ने1962 में इस मंदिर पर कम्बोडिया के दावे को सही ठहराया था, किन्तु उसके आसपास के क्षेत्र को लेकर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है। यूनेस्को ने वर्ष 2008 में इस मंदिर को विश्व विरासत घोषित किया था। मंदिर पर स्वामित्व का यह विवाद उस समय और गहरा गया जब कम्बोडिया ने इस मामले के समाधान के लिए होने वाली संयुक्त सीमा आयोग की बैठक में शामिल होने से इंकार कर दिया। कम्बोडिया ने इस मामले में थाईलैण्ड द्वारा आक्रामक रुख अपनाए जाने को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् अथवा किसी अन्य तीसरे पक्ष के समक्ष प्रस्तुत करने की बात कही है। 1962 में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के फैसले में मंदिर पर किसकी दावेदारी को सही ठहराया गया है? A कम्बोडिया B थाईलैण्ड C दो तिहाई कम्बोडिया और शेष थाईलैण्ड के दावे को D थाईलैण्ड एवं कम्बोडिया दोनों को।
6)
निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के विकास में, विशेषतः पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास में भागीदारी का आह्नान प्रवासी भारतीयों से किया। उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता का आभास कराते हुए बताया कि इस वित्तीय वर्ष की पिछली दो तिमाहियों में वृधि दर8-9-8-9% रही है तथा पूरे वर्ष में यह 8-5%  के आसपास रहने की संभावना है, जिसके बाद अगले वित्तीय वर्ष में देश में एक बार पुनः 9%  की वृद्धि प्राप्त की जा सकेगी। सम्मेलन को संबोधित करते हुए मनमोहन सिंह ने प्रवासी भारतीयों के लिए कई नई घोषणाएं की। उन्होंने भारतीय मूल के लोगों के भारत में आवागमन को और आसान बनाने के लिए ओ-सी-आई- व पी-आई-ओ- कार्डों की योजनाओं के विलय की घोषणा की। दोनों योजनाओं के एकीकरण से भारतीय मूल के लोगों को भारत में वीजा के बिना ही प्रवेश करने तथा भारत में शैक्षणिक व कारोबारी गतिविधियों में भाग लेने की सुविधा आसानी से उपलब्ध हो सकेगी। भारतवंशियों अर्थात् भारतीय मूल के व्यक्तियों अर्थात् ऐसे भारतीय जिनके पूर्वज जो सदियों पहले देश छोड़कर स्थायी तौर पर अन्य देश में बस गए थे, को भारत की यात्र करने और भारत में निवेश के लिए प्रोत्साहित करने के लिए पी-आई-ओ- कार्ड शुरु किया गया था। पी-आई-ओ- कार्डधारियों को भारत की यात्र करने के लिए वीजा की आवश्यकता नहीं होती है। यह कार्ड 15 वर्षों के लिए वैध है। पी-आई-ओ- कार्डधारियों को भारत में कई आर्थिक और शैक्षणिक लाभ भी हासिल हैं। दूसरी ओर, ओ-सी-आई- कार्ड एक तरह से दोहरी नागरिकता का कार्ड है। ऐसे कार्डधारक को भारत में प्रवेश के लिए वीजा की आवश्यकता नहीं होती। कोई भी भारतीय मूल का व्यक्ति इसके लिए आवेदन कर सकता है बशर्ते जिस देश में वह रहता है वह दोहरी नागरिकता की अनुमति देता हो। विदेशों में रह रहे भारतीयों की मदद के लिए शुरु किए गए भारतीय समुदाय कल्याण कोष की सुविधा, जो वर्तमान में 42 देशों में भारतीय दूतावासों/उच्चायुक्तों में उपलब्ध है, के ऐसे सभी मिशनों में विस्तार की घोषणा प्रधानमंत्री ने की। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि विदेशों में काम करने वाले भारतीय कामगारों के हितों की सुरक्षा के लिए 12 देशों के साथ सामाजिक सुरक्षा समझौते सम्पन्न किए गए हैं तथा दो अन्य देशों के साथ ‘लेबर मोबिलिटी पार्टनरशिप’ को अन्तिम रूप दे दिया गया है। इस सम्बन्ध में यूरोपीय संघ के साथ भी एक व्यापक समझौते के लिए बातचीत प्रगति पर है।इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने अनिवासी भारतीयों (NRIs) को भारत में मताधिकार प्रदान करने के लिए बनाए गए अधिनियम को शीघ्र ही लागू करने की घोषणा भी की है।केन्द्रीय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी, विदेश मंत्री एस-एम-कृष्णा, सड़क परिवहन मंत्री कमलनाथ, स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद व योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिह अहलूवालिया भी सम्मेलन को संबोघित करने वालों में शामिल थे। गुजरात, बिहार, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व गोवा आदि के मुख्यमंत्रियों/उपमुख्यमंत्रियों ने 9 जनवरी को सम्मेलन को संबोधित कर अपने-अपने राज्यों में निवेश के अनुकूल माहौल का उल्लेख करते हुए निवेश की अपील विदेशों में बसे भारतवंशियों से की। 9 जनवरी को ही राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने इस सम्मेलन के समापन समारोह को सम्बोधित करते हुए कहा कि आधारिक संरचना के किसी भी क्षेत्र में भारतवंशियों के योगदान का देश में स्वागत किया जाएगा। विश्व के विभिन्न भागों में रहते हुए अपने उत्कृष्ट कार्यों से प्रतिष्ठा अर्जित करने वाले 14 भारतवंशियों को प्रवासी भारतीय सम्मान से सम्मानित किया। सम्मानित किए जाने वालों में न्यूजीलैण्ड के गवर्नर जनरल आनंद सत्यानंद, जो इस सम्मेलन में मुख्य अतिथि थे, भी शामिल थे। इनके अतिरिक्त श्रीलंका के उद्योगपति मानो सेल्वनाथन को भी यह सम्मान राष्ट्रपति ने प्रदान किया। आगामी 10वें प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन का आयोजन 7-9 जनवरी2012 को जयपुर में किया जाएगा। प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से किसके विकास के लिए प्रवासी भारतीयों का आह्नान किया है? A दक्षिणांचल B वनांचल C पूर्वोत्तर D जम्मू-कश्मीर
7)
निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के विकास में, विशेषतः पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास में भागीदारी का आह्नान प्रवासी भारतीयों से किया। उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता का आभास कराते हुए बताया कि इस वित्तीय वर्ष की पिछली दो तिमाहियों में वृधि दर8-9-8-9% रही है तथा पूरे वर्ष में यह 8-5%  के आसपास रहने की संभावना है, जिसके बाद अगले वित्तीय वर्ष में देश में एक बार पुनः 9%  की वृद्धि प्राप्त की जा सकेगी। सम्मेलन को संबोधित करते हुए मनमोहन सिंह ने प्रवासी भारतीयों के लिए कई नई घोषणाएं की। उन्होंने भारतीय मूल के लोगों के भारत में आवागमन को और आसान बनाने के लिए ओ-सी-आई- व पी-आई-ओ- कार्डों की योजनाओं के विलय की घोषणा की। दोनों योजनाओं के एकीकरण से भारतीय मूल के लोगों को भारत में वीजा के बिना ही प्रवेश करने तथा भारत में शैक्षणिक व कारोबारी गतिविधियों में भाग लेने की सुविधा आसानी से उपलब्ध हो सकेगी। भारतवंशियों अर्थात् भारतीय मूल के व्यक्तियों अर्थात् ऐसे भारतीय जिनके पूर्वज जो सदियों पहले देश छोड़कर स्थायी तौर पर अन्य देश में बस गए थे, को भारत की यात्र करने और भारत में निवेश के लिए प्रोत्साहित करने के लिए पी-आई-ओ- कार्ड शुरु किया गया था। पी-आई-ओ- कार्डधारियों को भारत की यात्र करने के लिए वीजा की आवश्यकता नहीं होती है। यह कार्ड 15 वर्षों के लिए वैध है। पी-आई-ओ- कार्डधारियों को भारत में कई आर्थिक और शैक्षणिक लाभ भी हासिल हैं। दूसरी ओर, ओ-सी-आई- कार्ड एक तरह से दोहरी नागरिकता का कार्ड है। ऐसे कार्डधारक को भारत में प्रवेश के लिए वीजा की आवश्यकता नहीं होती। कोई भी भारतीय मूल का व्यक्ति इसके लिए आवेदन कर सकता है बशर्ते जिस देश में वह रहता है वह दोहरी नागरिकता की अनुमति देता हो। विदेशों में रह रहे भारतीयों की मदद के लिए शुरु किए गए भारतीय समुदाय कल्याण कोष की सुविधा, जो वर्तमान में 42 देशों में भारतीय दूतावासों/उच्चायुक्तों में उपलब्ध है, के ऐसे सभी मिशनों में विस्तार की घोषणा प्रधानमंत्री ने की। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि विदेशों में काम करने वाले भारतीय कामगारों के हितों की सुरक्षा के लिए 12 देशों के साथ सामाजिक सुरक्षा समझौते सम्पन्न किए गए हैं तथा दो अन्य देशों के साथ ‘लेबर मोबिलिटी पार्टनरशिप’ को अन्तिम रूप दे दिया गया है। इस सम्बन्ध में यूरोपीय संघ के साथ भी एक व्यापक समझौते के लिए बातचीत प्रगति पर है।इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने अनिवासी भारतीयों (NRIs) को भारत में मताधिकार प्रदान करने के लिए बनाए गए अधिनियम को शीघ्र ही लागू करने की घोषणा भी की है।केन्द्रीय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी, विदेश मंत्री एस-एम-कृष्णा, सड़क परिवहन मंत्री कमलनाथ, स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद व योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिह अहलूवालिया भी सम्मेलन को संबोघित करने वालों में शामिल थे। गुजरात, बिहार, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व गोवा आदि के मुख्यमंत्रियों/उपमुख्यमंत्रियों ने 9 जनवरी को सम्मेलन को संबोधित कर अपने-अपने राज्यों में निवेश के अनुकूल माहौल का उल्लेख करते हुए निवेश की अपील विदेशों में बसे भारतवंशियों से की। 9 जनवरी को ही राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने इस सम्मेलन के समापन समारोह को सम्बोधित करते हुए कहा कि आधारिक संरचना के किसी भी क्षेत्र में भारतवंशियों के योगदान का देश में स्वागत किया जाएगा। विश्व के विभिन्न भागों में रहते हुए अपने उत्कृष्ट कार्यों से प्रतिष्ठा अर्जित करने वाले 14 भारतवंशियों को प्रवासी भारतीय सम्मान से सम्मानित किया। सम्मानित किए जाने वालों में न्यूजीलैण्ड के गवर्नर जनरल आनंद सत्यानंद, जो इस सम्मेलन में मुख्य अतिथि थे, भी शामिल थे। इनके अतिरिक्त श्रीलंका के उद्योगपति मानो सेल्वनाथन को भी यह सम्मान राष्ट्रपति ने प्रदान किया। आगामी 10वें प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन का आयोजन 7-9 जनवरी2012 को जयपुर में किया जाएगा। निम्नलिखित में से किस कार्ड का संबंध दोहरी नागरिकता से है? A पी-सी-आई- B जी-सी-आई- C पी-ओ-आई- D ओ-सी-आई-
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के विकास में, विशेषतः पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास में भागीदारी का आह्नान प्रवासी भारतीयों से किया। उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता का आभास कराते हुए बताया कि इस वित्तीय वर्ष की पिछली दो तिमाहियों में वृधि दर8-9-8-9% रही है तथा पूरे वर्ष में यह 8-5%  के आसपास रहने की संभावना है, जिसके बाद अगले वित्तीय वर्ष में देश में एक बार पुनः 9%  की वृद्धि प्राप्त की जा सकेगी। सम्मेलन को संबोधित करते हुए मनमोहन सिंह ने प्रवासी भारतीयों के लिए कई नई घोषणाएं की। उन्होंने भारतीय मूल के लोगों के भारत में आवागमन को और आसान बनाने के लिए ओ-सी-आई- व पी-आई-ओ- कार्डों की योजनाओं के विलय की घोषणा की। दोनों योजनाओं के एकीकरण से भारतीय मूल के लोगों को भारत में वीजा के बिना ही प्रवेश करने तथा भारत में शैक्षणिक व कारोबारी गतिविधियों में भाग लेने की सुविधा आसानी से उपलब्ध हो सकेगी। भारतवंशियों अर्थात् भारतीय मूल के व्यक्तियों अर्थात् ऐसे भारतीय जिनके पूर्वज जो सदियों पहले देश छोड़कर स्थायी तौर पर अन्य देश में बस गए थे, को भारत की यात्र करने और भारत में निवेश के लिए प्रोत्साहित करने के लिए पी-आई-ओ- कार्ड शुरु किया गया था। पी-आई-ओ- कार्डधारियों को भारत की यात्र करने के लिए वीजा की आवश्यकता नहीं होती है। यह कार्ड 15 वर्षों के लिए वैध है। पी-आई-ओ- कार्डधारियों को भारत में कई आर्थिक और शैक्षणिक लाभ भी हासिल हैं। दूसरी ओर, ओ-सी-आई- कार्ड एक तरह से दोहरी नागरिकता का कार्ड है। ऐसे कार्डधारक को भारत में प्रवेश के लिए वीजा की आवश्यकता नहीं होती। कोई भी भारतीय मूल का व्यक्ति इसके लिए आवेदन कर सकता है बशर्ते जिस देश में वह रहता है वह दोहरी नागरिकता की अनुमति देता हो। विदेशों में रह रहे भारतीयों की मदद के लिए शुरु किए गए भारतीय समुदाय कल्याण कोष की सुविधा, जो वर्तमान में 42 देशों में भारतीय दूतावासों/उच्चायुक्तों में उपलब्ध है, के ऐसे सभी मिशनों में विस्तार की घोषणा प्रधानमंत्री ने की। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि विदेशों में काम करने वाले भारतीय कामगारों के हितों की सुरक्षा के लिए 12 देशों के साथ सामाजिक सुरक्षा समझौते सम्पन्न किए गए हैं तथा दो अन्य देशों के साथ ‘लेबर मोबिलिटी पार्टनरशिप’ को अन्तिम रूप दे दिया गया है। इस सम्बन्ध में यूरोपीय संघ के साथ भी एक व्यापक समझौते के लिए बातचीत प्रगति पर है।इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने अनिवासी भारतीयों (NRIs) को भारत में मताधिकार प्रदान करने के लिए बनाए गए अधिनियम को शीघ्र ही लागू करने की घोषणा भी की है।केन्द्रीय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी, विदेश मंत्री एस-एम-कृष्णा, सड़क परिवहन मंत्री कमलनाथ, स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद व योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिह अहलूवालिया भी सम्मेलन को संबोघित करने वालों में शामिल थे। गुजरात, बिहार, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व गोवा आदि के मुख्यमंत्रियों/उपमुख्यमंत्रियों ने 9 जनवरी को सम्मेलन को संबोधित कर अपने-अपने राज्यों में निवेश के अनुकूल माहौल का उल्लेख करते हुए निवेश की अपील विदेशों में बसे भारतवंशियों से की। 9 जनवरी को ही राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने इस सम्मेलन के समापन समारोह को सम्बोधित करते हुए कहा कि आधारिक संरचना के किसी भी क्षेत्र में भारतवंशियों के योगदान का देश में स्वागत किया जाएगा। विश्व के विभिन्न भागों में रहते हुए अपने उत्कृष्ट कार्यों से प्रतिष्ठा अर्जित करने वाले 14 भारतवंशियों को प्रवासी भारतीय सम्मान से सम्मानित किया। सम्मानित किए जाने वालों में न्यूजीलैण्ड के गवर्नर जनरल आनंद सत्यानंद, जो इस सम्मेलन में मुख्य अतिथि थे, भी शामिल थे। इनके अतिरिक्त श्रीलंका के उद्योगपति मानो सेल्वनाथन को भी यह सम्मान राष्ट्रपति ने प्रदान किया। आगामी 10वें प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन का आयोजन 7-9 जनवरी2012 को जयपुर में किया जाएगा। निम्नलिखित में से किन योजनाओं के विलय से प्रवासी भारतीयों को भारत में शैक्षणिक एवं व्यापारिक गतिविधियों को संचालित करने की छूट मिल जाएगी? A पी-ओ-आई- व ओ-सी-आई- B पी-ओ-आई- C ओ-सी-आई- D उपर्युक्त कोई नहीं
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के विकास में, विशेषतः पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास में भागीदारी का आह्नान प्रवासी भारतीयों से किया। उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता का आभास कराते हुए बताया कि इस वित्तीय वर्ष की पिछली दो तिमाहियों में वृधि दर8-9-8-9% रही है तथा पूरे वर्ष में यह 8-5%  के आसपास रहने की संभावना है, जिसके बाद अगले वित्तीय वर्ष में देश में एक बार पुनः 9%  की वृद्धि प्राप्त की जा सकेगी। सम्मेलन को संबोधित करते हुए मनमोहन सिंह ने प्रवासी भारतीयों के लिए कई नई घोषणाएं की। उन्होंने भारतीय मूल के लोगों के भारत में आवागमन को और आसान बनाने के लिए ओ-सी-आई- व पी-आई-ओ- कार्डों की योजनाओं के विलय की घोषणा की। दोनों योजनाओं के एकीकरण से भारतीय मूल के लोगों को भारत में वीजा के बिना ही प्रवेश करने तथा भारत में शैक्षणिक व कारोबारी गतिविधियों में भाग लेने की सुविधा आसानी से उपलब्ध हो सकेगी। भारतवंशियों अर्थात् भारतीय मूल के व्यक्तियों अर्थात् ऐसे भारतीय जिनके पूर्वज जो सदियों पहले देश छोड़कर स्थायी तौर पर अन्य देश में बस गए थे, को भारत की यात्र करने और भारत में निवेश के लिए प्रोत्साहित करने के लिए पी-आई-ओ- कार्ड शुरु किया गया था। पी-आई-ओ- कार्डधारियों को भारत की यात्र करने के लिए वीजा की आवश्यकता नहीं होती है। यह कार्ड 15 वर्षों के लिए वैध है। पी-आई-ओ- कार्डधारियों को भारत में कई आर्थिक और शैक्षणिक लाभ भी हासिल हैं। दूसरी ओर, ओ-सी-आई- कार्ड एक तरह से दोहरी नागरिकता का कार्ड है। ऐसे कार्डधारक को भारत में प्रवेश के लिए वीजा की आवश्यकता नहीं होती। कोई भी भारतीय मूल का व्यक्ति इसके लिए आवेदन कर सकता है बशर्ते जिस देश में वह रहता है वह दोहरी नागरिकता की अनुमति देता हो। विदेशों में रह रहे भारतीयों की मदद के लिए शुरु किए गए भारतीय समुदाय कल्याण कोष की सुविधा, जो वर्तमान में 42 देशों में भारतीय दूतावासों/उच्चायुक्तों में उपलब्ध है, के ऐसे सभी मिशनों में विस्तार की घोषणा प्रधानमंत्री ने की। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि विदेशों में काम करने वाले भारतीय कामगारों के हितों की सुरक्षा के लिए 12 देशों के साथ सामाजिक सुरक्षा समझौते सम्पन्न किए गए हैं तथा दो अन्य देशों के साथ ‘लेबर मोबिलिटी पार्टनरशिप’ को अन्तिम रूप दे दिया गया है। इस सम्बन्ध में यूरोपीय संघ के साथ भी एक व्यापक समझौते के लिए बातचीत प्रगति पर है।इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने अनिवासी भारतीयों (NRIs) को भारत में मताधिकार प्रदान करने के लिए बनाए गए अधिनियम को शीघ्र ही लागू करने की घोषणा भी की है।केन्द्रीय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी, विदेश मंत्री एस-एम-कृष्णा, सड़क परिवहन मंत्री कमलनाथ, स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद व योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिह अहलूवालिया भी सम्मेलन को संबोघित करने वालों में शामिल थे। गुजरात, बिहार, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व गोवा आदि के मुख्यमंत्रियों/उपमुख्यमंत्रियों ने 9 जनवरी को सम्मेलन को संबोधित कर अपने-अपने राज्यों में निवेश के अनुकूल माहौल का उल्लेख करते हुए निवेश की अपील विदेशों में बसे भारतवंशियों से की। 9 जनवरी को ही राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने इस सम्मेलन के समापन समारोह को सम्बोधित करते हुए कहा कि आधारिक संरचना के किसी भी क्षेत्र में भारतवंशियों के योगदान का देश में स्वागत किया जाएगा। विश्व के विभिन्न भागों में रहते हुए अपने उत्कृष्ट कार्यों से प्रतिष्ठा अर्जित करने वाले 14 भारतवंशियों को प्रवासी भारतीय सम्मान से सम्मानित किया। सम्मानित किए जाने वालों में न्यूजीलैण्ड के गवर्नर जनरल आनंद सत्यानंद, जो इस सम्मेलन में मुख्य अतिथि थे, भी शामिल थे। इनके अतिरिक्त श्रीलंका के उद्योगपति मानो सेल्वनाथन को भी यह सम्मान राष्ट्रपति ने प्रदान किया। आगामी 10वें प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन का आयोजन 7-9 जनवरी2012 को जयपुर में किया जाएगा। निम्नलिखित में से कौन प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन के मुख्य अतिथि थे? A राजीव शाह B आनंद सत्यानंद C मानो सेल्वनाथन D हरिंदर पाल सिंह बंगा
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।आन्ध्र प्रदेश का विघटन कर पृथक तेलंगाना राज्य के गठन की मांग के सम्बंध में विभिन्न पहलुओं पर विचार कर सुझाव देने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा गठित श्रीकृष्णा समिति की रिपोर्ट 6 जनवरी, 2011 को उस समय सार्वजनिक की गई, जब गृहमंत्री पी- चिदम्बरम् ने इसकी प्रतियां आंध्र प्रदेश के राजनीतिक दलों को सौंप दी। दो खण्डों में 450 से अधिक पृष्ठों वाली इस रिपोर्ट में समिति द्वारा विभिन्न विकल्प सुझाए गए हैं, समिति ने इनमें से पहले तीन विकल्पों को स्वयं ही अव्यावहारिक बताया है। समिति ने अपनी इस रिपोर्ट में सभी विकल्पों के घनात्मक व ऋणात्मक पहलू भी सुझाए हैं। रिपोर्ट में प्रस्तुत पहला विकल्प यथास्थिति बनाए रखने का है। समिति के सदस्यों ने इसे अव्यावहारिक बताते हुए इसका अधिक समर्थन नहीं किया है। दूसरा विकल्प आन्ध्र प्रदेश का दो राज्यों-सीमांध्र व तेलंगाना में विभाजन कर हैदराबाद को संघ शासित क्षेत्र बनाने का है। इस विकल्प में दोनों प्रस्तावित राज्यों द्वारा अपनी-अपनी अलग राजधानियां बनानी होंगी। इस विकल्प को भी समिति ने अधिक व्यावहारिक नहीं बताया है। तीसरे विकल्प में सीमांध्र व तेलंगाना में आन्ध्र प्रदेश के विघटन व साथ ही एक वृहत्तर हैदराबाद, जिसकी सीमाएं आन्ध प्रदेश के तीनों क्षेत्रें-तेलंगाना, रायल सीमा व तटीय आन्ध्र से लगी हों, को संघ शासित क्षेत्र बनाया जाए। समिति की राय में यह विकल्प जनता को अस्वीकार्य हो सकता है। चौथे विकल्प में राज्य को रायल तेलंगाना, जिसमें तेलंगाना व रायल सीमा क्षेत्र शामिल रहें व तटीय आन्ध्र में विभाजित कर हैदराबाद को रायल तेलंगाना की राजधानी बनाने का सुझाव है। इस विकल्प पर राजनीतिक आम सहमति की सम्भावना मुश्किल है। पांचवां विकल्प, जिसे दूसरा सर्वश्रेष्ठ विकल्प समिति ने बताया है, के तहत् राज्य का विभाजन तेलंगाना व सीमांध्र, जिसमें रायल सीमा व तटीय आन्ध्र क्षेत्र शामिल होगा, में कर हैदराबाद को तेलंगाना की राजधानी बनाने का सुझाव दिया गया है (इसके लिए ही तेलंगाना समर्थक दल तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) व तेलुगूदेशम पार्टी (TDP) आदि आन्दोलनरत् रहे हैं)। इस स्थिति में सीमांध्र को अपनी नई राजधानी बनानी होगी। छठे विकल्प, जिसे समिति ने सर्वश्रेष्ठ व सर्वाधिक व्यावहारिक विकल्प बताया है, के तहत् आंध्र प्रदेश को एकीकृत बनाए रखते हुए तेलंगाना के सामाजिक-आर्थिक विकास व राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए पृथक संवैधानिक तेलंगाना क्षेत्रीय परिषद् के गठन का सुझाव समिति ने दिया है। ध्यातव्य है कि आन्ध्र प्रदेश का विघटन कर पृथक तेलंगाना राज्य के गठन की मांग के सम्बन्ध में विभिन्न पक्षों से बातचीत कर विभिन्न पहलुओं पर विचार कर सुझाव देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय बी-एन- श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति का गठन केन्द्र सरकार ने 3 फरवरी, 2010 को किया था। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट की प्रतियां राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को सौंपते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री पी- चिदम्बरम ने कहा है कि इस मामले में एक ऐसा उचित, सम्मानजनक व व्यवहार्य हल सरकार निकालना चाहती है, जिसे सभी पक्षों का समर्थन हासिल हो। उधर तेलंगाना राष्ट्र समिति व तेलुगूदेशम पार्टी ने एक बार पुनः दोहराया है कि पृथक तेलंगाना राज्य के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प उन्हें स्वीकार्य नहीं होगा। श्रीकृष्णा समिति का गठन किस संदर्भ में किया गया? A नये राज्यों के गठन संबंधी सुझाव के लिए B राज्यों की सीमा विवाद का हल निकालने के लिए C राज्यों के बीच अच्छे संबंधों के निर्माण के लिए D आंध्र प्रदेश का विघटन कर तेलंगाना का निर्माण के लिए
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।आन्ध्र प्रदेश का विघटन कर पृथक तेलंगाना राज्य के गठन की मांग के सम्बंध में विभिन्न पहलुओं पर विचार कर सुझाव देने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा गठित श्रीकृष्णा समिति की रिपोर्ट 6 जनवरी, 2011 को उस समय सार्वजनिक की गई, जब गृहमंत्री पी- चिदम्बरम् ने इसकी प्रतियां आंध्र प्रदेश के राजनीतिक दलों को सौंप दी। दो खण्डों में 450 से अधिक पृष्ठों वाली इस रिपोर्ट में समिति द्वारा विभिन्न विकल्प सुझाए गए हैं, समिति ने इनमें से पहले तीन विकल्पों को स्वयं ही अव्यावहारिक बताया है। समिति ने अपनी इस रिपोर्ट में सभी विकल्पों के घनात्मक व ऋणात्मक पहलू भी सुझाए हैं। रिपोर्ट में प्रस्तुत पहला विकल्प यथास्थिति बनाए रखने का है। समिति के सदस्यों ने इसे अव्यावहारिक बताते हुए इसका अधिक समर्थन नहीं किया है। दूसरा विकल्प आन्ध्र प्रदेश का दो राज्यों-सीमांध्र व तेलंगाना में विभाजन कर हैदराबाद को संघ शासित क्षेत्र बनाने का है। इस विकल्प में दोनों प्रस्तावित राज्यों द्वारा अपनी-अपनी अलग राजधानियां बनानी होंगी। इस विकल्प को भी समिति ने अधिक व्यावहारिक नहीं बताया है। तीसरे विकल्प में सीमांध्र व तेलंगाना में आन्ध्र प्रदेश के विघटन व साथ ही एक वृहत्तर हैदराबाद, जिसकी सीमाएं आन्ध प्रदेश के तीनों क्षेत्रें-तेलंगाना, रायल सीमा व तटीय आन्ध्र से लगी हों, को संघ शासित क्षेत्र बनाया जाए। समिति की राय में यह विकल्प जनता को अस्वीकार्य हो सकता है। चौथे विकल्प में राज्य को रायल तेलंगाना, जिसमें तेलंगाना व रायल सीमा क्षेत्र शामिल रहें व तटीय आन्ध्र में विभाजित कर हैदराबाद को रायल तेलंगाना की राजधानी बनाने का सुझाव है। इस विकल्प पर राजनीतिक आम सहमति की सम्भावना मुश्किल है। पांचवां विकल्प, जिसे दूसरा सर्वश्रेष्ठ विकल्प समिति ने बताया है, के तहत् राज्य का विभाजन तेलंगाना व सीमांध्र, जिसमें रायल सीमा व तटीय आन्ध्र क्षेत्र शामिल होगा, में कर हैदराबाद को तेलंगाना की राजधानी बनाने का सुझाव दिया गया है (इसके लिए ही तेलंगाना समर्थक दल तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) व तेलुगूदेशम पार्टी (TDP) आदि आन्दोलनरत् रहे हैं)। इस स्थिति में सीमांध्र को अपनी नई राजधानी बनानी होगी। छठे विकल्प, जिसे समिति ने सर्वश्रेष्ठ व सर्वाधिक व्यावहारिक विकल्प बताया है, के तहत् आंध्र प्रदेश को एकीकृत बनाए रखते हुए तेलंगाना के सामाजिक-आर्थिक विकास व राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए पृथक संवैधानिक तेलंगाना क्षेत्रीय परिषद् के गठन का सुझाव समिति ने दिया है। ध्यातव्य है कि आन्ध्र प्रदेश का विघटन कर पृथक तेलंगाना राज्य के गठन की मांग के सम्बन्ध में विभिन्न पक्षों से बातचीत कर विभिन्न पहलुओं पर विचार कर सुझाव देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय बी-एन- श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति का गठन केन्द्र सरकार ने 3 फरवरी, 2010 को किया था। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट की प्रतियां राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को सौंपते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री पी- चिदम्बरम ने कहा है कि इस मामले में एक ऐसा उचित, सम्मानजनक व व्यवहार्य हल सरकार निकालना चाहती है, जिसे सभी पक्षों का समर्थन हासिल हो। उधर तेलंगाना राष्ट्र समिति व तेलुगूदेशम पार्टी ने एक बार पुनः दोहराया है कि पृथक तेलंगाना राज्य के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प उन्हें स्वीकार्य नहीं होगा। श्रीकृष्णा समिति ने अपनी रिपोर्ट में सरकार के सामने कितने विकल्पों का उल्लेख किया है? A 6 B 4 C 12 D 8
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।आन्ध्र प्रदेश का विघटन कर पृथक तेलंगाना राज्य के गठन की मांग के सम्बंध में विभिन्न पहलुओं पर विचार कर सुझाव देने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा गठित श्रीकृष्णा समिति की रिपोर्ट 6 जनवरी, 2011 को उस समय सार्वजनिक की गई, जब गृहमंत्री पी- चिदम्बरम् ने इसकी प्रतियां आंध्र प्रदेश के राजनीतिक दलों को सौंप दी। दो खण्डों में 450 से अधिक पृष्ठों वाली इस रिपोर्ट में समिति द्वारा विभिन्न विकल्प सुझाए गए हैं, समिति ने इनमें से पहले तीन विकल्पों को स्वयं ही अव्यावहारिक बताया है। समिति ने अपनी इस रिपोर्ट में सभी विकल्पों के घनात्मक व ऋणात्मक पहलू भी सुझाए हैं। रिपोर्ट में प्रस्तुत पहला विकल्प यथास्थिति बनाए रखने का है। समिति के सदस्यों ने इसे अव्यावहारिक बताते हुए इसका अधिक समर्थन नहीं किया है। दूसरा विकल्प आन्ध्र प्रदेश का दो राज्यों-सीमांध्र व तेलंगाना में विभाजन कर हैदराबाद को संघ शासित क्षेत्र बनाने का है। इस विकल्प में दोनों प्रस्तावित राज्यों द्वारा अपनी-अपनी अलग राजधानियां बनानी होंगी। इस विकल्प को भी समिति ने अधिक व्यावहारिक नहीं बताया है। तीसरे विकल्प में सीमांध्र व तेलंगाना में आन्ध्र प्रदेश के विघटन व साथ ही एक वृहत्तर हैदराबाद, जिसकी सीमाएं आन्ध प्रदेश के तीनों क्षेत्रें-तेलंगाना, रायल सीमा व तटीय आन्ध्र से लगी हों, को संघ शासित क्षेत्र बनाया जाए। समिति की राय में यह विकल्प जनता को अस्वीकार्य हो सकता है। चौथे विकल्प में राज्य को रायल तेलंगाना, जिसमें तेलंगाना व रायल सीमा क्षेत्र शामिल रहें व तटीय आन्ध्र में विभाजित कर हैदराबाद को रायल तेलंगाना की राजधानी बनाने का सुझाव है। इस विकल्प पर राजनीतिक आम सहमति की सम्भावना मुश्किल है। पांचवां विकल्प, जिसे दूसरा सर्वश्रेष्ठ विकल्प समिति ने बताया है, के तहत् राज्य का विभाजन तेलंगाना व सीमांध्र, जिसमें रायल सीमा व तटीय आन्ध्र क्षेत्र शामिल होगा, में कर हैदराबाद को तेलंगाना की राजधानी बनाने का सुझाव दिया गया है (इसके लिए ही तेलंगाना समर्थक दल तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) व तेलुगूदेशम पार्टी (TDP) आदि आन्दोलनरत् रहे हैं)। इस स्थिति में सीमांध्र को अपनी नई राजधानी बनानी होगी। छठे विकल्प, जिसे समिति ने सर्वश्रेष्ठ व सर्वाधिक व्यावहारिक विकल्प बताया है, के तहत् आंध्र प्रदेश को एकीकृत बनाए रखते हुए तेलंगाना के सामाजिक-आर्थिक विकास व राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए पृथक संवैधानिक तेलंगाना क्षेत्रीय परिषद् के गठन का सुझाव समिति ने दिया है। ध्यातव्य है कि आन्ध्र प्रदेश का विघटन कर पृथक तेलंगाना राज्य के गठन की मांग के सम्बन्ध में विभिन्न पक्षों से बातचीत कर विभिन्न पहलुओं पर विचार कर सुझाव देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय बी-एन- श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति का गठन केन्द्र सरकार ने 3 फरवरी, 2010 को किया था। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट की प्रतियां राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को सौंपते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री पी- चिदम्बरम ने कहा है कि इस मामले में एक ऐसा उचित, सम्मानजनक व व्यवहार्य हल सरकार निकालना चाहती है, जिसे सभी पक्षों का समर्थन हासिल हो। उधर तेलंगाना राष्ट्र समिति व तेलुगूदेशम पार्टी ने एक बार पुनः दोहराया है कि पृथक तेलंगाना राज्य के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प उन्हें स्वीकार्य नहीं होगा। श्रीकृष्णा समिति ने अपने किस/किन सिफारिश/सिफारिशों को स्वयं ही अव्यावहारिक करार किया है? A आंध्र प्रदेश का सीमांध्र एवं तेलंगाना में विभाजन करना B आंध्र प्रदेश में यथास्थिति बनाये रखना C वृहत्तर हैदराबाद का निर्माण करना D उपर्युक्त सभी
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।आन्ध्र प्रदेश का विघटन कर पृथक तेलंगाना राज्य के गठन की मांग के सम्बंध में विभिन्न पहलुओं पर विचार कर सुझाव देने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा गठित श्रीकृष्णा समिति की रिपोर्ट 6 जनवरी, 2011 को उस समय सार्वजनिक की गई, जब गृहमंत्री पी- चिदम्बरम् ने इसकी प्रतियां आंध्र प्रदेश के राजनीतिक दलों को सौंप दी। दो खण्डों में 450 से अधिक पृष्ठों वाली इस रिपोर्ट में समिति द्वारा विभिन्न विकल्प सुझाए गए हैं, समिति ने इनमें से पहले तीन विकल्पों को स्वयं ही अव्यावहारिक बताया है। समिति ने अपनी इस रिपोर्ट में सभी विकल्पों के घनात्मक व ऋणात्मक पहलू भी सुझाए हैं। रिपोर्ट में प्रस्तुत पहला विकल्प यथास्थिति बनाए रखने का है। समिति के सदस्यों ने इसे अव्यावहारिक बताते हुए इसका अधिक समर्थन नहीं किया है। दूसरा विकल्प आन्ध्र प्रदेश का दो राज्यों-सीमांध्र व तेलंगाना में विभाजन कर हैदराबाद को संघ शासित क्षेत्र बनाने का है। इस विकल्प में दोनों प्रस्तावित राज्यों द्वारा अपनी-अपनी अलग राजधानियां बनानी होंगी। इस विकल्प को भी समिति ने अधिक व्यावहारिक नहीं बताया है। तीसरे विकल्प में सीमांध्र व तेलंगाना में आन्ध्र प्रदेश के विघटन व साथ ही एक वृहत्तर हैदराबाद, जिसकी सीमाएं आन्ध प्रदेश के तीनों क्षेत्रें-तेलंगाना, रायल सीमा व तटीय आन्ध्र से लगी हों, को संघ शासित क्षेत्र बनाया जाए। समिति की राय में यह विकल्प जनता को अस्वीकार्य हो सकता है। चौथे विकल्प में राज्य को रायल तेलंगाना, जिसमें तेलंगाना व रायल सीमा क्षेत्र शामिल रहें व तटीय आन्ध्र में विभाजित कर हैदराबाद को रायल तेलंगाना की राजधानी बनाने का सुझाव है। इस विकल्प पर राजनीतिक आम सहमति की सम्भावना मुश्किल है। पांचवां विकल्प, जिसे दूसरा सर्वश्रेष्ठ विकल्प समिति ने बताया है, के तहत् राज्य का विभाजन तेलंगाना व सीमांध्र, जिसमें रायल सीमा व तटीय आन्ध्र क्षेत्र शामिल होगा, में कर हैदराबाद को तेलंगाना की राजधानी बनाने का सुझाव दिया गया है (इसके लिए ही तेलंगाना समर्थक दल तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) व तेलुगूदेशम पार्टी (TDP) आदि आन्दोलनरत् रहे हैं)। इस स्थिति में सीमांध्र को अपनी नई राजधानी बनानी होगी। छठे विकल्प, जिसे समिति ने सर्वश्रेष्ठ व सर्वाधिक व्यावहारिक विकल्प बताया है, के तहत् आंध्र प्रदेश को एकीकृत बनाए रखते हुए तेलंगाना के सामाजिक-आर्थिक विकास व राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए पृथक संवैधानिक तेलंगाना क्षेत्रीय परिषद् के गठन का सुझाव समिति ने दिया है। ध्यातव्य है कि आन्ध्र प्रदेश का विघटन कर पृथक तेलंगाना राज्य के गठन की मांग के सम्बन्ध में विभिन्न पक्षों से बातचीत कर विभिन्न पहलुओं पर विचार कर सुझाव देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय बी-एन- श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति का गठन केन्द्र सरकार ने 3 फरवरी, 2010 को किया था। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट की प्रतियां राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को सौंपते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री पी- चिदम्बरम ने कहा है कि इस मामले में एक ऐसा उचित, सम्मानजनक व व्यवहार्य हल सरकार निकालना चाहती है, जिसे सभी पक्षों का समर्थन हासिल हो। उधर तेलंगाना राष्ट्र समिति व तेलुगूदेशम पार्टी ने एक बार पुनः दोहराया है कि पृथक तेलंगाना राज्य के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प उन्हें स्वीकार्य नहीं होगा। तेलंगाना राष्ट्र समिति और तेलुगूदेशम पार्टी की मांग के अनुरूप श्रीकृष्णा समिति की कौन-सी सिफारिश शामिल है? A वृहत्तर हैदराबाद का निर्माण B आंध्र प्रदेश का सीमांध्र और तेलंगाना में विभाजन C तेलंगाना एवं सीमांध्र में विभाजन करते हुए हैदराबाद को आंध्र प्रदेश की राजधानी बनाया जाए D रायल तेलंगाना एवं तटीय आंध्र में विभाजन किया जाए
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए।आन्ध्र प्रदेश का विघटन कर पृथक तेलंगाना राज्य के गठन की मांग के सम्बंध में विभिन्न पहलुओं पर विचार कर सुझाव देने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा गठित श्रीकृष्णा समिति की रिपोर्ट 6 जनवरी, 2011 को उस समय सार्वजनिक की गई, जब गृहमंत्री पी- चिदम्बरम् ने इसकी प्रतियां आंध्र प्रदेश के राजनीतिक दलों को सौंप दी। दो खण्डों में 450 से अधिक पृष्ठों वाली इस रिपोर्ट में समिति द्वारा विभिन्न विकल्प सुझाए गए हैं, समिति ने इनमें से पहले तीन विकल्पों को स्वयं ही अव्यावहारिक बताया है। समिति ने अपनी इस रिपोर्ट में सभी विकल्पों के घनात्मक व ऋणात्मक पहलू भी सुझाए हैं। रिपोर्ट में प्रस्तुत पहला विकल्प यथास्थिति बनाए रखने का है। समिति के सदस्यों ने इसे अव्यावहारिक बताते हुए इसका अधिक समर्थन नहीं किया है। दूसरा विकल्प आन्ध्र प्रदेश का दो राज्यों-सीमांध्र व तेलंगाना में विभाजन कर हैदराबाद को संघ शासित क्षेत्र बनाने का है। इस विकल्प में दोनों प्रस्तावित राज्यों द्वारा अपनी-अपनी अलग राजधानियां बनानी होंगी। इस विकल्प को भी समिति ने अधिक व्यावहारिक नहीं बताया है। तीसरे विकल्प में सीमांध्र व तेलंगाना में आन्ध्र प्रदेश के विघटन व साथ ही एक वृहत्तर हैदराबाद, जिसकी सीमाएं आन्ध प्रदेश के तीनों क्षेत्रें-तेलंगाना, रायल सीमा व तटीय आन्ध्र से लगी हों, को संघ शासित क्षेत्र बनाया जाए। समिति की राय में यह विकल्प जनता को अस्वीकार्य हो सकता है। चौथे विकल्प में राज्य को रायल तेलंगाना, जिसमें तेलंगाना व रायल सीमा क्षेत्र शामिल रहें व तटीय आन्ध्र में विभाजित कर हैदराबाद को रायल तेलंगाना की राजधानी बनाने का सुझाव है। इस विकल्प पर राजनीतिक आम सहमति की सम्भावना मुश्किल है। पांचवां विकल्प, जिसे दूसरा सर्वश्रेष्ठ विकल्प समिति ने बताया है, के तहत् राज्य का विभाजन तेलंगाना व सीमांध्र, जिसमें रायल सीमा व तटीय आन्ध्र क्षेत्र शामिल होगा, में कर हैदराबाद को तेलंगाना की राजधानी बनाने का सुझाव दिया गया है (इसके लिए ही तेलंगाना समर्थक दल तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) व तेलुगूदेशम पार्टी (TDP) आदि आन्दोलनरत् रहे हैं)। इस स्थिति में सीमांध्र को अपनी नई राजधानी बनानी होगी। छठे विकल्प, जिसे समिति ने सर्वश्रेष्ठ व सर्वाधिक व्यावहारिक विकल्प बताया है, के तहत् आंध्र प्रदेश को एकीकृत बनाए रखते हुए तेलंगाना के सामाजिक-आर्थिक विकास व राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए पृथक संवैधानिक तेलंगाना क्षेत्रीय परिषद् के गठन का सुझाव समिति ने दिया है। ध्यातव्य है कि आन्ध्र प्रदेश का विघटन कर पृथक तेलंगाना राज्य के गठन की मांग के सम्बन्ध में विभिन्न पक्षों से बातचीत कर विभिन्न पहलुओं पर विचार कर सुझाव देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय बी-एन- श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति का गठन केन्द्र सरकार ने 3 फरवरी, 2010 को किया था। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट की प्रतियां राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को सौंपते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री पी- चिदम्बरम ने कहा है कि इस मामले में एक ऐसा उचित, सम्मानजनक व व्यवहार्य हल सरकार निकालना चाहती है, जिसे सभी पक्षों का समर्थन हासिल हो। उधर तेलंगाना राष्ट्र समिति व तेलुगूदेशम पार्टी ने एक बार पुनः दोहराया है कि पृथक तेलंगाना राज्य के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प उन्हें स्वीकार्य नहीं होगा। श्रीकृष्णा समिति ने अपनी किस सिफारिश को सर्वश्रेष्ठ विकल्प बताया है? A यथास्थिति का गठन बनाये रखना B पृथक संवैधानिक तेलंगाना क्षेत्रीय परिषद् C वृहत्तर हैदराबाद का निर्माण D उपर्युक्त सभी
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। ग्रामीण क्षेत्र में गारंटी शुदा रोजगार उपलब्ध कराने के लिए केन्द्र सरकार के महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी अधिनियम (डछत्म्ळ।) के फरवरी, 2011 में पांच वर्ष पूरे हुए हैं। इन पांच वर्षों के दौरान इस कार्यक्रम के तहत् कुल मिलाकर 879 करोड़ मानव दिवस का रोजगार सृजित किया गया है। इसमें 410 करोड़ मानव दिवस रोजगार महिलाओं के लिए सृजित हुआ, जो कुल सृजित रोजगार का 47%  है। ग्रामीण विकास मंत्रलय की एक अधिसूचना के अनुसार कुल सृजित रोजगार में 245 करोड़ मानव दिवस (28% ) में अनुसूचित जाति के व 214 करोड़ मानव दिवस (24% ) में अनुसूचित जनजाति के लोगों की भागीदारी रही है। ग्रामीण क्षेत्रें में रोजगार मांगने वाले हर परिवार को न्यूनतम 100 दिन के रोजगार की गारंटी वाले राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम (NREGA) के तहत् 2 फरवरी, 2006 से शुरु किए गए ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम को 2006-07 के दौरान देश के चुनिंदा 200 जिलों में लागू किया गया था। 2007-08 में इसका विस्तार 130 अन्य जिलों में किया गया था, जिससे 2007-08 में यह कार्यक्रम 330 जिलों में लागू था। 1 अप्रैल, 2008 से शेष सभी जिलों में यह कार्यक्रम लागू किया गया था। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम में ही ‘काम के बदले अनाज’ व ‘सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना’ को समाहित कर दिया गया था। 2 अक्टूबर, 2009 को इस कार्यक्रम का नामकरण महात्मा गांधी के नाम पर करने की घोषणा की गई थी। तद्नुरूप संबंधित संशोधन विधेयक संसद में दिसम्बर, 2009 में पारित किया गया था। देश में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम का प्रारम्भ कब किया गया? A 2 अक्टूबर, 2006 B 2 अक्टूबर, 2008 C 2 फरवरी, 2005 D 2 फरवरी, 2006
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। ग्रामीण क्षेत्र में गारंटी शुदा रोजगार उपलब्ध कराने के लिए केन्द्र सरकार के महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी अधिनियम (डछत्म्ळ।) के फरवरी, 2011 में पांच वर्ष पूरे हुए हैं। इन पांच वर्षों के दौरान इस कार्यक्रम के तहत् कुल मिलाकर 879 करोड़ मानव दिवस का रोजगार सृजित किया गया है। इसमें 410 करोड़ मानव दिवस रोजगार महिलाओं के लिए सृजित हुआ, जो कुल सृजित रोजगार का 47%  है। ग्रामीण विकास मंत्रलय की एक अधिसूचना के अनुसार कुल सृजित रोजगार में 245 करोड़ मानव दिवस (28% ) में अनुसूचित जाति के व 214 करोड़ मानव दिवस (24% ) में अनुसूचित जनजाति के लोगों की भागीदारी रही है। ग्रामीण क्षेत्रें में रोजगार मांगने वाले हर परिवार को न्यूनतम 100 दिन के रोजगार की गारंटी वाले राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम (NREGA) के तहत् 2 फरवरी, 2006 से शुरु किए गए ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम को 2006-07 के दौरान देश के चुनिंदा 200 जिलों में लागू किया गया था। 2007-08 में इसका विस्तार 130 अन्य जिलों में किया गया था, जिससे 2007-08 में यह कार्यक्रम 330 जिलों में लागू था। 1 अप्रैल, 2008 से शेष सभी जिलों में यह कार्यक्रम लागू किया गया था। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम में ही ‘काम के बदले अनाज’ व ‘सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना’ को समाहित कर दिया गया था। 2 अक्टूबर, 2009 को इस कार्यक्रम का नामकरण महात्मा गांधी के नाम पर करने की घोषणा की गई थी। तद्नुरूप संबंधित संशोधन विधेयक संसद में दिसम्बर, 2009 में पारित किया गया था। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत ग्रामीण श्रेत्र में रोजगार मांगने वाले प्रत्येक परिवार को न्यूनतम कितने दिन के रोजगार उपलब्धता की गारंटी देने का प्रावधान है? A 100 दिन B 120 दिन C 50 दिन D 80 दिन
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। ग्रामीण क्षेत्र में गारंटी शुदा रोजगार उपलब्ध कराने के लिए केन्द्र सरकार के महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी अधिनियम (डछत्म्ळ।) के फरवरी, 2011 में पांच वर्ष पूरे हुए हैं। इन पांच वर्षों के दौरान इस कार्यक्रम के तहत् कुल मिलाकर 879 करोड़ मानव दिवस का रोजगार सृजित किया गया है। इसमें 410 करोड़ मानव दिवस रोजगार महिलाओं के लिए सृजित हुआ, जो कुल सृजित रोजगार का 47%  है। ग्रामीण विकास मंत्रलय की एक अधिसूचना के अनुसार कुल सृजित रोजगार में 245 करोड़ मानव दिवस (28% ) में अनुसूचित जाति के व 214 करोड़ मानव दिवस (24% ) में अनुसूचित जनजाति के लोगों की भागीदारी रही है। ग्रामीण क्षेत्रें में रोजगार मांगने वाले हर परिवार को न्यूनतम 100 दिन के रोजगार की गारंटी वाले राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम (NREGA) के तहत् 2 फरवरी, 2006 से शुरु किए गए ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम को 2006-07 के दौरान देश के चुनिंदा 200 जिलों में लागू किया गया था। 2007-08 में इसका विस्तार 130 अन्य जिलों में किया गया था, जिससे 2007-08 में यह कार्यक्रम 330 जिलों में लागू था। 1 अप्रैल, 2008 से शेष सभी जिलों में यह कार्यक्रम लागू किया गया था। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम में ही ‘काम के बदले अनाज’ व ‘सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना’ को समाहित कर दिया गया था। 2 अक्टूबर, 2009 को इस कार्यक्रम का नामकरण महात्मा गांधी के नाम पर करने की घोषणा की गई थी। तद्नुरूप संबंधित संशोधन विधेयक संसद में दिसम्बर, 2009 में पारित किया गया था। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत पिछले पांच वर्षों के दौरान कुल कितने मानव दिवस सृजित किये गये हैं? A 100 करोड़ B 180 करोड़ C 600 करोड़ D 879 करोड़
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। ग्रामीण क्षेत्र में गारंटी शुदा रोजगार उपलब्ध कराने के लिए केन्द्र सरकार के महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी अधिनियम (डछत्म्ळ।) के फरवरी, 2011 में पांच वर्ष पूरे हुए हैं। इन पांच वर्षों के दौरान इस कार्यक्रम के तहत् कुल मिलाकर 879 करोड़ मानव दिवस का रोजगार सृजित किया गया है। इसमें 410 करोड़ मानव दिवस रोजगार महिलाओं के लिए सृजित हुआ, जो कुल सृजित रोजगार का 47%  है। ग्रामीण विकास मंत्रलय की एक अधिसूचना के अनुसार कुल सृजित रोजगार में 245 करोड़ मानव दिवस (28% ) में अनुसूचित जाति के व 214 करोड़ मानव दिवस (24% ) में अनुसूचित जनजाति के लोगों की भागीदारी रही है। ग्रामीण क्षेत्रें में रोजगार मांगने वाले हर परिवार को न्यूनतम 100 दिन के रोजगार की गारंटी वाले राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम (NREGA) के तहत् 2 फरवरी, 2006 से शुरु किए गए ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम को 2006-07 के दौरान देश के चुनिंदा 200 जिलों में लागू किया गया था। 2007-08 में इसका विस्तार 130 अन्य जिलों में किया गया था, जिससे 2007-08 में यह कार्यक्रम 330 जिलों में लागू था। 1 अप्रैल, 2008 से शेष सभी जिलों में यह कार्यक्रम लागू किया गया था। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम में ही ‘काम के बदले अनाज’ व ‘सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना’ को समाहित कर दिया गया था। 2 अक्टूबर, 2009 को इस कार्यक्रम का नामकरण महात्मा गांधी के नाम पर करने की घोषणा की गई थी। तद्नुरूप संबंधित संशोधन विधेयक संसद में दिसम्बर, 2009 में पारित किया गया था। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का नामकरण महात्मा गांधी के नाम पर करने संबंधी घोषणा कब की गई? A 2 अक्टूबर, 2010 B 30 जनवरी, 2010 C 2 अक्टूबर, 2008 D 2 अक्टूबर, 2009
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। ग्रामीण क्षेत्र में गारंटी शुदा रोजगार उपलब्ध कराने के लिए केन्द्र सरकार के महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी अधिनियम (डछत्म्ळ।) के फरवरी, 2011 में पांच वर्ष पूरे हुए हैं। इन पांच वर्षों के दौरान इस कार्यक्रम के तहत् कुल मिलाकर 879 करोड़ मानव दिवस का रोजगार सृजित किया गया है। इसमें 410 करोड़ मानव दिवस रोजगार महिलाओं के लिए सृजित हुआ, जो कुल सृजित रोजगार का 47%  है। ग्रामीण विकास मंत्रलय की एक अधिसूचना के अनुसार कुल सृजित रोजगार में 245 करोड़ मानव दिवस (28% ) में अनुसूचित जाति के व 214 करोड़ मानव दिवस (24% ) में अनुसूचित जनजाति के लोगों की भागीदारी रही है। ग्रामीण क्षेत्रें में रोजगार मांगने वाले हर परिवार को न्यूनतम 100 दिन के रोजगार की गारंटी वाले राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम (NREGA) के तहत् 2 फरवरी, 2006 से शुरु किए गए ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम को 2006-07 के दौरान देश के चुनिंदा 200 जिलों में लागू किया गया था। 2007-08 में इसका विस्तार 130 अन्य जिलों में किया गया था, जिससे 2007-08 में यह कार्यक्रम 330 जिलों में लागू था। 1 अप्रैल, 2008 से शेष सभी जिलों में यह कार्यक्रम लागू किया गया था। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम में ही ‘काम के बदले अनाज’ व ‘सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना’ को समाहित कर दिया गया था। 2 अक्टूबर, 2009 को इस कार्यक्रम का नामकरण महात्मा गांधी के नाम पर करने की घोषणा की गई थी। तद्नुरूप संबंधित संशोधन विधेयक संसद में दिसम्बर, 2009 में पारित किया गया था। ग्रामीण क्षेत्रें में गारंटी शुदा रोजगार उपलब्ध कराने संबंधी रोजगार गारंटी योजना में किन अन्य योजनाओं का विलय किया गया है? A इंदिरा आवास योजना B संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना C काम के बदले अनाज योजना D केवल a और b
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। मानव जीवन के नाना मनोव्यापारों, आकांक्षाओं, योजनाओं, घटनाओं, क्रियाओं, प्रतिक्रियाओं का आकलन ही साहित्य का प्रयोजन है। जगत् के बहुमुखी क्रियाकलाप मानव के हृदय में जिन संवेदनाओं की सृष्टि करते हैं, उनकी अभिव्यक्ति ही साहित्य का सर्वस्व है। कुछ विद्वान साहित्य में जीवन के यथार्थ को आदर्श की भूमिका पर प्रस्तुत करने के पक्ष में हैं, जबकि इनका दूसरा वर्ग जीवन को उसके यथार्थ में देखने तथा चित्रित करने के पक्ष में है। प्रथम पक्ष के अनुसार जीवन या जगत् के वास्तविक रूप के चित्रण से साहित्य में मानव के प्रेरणा एवं प्रोत्साहन देने की क्षमता कहां से आएगी? साहित्य आदर्श के उस छोर पर पहुंचना चाहता है, जहां उसे अमरता प्राप्त हो जाए। साहित्य में मनुष्य इस जीवन या भावी जीवन में पूरी होने वाली कल्पनाएं ही नहीं करता, बल्कि ऐसी कामनाएं भी करता है, जो अनन्त जन्मों में भी पूरी नहीं हो सकतीं। यह गुण केवल साहित्य में ही है। साहित्य एक नई सृष्टि, नई संस्कृति में महत्वपूर्ण सुधार करने में समर्थ होता है। कभी-कभी तो एक सर्वांगपूर्ण संस्कृति की कल्पना ही साहित्य द्वारा प्रस्तुत कर दी जाती है। लेखांश के अनुसार 1- साहित्य जीवन का दर्पण है। इसमें सभी प्रकार की आकांक्षाओं, कार्य व्यापारों तथा योजनाओं का चित्रण मिलता है। 2- साहित्य मानव हृदय में मानवता के प्रति संवेदना की सृष्टि करते हैं। 3- साहित्य को उस आदर्श तक पहुंचना चाहिए, जहां उसे अमरता प्राप्त हो। उपरोक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं? A 1, 2 और 3 B 1 और 3 C 1 और 2 D 2 और 3
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। मानव जीवन के नाना मनोव्यापारों, आकांक्षाओं, योजनाओं, घटनाओं, क्रियाओं, प्रतिक्रियाओं का आकलन ही साहित्य का प्रयोजन है। जगत् के बहुमुखी क्रियाकलाप मानव के हृदय में जिन संवेदनाओं की सृष्टि करते हैं, उनकी अभिव्यक्ति ही साहित्य का सर्वस्व है। कुछ विद्वान साहित्य में जीवन के यथार्थ को आदर्श की भूमिका पर प्रस्तुत करने के पक्ष में हैं, जबकि इनका दूसरा वर्ग जीवन को उसके यथार्थ में देखने तथा चित्रित करने के पक्ष में है। प्रथम पक्ष के अनुसार जीवन या जगत् के वास्तविक रूप के चित्रण से साहित्य में मानव के प्रेरणा एवं प्रोत्साहन देने की क्षमता कहां से आएगी? साहित्य आदर्श के उस छोर पर पहुंचना चाहता है, जहां उसे अमरता प्राप्त हो जाए। साहित्य में मनुष्य इस जीवन या भावी जीवन में पूरी होने वाली कल्पनाएं ही नहीं करता, बल्कि ऐसी कामनाएं भी करता है, जो अनन्त जन्मों में भी पूरी नहीं हो सकतीं। यह गुण केवल साहित्य में ही है। साहित्य एक नई सृष्टि, नई संस्कृति में महत्वपूर्ण सुधार करने में समर्थ होता है। कभी-कभी तो एक सर्वांगपूर्ण संस्कृति की कल्पना ही साहित्य द्वारा प्रस्तुत कर दी जाती है। निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए- 1- साहित्य जीवन को आदर्श बनाने की भूमिका में होता है 2- साहित्य में मानव के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन की क्षमता होनी चाहिए 3- साहित्य को नए सांस्कृतिक मूल्यों तथा सृष्टि का माध्यम बनाना होगा। 4- साहित्य ही एक ऐसा माध्यम है जो समाज और जगत् को दिशा देने में सक्षम है। उपरोक्त कथनों में से कौन-कौन-से कथन सत्य हैं? A 1, 2 और 4 B 2, 3 और 4 C 1, 2, 3 और 4 D 1, 3 और 4
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। मानव जीवन के नाना मनोव्यापारों, आकांक्षाओं, योजनाओं, घटनाओं, क्रियाओं, प्रतिक्रियाओं का आकलन ही साहित्य का प्रयोजन है। जगत् के बहुमुखी क्रियाकलाप मानव के हृदय में जिन संवेदनाओं की सृष्टि करते हैं, उनकी अभिव्यक्ति ही साहित्य का सर्वस्व है। कुछ विद्वान साहित्य में जीवन के यथार्थ को आदर्श की भूमिका पर प्रस्तुत करने के पक्ष में हैं, जबकि इनका दूसरा वर्ग जीवन को उसके यथार्थ में देखने तथा चित्रित करने के पक्ष में है। प्रथम पक्ष के अनुसार जीवन या जगत् के वास्तविक रूप के चित्रण से साहित्य में मानव के प्रेरणा एवं प्रोत्साहन देने की क्षमता कहां से आएगी? साहित्य आदर्श के उस छोर पर पहुंचना चाहता है, जहां उसे अमरता प्राप्त हो जाए। साहित्य में मनुष्य इस जीवन या भावी जीवन में पूरी होने वाली कल्पनाएं ही नहीं करता, बल्कि ऐसी कामनाएं भी करता है, जो अनन्त जन्मों में भी पूरी नहीं हो सकतीं। यह गुण केवल साहित्य में ही है। साहित्य एक नई सृष्टि, नई संस्कृति में महत्वपूर्ण सुधार करने में समर्थ होता है। कभी-कभी तो एक सर्वांगपूर्ण संस्कृति की कल्पना ही साहित्य द्वारा प्रस्तुत कर दी जाती है। लेखांश के लेखक का केन्द्रीय भाव क्या है, A साहित्य, इतिहास और संस्कृति को कम तथा लेखक के पूर्वाग्रह को अधिक स्पष्ट करता है B साहित्य केवल मनोरंजन का साधन है और इससे मनबदलाव के अतिरिक्त कुछ नहीं होता C साहित्य हमें क्रान्ति तथा व्यवस्था परिवर्तन के लिए उकसाता है। इसका काम लोगों को उत्तेजित करना है D साहित्य जीवन और जगत् का सच्चा प्रतिबिंबन करता है तथा एक सर्वांगपूर्ण संस्कृति की कल्पना साहित्य द्वारा ही प्रस्तुत की जा सकती है।
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। विकास एवं आर्थिक दक्षता को बढ़ाने में सामाजिक मानदंडों और संस्कृति की भूमिका का वर्णन आमतौर पर संकीर्ण रूप से बनाए गए सरकारी दस्तावेज नहीं करते हैं। तथापि, अब साहित्य भी एक उभरती शाखा है जो दर्शाती है कि किस प्रकार कुछ सामाजिक मानदंड और सांस्कृतिक क्रिया-कलाप आर्थिक दक्षता और वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण कारक हैं। समूह और समाज जो कि ईमानदार और सच्चे माने जाते हैं, उन समाजों से बेहतर प्रदर्शन करने का प्रयास करते है जिनके पास ऐसा रुतबा नहीं होता है। ‘विश्वास कार्य’ पर विस्तृत देश-वार अध्ययन और प्रयोगशाला प्रयोग हुए हैं जो इसकी व्याख्या करते हैं। मोटे रूप से, जिस पर बहस की जाती है वह यह है कि एक राष्ट्र की सफलता निःसंदेह उसके संसाधनों, मानवीय पूंजी और आर्थिक नीतियों उदाहरणतया राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों पर निर्भर करती हैं, परन्तु सांस्कृतिक और सामाजिक मानदंडों पर भी निर्भर करती है, जो कि समाज में फैल जाती है। हम जिंदगी भर ऐसे हजारों छोटे अनुबंधों और संपर्कों से गुजरते हैं जो हमारी जिंदगी पर असर डालते हैं। आप एक दिन एक व्यक्ति को पैसे देते हैं और यह मानते हैं कि वह व्यक्ति अगले दिन आपके नल को ठीक कर देगा या कि आपके नल को एक व्यक्ति आज ठीक कर देता है और उम्मीद करता है कि आप अगले दिन उसका हिसाब कर देगें। आप एक स्टोर को गारमेंट की आपूर्ति करते हैं और फिर स्टोर आपको इसके लिए कीमत चुकाता है या कोई व्यक्ति आपके बाल काटता है और इसके पश्चात् आप उसे पैसे चुकाते हैं। ऐसे छोटे अनुबंधों का किसी अन्य पार्टी या किसी औपचारिक वैधानिक/नौकरशाही मशीनरी द्वारा प्रतिबलित होना मुश्किल है। यदि हम ऐसे छोटे अनुबंधों के संदर्भ में भी ऐसी नौकरशाही आधारित औपचारिक प्रक्रिया अपनाते हैं, जैसा कि हम भारत में प्रायः करते हैं तो इसका परिणाम एक बोझिल नौकरशाही के रूप में सामने आएगा जो कि किसी भी रूप में अपना काम नहीं कर पाएगी। समाज जिनमें अंतर्निहित ईमानदारी और सच्चाई होती है उन्हें यह स्वतः लाभ होता है कि यहां अनुबंधों को बाध्यकारी बनाने के लिए किसी अन्य पार्टी की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं होती। अन्य समाजों के लिए इस समाज का अधिक विश्वसनीय होना मात्र इस समाज के साथ अधिक व्यापार और उद्योग करने का तर्क प्रदान करता है। निम्नलिखित में से कौन-सा कारण उद्धरण से उद्धृत किया जा सकता है- A आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में सामाजिक मानदंडों और संस्कृति की भूमिका का सरकारी दस्तावेज खंडन करते हैं B आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में सामाजिक मानदंडों और संस्कृति की भूमिका पर सरकारी दस्तावेज चुप है C आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में सामाजिक मानदंडों और संस्कृति की भूमिका को सरकारी दस्तावेज मान्यता देते हैं D उपरोक्त में से कोई नहीं
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। विकास एवं आर्थिक दक्षता को बढ़ाने में सामाजिक मानदंडों और संस्कृति की भूमिका का वर्णन आमतौर पर संकीर्ण रूप से बनाए गए सरकारी दस्तावेज नहीं करते हैं। तथापि, अब साहित्य भी एक उभरती शाखा है जो दर्शाती है कि किस प्रकार कुछ सामाजिक मानदंड और सांस्कृतिक क्रिया-कलाप आर्थिक दक्षता और वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण कारक हैं। समूह और समाज जो कि ईमानदार और सच्चे माने जाते हैं, उन समाजों से बेहतर प्रदर्शन करने का प्रयास करते है जिनके पास ऐसा रुतबा नहीं होता है। ‘विश्वास कार्य’ पर विस्तृत देश-वार अध्ययन और प्रयोगशाला प्रयोग हुए हैं जो इसकी व्याख्या करते हैं। मोटे रूप से, जिस पर बहस की जाती है वह यह है कि एक राष्ट्र की सफलता निःसंदेह उसके संसाधनों, मानवीय पूंजी और आर्थिक नीतियों उदाहरणतया राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों पर निर्भर करती हैं, परन्तु सांस्कृतिक और सामाजिक मानदंडों पर भी निर्भर करती है, जो कि समाज में फैल जाती है। हम जिंदगी भर ऐसे हजारों छोटे अनुबंधों और संपर्कों से गुजरते हैं जो हमारी जिंदगी पर असर डालते हैं। आप एक दिन एक व्यक्ति को पैसे देते हैं और यह मानते हैं कि वह व्यक्ति अगले दिन आपके नल को ठीक कर देगा या कि आपके नल को एक व्यक्ति आज ठीक कर देता है और उम्मीद करता है कि आप अगले दिन उसका हिसाब कर देगें। आप एक स्टोर को गारमेंट की आपूर्ति करते हैं और फिर स्टोर आपको इसके लिए कीमत चुकाता है या कोई व्यक्ति आपके बाल काटता है और इसके पश्चात् आप उसे पैसे चुकाते हैं। ऐसे छोटे अनुबंधों का किसी अन्य पार्टी या किसी औपचारिक वैधानिक/नौकरशाही मशीनरी द्वारा प्रतिबलित होना मुश्किल है। यदि हम ऐसे छोटे अनुबंधों के संदर्भ में भी ऐसी नौकरशाही आधारित औपचारिक प्रक्रिया अपनाते हैं, जैसा कि हम भारत में प्रायः करते हैं तो इसका परिणाम एक बोझिल नौकरशाही के रूप में सामने आएगा जो कि किसी भी रूप में अपना काम नहीं कर पाएगी। समाज जिनमें अंतर्निहित ईमानदारी और सच्चाई होती है उन्हें यह स्वतः लाभ होता है कि यहां अनुबंधों को बाध्यकारी बनाने के लिए किसी अन्य पार्टी की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं होती। अन्य समाजों के लिए इस समाज का अधिक विश्वसनीय होना मात्र इस समाज के साथ अधिक व्यापार और उद्योग करने का तर्क प्रदान करता है। राष्ट्र की सफलता को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारकों में से लेखक किसे मान्यता प्राप्त करता है? 1) संसाधन 2) संस्कृति और सामाजिक मानदंड 3) मानवीय पूंजी 4) आर्थिक नीतियां A 1, 3, 4 B 1, 2, 4 C 2, 3, 4 D 1, 2, 3, 4
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। विकास एवं आर्थिक दक्षता को बढ़ाने में सामाजिक मानदंडों और संस्कृति की भूमिका का वर्णन आमतौर पर संकीर्ण रूप से बनाए गए सरकारी दस्तावेज नहीं करते हैं। तथापि, अब साहित्य भी एक उभरती शाखा है जो दर्शाती है कि किस प्रकार कुछ सामाजिक मानदंड और सांस्कृतिक क्रिया-कलाप आर्थिक दक्षता और वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण कारक हैं। समूह और समाज जो कि ईमानदार और सच्चे माने जाते हैं, उन समाजों से बेहतर प्रदर्शन करने का प्रयास करते है जिनके पास ऐसा रुतबा नहीं होता है। ‘विश्वास कार्य’ पर विस्तृत देश-वार अध्ययन और प्रयोगशाला प्रयोग हुए हैं जो इसकी व्याख्या करते हैं। मोटे रूप से, जिस पर बहस की जाती है वह यह है कि एक राष्ट्र की सफलता निःसंदेह उसके संसाधनों, मानवीय पूंजी और आर्थिक नीतियों उदाहरणतया राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों पर निर्भर करती हैं, परन्तु सांस्कृतिक और सामाजिक मानदंडों पर भी निर्भर करती है, जो कि समाज में फैल जाती है। हम जिंदगी भर ऐसे हजारों छोटे अनुबंधों और संपर्कों से गुजरते हैं जो हमारी जिंदगी पर असर डालते हैं। आप एक दिन एक व्यक्ति को पैसे देते हैं और यह मानते हैं कि वह व्यक्ति अगले दिन आपके नल को ठीक कर देगा या कि आपके नल को एक व्यक्ति आज ठीक कर देता है और उम्मीद करता है कि आप अगले दिन उसका हिसाब कर देगें। आप एक स्टोर को गारमेंट की आपूर्ति करते हैं और फिर स्टोर आपको इसके लिए कीमत चुकाता है या कोई व्यक्ति आपके बाल काटता है और इसके पश्चात् आप उसे पैसे चुकाते हैं। ऐसे छोटे अनुबंधों का किसी अन्य पार्टी या किसी औपचारिक वैधानिक/नौकरशाही मशीनरी द्वारा प्रतिबलित होना मुश्किल है। यदि हम ऐसे छोटे अनुबंधों के संदर्भ में भी ऐसी नौकरशाही आधारित औपचारिक प्रक्रिया अपनाते हैं, जैसा कि हम भारत में प्रायः करते हैं तो इसका परिणाम एक बोझिल नौकरशाही के रूप में सामने आएगा जो कि किसी भी रूप में अपना काम नहीं कर पाएगी। समाज जिनमें अंतर्निहित ईमानदारी और सच्चाई होती है उन्हें यह स्वतः लाभ होता है कि यहां अनुबंधों को बाध्यकारी बनाने के लिए किसी अन्य पार्टी की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं होती। अन्य समाजों के लिए इस समाज का अधिक विश्वसनीय होना मात्र इस समाज के साथ अधिक व्यापार और उद्योग करने का तर्क प्रदान करता है। सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंड किस प्रकार आर्थिक विकास को प्रभावित करते हैं? A वे निर्धारित करते हैं कि क्या एक समाज के पास उद्यमशीलता और व्यापारिक निपुणता है B सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंड अधिक पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। C ईमानदारी और एकता के सामाजिक मानदंड विश्वसनीयता लाते हैं जिससे अन्य व्यक्ति ऐसे समाज के साथ व्यापार और उद्योग करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं D उपरोक्त सभी
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। पराड़कर को सवा सौ साल बाद भी क्यों याद करें? यह प्रश्न आधुनिक-व्यापारिक पत्रकारिता के दौर में उछाला जाना स्वाभाविक है। किन्तु, एक जेब में पिस्तोल, दूसरी में गुप्त पत्र ‘रणभेरी’ और हाथों में ‘आज’, ‘संसार’ जैसे पत्रें को संवारने, जुझारू तेवर देने वाली प्रतापी लेखनी के स्वामी पराड़कर ने जेल जाने, अखबार की बन्दी, अर्थदंड जैसे दमन की परवाह किये बगैर पत्रकारिता के पेशे का वरण किया। मुफलिसी में सारा जीवन ही बीत गया। अंग्रेजों से मिली आजादी के बाद देश की आर्थिक गुलामी के खिलाफ अपनी लेखनी को ताकतवर हथियार बनाकर संघर्ष करने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर ने मराठी भाषी होते हुए भी हिंदी की जो सेवा की, वह ऐतिहासिक है। पराड़कर मिशनरी पत्रकारिता के शीर्ष मानदंड हैं। तभी तो साहित्यकार नामवर सिंह कहते हैं-पराड़कर के योगदान को हिंदी वाले हम सब अच्छी तरह जानते और अनुभव करते हैं, परन्तु पराड़कर के माध्यम से महाराष्ट्र ही नहीं पूरे देश को यह संदेश भी जाता है और जाना भी चाहिए कि एक मराठी भाषी ने हिंदी का कितना अवदान किया। वैसे हिंदी साहित्य में इतिहास लेखकों ने इस मिशनरी पत्रकार की उपेक्षा की है, जबकि हिंदी पत्रकारिता और साहित्य को इस अहिंदीभाषी संपादक का अवदान ऐतिहासिक है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने पराड़करजी के हिंदी को व्याकरणसम्मत बनाने के प्रयासों, जैसे ‘विभक्ति’ संबंधी आंदोलन आदि की चर्चा तो अपने हिंदी साहित्य इतिहास में की है, परंतु अज्ञात कारणों से उन्होंने पराड़करजी का विशेष नामोल्लेख नहीं किया। उनके योगदान की भारत के प्रथम प्रेस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में व्यापक चर्चा की। एक आदर्शवादी, गंभीर संपादक होने के साथ ही पराड़करजी ने भाषा और शैली के विचारों की नवीनता, विषय के विश्लेषण, भावाभिव्यक्ति की विविधता और निर्भीकता की दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता को नया स्वरूप और नया कलेवर प्रदान किया। उन्होंने पत्रें की भाषा को जहां जनसामान्य के लिए उपयोगी बनाया, वहीं व्याकरण की दृष्टि से भी इसे समृद्ध किया। उनके समकालीन सहयोगियों के अनुसार वे तेज गति से संपादकीय अग्रलेख और टिप्पणियां लिखते थे। उनकी स्मरण शक्ति अजीब थी और वे एक बार लिखने बैठते तो कई टिप्पणियां और अग्रलेख एक साथ पूरा कर लेते थे। वाक्य छोटे होते थे और अंग्रेजी मुहावरों के स्थान पर सामान्य अर्थ वाले हिंदी मुहावरों का प्रयोग करते थे। वे हिंदी को अनुवाद की भाषा बनाने के विरोधी थे। पराड़करजी केे राजनैतिक-आर्थिक संपादकीय-अग्रलेखों का महत्व ऐतिहासिक है। अधिकतर विषयों पर उनकी पैनी दृष्टि भारतीय अर्थव्यवस्था के नियामकों के लिए कसौटी और मार्गदर्शन सिद्ध हुई। तभी तो अनके अवसरों पर तत्कालीन लार्ड वायसराय ‘दैट बेनारेस पंडित’ (बनारस के उस पंडित) ने क्या लिखा और जो लिखा उसका अनुवाद अंग्रेजी में कराकर उसका अनुशीलन देश के जनमत और अर्थव्यवस्था की नब्ज पकड़ने के लिए करते थे। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने लगभग 200 शब्दों की विपुल संपदा हिन्दी को दान की। वे अनन्य शब्द-साधक थे। भारतीय संविधान की मूल संरचना अंग्रेजी में हुई और जब हिंदी अनुवाद हुआ तो पराड़कर जी ने मौलिक योगदान किया। ‘प्रेसिडेन्ट ऑफ इंडिया’ के लिए ‘राष्ट्रपति’ शब्द देकर पराड़कर जी ने देश और देश के संविधान-निर्माताओं को संकट से उबारा। इसी प्रकार ‘मैसर्स’ के लिए सर्वश्री, ‘मिस या मिसेज’ दोनों के लिए एक ही स्त्री बोधक शब्द-सुश्री, इनफ्रलेशन के लिए मुद्रास्फीति, कम्युनिज्म’ के लिए साम्यवाद जैसे शब्द हिंदी को दिए। उन्होंने वायुमंडल, अंतर्राष्ट्रीय, कार्रवाई, लोकतंत्र, वाद्ययंत्र, चालू आदि शब्द हिंदी के शब्द भंडार को दिए। वे नागरी लिपि में सुधार के भी हिमायती थे। उन्होंने पत्रकारिता की भाषा को मर्यादित किया। वे मानते थे कि पत्रकार के लिए पत्रकारिता केवल एक कला या जीविकोपार्जन का साधन मात्र नहीं होनी चाहिए, उसके लिए वह कर्तव्य साधन की एक पुनीत वृत्ति भी होनी चाहिए। जनजागृति का आवश्यक और अनिवार्य कार्य करना भारतीय पत्रकार का उत्तरदायित्व है। यह बात आज भी पत्रकारों के लिए अनुकरणीय है। बाबूराव विष्णु पराड़कर कौन थे? A अर्थशास्त्री B शिक्षाविद् C सम्पादक-पत्रकार D कानूनविद्
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। पराड़कर को सवा सौ साल बाद भी क्यों याद करें? यह प्रश्न आधुनिक-व्यापारिक पत्रकारिता के दौर में उछाला जाना स्वाभाविक है। किन्तु, एक जेब में पिस्तोल, दूसरी में गुप्त पत्र ‘रणभेरी’ और हाथों में ‘आज’, ‘संसार’ जैसे पत्रें को संवारने, जुझारू तेवर देने वाली प्रतापी लेखनी के स्वामी पराड़कर ने जेल जाने, अखबार की बन्दी, अर्थदंड जैसे दमन की परवाह किये बगैर पत्रकारिता के पेशे का वरण किया। मुफलिसी में सारा जीवन ही बीत गया। अंग्रेजों से मिली आजादी के बाद देश की आर्थिक गुलामी के खिलाफ अपनी लेखनी को ताकतवर हथियार बनाकर संघर्ष करने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर ने मराठी भाषी होते हुए भी हिंदी की जो सेवा की, वह ऐतिहासिक है। पराड़कर मिशनरी पत्रकारिता के शीर्ष मानदंड हैं। तभी तो साहित्यकार नामवर सिंह कहते हैं-पराड़कर के योगदान को हिंदी वाले हम सब अच्छी तरह जानते और अनुभव करते हैं, परन्तु पराड़कर के माध्यम से महाराष्ट्र ही नहीं पूरे देश को यह संदेश भी जाता है और जाना भी चाहिए कि एक मराठी भाषी ने हिंदी का कितना अवदान किया। वैसे हिंदी साहित्य में इतिहास लेखकों ने इस मिशनरी पत्रकार की उपेक्षा की है, जबकि हिंदी पत्रकारिता और साहित्य को इस अहिंदीभाषी संपादक का अवदान ऐतिहासिक है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने पराड़करजी के हिंदी को व्याकरणसम्मत बनाने के प्रयासों, जैसे ‘विभक्ति’ संबंधी आंदोलन आदि की चर्चा तो अपने हिंदी साहित्य इतिहास में की है, परंतु अज्ञात कारणों से उन्होंने पराड़करजी का विशेष नामोल्लेख नहीं किया। उनके योगदान की भारत के प्रथम प्रेस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में व्यापक चर्चा की। एक आदर्शवादी, गंभीर संपादक होने के साथ ही पराड़करजी ने भाषा और शैली के विचारों की नवीनता, विषय के विश्लेषण, भावाभिव्यक्ति की विविधता और निर्भीकता की दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता को नया स्वरूप और नया कलेवर प्रदान किया। उन्होंने पत्रें की भाषा को जहां जनसामान्य के लिए उपयोगी बनाया, वहीं व्याकरण की दृष्टि से भी इसे समृद्ध किया। उनके समकालीन सहयोगियों के अनुसार वे तेज गति से संपादकीय अग्रलेख और टिप्पणियां लिखते थे। उनकी स्मरण शक्ति अजीब थी और वे एक बार लिखने बैठते तो कई टिप्पणियां और अग्रलेख एक साथ पूरा कर लेते थे। वाक्य छोटे होते थे और अंग्रेजी मुहावरों के स्थान पर सामान्य अर्थ वाले हिंदी मुहावरों का प्रयोग करते थे। वे हिंदी को अनुवाद की भाषा बनाने के विरोधी थे। पराड़करजी केे राजनैतिक-आर्थिक संपादकीय-अग्रलेखों का महत्व ऐतिहासिक है। अधिकतर विषयों पर उनकी पैनी दृष्टि भारतीय अर्थव्यवस्था के नियामकों के लिए कसौटी और मार्गदर्शन सिद्ध हुई। तभी तो अनके अवसरों पर तत्कालीन लार्ड वायसराय ‘दैट बेनारेस पंडित’ (बनारस के उस पंडित) ने क्या लिखा और जो लिखा उसका अनुवाद अंग्रेजी में कराकर उसका अनुशीलन देश के जनमत और अर्थव्यवस्था की नब्ज पकड़ने के लिए करते थे। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने लगभग 200 शब्दों की विपुल संपदा हिन्दी को दान की। वे अनन्य शब्द-साधक थे। भारतीय संविधान की मूल संरचना अंग्रेजी में हुई और जब हिंदी अनुवाद हुआ तो पराड़कर जी ने मौलिक योगदान किया। ‘प्रेसिडेन्ट ऑफ इंडिया’ के लिए ‘राष्ट्रपति’ शब्द देकर पराड़कर जी ने देश और देश के संविधान-निर्माताओं को संकट से उबारा। इसी प्रकार ‘मैसर्स’ के लिए सर्वश्री, ‘मिस या मिसेज’ दोनों के लिए एक ही स्त्री बोधक शब्द-सुश्री, इनफ्रलेशन के लिए मुद्रास्फीति, कम्युनिज्म’ के लिए साम्यवाद जैसे शब्द हिंदी को दिए। उन्होंने वायुमंडल, अंतर्राष्ट्रीय, कार्रवाई, लोकतंत्र, वाद्ययंत्र, चालू आदि शब्द हिंदी के शब्द भंडार को दिए। वे नागरी लिपि में सुधार के भी हिमायती थे। उन्होंने पत्रकारिता की भाषा को मर्यादित किया। वे मानते थे कि पत्रकार के लिए पत्रकारिता केवल एक कला या जीविकोपार्जन का साधन मात्र नहीं होनी चाहिए, उसके लिए वह कर्तव्य साधन की एक पुनीत वृत्ति भी होनी चाहिए। जनजागृति का आवश्यक और अनिवार्य कार्य करना भारतीय पत्रकार का उत्तरदायित्व है। यह बात आज भी पत्रकारों के लिए अनुकरणीय है। किसने विष्णु पराड़कर के हिंदी पत्रकारिता के उल्लेखनीय योगदान की व्यापक चर्चा की? A रामचंद्र शुक्ल B नामवर सिंह C प्रथम प्रेस आयोग D उपर्युक्त में से कोई नहीं
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। पराड़कर को सवा सौ साल बाद भी क्यों याद करें? यह प्रश्न आधुनिक-व्यापारिक पत्रकारिता के दौर में उछाला जाना स्वाभाविक है। किन्तु, एक जेब में पिस्तोल, दूसरी में गुप्त पत्र ‘रणभेरी’ और हाथों में ‘आज’, ‘संसार’ जैसे पत्रें को संवारने, जुझारू तेवर देने वाली प्रतापी लेखनी के स्वामी पराड़कर ने जेल जाने, अखबार की बन्दी, अर्थदंड जैसे दमन की परवाह किये बगैर पत्रकारिता के पेशे का वरण किया। मुफलिसी में सारा जीवन ही बीत गया। अंग्रेजों से मिली आजादी के बाद देश की आर्थिक गुलामी के खिलाफ अपनी लेखनी को ताकतवर हथियार बनाकर संघर्ष करने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर ने मराठी भाषी होते हुए भी हिंदी की जो सेवा की, वह ऐतिहासिक है। पराड़कर मिशनरी पत्रकारिता के शीर्ष मानदंड हैं। तभी तो साहित्यकार नामवर सिंह कहते हैं-पराड़कर के योगदान को हिंदी वाले हम सब अच्छी तरह जानते और अनुभव करते हैं, परन्तु पराड़कर के माध्यम से महाराष्ट्र ही नहीं पूरे देश को यह संदेश भी जाता है और जाना भी चाहिए कि एक मराठी भाषी ने हिंदी का कितना अवदान किया। वैसे हिंदी साहित्य में इतिहास लेखकों ने इस मिशनरी पत्रकार की उपेक्षा की है, जबकि हिंदी पत्रकारिता और साहित्य को इस अहिंदीभाषी संपादक का अवदान ऐतिहासिक है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने पराड़करजी के हिंदी को व्याकरणसम्मत बनाने के प्रयासों, जैसे ‘विभक्ति’ संबंधी आंदोलन आदि की चर्चा तो अपने हिंदी साहित्य इतिहास में की है, परंतु अज्ञात कारणों से उन्होंने पराड़करजी का विशेष नामोल्लेख नहीं किया। उनके योगदान की भारत के प्रथम प्रेस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में व्यापक चर्चा की। एक आदर्शवादी, गंभीर संपादक होने के साथ ही पराड़करजी ने भाषा और शैली के विचारों की नवीनता, विषय के विश्लेषण, भावाभिव्यक्ति की विविधता और निर्भीकता की दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता को नया स्वरूप और नया कलेवर प्रदान किया। उन्होंने पत्रें की भाषा को जहां जनसामान्य के लिए उपयोगी बनाया, वहीं व्याकरण की दृष्टि से भी इसे समृद्ध किया। उनके समकालीन सहयोगियों के अनुसार वे तेज गति से संपादकीय अग्रलेख और टिप्पणियां लिखते थे। उनकी स्मरण शक्ति अजीब थी और वे एक बार लिखने बैठते तो कई टिप्पणियां और अग्रलेख एक साथ पूरा कर लेते थे। वाक्य छोटे होते थे और अंग्रेजी मुहावरों के स्थान पर सामान्य अर्थ वाले हिंदी मुहावरों का प्रयोग करते थे। वे हिंदी को अनुवाद की भाषा बनाने के विरोधी थे। पराड़करजी केे राजनैतिक-आर्थिक संपादकीय-अग्रलेखों का महत्व ऐतिहासिक है। अधिकतर विषयों पर उनकी पैनी दृष्टि भारतीय अर्थव्यवस्था के नियामकों के लिए कसौटी और मार्गदर्शन सिद्ध हुई। तभी तो अनके अवसरों पर तत्कालीन लार्ड वायसराय ‘दैट बेनारेस पंडित’ (बनारस के उस पंडित) ने क्या लिखा और जो लिखा उसका अनुवाद अंग्रेजी में कराकर उसका अनुशीलन देश के जनमत और अर्थव्यवस्था की नब्ज पकड़ने के लिए करते थे। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने लगभग 200 शब्दों की विपुल संपदा हिन्दी को दान की। वे अनन्य शब्द-साधक थे। भारतीय संविधान की मूल संरचना अंग्रेजी में हुई और जब हिंदी अनुवाद हुआ तो पराड़कर जी ने मौलिक योगदान किया। ‘प्रेसिडेन्ट ऑफ इंडिया’ के लिए ‘राष्ट्रपति’ शब्द देकर पराड़कर जी ने देश और देश के संविधान-निर्माताओं को संकट से उबारा। इसी प्रकार ‘मैसर्स’ के लिए सर्वश्री, ‘मिस या मिसेज’ दोनों के लिए एक ही स्त्री बोधक शब्द-सुश्री, इनफ्रलेशन के लिए मुद्रास्फीति, कम्युनिज्म’ के लिए साम्यवाद जैसे शब्द हिंदी को दिए। उन्होंने वायुमंडल, अंतर्राष्ट्रीय, कार्रवाई, लोकतंत्र, वाद्ययंत्र, चालू आदि शब्द हिंदी के शब्द भंडार को दिए। वे नागरी लिपि में सुधार के भी हिमायती थे। उन्होंने पत्रकारिता की भाषा को मर्यादित किया। वे मानते थे कि पत्रकार के लिए पत्रकारिता केवल एक कला या जीविकोपार्जन का साधन मात्र नहीं होनी चाहिए, उसके लिए वह कर्तव्य साधन की एक पुनीत वृत्ति भी होनी चाहिए। जनजागृति का आवश्यक और अनिवार्य कार्य करना भारतीय पत्रकार का उत्तरदायित्व है। यह बात आज भी पत्रकारों के लिए अनुकरणीय है। निम्न पर विचार कीजिए- 1. एक आदर्शवादी, गंभीर संपादक होने के साथ ही विष्णु पराड़कर ने भाषा और शैली के विचारों की नवीनता, विषय के विश्लेषण, भावाभिव्यक्ति की विविधता और निर्भीकता की दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता को नया स्वरूप प्रदान किया। B. विष्णु पराड़कर जी के माध्यम से महाराष्ट्र ही ंनहीं पूरे देश को यह संदेश भी जाता है और जाना भी चाहिए कि एक मराठी भाषी ने हिंदी का कितना अवदान किया। A केवल 1 B केवल 2 C 1 और 2 दोनों D न तो 1 और न ही 2
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। पराड़कर को सवा सौ साल बाद भी क्यों याद करें? यह प्रश्न आधुनिक-व्यापारिक पत्रकारिता के दौर में उछाला जाना स्वाभाविक है। किन्तु, एक जेब में पिस्तोल, दूसरी में गुप्त पत्र ‘रणभेरी’ और हाथों में ‘आज’, ‘संसार’ जैसे पत्रें को संवारने, जुझारू तेवर देने वाली प्रतापी लेखनी के स्वामी पराड़कर ने जेल जाने, अखबार की बन्दी, अर्थदंड जैसे दमन की परवाह किये बगैर पत्रकारिता के पेशे का वरण किया। मुफलिसी में सारा जीवन ही बीत गया। अंग्रेजों से मिली आजादी के बाद देश की आर्थिक गुलामी के खिलाफ अपनी लेखनी को ताकतवर हथियार बनाकर संघर्ष करने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर ने मराठी भाषी होते हुए भी हिंदी की जो सेवा की, वह ऐतिहासिक है। पराड़कर मिशनरी पत्रकारिता के शीर्ष मानदंड हैं। तभी तो साहित्यकार नामवर सिंह कहते हैं-पराड़कर के योगदान को हिंदी वाले हम सब अच्छी तरह जानते और अनुभव करते हैं, परन्तु पराड़कर के माध्यम से महाराष्ट्र ही नहीं पूरे देश को यह संदेश भी जाता है और जाना भी चाहिए कि एक मराठी भाषी ने हिंदी का कितना अवदान किया। वैसे हिंदी साहित्य में इतिहास लेखकों ने इस मिशनरी पत्रकार की उपेक्षा की है, जबकि हिंदी पत्रकारिता और साहित्य को इस अहिंदीभाषी संपादक का अवदान ऐतिहासिक है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने पराड़करजी के हिंदी को व्याकरणसम्मत बनाने के प्रयासों, जैसे ‘विभक्ति’ संबंधी आंदोलन आदि की चर्चा तो अपने हिंदी साहित्य इतिहास में की है, परंतु अज्ञात कारणों से उन्होंने पराड़करजी का विशेष नामोल्लेख नहीं किया। उनके योगदान की भारत के प्रथम प्रेस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में व्यापक चर्चा की। एक आदर्शवादी, गंभीर संपादक होने के साथ ही पराड़करजी ने भाषा और शैली के विचारों की नवीनता, विषय के विश्लेषण, भावाभिव्यक्ति की विविधता और निर्भीकता की दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता को नया स्वरूप और नया कलेवर प्रदान किया। उन्होंने पत्रें की भाषा को जहां जनसामान्य के लिए उपयोगी बनाया, वहीं व्याकरण की दृष्टि से भी इसे समृद्ध किया। उनके समकालीन सहयोगियों के अनुसार वे तेज गति से संपादकीय अग्रलेख और टिप्पणियां लिखते थे। उनकी स्मरण शक्ति अजीब थी और वे एक बार लिखने बैठते तो कई टिप्पणियां और अग्रलेख एक साथ पूरा कर लेते थे। वाक्य छोटे होते थे और अंग्रेजी मुहावरों के स्थान पर सामान्य अर्थ वाले हिंदी मुहावरों का प्रयोग करते थे। वे हिंदी को अनुवाद की भाषा बनाने के विरोधी थे। पराड़करजी केे राजनैतिक-आर्थिक संपादकीय-अग्रलेखों का महत्व ऐतिहासिक है। अधिकतर विषयों पर उनकी पैनी दृष्टि भारतीय अर्थव्यवस्था के नियामकों के लिए कसौटी और मार्गदर्शन सिद्ध हुई। तभी तो अनके अवसरों पर तत्कालीन लार्ड वायसराय ‘दैट बेनारेस पंडित’ (बनारस के उस पंडित) ने क्या लिखा और जो लिखा उसका अनुवाद अंग्रेजी में कराकर उसका अनुशीलन देश के जनमत और अर्थव्यवस्था की नब्ज पकड़ने के लिए करते थे। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने लगभग 200 शब्दों की विपुल संपदा हिन्दी को दान की। वे अनन्य शब्द-साधक थे। भारतीय संविधान की मूल संरचना अंग्रेजी में हुई और जब हिंदी अनुवाद हुआ तो पराड़कर जी ने मौलिक योगदान किया। ‘प्रेसिडेन्ट ऑफ इंडिया’ के लिए ‘राष्ट्रपति’ शब्द देकर पराड़कर जी ने देश और देश के संविधान-निर्माताओं को संकट से उबारा। इसी प्रकार ‘मैसर्स’ के लिए सर्वश्री, ‘मिस या मिसेज’ दोनों के लिए एक ही स्त्री बोधक शब्द-सुश्री, इनफ्रलेशन के लिए मुद्रास्फीति, कम्युनिज्म’ के लिए साम्यवाद जैसे शब्द हिंदी को दिए। उन्होंने वायुमंडल, अंतर्राष्ट्रीय, कार्रवाई, लोकतंत्र, वाद्ययंत्र, चालू आदि शब्द हिंदी के शब्द भंडार को दिए। वे नागरी लिपि में सुधार के भी हिमायती थे। उन्होंने पत्रकारिता की भाषा को मर्यादित किया। वे मानते थे कि पत्रकार के लिए पत्रकारिता केवल एक कला या जीविकोपार्जन का साधन मात्र नहीं होनी चाहिए, उसके लिए वह कर्तव्य साधन की एक पुनीत वृत्ति भी होनी चाहिए। जनजागृति का आवश्यक और अनिवार्य कार्य करना भारतीय पत्रकार का उत्तरदायित्व है। यह बात आज भी पत्रकारों के लिए अनुकरणीय है। निम्न में से कौन-से कथन सत्य हैं? A पराड़कर जी ने जहां पत्रें की भाषा को जनसामान्य के लिए उपयोगी बनाया, वहीं व्याकरण की दृष्टि से भी इसे समृद्ध किया। B विष्णु पराड़कर के राजनीतिक-आर्थिक संपादकीय अग्रलेखों का ऐतिहासिक महत्व है। C ‘प्रेसिडेन्ट ऑफ इंडिया’ के लिए ‘राष्ट्रपति’ शब्द देकर पराड़कर जी ने देश और देश के संविधान-निर्माताओं को संकट से उबारा D उपर्युक्त सभी
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। पराड़कर को सवा सौ साल बाद भी क्यों याद करें? यह प्रश्न आधुनिक-व्यापारिक पत्रकारिता के दौर में उछाला जाना स्वाभाविक है। किन्तु, एक जेब में पिस्तोल, दूसरी में गुप्त पत्र ‘रणभेरी’ और हाथों में ‘आज’, ‘संसार’ जैसे पत्रें को संवारने, जुझारू तेवर देने वाली प्रतापी लेखनी के स्वामी पराड़कर ने जेल जाने, अखबार की बन्दी, अर्थदंड जैसे दमन की परवाह किये बगैर पत्रकारिता के पेशे का वरण किया। मुफलिसी में सारा जीवन ही बीत गया। अंग्रेजों से मिली आजादी के बाद देश की आर्थिक गुलामी के खिलाफ अपनी लेखनी को ताकतवर हथियार बनाकर संघर्ष करने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर ने मराठी भाषी होते हुए भी हिंदी की जो सेवा की, वह ऐतिहासिक है। पराड़कर मिशनरी पत्रकारिता के शीर्ष मानदंड हैं। तभी तो साहित्यकार नामवर सिंह कहते हैं-पराड़कर के योगदान को हिंदी वाले हम सब अच्छी तरह जानते और अनुभव करते हैं, परन्तु पराड़कर के माध्यम से महाराष्ट्र ही नहीं पूरे देश को यह संदेश भी जाता है और जाना भी चाहिए कि एक मराठी भाषी ने हिंदी का कितना अवदान किया। वैसे हिंदी साहित्य में इतिहास लेखकों ने इस मिशनरी पत्रकार की उपेक्षा की है, जबकि हिंदी पत्रकारिता और साहित्य को इस अहिंदीभाषी संपादक का अवदान ऐतिहासिक है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने पराड़करजी के हिंदी को व्याकरणसम्मत बनाने के प्रयासों, जैसे ‘विभक्ति’ संबंधी आंदोलन आदि की चर्चा तो अपने हिंदी साहित्य इतिहास में की है, परंतु अज्ञात कारणों से उन्होंने पराड़करजी का विशेष नामोल्लेख नहीं किया। उनके योगदान की भारत के प्रथम प्रेस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में व्यापक चर्चा की। एक आदर्शवादी, गंभीर संपादक होने के साथ ही पराड़करजी ने भाषा और शैली के विचारों की नवीनता, विषय के विश्लेषण, भावाभिव्यक्ति की विविधता और निर्भीकता की दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता को नया स्वरूप और नया कलेवर प्रदान किया। उन्होंने पत्रें की भाषा को जहां जनसामान्य के लिए उपयोगी बनाया, वहीं व्याकरण की दृष्टि से भी इसे समृद्ध किया। उनके समकालीन सहयोगियों के अनुसार वे तेज गति से संपादकीय अग्रलेख और टिप्पणियां लिखते थे। उनकी स्मरण शक्ति अजीब थी और वे एक बार लिखने बैठते तो कई टिप्पणियां और अग्रलेख एक साथ पूरा कर लेते थे। वाक्य छोटे होते थे और अंग्रेजी मुहावरों के स्थान पर सामान्य अर्थ वाले हिंदी मुहावरों का प्रयोग करते थे। वे हिंदी को अनुवाद की भाषा बनाने के विरोधी थे। पराड़करजी केे राजनैतिक-आर्थिक संपादकीय-अग्रलेखों का महत्व ऐतिहासिक है। अधिकतर विषयों पर उनकी पैनी दृष्टि भारतीय अर्थव्यवस्था के नियामकों के लिए कसौटी और मार्गदर्शन सिद्ध हुई। तभी तो अनके अवसरों पर तत्कालीन लार्ड वायसराय ‘दैट बेनारेस पंडित’ (बनारस के उस पंडित) ने क्या लिखा और जो लिखा उसका अनुवाद अंग्रेजी में कराकर उसका अनुशीलन देश के जनमत और अर्थव्यवस्था की नब्ज पकड़ने के लिए करते थे। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने लगभग 200 शब्दों की विपुल संपदा हिन्दी को दान की। वे अनन्य शब्द-साधक थे। भारतीय संविधान की मूल संरचना अंग्रेजी में हुई और जब हिंदी अनुवाद हुआ तो पराड़कर जी ने मौलिक योगदान किया। ‘प्रेसिडेन्ट ऑफ इंडिया’ के लिए ‘राष्ट्रपति’ शब्द देकर पराड़कर जी ने देश और देश के संविधान-निर्माताओं को संकट से उबारा। इसी प्रकार ‘मैसर्स’ के लिए सर्वश्री, ‘मिस या मिसेज’ दोनों के लिए एक ही स्त्री बोधक शब्द-सुश्री, इनफ्रलेशन के लिए मुद्रास्फीति, कम्युनिज्म’ के लिए साम्यवाद जैसे शब्द हिंदी को दिए। उन्होंने वायुमंडल, अंतर्राष्ट्रीय, कार्रवाई, लोकतंत्र, वाद्ययंत्र, चालू आदि शब्द हिंदी के शब्द भंडार को दिए। वे नागरी लिपि में सुधार के भी हिमायती थे। उन्होंने पत्रकारिता की भाषा को मर्यादित किया। वे मानते थे कि पत्रकार के लिए पत्रकारिता केवल एक कला या जीविकोपार्जन का साधन मात्र नहीं होनी चाहिए, उसके लिए वह कर्तव्य साधन की एक पुनीत वृत्ति भी होनी चाहिए। जनजागृति का आवश्यक और अनिवार्य कार्य करना भारतीय पत्रकार का उत्तरदायित्व है। यह बात आज भी पत्रकारों के लिए अनुकरणीय है। विष्णु पराड़कर ने हिंदी को कितने शब्द प्रदान किए? A 200 B 201 C 202 D 203
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। पराड़कर को सवा सौ साल बाद भी क्यों याद करें? यह प्रश्न आधुनिक-व्यापारिक पत्रकारिता के दौर में उछाला जाना स्वाभाविक है। किन्तु, एक जेब में पिस्तोल, दूसरी में गुप्त पत्र ‘रणभेरी’ और हाथों में ‘आज’, ‘संसार’ जैसे पत्रें को संवारने, जुझारू तेवर देने वाली प्रतापी लेखनी के स्वामी पराड़कर ने जेल जाने, अखबार की बन्दी, अर्थदंड जैसे दमन की परवाह किये बगैर पत्रकारिता के पेशे का वरण किया। मुफलिसी में सारा जीवन ही बीत गया। अंग्रेजों से मिली आजादी के बाद देश की आर्थिक गुलामी के खिलाफ अपनी लेखनी को ताकतवर हथियार बनाकर संघर्ष करने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर ने मराठी भाषी होते हुए भी हिंदी की जो सेवा की, वह ऐतिहासिक है। पराड़कर मिशनरी पत्रकारिता के शीर्ष मानदंड हैं। तभी तो साहित्यकार नामवर सिंह कहते हैं-पराड़कर के योगदान को हिंदी वाले हम सब अच्छी तरह जानते और अनुभव करते हैं, परन्तु पराड़कर के माध्यम से महाराष्ट्र ही नहीं पूरे देश को यह संदेश भी जाता है और जाना भी चाहिए कि एक मराठी भाषी ने हिंदी का कितना अवदान किया। वैसे हिंदी साहित्य में इतिहास लेखकों ने इस मिशनरी पत्रकार की उपेक्षा की है, जबकि हिंदी पत्रकारिता और साहित्य को इस अहिंदीभाषी संपादक का अवदान ऐतिहासिक है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने पराड़करजी के हिंदी को व्याकरणसम्मत बनाने के प्रयासों, जैसे ‘विभक्ति’ संबंधी आंदोलन आदि की चर्चा तो अपने हिंदी साहित्य इतिहास में की है, परंतु अज्ञात कारणों से उन्होंने पराड़करजी का विशेष नामोल्लेख नहीं किया। उनके योगदान की भारत के प्रथम प्रेस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में व्यापक चर्चा की। एक आदर्शवादी, गंभीर संपादक होने के साथ ही पराड़करजी ने भाषा और शैली के विचारों की नवीनता, विषय के विश्लेषण, भावाभिव्यक्ति की विविधता और निर्भीकता की दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता को नया स्वरूप और नया कलेवर प्रदान किया। उन्होंने पत्रें की भाषा को जहां जनसामान्य के लिए उपयोगी बनाया, वहीं व्याकरण की दृष्टि से भी इसे समृद्ध किया। उनके समकालीन सहयोगियों के अनुसार वे तेज गति से संपादकीय अग्रलेख और टिप्पणियां लिखते थे। उनकी स्मरण शक्ति अजीब थी और वे एक बार लिखने बैठते तो कई टिप्पणियां और अग्रलेख एक साथ पूरा कर लेते थे। वाक्य छोटे होते थे और अंग्रेजी मुहावरों के स्थान पर सामान्य अर्थ वाले हिंदी मुहावरों का प्रयोग करते थे। वे हिंदी को अनुवाद की भाषा बनाने के विरोधी थे। पराड़करजी केे राजनैतिक-आर्थिक संपादकीय-अग्रलेखों का महत्व ऐतिहासिक है। अधिकतर विषयों पर उनकी पैनी दृष्टि भारतीय अर्थव्यवस्था के नियामकों के लिए कसौटी और मार्गदर्शन सिद्ध हुई। तभी तो अनके अवसरों पर तत्कालीन लार्ड वायसराय ‘दैट बेनारेस पंडित’ (बनारस के उस पंडित) ने क्या लिखा और जो लिखा उसका अनुवाद अंग्रेजी में कराकर उसका अनुशीलन देश के जनमत और अर्थव्यवस्था की नब्ज पकड़ने के लिए करते थे। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने लगभग 200 शब्दों की विपुल संपदा हिन्दी को दान की। वे अनन्य शब्द-साधक थे। भारतीय संविधान की मूल संरचना अंग्रेजी में हुई और जब हिंदी अनुवाद हुआ तो पराड़कर जी ने मौलिक योगदान किया। ‘प्रेसिडेन्ट ऑफ इंडिया’ के लिए ‘राष्ट्रपति’ शब्द देकर पराड़कर जी ने देश और देश के संविधान-निर्माताओं को संकट से उबारा। इसी प्रकार ‘मैसर्स’ के लिए सर्वश्री, ‘मिस या मिसेज’ दोनों के लिए एक ही स्त्री बोधक शब्द-सुश्री, इनफ्रलेशन के लिए मुद्रास्फीति, कम्युनिज्म’ के लिए साम्यवाद जैसे शब्द हिंदी को दिए। उन्होंने वायुमंडल, अंतर्राष्ट्रीय, कार्रवाई, लोकतंत्र, वाद्ययंत्र, चालू आदि शब्द हिंदी के शब्द भंडार को दिए। वे नागरी लिपि में सुधार के भी हिमायती थे। उन्होंने पत्रकारिता की भाषा को मर्यादित किया। वे मानते थे कि पत्रकार के लिए पत्रकारिता केवल एक कला या जीविकोपार्जन का साधन मात्र नहीं होनी चाहिए, उसके लिए वह कर्तव्य साधन की एक पुनीत वृत्ति भी होनी चाहिए। जनजागृति का आवश्यक और अनिवार्य कार्य करना भारतीय पत्रकार का उत्तरदायित्व है। यह बात आज भी पत्रकारों के लिए अनुकरणीय है। पत्रकार का दायित्व एवं गुण क्या होना चाहिए? A समाचारों का संग्रह B समाचारों का जनमानस तक वितरण C जनजागृति का आवश्यक एवं अनिवार्य कार्य D उपर्युक्त सभी
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। वैज्ञानिकों ने हृदय की धमनियों में रुकावट के उपचार में एक बड़ी सफलता प्राप्त की है। अब इलाज का समय बहुत घट जाएगा और मरीजों को अस्पताल में देर तक रहने की जरुरत नहीं रह जाएगी। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने उच्च क्षमता के एक लेसर का अविष्कार किया है, जिससे धमनियों में रुकावट का उपचार कुछ ही मिनटों में किया जा सकेगा। इस नई प्रक्रिया में ‘एक्जाइमर’ नामक नए लेसर पर एक विशिष्ट कैथेटर या टूयूब लगाई जाती है, जो ऊतकों को इतने छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देती है, जिन्हें केवल सूक्ष्मदर्शीर् से ही देखा जा सकता है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत जिन प्रथम दो मरीजों का उपचार किया गया, उन्हें अगले ही दिन छुट्टी दे दी गई। प्रतिवर्ष हजारों लोग अपनी धमनियों को चौड़ा कराने के लिए ऑपरेशन कराते हैं। धमनियों में कोलेस्ट्रॉल, उच्च रक्तचाप और मधुमेह के कारण रुकावट आने लगती है, जिनका परिणाम दिल की बीमारी और बाइपास सर्जरी के रूप में प्रकट होता है तथा इलाज के बाद भी धमनियों की दीवारों में अवांछित ऊतक जमा होने लगते हैं। धमनियों को चौड़ा करने के लिए प्रयोग की गई छोटी टूयूब या स्टेंट के भी अवरुद्ध होने का खतरा बना रहता है। ऑपरेशन कराने वाले हर तीन में से एक मरीज की धमनियों में नया अवरोध या ब्लॉकेज आने का खतरा होता है, जो भविष्य में उनके स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर सकता है। अब तक इस समस्या के लिए डॉक्टरों के पास एक ही समाधान था-पुनः जटिल बाइपास सर्जरी। अब लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के डॉ- जो ब्रुक्स और उनकी टीम ने अवरुद्ध धमनियों को खोलने के लिए लेसर तकनीक का विकास कर इस क्षेत्र में क्रांतिकारी पहल कर दी है। मनुष्य की धमनियों में रुकावट को दूर करने संबंधी आधुनिकतम तकनीक क्या है? A मेसर तकनीक B बायोप्सी तकनीक C बाइपास सर्जरी तकनीक D लेसर तकनीक
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। वैज्ञानिकों ने हृदय की धमनियों में रुकावट के उपचार में एक बड़ी सफलता प्राप्त की है। अब इलाज का समय बहुत घट जाएगा और मरीजों को अस्पताल में देर तक रहने की जरुरत नहीं रह जाएगी। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने उच्च क्षमता के एक लेसर का अविष्कार किया है, जिससे धमनियों में रुकावट का उपचार कुछ ही मिनटों में किया जा सकेगा। इस नई प्रक्रिया में ‘एक्जाइमर’ नामक नए लेसर पर एक विशिष्ट कैथेटर या टूयूब लगाई जाती है, जो ऊतकों को इतने छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देती है, जिन्हें केवल सूक्ष्मदर्शीर् से ही देखा जा सकता है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत जिन प्रथम दो मरीजों का उपचार किया गया, उन्हें अगले ही दिन छुट्टी दे दी गई। प्रतिवर्ष हजारों लोग अपनी धमनियों को चौड़ा कराने के लिए ऑपरेशन कराते हैं। धमनियों में कोलेस्ट्रॉल, उच्च रक्तचाप और मधुमेह के कारण रुकावट आने लगती है, जिनका परिणाम दिल की बीमारी और बाइपास सर्जरी के रूप में प्रकट होता है तथा इलाज के बाद भी धमनियों की दीवारों में अवांछित ऊतक जमा होने लगते हैं। धमनियों को चौड़ा करने के लिए प्रयोग की गई छोटी टूयूब या स्टेंट के भी अवरुद्ध होने का खतरा बना रहता है। ऑपरेशन कराने वाले हर तीन में से एक मरीज की धमनियों में नया अवरोध या ब्लॉकेज आने का खतरा होता है, जो भविष्य में उनके स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर सकता है। अब तक इस समस्या के लिए डॉक्टरों के पास एक ही समाधान था-पुनः जटिल बाइपास सर्जरी। अब लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के डॉ- जो ब्रुक्स और उनकी टीम ने अवरुद्ध धमनियों को खोलने के लिए लेसर तकनीक का विकास कर इस क्षेत्र में क्रांतिकारी पहल कर दी है। धमनियों में रुकावट का उपचार कुछ ही मिनटों में करने संबंधी जिस लेसर की खोज की गई है वह है- A कैथेटर B एक्जाइमर C अल्झाईमर D उपर्युक्त कोई नहीं
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। वैज्ञानिकों ने हृदय की धमनियों में रुकावट के उपचार में एक बड़ी सफलता प्राप्त की है। अब इलाज का समय बहुत घट जाएगा और मरीजों को अस्पताल में देर तक रहने की जरुरत नहीं रह जाएगी। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने उच्च क्षमता के एक लेसर का अविष्कार किया है, जिससे धमनियों में रुकावट का उपचार कुछ ही मिनटों में किया जा सकेगा। इस नई प्रक्रिया में ‘एक्जाइमर’ नामक नए लेसर पर एक विशिष्ट कैथेटर या टूयूब लगाई जाती है, जो ऊतकों को इतने छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देती है, जिन्हें केवल सूक्ष्मदर्शीर् से ही देखा जा सकता है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत जिन प्रथम दो मरीजों का उपचार किया गया, उन्हें अगले ही दिन छुट्टी दे दी गई। प्रतिवर्ष हजारों लोग अपनी धमनियों को चौड़ा कराने के लिए ऑपरेशन कराते हैं। धमनियों में कोलेस्ट्रॉल, उच्च रक्तचाप और मधुमेह के कारण रुकावट आने लगती है, जिनका परिणाम दिल की बीमारी और बाइपास सर्जरी के रूप में प्रकट होता है तथा इलाज के बाद भी धमनियों की दीवारों में अवांछित ऊतक जमा होने लगते हैं। धमनियों को चौड़ा करने के लिए प्रयोग की गई छोटी टूयूब या स्टेंट के भी अवरुद्ध होने का खतरा बना रहता है। ऑपरेशन कराने वाले हर तीन में से एक मरीज की धमनियों में नया अवरोध या ब्लॉकेज आने का खतरा होता है, जो भविष्य में उनके स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर सकता है। अब तक इस समस्या के लिए डॉक्टरों के पास एक ही समाधान था-पुनः जटिल बाइपास सर्जरी। अब लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के डॉ- जो ब्रुक्स और उनकी टीम ने अवरुद्ध धमनियों को खोलने के लिए लेसर तकनीक का विकास कर इस क्षेत्र में क्रांतिकारी पहल कर दी है। धमनियों में रुकावट के प्रमुख कारण क्या है? A मधुमेह B उच्च रक्तचाप C कोलेस्ट्रॉल D उपर्युक्त सभी
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। वैज्ञानिकों ने हृदय की धमनियों में रुकावट के उपचार में एक बड़ी सफलता प्राप्त की है। अब इलाज का समय बहुत घट जाएगा और मरीजों को अस्पताल में देर तक रहने की जरुरत नहीं रह जाएगी। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने उच्च क्षमता के एक लेसर का अविष्कार किया है, जिससे धमनियों में रुकावट का उपचार कुछ ही मिनटों में किया जा सकेगा। इस नई प्रक्रिया में ‘एक्जाइमर’ नामक नए लेसर पर एक विशिष्ट कैथेटर या टूयूब लगाई जाती है, जो ऊतकों को इतने छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देती है, जिन्हें केवल सूक्ष्मदर्शीर् से ही देखा जा सकता है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत जिन प्रथम दो मरीजों का उपचार किया गया, उन्हें अगले ही दिन छुट्टी दे दी गई। प्रतिवर्ष हजारों लोग अपनी धमनियों को चौड़ा कराने के लिए ऑपरेशन कराते हैं। धमनियों में कोलेस्ट्रॉल, उच्च रक्तचाप और मधुमेह के कारण रुकावट आने लगती है, जिनका परिणाम दिल की बीमारी और बाइपास सर्जरी के रूप में प्रकट होता है तथा इलाज के बाद भी धमनियों की दीवारों में अवांछित ऊतक जमा होने लगते हैं। धमनियों को चौड़ा करने के लिए प्रयोग की गई छोटी टूयूब या स्टेंट के भी अवरुद्ध होने का खतरा बना रहता है। ऑपरेशन कराने वाले हर तीन में से एक मरीज की धमनियों में नया अवरोध या ब्लॉकेज आने का खतरा होता है, जो भविष्य में उनके स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर सकता है। अब तक इस समस्या के लिए डॉक्टरों के पास एक ही समाधान था-पुनः जटिल बाइपास सर्जरी। अब लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के डॉ- जो ब्रुक्स और उनकी टीम ने अवरुद्ध धमनियों को खोलने के लिए लेसर तकनीक का विकास कर इस क्षेत्र में क्रांतिकारी पहल कर दी है। अवरुद्ध धमनियों को खोलने के लिए लेसर तकनीक की खोज की गई है उसके प्रमुख सूत्रधार हैं- A डॉ रॉबर्ट ब्राउन B डॉ- पीटरसन C डॉ- जो ब्रुक्स D डॉ- रॉबर्ट हुक
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निम्नलिखित लेखांशों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आपके उत्तर दिए गये लेखांश की अंतर्वस्तु पर ही आधारित होने चाहिए। वैज्ञानिकों ने हृदय की धमनियों में रुकावट के उपचार में एक बड़ी सफलता प्राप्त की है। अब इलाज का समय बहुत घट जाएगा और मरीजों को अस्पताल में देर तक रहने की जरुरत नहीं रह जाएगी। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने उच्च क्षमता के एक लेसर का अविष्कार किया है, जिससे धमनियों में रुकावट का उपचार कुछ ही मिनटों में किया जा सकेगा। इस नई प्रक्रिया में ‘एक्जाइमर’ नामक नए लेसर पर एक विशिष्ट कैथेटर या टूयूब लगाई जाती है, जो ऊतकों को इतने छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देती है, जिन्हें केवल सूक्ष्मदर्शीर् से ही देखा जा सकता है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत जिन प्रथम दो मरीजों का उपचार किया गया, उन्हें अगले ही दिन छुट्टी दे दी गई। प्रतिवर्ष हजारों लोग अपनी धमनियों को चौड़ा कराने के लिए ऑपरेशन कराते हैं। धमनियों में कोलेस्ट्रॉल, उच्च रक्तचाप और मधुमेह के कारण रुकावट आने लगती है, जिनका परिणाम दिल की बीमारी और बाइपास सर्जरी के रूप में प्रकट होता है तथा इलाज के बाद भी धमनियों की दीवारों में अवांछित ऊतक जमा होने लगते हैं। धमनियों को चौड़ा करने के लिए प्रयोग की गई छोटी टूयूब या स्टेंट के भी अवरुद्ध होने का खतरा बना रहता है। ऑपरेशन कराने वाले हर तीन में से एक मरीज की धमनियों में नया अवरोध या ब्लॉकेज आने का खतरा होता है, जो भविष्य में उनके स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर सकता है। अब तक इस समस्या के लिए डॉक्टरों के पास एक ही समाधान था-पुनः जटिल बाइपास सर्जरी। अब लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के डॉ- जो ब्रुक्स और उनकी टीम ने अवरुद्ध धमनियों को खोलने के लिए लेसर तकनीक का विकास कर इस क्षेत्र में क्रांतिकारी पहल कर दी है। नई लेसर तकनीक के द्वारा धमनियों के अवरोध को हटाने में कितना समय लगता है? A केवल कुछ मिनट B केवल कुछ घंटे C 10 दिन D 2 दिन
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Read each of the following two passages and answers to these items that follow. Your answers to these items should be based on the passage only. Most of us would like to live a long and healthy life. Increasingly, doctors are telling us that, in order to do so, we must eat a healthy diet. Too often we ignore the advice. In most countries of the developed world there is no shortage of food, but their inhabitants could be suffering from a form of malnutrition. This is something that we are accustomed to associate with poor countries which regularly suffer from famine, caused by primitive agricultural methods and over-population. The problem in the developed countries is that all too many of us are eating food which is far from being nutritious and which is lacking in many of the vitamins essential to health. Because of our busy way of life, we rely too much on convenience foods, not taking the time to prepare a nourishing meal for ourselves. Instead, we grab something from the supermarket shelves of freezer and put it in the microwave. Even when we decide to eat in a restaurant, many of us decide that we have very little time and that our food must be served instantly. It is for this reason that there are, in many countries, so many restaurants that specialise in serving fast food. Unfortunately, much of this food is also junk food, and even more unfortunately many children have become addicted to this, refusing to eat healthier alternatives. In general, we are eating too much processed food and not enough wholefood. Ideally, we should eat more cereal products in order to increase our intake of fibre, since there is some evidence that this reduces the risk of certain cancers. Antioxidants, too, are thought to have some effect in preventing cancer and these are found in significant quantities in fruit and vegetables. Formerly, it was considered important to eat plenty of eggs and dairy products to remain healthy. Such foods are now known to be high in cholesterol, which can be a contributory factor in heart disease. Fashions in healthy eating may have changed, but the message remains the same. Watch what you eat! Which of the following sentences is incorrect in the context of the passage? A Malnutrition is associated with shortage of food B Malnutrition is a condition largely found in developing and urban-developed countries C Backward methods of agriculture and over­population cannot be related to malnutrition D Malnutrition can be linked to the lifestyle in developed countries
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Read each of the following two passages and answers to these items that follow. Your answers to these items should be based on the passage only. Most of us would like to live a long and healthy life. Increasingly, doctors are telling us that, in order to do so, we must eat a healthy diet. Too often we ignore the advice. In most countries of the developed world there is no shortage of food, but their inhabitants could be suffering from a form of malnutrition. This is something that we are accustomed to associate with poor countries which regularly suffer from famine, caused by primitive agricultural methods and over-population. The problem in the developed countries is that all too many of us are eating food which is far from being nutritious and which is lacking in many of the vitamins essential to health. Because of our busy way of life, we rely too much on convenience foods, not taking the time to prepare a nourishing meal for ourselves. Instead, we grab something from the supermarket shelves of freezer and put it in the microwave. Even when we decide to eat in a restaurant, many of us decide that we have very little time and that our food must be served instantly. It is for this reason that there are, in many countries, so many restaurants that specialise in serving fast food. Unfortunately, much of this food is also junk food, and even more unfortunately many children have become addicted to this, refusing to eat healthier alternatives. In general, we are eating too much processed food and not enough wholefood. Ideally, we should eat more cereal products in order to increase our intake of fibre, since there is some evidence that this reduces the risk of certain cancers. Antioxidants, too, are thought to have some effect in preventing cancer and these are found in significant quantities in fruit and vegetables. Formerly, it was considered important to eat plenty of eggs and dairy products to remain healthy. Such foods are now known to be high in cholesterol, which can be a contributory factor in heart disease. Fashions in healthy eating may have changed, but the message remains the same. Watch what you eat! Given below are certain terms form the passage relating to different types of food and their meanings. Match the terms with their meanings. A- Convenience Food (i) Prepared quickly and meantto be taken away for eating B- Junk Food (ii) Prepared quickly and easily but lacking in nutrition C- Fast Food (iii) Treated with chemicals so that it could be preserved or given extra-colour D- Processed Food (iv) Not containing artificial substances. E- Wholefood (v) Prepared quickly and easily, without much cooking. A A-v, B-ii, C-i, D-iii, E-iv B A-iv, B-iii, C-i, D-ii, E-v C A-iii, B-v, C-ii, D-i, E-iv D A-i, B-ii, C-iv, D-v, E-iii
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Read each of the following two passages and answers to these items that follow. Your answers to these items should be based on the passage only. Most of us would like to live a long and healthy life. Increasingly, doctors are telling us that, in order to do so, we must eat a healthy diet. Too often we ignore the advice. In most countries of the developed world there is no shortage of food, but their inhabitants could be suffering from a form of malnutrition. This is something that we are accustomed to associate with poor countries which regularly suffer from famine, caused by primitive agricultural methods and over-population. The problem in the developed countries is that all too many of us are eating food which is far from being nutritious and which is lacking in many of the vitamins essential to health. Because of our busy way of life, we rely too much on convenience foods, not taking the time to prepare a nourishing meal for ourselves. Instead, we grab something from the supermarket shelves of freezer and put it in the microwave. Even when we decide to eat in a restaurant, many of us decide that we have very little time and that our food must be served instantly. It is for this reason that there are, in many countries, so many restaurants that specialise in serving fast food. Unfortunately, much of this food is also junk food, and even more unfortunately many children have become addicted to this, refusing to eat healthier alternatives. In general, we are eating too much processed food and not enough wholefood. Ideally, we should eat more cereal products in order to increase our intake of fibre, since there is some evidence that this reduces the risk of certain cancers. Antioxidants, too, are thought to have some effect in preventing cancer and these are found in significant quantities in fruit and vegetables. Formerly, it was considered important to eat plenty of eggs and dairy products to remain healthy. Such foods are now known to be high in cholesterol, which can be a contributory factor in heart disease. Fashions in healthy eating may have changed, but the message remains the same. Watch what you eat! Which of the following statements is incorrect in the context of the passage? A Consuming large amounts of fruits and vegetables may prevent cancer B Cereals contain antioxidants that reduce the risk of cancer C Antioxidants reduce the risk of diseases like cancer D Consumption of large amounts of eggs and dairy products may lead to heart ailments
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Read each of the following two passages and answers to these items that follow. Your answers to these items should be based on the passage only. Most of us would like to live a long and healthy life. Increasingly, doctors are telling us that, in order to do so, we must eat a healthy diet. Too often we ignore the advice. In most countries of the developed world there is no shortage of food, but their inhabitants could be suffering from a form of malnutrition. This is something that we are accustomed to associate with poor countries which regularly suffer from famine, caused by primitive agricultural methods and over-population. The problem in the developed countries is that all too many of us are eating food which is far from being nutritious and which is lacking in many of the vitamins essential to health. Because of our busy way of life, we rely too much on convenience foods, not taking the time to prepare a nourishing meal for ourselves. Instead, we grab something from the supermarket shelves of freezer and put it in the microwave. Even when we decide to eat in a restaurant, many of us decide that we have very little time and that our food must be served instantly. It is for this reason that there are, in many countries, so many restaurants that specialise in serving fast food. Unfortunately, much of this food is also junk food, and even more unfortunately many children have become addicted to this, refusing to eat healthier alternatives. In general, we are eating too much processed food and not enough wholefood. Ideally, we should eat more cereal products in order to increase our intake of fibre, since there is some evidence that this reduces the risk of certain cancers. Antioxidants, too, are thought to have some effect in preventing cancer and these are found in significant quantities in fruit and vegetables. Formerly, it was considered important to eat plenty of eggs and dairy products to remain healthy. Such foods are now known to be high in cholesterol, which can be a contributory factor in heart disease. Fashions in healthy eating may have changed, but the message remains the same. Watch what you eat! The word primitive here means A tribal B simple C backward D earliest
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Read each of the following two passages and answers to these items that follow. Your answers to these items should be based on the passage only. Most of us would like to live a long and healthy life. Increasingly, doctors are telling us that, in order to do so, we must eat a healthy diet. Too often we ignore the advice. In most countries of the developed world there is no shortage of food, but their inhabitants could be suffering from a form of malnutrition. This is something that we are accustomed to associate with poor countries which regularly suffer from famine, caused by primitive agricultural methods and over-population. The problem in the developed countries is that all too many of us are eating food which is far from being nutritious and which is lacking in many of the vitamins essential to health. Because of our busy way of life, we rely too much on convenience foods, not taking the time to prepare a nourishing meal for ourselves. Instead, we grab something from the supermarket shelves of freezer and put it in the microwave. Even when we decide to eat in a restaurant, many of us decide that we have very little time and that our food must be served instantly. It is for this reason that there are, in many countries, so many restaurants that specialise in serving fast food. Unfortunately, much of this food is also junk food, and even more unfortunately many children have become addicted to this, refusing to eat healthier alternatives. In general, we are eating too much processed food and not enough wholefood. Ideally, we should eat more cereal products in order to increase our intake of fibre, since there is some evidence that this reduces the risk of certain cancers. Antioxidants, too, are thought to have some effect in preventing cancer and these are found in significant quantities in fruit and vegetables. Formerly, it was considered important to eat plenty of eggs and dairy products to remain healthy. Such foods are now known to be high in cholesterol, which can be a contributory factor in heart disease. Fashions in healthy eating may have changed, but the message remains the same. Watch what you eat! Which of the following is not a meaning of the word fibre? A A fine threadlike piece B An essential character C Roughage D Cereal products
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Read each of the following two passages and answers to these items that follow. Your answers to these items should be based on the passage only. A city centre hotel was seriously damaged by fire last night. Guests were awoken by the fire alarm about 2 a.m. and got out safely by means of the various fire escapes. Fortunately, no one was killed or seriously injured although some people were taken to hospital, suffering from smoke-inhalation. Also, one woman sustained minor burns when flying sparks set fire to her flammable nightdress. Fire brigades from several districts rushed to the Hotel Anglia immediately the alarm was raised, but it took the firefighters several hours to get the blaze under control. The fire appears to have started in the hotel basement in the storage area, where there was a lot of combustible material stored. This area was already an inferno when the fire engines arrived, but eventually firefighters succeeded in extinguishing the flames. Obviously the first and most important task was to put the fire out and ensure that everyone was safe. Now investigators will have to try to establish what caused the fire. It is possible that it was caused accidentally. The storage area may have been set alight following some kind of electrical fault, or the conflagration may have been started by a cigarette left smouldering. No one yet knows. However, police have not ruled out the possibility of arson. There has been a number of fires in the area recently, although this conflagration is the most serious to date. Some of these are obviously the work of the raiser although, as yet, no one has been charged, in the case investigators found a can of petrol and a box of matches at the scene of the fire. As yet there is no proof that anyone set fire to the hotel deliberately, and nothing has been found to connect this with the other fires. It will take a considerable time for investigators to search through all the embers, looking for clues. If this is the work of arsonists, let us hope they are caught before other lives are put at risk. What is stated to be the cause of the fire? A Arson B An electrical fault C A cigarette was left smouldering D None of the above
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Read each of the following two passages and answers to these items that follow. Your answers to these items should be based on the passage only. A city centre hotel was seriously damaged by fire last night. Guests were awoken by the fire alarm about 2 a.m. and got out safely by means of the various fire escapes. Fortunately, no one was killed or seriously injured although some people were taken to hospital, suffering from smoke-inhalation. Also, one woman sustained minor burns when flying sparks set fire to her flammable nightdress. Fire brigades from several districts rushed to the Hotel Anglia immediately the alarm was raised, but it took the firefighters several hours to get the blaze under control. The fire appears to have started in the hotel basement in the storage area, where there was a lot of combustible material stored. This area was already an inferno when the fire engines arrived, but eventually firefighters succeeded in extinguishing the flames. Obviously the first and most important task was to put the fire out and ensure that everyone was safe. Now investigators will have to try to establish what caused the fire. It is possible that it was caused accidentally. The storage area may have been set alight following some kind of electrical fault, or the conflagration may have been started by a cigarette left smouldering. No one yet knows. However, police have not ruled out the possibility of arson. There has been a number of fires in the area recently, although this conflagration is the most serious to date. Some of these are obviously the work of the raiser although, as yet, no one has been charged, in the case investigators found a can of petrol and a box of matches at the scene of the fire. As yet there is no proof that anyone set fire to the hotel deliberately, and nothing has been found to connect this with the other fires. It will take a considerable time for investigators to search through all the embers, looking for clues. If this is the work of arsonists, let us hope they are caught before other lives are put at risk. What is there to suggest that the fire started in the basement of the hotel? A The alarm was raised here B The basement was ablaze when the fire engines arrived C There was an electrical fault in the basement D None of the above
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Read each of the following two passages and answers to these items that follow. Your answers to these items should be based on the passage only. A city centre hotel was seriously damaged by fire last night. Guests were awoken by the fire alarm about 2 a.m. and got out safely by means of the various fire escapes. Fortunately, no one was killed or seriously injured although some people were taken to hospital, suffering from smoke-inhalation. Also, one woman sustained minor burns when flying sparks set fire to her flammable nightdress. Fire brigades from several districts rushed to the Hotel Anglia immediately the alarm was raised, but it took the firefighters several hours to get the blaze under control. The fire appears to have started in the hotel basement in the storage area, where there was a lot of combustible material stored. This area was already an inferno when the fire engines arrived, but eventually firefighters succeeded in extinguishing the flames. Obviously the first and most important task was to put the fire out and ensure that everyone was safe. Now investigators will have to try to establish what caused the fire. It is possible that it was caused accidentally. The storage area may have been set alight following some kind of electrical fault, or the conflagration may have been started by a cigarette left smouldering. No one yet knows. However, police have not ruled out the possibility of arson. There has been a number of fires in the area recently, although this conflagration is the most serious to date. Some of these are obviously the work of the raiser although, as yet, no one has been charged, in the case investigators found a can of petrol and a box of matches at the scene of the fire. As yet there is no proof that anyone set fire to the hotel deliberately, and nothing has been found to connect this with the other fires. It will take a considerable time for investigators to search through all the embers, looking for clues. If this is the work of arsonists, let us hope they are caught before other lives are put at risk. What would make it difficult to investigate and conclude that it is a case of arson—in case it is arson? A There is no evidence that the hotel was purposely set on fire B There is nothing to link the fire with a number of fires in the area C Searching for clues would be time-consuming and tedious D All of the above
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Read each of the following two passages and answers to these items that follow. Your answers to these items should be based on the passage only. A city centre hotel was seriously damaged by fire last night. Guests were awoken by the fire alarm about 2 a.m. and got out safely by means of the various fire escapes. Fortunately, no one was killed or seriously injured although some people were taken to hospital, suffering from smoke-inhalation. Also, one woman sustained minor burns when flying sparks set fire to her flammable nightdress. Fire brigades from several districts rushed to the Hotel Anglia immediately the alarm was raised, but it took the firefighters several hours to get the blaze under control. The fire appears to have started in the hotel basement in the storage area, where there was a lot of combustible material stored. This area was already an inferno when the fire engines arrived, but eventually firefighters succeeded in extinguishing the flames. Obviously the first and most important task was to put the fire out and ensure that everyone was safe. Now investigators will have to try to establish what caused the fire. It is possible that it was caused accidentally. The storage area may have been set alight following some kind of electrical fault, or the conflagration may have been started by a cigarette left smouldering. No one yet knows. However, police have not ruled out the possibility of arson. There has been a number of fires in the area recently, although this conflagration is the most serious to date. Some of these are obviously the work of the raiser although, as yet, no one has been charged, in the case investigators found a can of petrol and a box of matches at the scene of the fire. As yet there is no proof that anyone set fire to the hotel deliberately, and nothing has been found to connect this with the other fires. It will take a considerable time for investigators to search through all the embers, looking for clues. If this is the work of arsonists, let us hope they are caught before other lives are put at risk. Arson is a word that means which of the following. A Destruction of one’s own or another’s property B Raising a fire to win attention to a cause/ an issue C Malicious burning of property D Setting fire to things with the intention of protesting against the system
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Read each of the following two passages and answers to these items that follow. Your answers to these items should be based on the passage only. A city centre hotel was seriously damaged by fire last night. Guests were awoken by the fire alarm about 2 a.m. and got out safely by means of the various fire escapes. Fortunately, no one was killed or seriously injured although some people were taken to hospital, suffering from smoke-inhalation. Also, one woman sustained minor burns when flying sparks set fire to her flammable nightdress. Fire brigades from several districts rushed to the Hotel Anglia immediately the alarm was raised, but it took the firefighters several hours to get the blaze under control. The fire appears to have started in the hotel basement in the storage area, where there was a lot of combustible material stored. This area was already an inferno when the fire engines arrived, but eventually firefighters succeeded in extinguishing the flames. Obviously the first and most important task was to put the fire out and ensure that everyone was safe. Now investigators will have to try to establish what caused the fire. It is possible that it was caused accidentally. The storage area may have been set alight following some kind of electrical fault, or the conflagration may have been started by a cigarette left smouldering. No one yet knows. However, police have not ruled out the possibility of arson. There has been a number of fires in the area recently, although this conflagration is the most serious to date. Some of these are obviously the work of the raiser although, as yet, no one has been charged, in the case investigators found a can of petrol and a box of matches at the scene of the fire. As yet there is no proof that anyone set fire to the hotel deliberately, and nothing has been found to connect this with the other fires. It will take a considerable time for investigators to search through all the embers, looking for clues. If this is the work of arsonists, let us hope they are caught before other lives are put at risk. Choose a word from the options given below that best expresses the meaning of the word conflagration as used in the passage. A A destructive, usually extensive fire B Burning C Catastrophe D A criminal act that has occurred accidentally
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Read each of the following two passages and answers to these items that follow. Your answers to these items should be based on the passage only. A city centre hotel was seriously damaged by fire last night. Guests were awoken by the fire alarm about 2 a.m. and got out safely by means of the various fire escapes. Fortunately, no one was killed or seriously injured although some people were taken to hospital, suffering from smoke-inhalation. Also, one woman sustained minor burns when flying sparks set fire to her flammable nightdress. Fire brigades from several districts rushed to the Hotel Anglia immediately the alarm was raised, but it took the firefighters several hours to get the blaze under control. The fire appears to have started in the hotel basement in the storage area, where there was a lot of combustible material stored. This area was already an inferno when the fire engines arrived, but eventually firefighters succeeded in extinguishing the flames. Obviously the first and most important task was to put the fire out and ensure that everyone was safe. Now investigators will have to try to establish what caused the fire. It is possible that it was caused accidentally. The storage area may have been set alight following some kind of electrical fault, or the conflagration may have been started by a cigarette left smouldering. No one yet knows. However, police have not ruled out the possibility of arson. There has been a number of fires in the area recently, although this conflagration is the most serious to date. Some of these are obviously the work of the raiser although, as yet, no one has been charged, in the case investigators found a can of petrol and a box of matches at the scene of the fire. As yet there is no proof that anyone set fire to the hotel deliberately, and nothing has been found to connect this with the other fires. It will take a considerable time for investigators to search through all the embers, looking for clues. If this is the work of arsonists, let us hope they are caught before other lives are put at risk. Choose the word that best expresses the opposite in meaning of the word flammable as used in the passage. A Inflammable B Non-combustible C Something that cannot be destroyed D Inert
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आप एक वित्त कम्पनी के प्रबन्धक हैं। भारत में आर्थिक मन्दी की स्थिति पर आयोजित एक अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार में आपको प्रस्तुति देनी है। आपने सभी आँकड़ों तथा सूचनाओं को इक्ट्ठा कर लिया है। इनमें से कुछ आँकड़े तथा सूचनाएँ आप की कम्पनी के निवेश हेतु नुकसानदायक भी हो सकते हैं। आप क्या करेंगे? A एक ऐसी प्रस्तुति बनाएँगे, जो सभी तरह की सूचनाएँ दे रही हो, तथा निवेशकों को इस बात के प्रति सुनिश्चित करेंगे कि आपकी कम्पनी धन की सुरक्षा करने के लिए प्रत्येक सम्भावित कदम उठाएगी B केवल समर्थित आँकड़ों एवं सूचनाओं का उपयोग करते हुए अपनी प्रस्तुति बनाएँगे C विरोधी आँकड़ों पर अधिक बल दिए बगैर समर्थित आँकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करेंगे D विरोधी आँकड़ों को बेहतर साबित करने हेतु परिवर्तित कर देंगे
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