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GS-II

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Practice Test-9

Question
65 out of 80
 

Read the following passage carefully and answer the questions that follow:

To a greater or less degree all the civilized communities of the modern world are made up of a small class of ruler, corrupted by too much power, and of a large class subjects, corrupted by too much passive and irresponsible obedience. Participation in a social order to this kind makes it very difficult for individuals to achieve that non attachment in the midst of activity, which is the distinguishing mark of the ideally excellent human being; and where three is not at least a considerable degree of non attachment in activity, the ideal society of the prophets cannot be realized. A desirable social order is one that delivers us from avoidable evils. A bad social order is one that leads us into temptation which if matters were more sensibly arranged, would never rise. Our present business is to discover what large scale changes are best calculated to deliver us from the evils of too much power and of too much passive and irresponsible obedience. It has been shown that the economic reforms, so dear to advanced thinker’s are not in themselves sufficient to produce desirable changes in the character of society and of the individuals composing it unless carried out by the right sort of means and in the right sort of governmental, administrative and educational contexts such reforms are either fruitless or actually fruitful of evil. In order to create the proper contexts for economic reform we must change our machinery of government, our methods of public administration, our system of education and our metaphysical and ethical beliefs.


The author does not say:



A By participating in this kind of society one cannot remain non attached

B Bad social order leads into-temptations

C Subject indulge in obedience

D None of these

Ans. D

Practice Test-9 Flashcard List

80 flashcards
1)
निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। 1990 के दशक के आरंभ में भारतीय अर्थव्यवस्था महत्वपूर्ण नीतिगत परिवर्तनों से गुजरी थी। आर्थिक सुधारों का यह नया प्रतिरूप (मॉडल) उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण अथवा एलपीजी मॉडल के नाम से जाना जाता है। इस मॉडल का प्राथमिक उद्देश्य विश्व के सातवें सबसे बड़े देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की तीव्रतम विकासशील अर्थव्यवस्था बनाना और उन क्षमताओं का विकास करना था जिससे वह विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की बराबरी कर सके। व्यवसाय, विनिर्माण एवं वित्तीय उद्योगों के संबंध में एक के बाद एक जो सुधार हुए उनका लक्ष्य देश की अर्थव्यवस्था को अधिक लाभप्रद स्तर तक उठाना था। इन आर्थिक सुधारों ने बड़े ही महत्वपूर्ण ढंग से देश के समग्र आर्थिक विकास को प्रभावित किया। उदारीकरण का अर्थ सरकारी नियंत्रण को ढीला करने से है। भारत में आर्थिक उदारीकरण अनवरत वित्तीय सुधारों का द्योतक है जो 24 जुलाई1991 से आरंभ हुए। निजीकरण से आशय व्यवसाय एवं सेवाओं में निजी इकाइयों की भागीदारी और सार्वजनिक क्षेत्र से निजी क्षेत्रें में स्वामित्व के हस्तांतरण से भी है। वैश्वीकरण विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं के समेकन से संबंधित है। 15 अगस्त, 1947 को मिली आजादी के बाद भारतीय गणतंत्र समाजवादी आर्थिक रणनीतियों पर ही केंद्रित था। 1980 के दशक में सरकार ने नवीनीकरण के अनेक कदम उठाए। 1991 में खाड़ी युद्ध एवं सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत ने भुगतान संतुलन की दुविधा का सामना किया। देश को 47 टन सोना बैंक आफ इंग्लैंड के पास एवं 20 टन सोना यूनियन बैंक आफ स्विटजरलैंड के पास रखना पड़ा। यह अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ हुए पुनउर्त्थान समझौते के तहत अनिवार्य था। इसके अतिरिक्त अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत को व्यवस्थित आर्थिक पुनर्निर्माण अपनाने के लिये विवश किया। परिणामस्वरूप, तत्कालीन सरकार ने अभूतपूर्व आर्थिक सुधार किए। हालांकि प्रधानमंत्री द्वारा गठित समिति वे कई सुधार संचालित नहीं कर पाई जिनकी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अपेक्षा की थी। गद्यांश के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए- (i) भुगतान संतुलन के संकट से अपनी अर्थव्यवस्था को उबारने के बदले भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की शर्तें स्वीकारी। (ii) 24 जुलाई1991 तक भारत समाजवादी-आर्थिक रणनीतियों पर ही केंद्रित था। नीचे दिये कूटों में से सही उत्तर का चुनाव करें: A केवल (i)B केवल (ii) C (i) और (ii) दोनोंD न तो (i) न ही (ii)
2)
निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। 1990 के दशक के आरंभ में भारतीय अर्थव्यवस्था महत्वपूर्ण नीतिगत परिवर्तनों से गुजरी थी। आर्थिक सुधारों का यह नया प्रतिरूप (मॉडल) उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण अथवा एलपीजी मॉडल के नाम से जाना जाता है। इस मॉडल का प्राथमिक उद्देश्य विश्व के सातवें सबसे बड़े देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की तीव्रतम विकासशील अर्थव्यवस्था बनाना और उन क्षमताओं का विकास करना था जिससे वह विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की बराबरी कर सके। व्यवसाय, विनिर्माण एवं वित्तीय उद्योगों के संबंध में एक के बाद एक जो सुधार हुए उनका लक्ष्य देश की अर्थव्यवस्था को अधिक लाभप्रद स्तर तक उठाना था। इन आर्थिक सुधारों ने बड़े ही महत्वपूर्ण ढंग से देश के समग्र आर्थिक विकास को प्रभावित किया। उदारीकरण का अर्थ सरकारी नियंत्रण को ढीला करने से है। भारत में आर्थिक उदारीकरण अनवरत वित्तीय सुधारों का द्योतक है जो 24 जुलाई1991 से आरंभ हुए। निजीकरण से आशय व्यवसाय एवं सेवाओं में निजी इकाइयों की भागीदारी और सार्वजनिक क्षेत्र से निजी क्षेत्रें में स्वामित्व के हस्तांतरण से भी है। वैश्वीकरण विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं के समेकन से संबंधित है। 15 अगस्त, 1947 को मिली आजादी के बाद भारतीय गणतंत्र समाजवादी आर्थिक रणनीतियों पर ही केंद्रित था। 1980 के दशक में सरकार ने नवीनीकरण के अनेक कदम उठाए। 1991 में खाड़ी युद्ध एवं सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत ने भुगतान संतुलन की दुविधा का सामना किया। देश को 47 टन सोना बैंक आफ इंग्लैंड के पास एवं 20 टन सोना यूनियन बैंक आफ स्विटजरलैंड के पास रखना पड़ा। यह अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ हुए पुनउर्त्थान समझौते के तहत अनिवार्य था। इसके अतिरिक्त अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत को व्यवस्थित आर्थिक पुनर्निर्माण अपनाने के लिये विवश किया। परिणामस्वरूप, तत्कालीन सरकार ने अभूतपूर्व आर्थिक सुधार किए। हालांकि प्रधानमंत्री द्वारा गठित समिति वे कई सुधार संचालित नहीं कर पाई जिनकी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अपेक्षा की थी। 1991 से हुए आर्थिक सुधारों के क्या घटक रहे हैं? (i) विश्व अर्थव्यवस्था के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को जोड़ना। (ii) भारतीय अर्थव्यवस्था को और अधिक प्रतिस्पर्धात्मक बनाना। (iii) उद्योगों में सरकारी अंश को कम करना। नीचे दिए कूटों में से सही उत्तर का चुनाव करें- A केवल (iii)B केवल (i) और (iii) C (i), (ii) और (iii)D केवल (i)
3)
निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। 1990 के दशक के आरंभ में भारतीय अर्थव्यवस्था महत्वपूर्ण नीतिगत परिवर्तनों से गुजरी थी। आर्थिक सुधारों का यह नया प्रतिरूप (मॉडल) उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण अथवा एलपीजी मॉडल के नाम से जाना जाता है। इस मॉडल का प्राथमिक उद्देश्य विश्व के सातवें सबसे बड़े देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की तीव्रतम विकासशील अर्थव्यवस्था बनाना और उन क्षमताओं का विकास करना था जिससे वह विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की बराबरी कर सके। व्यवसाय, विनिर्माण एवं वित्तीय उद्योगों के संबंध में एक के बाद एक जो सुधार हुए उनका लक्ष्य देश की अर्थव्यवस्था को अधिक लाभप्रद स्तर तक उठाना था। इन आर्थिक सुधारों ने बड़े ही महत्वपूर्ण ढंग से देश के समग्र आर्थिक विकास को प्रभावित किया। उदारीकरण का अर्थ सरकारी नियंत्रण को ढीला करने से है। भारत में आर्थिक उदारीकरण अनवरत वित्तीय सुधारों का द्योतक है जो 24 जुलाई1991 से आरंभ हुए। निजीकरण से आशय व्यवसाय एवं सेवाओं में निजी इकाइयों की भागीदारी और सार्वजनिक क्षेत्र से निजी क्षेत्रें में स्वामित्व के हस्तांतरण से भी है। वैश्वीकरण विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं के समेकन से संबंधित है। 15 अगस्त, 1947 को मिली आजादी के बाद भारतीय गणतंत्र समाजवादी आर्थिक रणनीतियों पर ही केंद्रित था। 1980 के दशक में सरकार ने नवीनीकरण के अनेक कदम उठाए। 1991 में खाड़ी युद्ध एवं सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत ने भुगतान संतुलन की दुविधा का सामना किया। देश को 47 टन सोना बैंक आफ इंग्लैंड के पास एवं 20 टन सोना यूनियन बैंक आफ स्विटजरलैंड के पास रखना पड़ा। यह अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ हुए पुनउर्त्थान समझौते के तहत अनिवार्य था। इसके अतिरिक्त अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत को व्यवस्थित आर्थिक पुनर्निर्माण अपनाने के लिये विवश किया। परिणामस्वरूप, तत्कालीन सरकार ने अभूतपूर्व आर्थिक सुधार किए। हालांकि प्रधानमंत्री द्वारा गठित समिति वे कई सुधार संचालित नहीं कर पाई जिनकी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अपेक्षा की थी। 1991 में भुगतान संतुलन संकट के पीछे कौन-से तात्कालिक कारक थे? (i) समाजवादी अर्थव्यवस्था(ii) खाड़ी युद्ध (iii) सोवियत संघ का विघटन (iv) 1980 के दशक के आर्थिक नवीनीकरण उपाय पर्याप्त नहीं थे। नीचे दिये कूटों में से सही उत्तर का चुनाव करें: A केवल (i), (ii) और (iii)B केवल (ii) और (iii) C केवल (ii), (iii) और (iv)D (i), (ii), (iii) और (iv)
4)
यूँ तो जीवाणु और विषाणु में आनुवांशिक परिवर्तन महामारी फैलने का कारण हो सकते हैं, मगर कुछ महामारियां ऐसे जीवाणुओं और विषाणुओं के कारण फैलती हैं जिनमें कोई महत्वपूर्ण आनुवंशिक वैज्ञानिकों ने महामारी के सामाजिक और पारिस्थितिकीय कारकों के महत्व को जाना। उदाहरण के लिए, पोलियोमायलिटीज बीसवीं सदी में अमेरिका में एक महामारी के रूप में उभरा तब तक आधुनिक सफाई प्रबंध पोलियो के संक्रमण को किशोरावस्था या वयस्कता तक टालने में सक्षम था और उस समय तक पोलियो संक्रमण के कारण लकवा हो जाता है। इससे पहले, संक्रमण बचपन में ही हो जाता था जब यह विशेष रूप से बिना लकवे के आजीवन प्रतिरोधकता प्रदान करता था। अतः एक तरफ जहाँ साफ-सफाई ने टायफाइड महामारी की रोकथाम में सहायता की, वहीं प्रत्यक्ष रूप से लकवे वाली पोलियो महामारी को प्रोत्साहित किया। दूसरा उदाहरण लाइम रोग (lyme disease) का है, जो कि हिरण के शरीर पर पाए जाने वाले परजीवियों के द्वारा संचारित जीवाणुओं के कारण होता है। यह उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यदा-कदा ही सामने आती थी, मगर हाल ही में अमेरिका के कुछ भागों में फिर से प्रबल हो गई है। इसका कारण उपनगरों के विकास के साथ-साथ हिरणों की जनसंख्या में हुई वृद्धि एवं हिरणों के आवास स्थलों में मनोरंजक गतिविधियों का बढ़ना है। इसी तरह 1950 के दशक में डेंगू रक्तस्रावी बुखार एशिया में एक महामारी बन गया क्योंकि पारिस्थितिकीय परिवर्तनों के कारण डेंगू विषाणु का संचरण करने वाला मच्छर ऐडीज ऐजिप्टी भारी मात्र में पैदा होने लगा। इस समय अमेरिका में डेंगू महामारी के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बन गई है क्योंकि एक अन्य मच्छर ऐडीज ऐल्बोपिक्टस असावधानीपूर्वक विस्तृत रूप से फैल गया है। गद्यांश में कहा गया है कि आधुनिक सफाई प्रबंध के अभाव में निम्नलिखित में से किसके होने की संभावना सर्वाधिक है? A लाइम रोग के प्रकोप की B डेंगू रक्तस्रावी बुखार के प्रकोप की C टायफाइड महामारी की D शिशुओं में लकवा वाली पोलियो महामारी की
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यूँ तो जीवाणु और विषाणु में आनुवांशिक परिवर्तन महामारी फैलने का कारण हो सकते हैं, मगर कुछ महामारियां ऐसे जीवाणुओं और विषाणुओं के कारण फैलती हैं जिनमें कोई महत्वपूर्ण आनुवंशिक वैज्ञानिकों ने महामारी के सामाजिक और पारिस्थितिकीय कारकों के महत्व को जाना। उदाहरण के लिए, पोलियोमायलिटीज बीसवीं सदी में अमेरिका में एक महामारी के रूप में उभरा तब तक आधुनिक सफाई प्रबंध पोलियो के संक्रमण को किशोरावस्था या वयस्कता तक टालने में सक्षम था और उस समय तक पोलियो संक्रमण के कारण लकवा हो जाता है। इससे पहले, संक्रमण बचपन में ही हो जाता था जब यह विशेष रूप से बिना लकवे के आजीवन प्रतिरोधकता प्रदान करता था। अतः एक तरफ जहाँ साफ-सफाई ने टायफाइड महामारी की रोकथाम में सहायता की, वहीं प्रत्यक्ष रूप से लकवे वाली पोलियो महामारी को प्रोत्साहित किया। दूसरा उदाहरण लाइम रोग (lyme disease) का है, जो कि हिरण के शरीर पर पाए जाने वाले परजीवियों के द्वारा संचारित जीवाणुओं के कारण होता है। यह उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यदा-कदा ही सामने आती थी, मगर हाल ही में अमेरिका के कुछ भागों में फिर से प्रबल हो गई है। इसका कारण उपनगरों के विकास के साथ-साथ हिरणों की जनसंख्या में हुई वृद्धि एवं हिरणों के आवास स्थलों में मनोरंजक गतिविधियों का बढ़ना है। इसी तरह 1950 के दशक में डेंगू रक्तस्रावी बुखार एशिया में एक महामारी बन गया क्योंकि पारिस्थितिकीय परिवर्तनों के कारण डेंगू विषाणु का संचरण करने वाला मच्छर ऐडीज ऐजिप्टी भारी मात्र में पैदा होने लगा। इस समय अमेरिका में डेंगू महामारी के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बन गई है क्योंकि एक अन्य मच्छर ऐडीज ऐल्बोपिक्टस असावधानीपूर्वक विस्तृत रूप से फैल गया है। गद्यांश के अनुसार1950 के दशक में डेंगू रक्तस्रावी बुखार के प्रकोप का निम्नलिखित में से कौन-सा कारण था? A एशिया में ऐडीज ऐजिप्टी मच्छर का प्रवेश हुआ था। B ऐडीज ऐजिप्टी मच्छर की तादाद बढ़ गई थी। C ऐडीज ऐल्बोपिक्टस मच्छर डेंगू विषाणु से संक्रमित हो गया था। D जो लोग बचपन में सामान्य रूप से डेंगू विषाणु से प्रतिरोधकता प्राप्त कर लेते हैं, बड़ी उम्र में इससे संक्रमित नहीं होते
6)
यूँ तो जीवाणु और विषाणु में आनुवांशिक परिवर्तन महामारी फैलने का कारण हो सकते हैं, मगर कुछ महामारियां ऐसे जीवाणुओं और विषाणुओं के कारण फैलती हैं जिनमें कोई महत्वपूर्ण आनुवंशिक वैज्ञानिकों ने महामारी के सामाजिक और पारिस्थितिकीय कारकों के महत्व को जाना। उदाहरण के लिए, पोलियोमायलिटीज बीसवीं सदी में अमेरिका में एक महामारी के रूप में उभरा तब तक आधुनिक सफाई प्रबंध पोलियो के संक्रमण को किशोरावस्था या वयस्कता तक टालने में सक्षम था और उस समय तक पोलियो संक्रमण के कारण लकवा हो जाता है। इससे पहले, संक्रमण बचपन में ही हो जाता था जब यह विशेष रूप से बिना लकवे के आजीवन प्रतिरोधकता प्रदान करता था। अतः एक तरफ जहाँ साफ-सफाई ने टायफाइड महामारी की रोकथाम में सहायता की, वहीं प्रत्यक्ष रूप से लकवे वाली पोलियो महामारी को प्रोत्साहित किया। दूसरा उदाहरण लाइम रोग (lyme disease) का है, जो कि हिरण के शरीर पर पाए जाने वाले परजीवियों के द्वारा संचारित जीवाणुओं के कारण होता है। यह उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यदा-कदा ही सामने आती थी, मगर हाल ही में अमेरिका के कुछ भागों में फिर से प्रबल हो गई है। इसका कारण उपनगरों के विकास के साथ-साथ हिरणों की जनसंख्या में हुई वृद्धि एवं हिरणों के आवास स्थलों में मनोरंजक गतिविधियों का बढ़ना है। इसी तरह 1950 के दशक में डेंगू रक्तस्रावी बुखार एशिया में एक महामारी बन गया क्योंकि पारिस्थितिकीय परिवर्तनों के कारण डेंगू विषाणु का संचरण करने वाला मच्छर ऐडीज ऐजिप्टी भारी मात्र में पैदा होने लगा। इस समय अमेरिका में डेंगू महामारी के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बन गई है क्योंकि एक अन्य मच्छर ऐडीज ऐल्बोपिक्टस असावधानीपूर्वक विस्तृत रूप से फैल गया है। गद्यांश से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अमेरिका के कुछ भागों में लाइम रोग प्रबल हो गया है, उसके निम्नलिखित में से कौन से कारण हैं? A अमेरिका में असावधानीपूर्वक लाइम रोग के जीवाणु का प्रवेश होना। B लाइम रोग के जीवाणुओं को खत्म करने में आधुनिक स्वच्छता पद्धति की अक्षमता। C लाइम रोग के जीवाणुओं में आनुवांशिक परिवर्तन जो कि इन्हें और अधिक विषाक्त बना देते हैं। D हिरण परजीवियों के संपर्क में आने वाले मनुष्यों की संख्या में वृद्धि होना
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यूँ तो जीवाणु और विषाणु में आनुवांशिक परिवर्तन महामारी फैलने का कारण हो सकते हैं, मगर कुछ महामारियां ऐसे जीवाणुओं और विषाणुओं के कारण फैलती हैं जिनमें कोई महत्वपूर्ण आनुवंशिक वैज्ञानिकों ने महामारी के सामाजिक और पारिस्थितिकीय कारकों के महत्व को जाना। उदाहरण के लिए, पोलियोमायलिटीज बीसवीं सदी में अमेरिका में एक महामारी के रूप में उभरा तब तक आधुनिक सफाई प्रबंध पोलियो के संक्रमण को किशोरावस्था या वयस्कता तक टालने में सक्षम था और उस समय तक पोलियो संक्रमण के कारण लकवा हो जाता है। इससे पहले, संक्रमण बचपन में ही हो जाता था जब यह विशेष रूप से बिना लकवे के आजीवन प्रतिरोधकता प्रदान करता था। अतः एक तरफ जहाँ साफ-सफाई ने टायफाइड महामारी की रोकथाम में सहायता की, वहीं प्रत्यक्ष रूप से लकवे वाली पोलियो महामारी को प्रोत्साहित किया। दूसरा उदाहरण लाइम रोग (lyme disease) का है, जो कि हिरण के शरीर पर पाए जाने वाले परजीवियों के द्वारा संचारित जीवाणुओं के कारण होता है। यह उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यदा-कदा ही सामने आती थी, मगर हाल ही में अमेरिका के कुछ भागों में फिर से प्रबल हो गई है। इसका कारण उपनगरों के विकास के साथ-साथ हिरणों की जनसंख्या में हुई वृद्धि एवं हिरणों के आवास स्थलों में मनोरंजक गतिविधियों का बढ़ना है। इसी तरह 1950 के दशक में डेंगू रक्तस्रावी बुखार एशिया में एक महामारी बन गया क्योंकि पारिस्थितिकीय परिवर्तनों के कारण डेंगू विषाणु का संचरण करने वाला मच्छर ऐडीज ऐजिप्टी भारी मात्र में पैदा होने लगा। इस समय अमेरिका में डेंगू महामारी के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बन गई है क्योंकि एक अन्य मच्छर ऐडीज ऐल्बोपिक्टस असावधानीपूर्वक विस्तृत रूप से फैल गया है। गद्यांश में दी गई जानकारी के आधार पर ऐडीज ऐजिप्टी मच्छर के बारे में निम्नलिखित में से कौन से निष्कर्ष तर्कपूर्ण माने जा सकते हैं? A यह मूल रूप से अमेरिका में पाया जाता है। B यह केवल एशिया में फैल सकता है। C यह डेंगू विषाणु का संचरण करता है। D 1950 के दशक में इसके कारण डेंगू रक्तस्रावी बुखार की महामारी फैली
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(i) 7 पुस्तकें एक खास तरीके से एक के ऊपर एक रखी गई हैं। (ii) मनोविज्ञान की पुस्तक ठीक समाजशास्त्र की पुस्तक के ऊपर रखी गई है (iii) गणित की पुस्तक नीचे से चौथी और भौतिकी की पुस्तक ऊपर से पांचवी है। (iv) समाजशास्त्र  और वाणिज्य के बीच में कोई दो पुस्तकें हैं। समाजशास्त्र और विज्ञान के बीच कितनी पुस्तकें हैं? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए निम्नलिखित में से दूसरी कौन सी अतिरिक्त जानकारी यदि कोई हो, तो आवश्यक है? A जन्तु विज्ञान और गणित के बीच कोई दो पुस्तकें हैं B गणित और विज्ञान के बीच दो पुस्तकें हैं C समाजशास्त्र की पुस्तक वाणिज्य की दो पुस्तकों के ≈पर है D भौतिकशास्त्र और विज्ञान के बीच में एक पुस्तक है
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(i) 7 पुस्तकें एक खास तरीके से एक के ऊपर एक रखी गई हैं। (ii) मनोविज्ञान की पुस्तक ठीक समाजशास्त्र की पुस्तक के ऊपर रखी गई है (iii) गणित की पुस्तक नीचे से चौथी और भौतिकी की पुस्तक ऊपर से पांचवी है। (iv) समाजशास्त्र  और वाणिज्य के बीच में कोई दो पुस्तकें हैं। निम्नलिखित में से कौन सी तीन पुस्तकें भौतिकशास्त्र की पुस्तक के ऊपर रखी हैं? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए निम्नलिखित में से कौन सी अतिरिक्त जानकारी यदि हो, तो आवश्यक है? A भौतिकशास्त्र और मनोविज्ञान के बीच में कोई दो पुस्तकें हैं B वाणिज्य की पुस्तक भौतिकशास्त्र और विज्ञान के बीच में रखी है C जो पुस्तक ऊपर रखी है, वह विज्ञान की है D कोई अतिरिक्त जानकारी आवश्यक नहीं है
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 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। भारत के राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक-मण्डल के सदस्यों द्वारा किया जाता है। इस निर्वाचक-मण्डल में, समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल हस्तान्तरणीय मत के द्वारा निर्वाचित संसद तथा राज्य की विधान सभाओं के दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। विभिन्न पृथक् राज्यों के बीच समानुपात और साथ ही एक समग्र के रूप में राज्यों तथा केन्द्र के बीच समानता लाने के लिए प्रत्येक मत को उपयुक्त अधिप्रतिनिधित्व दिया जाता है। केन्द्र की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है जिसका, संविधान के अनुसार प्रयोग वह प्रत्यक्ष रूप में स्वयं अथवा अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है। राष्ट्रपति संसद को बुला सकता है। सम्बोधित कर सकता है, उसका सत्रवसान कर सकता है। उस समय को छोड़कर जिस समय संसद के दोनों सदन सत्र में हों, अन्य किसी भी समय किसी अध्यादेश को प्रख्यापित कर सकता है, वित्त एवं मुद्रा सम्बन्धी विधेयकों के लाने की अनुशंसा करता है और विधेयकों को स्वीकृति देता है, दण्डों और सजाओं को क्षमा करता हैं, उनमें कमी करता है, उनमें राहत देता है या उनमें छूट देता है तथा कुछ मामलों में उन्हें निलम्बित करता है, माफ करता है या रूपान्तरित करता है। इस बात से सन्तुष्ट होने पर कि भारत या भारत के अधिक्षेत्र के किसी भाग में अत्यन्त गम्भीर आपात-स्थिति व्याप्त है जिससे देश पर युद्ध या बाह्य-आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति के कारण देश की सुरक्षा को खतरा है, तो राष्ट्रपति आपातकाल उद्घोषित कर सकता है। किसी राज्य में संवैधानिक कार्यप्रणाली के विफल होने पर वह उस राज्य के किसी या सारे कार्यों को अपने हाथ में ले सकता है। उपर्युक्त/उपरोक्त लेखांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए एवं लेखांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर दीजिएः समानुपातिक प्रतिनिधित्व की पद्धति को------------ द्वारा सुनिश्चित किया जाता है। A एकल हस्तान्तरणीय मत B प्रत्येक मत के अधिप्रतिनिधित्व C अधिप्रतिनिधित्व को समानता के मत में बदलकर D छोटे राज्यों के मतों को बड़े राज्यों के मतों में हस्तान्तरित कर
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 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। भारत के राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक-मण्डल के सदस्यों द्वारा किया जाता है। इस निर्वाचक-मण्डल में, समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल हस्तान्तरणीय मत के द्वारा निर्वाचित संसद तथा राज्य की विधान सभाओं के दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। विभिन्न पृथक् राज्यों के बीच समानुपात और साथ ही एक समग्र के रूप में राज्यों तथा केन्द्र के बीच समानता लाने के लिए प्रत्येक मत को उपयुक्त अधिप्रतिनिधित्व दिया जाता है। केन्द्र की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है जिसका, संविधान के अनुसार प्रयोग वह प्रत्यक्ष रूप में स्वयं अथवा अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है। राष्ट्रपति संसद को बुला सकता है। सम्बोधित कर सकता है, उसका सत्रवसान कर सकता है। उस समय को छोड़कर जिस समय संसद के दोनों सदन सत्र में हों, अन्य किसी भी समय किसी अध्यादेश को प्रख्यापित कर सकता है, वित्त एवं मुद्रा सम्बन्धी विधेयकों के लाने की अनुशंसा करता है और विधेयकों को स्वीकृति देता है, दण्डों और सजाओं को क्षमा करता हैं, उनमें कमी करता है, उनमें राहत देता है या उनमें छूट देता है तथा कुछ मामलों में उन्हें निलम्बित करता है, माफ करता है या रूपान्तरित करता है। इस बात से सन्तुष्ट होने पर कि भारत या भारत के अधिक्षेत्र के किसी भाग में अत्यन्त गम्भीर आपात-स्थिति व्याप्त है जिससे देश पर युद्ध या बाह्य-आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति के कारण देश की सुरक्षा को खतरा है, तो राष्ट्रपति आपातकाल उद्घोषित कर सकता है। किसी राज्य में संवैधानिक कार्यप्रणाली के विफल होने पर वह उस राज्य के किसी या सारे कार्यों को अपने हाथ में ले सकता है। उपर्युक्त/उपरोक्त लेखांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए एवं लेखांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर दीजिएः इस उद्धरण में उठाई गयी समस्या प्रतिबिम्बित करती है: A निर्वाचक मण्डल का गठन, संसद तथा राज्य विधान सभाओं के दोनों सदनों के सभी सदस्यों सहित होना चाहिए B राष्ट्रपति को जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुना जाना चाहिए C राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मण्डल द्वारा किया जाता है जिसका गठन संसद के दोनों सदनों के सदस्यों द्वारा होता है D निर्वाचक मण्डल का गठन संसद तथा राज्य विधान सभा के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों से होता है
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 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। भारत के राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक-मण्डल के सदस्यों द्वारा किया जाता है। इस निर्वाचक-मण्डल में, समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल हस्तान्तरणीय मत के द्वारा निर्वाचित संसद तथा राज्य की विधान सभाओं के दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। विभिन्न पृथक् राज्यों के बीच समानुपात और साथ ही एक समग्र के रूप में राज्यों तथा केन्द्र के बीच समानता लाने के लिए प्रत्येक मत को उपयुक्त अधिप्रतिनिधित्व दिया जाता है। केन्द्र की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है जिसका, संविधान के अनुसार प्रयोग वह प्रत्यक्ष रूप में स्वयं अथवा अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है। राष्ट्रपति संसद को बुला सकता है। सम्बोधित कर सकता है, उसका सत्रवसान कर सकता है। उस समय को छोड़कर जिस समय संसद के दोनों सदन सत्र में हों, अन्य किसी भी समय किसी अध्यादेश को प्रख्यापित कर सकता है, वित्त एवं मुद्रा सम्बन्धी विधेयकों के लाने की अनुशंसा करता है और विधेयकों को स्वीकृति देता है, दण्डों और सजाओं को क्षमा करता हैं, उनमें कमी करता है, उनमें राहत देता है या उनमें छूट देता है तथा कुछ मामलों में उन्हें निलम्बित करता है, माफ करता है या रूपान्तरित करता है। इस बात से सन्तुष्ट होने पर कि भारत या भारत के अधिक्षेत्र के किसी भाग में अत्यन्त गम्भीर आपात-स्थिति व्याप्त है जिससे देश पर युद्ध या बाह्य-आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति के कारण देश की सुरक्षा को खतरा है, तो राष्ट्रपति आपातकाल उद्घोषित कर सकता है। किसी राज्य में संवैधानिक कार्यप्रणाली के विफल होने पर वह उस राज्य के किसी या सारे कार्यों को अपने हाथ में ले सकता है। उपर्युक्त/उपरोक्त लेखांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए एवं लेखांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर दीजिएः राष्ट्रपति आपातकाल की उद्घोषणा कर सकता है जब--------------- को गम्भीर खतरा होः A भारत की सुरक्षा B उसके जीवन एवं सम्पत्ति C राज्य सरकार के कार्यपालिका सम्बन्धी कार्यों D भारत के एक राजनीतिक दल
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 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। भारत के राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक-मण्डल के सदस्यों द्वारा किया जाता है। इस निर्वाचक-मण्डल में, समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल हस्तान्तरणीय मत के द्वारा निर्वाचित संसद तथा राज्य की विधान सभाओं के दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। विभिन्न पृथक् राज्यों के बीच समानुपात और साथ ही एक समग्र के रूप में राज्यों तथा केन्द्र के बीच समानता लाने के लिए प्रत्येक मत को उपयुक्त अधिप्रतिनिधित्व दिया जाता है। केन्द्र की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है जिसका, संविधान के अनुसार प्रयोग वह प्रत्यक्ष रूप में स्वयं अथवा अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है। राष्ट्रपति संसद को बुला सकता है। सम्बोधित कर सकता है, उसका सत्रवसान कर सकता है। उस समय को छोड़कर जिस समय संसद के दोनों सदन सत्र में हों, अन्य किसी भी समय किसी अध्यादेश को प्रख्यापित कर सकता है, वित्त एवं मुद्रा सम्बन्धी विधेयकों के लाने की अनुशंसा करता है और विधेयकों को स्वीकृति देता है, दण्डों और सजाओं को क्षमा करता हैं, उनमें कमी करता है, उनमें राहत देता है या उनमें छूट देता है तथा कुछ मामलों में उन्हें निलम्बित करता है, माफ करता है या रूपान्तरित करता है। इस बात से सन्तुष्ट होने पर कि भारत या भारत के अधिक्षेत्र के किसी भाग में अत्यन्त गम्भीर आपात-स्थिति व्याप्त है जिससे देश पर युद्ध या बाह्य-आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति के कारण देश की सुरक्षा को खतरा है, तो राष्ट्रपति आपातकाल उद्घोषित कर सकता है। किसी राज्य में संवैधानिक कार्यप्रणाली के विफल होने पर वह उस राज्य के किसी या सारे कार्यों को अपने हाथ में ले सकता है। उपर्युक्त/उपरोक्त लेखांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए एवं लेखांश के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर दीजिएः राष्ट्रपति--------------- अध्यादेश प्रख्यापित कर सकते हैं। A किसी भी समय B संसद जब बैठक में हो तो केवल एक बार C जब संसद की संयुुक्त बैठक चल रही हो D उस समय को छोड़कर जब संसद के दोनों सदन सत्र में हों
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मुस्लिम समाज के बारे में एक धारणा यह है कि वह एक रूढ़िवादी, इकहरा समाज है। इस धारणा को वोटों की या धर्म की राजनीति करने वाले खूब भुनाते हैं। चाहे वे हिन्दू कट्टरपंथी हों या स्वयंभू मुस्लिम नेता। लेकिन सच यह है कि मुसलिम समाज में लगातार परिवर्तन और बहसें होती रहती है, जैसी किसी भी समाज में होनी चाहिए। मुस्लिम समाज अपनी स्थिति से वाकिफ़ भी है और उसे बेहतर बनाने की कोशिशों में भी है। इसी नजरिये से दारुल उलूम, देवबंद के उस विचार को देखा जाना चाहिए, जो राजनीति और धर्म के बारे में उसने पेश किया है। दारुल उलूम की ओर से यह कहा गया है कि मुसलमानों को धर्म के आधार पर वोट नहीं देना चाहिए, बल्कि इस आधार पर वोट देना चाहिए कि कौन सा उम्मीदवार बेहतर है और अपने क्षेत्र का विकास कर सकता है। इसी सिलसिले में दारुल उलूम के एक महत्वपूर्ण धार्मिक नेता ने कहा कि मुसलमानों को धर्म आधारित नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को वोट देना चाहिए। दारुल उलूम का यह रवैया उसकी विचारधारा में निरंतरता को ही दिखाता है। दारुल उलूम की स्थापना 19वीं शताब्दी में हुई थी, जब भारत के सभी धर्मों के नेता यह सोच रहे थे कि अंग्रेजी राज और पश्चिमी सभ्यता के दबाव में भारत के धर्मों और संस्कृतियों को खतरा है। दारुल उलूम इस मामले में हमेशा से राष्ट्रवादी रहा और अंग्रेजी प्रभुत्व का विरोधी रहा और इस्लाम के प्रति उसकी धारणा काफी हद तक शुद्धतावादी रही। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि परंपरावादी मुस्लिम नेतृत्व ही अंत तक राष्ट्रवादी बना रहा, चाहे वे अली बंधु हो, अकबर इलाहाबादी जैसे शायर हों या मौलाना आजाद जैसे विद्वान व जननेता। इसके विपरीत सैयद अहमद से लेकर मोहम्मद अली जिन्ना तक जो आधुनिकतावादी नेता थे, वे अलगाववाद और आखिरकार विभाजन के निमित्त बने। दारुल उलूम ने विभाजन का खुले शब्दों में विरोध किया था। इसी तरह धर्म के नाम पर आतंकवाद का भी उसने पुरजोर विरोध किया है और यह उसने इस्लामी धर्मशास्त्र के आधार पर ही किया। दारुल उलूम, देवबंद से निकले लोग पाकिस्तान में कट्टरवाद के समर्थक हो गए, इसलिए कभी-कभी देवबंदियों को कट्टरवादी मान लिया जाता है। वास्तविकता में देवबंदी परंपरावादी तो हैं, कुछ मामलों में उनकी राय रूढ़िवादी भी हैं, लेकिन वे कट्टरवाद या अलगाववाद के सख्त खिलाफ हैं। इसके ठीक पहले शिया धर्मगुरु और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष कल्बे सादिक भी मुसलमानों से यह अपील कर चुके हैं कि वे धर्म नहीं, बल्कि उम्मीदवार के चरित्र के आधार पर वोट दें। इस तरह की बातों से उन मुस्लिम नेताओं को परेशानी हो सकती है, जो धर्म की राजनीति करते हैं। मुस्लिमों में से ज्यादातर यह सोचने लगे हैं कि व्यापक समाज से अलग-थलग होकर उनका भला नहीं होगा। उनकी तरक्की का रास्ता यही है कि ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम शिक्षित हों और समाज में बेहतर दर्जा हासिल करें, इसके लिए धर्म की राजनीति करने वाले नेताओं को किनारे करना जरूरी है। लेकिन इसी के साथ बहुसंख्यक हिन्दू समाज और उनके नेताओं को भी यह साबित करना होगा कि वे मुस्लिम समाज के हितों का ख्याल करते हैं। पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद और गुजरात के दंगों जैसी घटनाओं ने दोनों समाजों के बीच खाई को चौड़ा कर दिया है। दोनों समुदायों के कुछ नेता इस दूरी का राजनीतिक फायदा उठाना चाहते हैं, लेकिन व्यापक मुस्लिम समाज इस खाई को खतरा समझ रहा है। दारुल उलूम जैसे संगठन और कल्बे सादिक जैसे नेताओं के बयान इसी ओर संकेत करते हैं। बहुसंख्यक समाज भी अगर इस बात को समझे, तो इसमें देश की भलाई है। प्रस्तुत लेखांश के आधार पर उपयुक्त शीर्षक निम्न हैं: A धर्म और वोटB राजनीति और धर्म C मुसलमान और वोटD दारुल उलूम और राजनीति
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मुस्लिम समाज के बारे में एक धारणा यह है कि वह एक रूढ़िवादी, इकहरा समाज है। इस धारणा को वोटों की या धर्म की राजनीति करने वाले खूब भुनाते हैं। चाहे वे हिन्दू कट्टरपंथी हों या स्वयंभू मुस्लिम नेता। लेकिन सच यह है कि मुसलिम समाज में लगातार परिवर्तन और बहसें होती रहती है, जैसी किसी भी समाज में होनी चाहिए। मुस्लिम समाज अपनी स्थिति से वाकिफ़ भी है और उसे बेहतर बनाने की कोशिशों में भी है। इसी नजरिये से दारुल उलूम, देवबंद के उस विचार को देखा जाना चाहिए, जो राजनीति और धर्म के बारे में उसने पेश किया है। दारुल उलूम की ओर से यह कहा गया है कि मुसलमानों को धर्म के आधार पर वोट नहीं देना चाहिए, बल्कि इस आधार पर वोट देना चाहिए कि कौन सा उम्मीदवार बेहतर है और अपने क्षेत्र का विकास कर सकता है। इसी सिलसिले में दारुल उलूम के एक महत्वपूर्ण धार्मिक नेता ने कहा कि मुसलमानों को धर्म आधारित नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को वोट देना चाहिए। दारुल उलूम का यह रवैया उसकी विचारधारा में निरंतरता को ही दिखाता है। दारुल उलूम की स्थापना 19वीं शताब्दी में हुई थी, जब भारत के सभी धर्मों के नेता यह सोच रहे थे कि अंग्रेजी राज और पश्चिमी सभ्यता के दबाव में भारत के धर्मों और संस्कृतियों को खतरा है। दारुल उलूम इस मामले में हमेशा से राष्ट्रवादी रहा और अंग्रेजी प्रभुत्व का विरोधी रहा और इस्लाम के प्रति उसकी धारणा काफी हद तक शुद्धतावादी रही। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि परंपरावादी मुस्लिम नेतृत्व ही अंत तक राष्ट्रवादी बना रहा, चाहे वे अली बंधु हो, अकबर इलाहाबादी जैसे शायर हों या मौलाना आजाद जैसे विद्वान व जननेता। इसके विपरीत सैयद अहमद से लेकर मोहम्मद अली जिन्ना तक जो आधुनिकतावादी नेता थे, वे अलगाववाद और आखिरकार विभाजन के निमित्त बने। दारुल उलूम ने विभाजन का खुले शब्दों में विरोध किया था। इसी तरह धर्म के नाम पर आतंकवाद का भी उसने पुरजोर विरोध किया है और यह उसने इस्लामी धर्मशास्त्र के आधार पर ही किया। दारुल उलूम, देवबंद से निकले लोग पाकिस्तान में कट्टरवाद के समर्थक हो गए, इसलिए कभी-कभी देवबंदियों को कट्टरवादी मान लिया जाता है। वास्तविकता में देवबंदी परंपरावादी तो हैं, कुछ मामलों में उनकी राय रूढ़िवादी भी हैं, लेकिन वे कट्टरवाद या अलगाववाद के सख्त खिलाफ हैं। इसके ठीक पहले शिया धर्मगुरु और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष कल्बे सादिक भी मुसलमानों से यह अपील कर चुके हैं कि वे धर्म नहीं, बल्कि उम्मीदवार के चरित्र के आधार पर वोट दें। इस तरह की बातों से उन मुस्लिम नेताओं को परेशानी हो सकती है, जो धर्म की राजनीति करते हैं। मुस्लिमों में से ज्यादातर यह सोचने लगे हैं कि व्यापक समाज से अलग-थलग होकर उनका भला नहीं होगा। उनकी तरक्की का रास्ता यही है कि ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम शिक्षित हों और समाज में बेहतर दर्जा हासिल करें, इसके लिए धर्म की राजनीति करने वाले नेताओं को किनारे करना जरूरी है। लेकिन इसी के साथ बहुसंख्यक हिन्दू समाज और उनके नेताओं को भी यह साबित करना होगा कि वे मुस्लिम समाज के हितों का ख्याल करते हैं। पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद और गुजरात के दंगों जैसी घटनाओं ने दोनों समाजों के बीच खाई को चौड़ा कर दिया है। दोनों समुदायों के कुछ नेता इस दूरी का राजनीतिक फायदा उठाना चाहते हैं, लेकिन व्यापक मुस्लिम समाज इस खाई को खतरा समझ रहा है। दारुल उलूम जैसे संगठन और कल्बे सादिक जैसे नेताओं के बयान इसी ओर संकेत करते हैं। बहुसंख्यक समाज भी अगर इस बात को समझे, तो इसमें देश की भलाई है। दिये गए लेखांश का अंतर्निहित विषय क्या है? A धर्म का राजनीति से संबंध B मुसलमान और आतंकवाद C मुसलमान, राजनीति और देवबंद D मुसलमान: आधुनिकतावादी व राष्ट्रवादी
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मुस्लिम समाज के बारे में एक धारणा यह है कि वह एक रूढ़िवादी, इकहरा समाज है। इस धारणा को वोटों की या धर्म की राजनीति करने वाले खूब भुनाते हैं। चाहे वे हिन्दू कट्टरपंथी हों या स्वयंभू मुस्लिम नेता। लेकिन सच यह है कि मुसलिम समाज में लगातार परिवर्तन और बहसें होती रहती है, जैसी किसी भी समाज में होनी चाहिए। मुस्लिम समाज अपनी स्थिति से वाकिफ़ भी है और उसे बेहतर बनाने की कोशिशों में भी है। इसी नजरिये से दारुल उलूम, देवबंद के उस विचार को देखा जाना चाहिए, जो राजनीति और धर्म के बारे में उसने पेश किया है। दारुल उलूम की ओर से यह कहा गया है कि मुसलमानों को धर्म के आधार पर वोट नहीं देना चाहिए, बल्कि इस आधार पर वोट देना चाहिए कि कौन सा उम्मीदवार बेहतर है और अपने क्षेत्र का विकास कर सकता है। इसी सिलसिले में दारुल उलूम के एक महत्वपूर्ण धार्मिक नेता ने कहा कि मुसलमानों को धर्म आधारित नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को वोट देना चाहिए। दारुल उलूम का यह रवैया उसकी विचारधारा में निरंतरता को ही दिखाता है। दारुल उलूम की स्थापना 19वीं शताब्दी में हुई थी, जब भारत के सभी धर्मों के नेता यह सोच रहे थे कि अंग्रेजी राज और पश्चिमी सभ्यता के दबाव में भारत के धर्मों और संस्कृतियों को खतरा है। दारुल उलूम इस मामले में हमेशा से राष्ट्रवादी रहा और अंग्रेजी प्रभुत्व का विरोधी रहा और इस्लाम के प्रति उसकी धारणा काफी हद तक शुद्धतावादी रही। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि परंपरावादी मुस्लिम नेतृत्व ही अंत तक राष्ट्रवादी बना रहा, चाहे वे अली बंधु हो, अकबर इलाहाबादी जैसे शायर हों या मौलाना आजाद जैसे विद्वान व जननेता। इसके विपरीत सैयद अहमद से लेकर मोहम्मद अली जिन्ना तक जो आधुनिकतावादी नेता थे, वे अलगाववाद और आखिरकार विभाजन के निमित्त बने। दारुल उलूम ने विभाजन का खुले शब्दों में विरोध किया था। इसी तरह धर्म के नाम पर आतंकवाद का भी उसने पुरजोर विरोध किया है और यह उसने इस्लामी धर्मशास्त्र के आधार पर ही किया। दारुल उलूम, देवबंद से निकले लोग पाकिस्तान में कट्टरवाद के समर्थक हो गए, इसलिए कभी-कभी देवबंदियों को कट्टरवादी मान लिया जाता है। वास्तविकता में देवबंदी परंपरावादी तो हैं, कुछ मामलों में उनकी राय रूढ़िवादी भी हैं, लेकिन वे कट्टरवाद या अलगाववाद के सख्त खिलाफ हैं। इसके ठीक पहले शिया धर्मगुरु और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष कल्बे सादिक भी मुसलमानों से यह अपील कर चुके हैं कि वे धर्म नहीं, बल्कि उम्मीदवार के चरित्र के आधार पर वोट दें। इस तरह की बातों से उन मुस्लिम नेताओं को परेशानी हो सकती है, जो धर्म की राजनीति करते हैं। मुस्लिमों में से ज्यादातर यह सोचने लगे हैं कि व्यापक समाज से अलग-थलग होकर उनका भला नहीं होगा। उनकी तरक्की का रास्ता यही है कि ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम शिक्षित हों और समाज में बेहतर दर्जा हासिल करें, इसके लिए धर्म की राजनीति करने वाले नेताओं को किनारे करना जरूरी है। लेकिन इसी के साथ बहुसंख्यक हिन्दू समाज और उनके नेताओं को भी यह साबित करना होगा कि वे मुस्लिम समाज के हितों का ख्याल करते हैं। पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद और गुजरात के दंगों जैसी घटनाओं ने दोनों समाजों के बीच खाई को चौड़ा कर दिया है। दोनों समुदायों के कुछ नेता इस दूरी का राजनीतिक फायदा उठाना चाहते हैं, लेकिन व्यापक मुस्लिम समाज इस खाई को खतरा समझ रहा है। दारुल उलूम जैसे संगठन और कल्बे सादिक जैसे नेताओं के बयान इसी ओर संकेत करते हैं। बहुसंख्यक समाज भी अगर इस बात को समझे, तो इसमें देश की भलाई है। किस संगठन के धार्मिक नेता ने कहा कि मुसलमानों को धर्म आधारित नहीं बल्कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को वोट देना चाहिए। A मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्डB देवबंद दारुल उलूम C कल्बे सादिकD मुहम्मद अली जिन्ना
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मुस्लिम समाज के बारे में एक धारणा यह है कि वह एक रूढ़िवादी, इकहरा समाज है। इस धारणा को वोटों की या धर्म की राजनीति करने वाले खूब भुनाते हैं। चाहे वे हिन्दू कट्टरपंथी हों या स्वयंभू मुस्लिम नेता। लेकिन सच यह है कि मुसलिम समाज में लगातार परिवर्तन और बहसें होती रहती है, जैसी किसी भी समाज में होनी चाहिए। मुस्लिम समाज अपनी स्थिति से वाकिफ़ भी है और उसे बेहतर बनाने की कोशिशों में भी है। इसी नजरिये से दारुल उलूम, देवबंद के उस विचार को देखा जाना चाहिए, जो राजनीति और धर्म के बारे में उसने पेश किया है। दारुल उलूम की ओर से यह कहा गया है कि मुसलमानों को धर्म के आधार पर वोट नहीं देना चाहिए, बल्कि इस आधार पर वोट देना चाहिए कि कौन सा उम्मीदवार बेहतर है और अपने क्षेत्र का विकास कर सकता है। इसी सिलसिले में दारुल उलूम के एक महत्वपूर्ण धार्मिक नेता ने कहा कि मुसलमानों को धर्म आधारित नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को वोट देना चाहिए। दारुल उलूम का यह रवैया उसकी विचारधारा में निरंतरता को ही दिखाता है। दारुल उलूम की स्थापना 19वीं शताब्दी में हुई थी, जब भारत के सभी धर्मों के नेता यह सोच रहे थे कि अंग्रेजी राज और पश्चिमी सभ्यता के दबाव में भारत के धर्मों और संस्कृतियों को खतरा है। दारुल उलूम इस मामले में हमेशा से राष्ट्रवादी रहा और अंग्रेजी प्रभुत्व का विरोधी रहा और इस्लाम के प्रति उसकी धारणा काफी हद तक शुद्धतावादी रही। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि परंपरावादी मुस्लिम नेतृत्व ही अंत तक राष्ट्रवादी बना रहा, चाहे वे अली बंधु हो, अकबर इलाहाबादी जैसे शायर हों या मौलाना आजाद जैसे विद्वान व जननेता। इसके विपरीत सैयद अहमद से लेकर मोहम्मद अली जिन्ना तक जो आधुनिकतावादी नेता थे, वे अलगाववाद और आखिरकार विभाजन के निमित्त बने। दारुल उलूम ने विभाजन का खुले शब्दों में विरोध किया था। इसी तरह धर्म के नाम पर आतंकवाद का भी उसने पुरजोर विरोध किया है और यह उसने इस्लामी धर्मशास्त्र के आधार पर ही किया। दारुल उलूम, देवबंद से निकले लोग पाकिस्तान में कट्टरवाद के समर्थक हो गए, इसलिए कभी-कभी देवबंदियों को कट्टरवादी मान लिया जाता है। वास्तविकता में देवबंदी परंपरावादी तो हैं, कुछ मामलों में उनकी राय रूढ़िवादी भी हैं, लेकिन वे कट्टरवाद या अलगाववाद के सख्त खिलाफ हैं। इसके ठीक पहले शिया धर्मगुरु और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष कल्बे सादिक भी मुसलमानों से यह अपील कर चुके हैं कि वे धर्म नहीं, बल्कि उम्मीदवार के चरित्र के आधार पर वोट दें। इस तरह की बातों से उन मुस्लिम नेताओं को परेशानी हो सकती है, जो धर्म की राजनीति करते हैं। मुस्लिमों में से ज्यादातर यह सोचने लगे हैं कि व्यापक समाज से अलग-थलग होकर उनका भला नहीं होगा। उनकी तरक्की का रास्ता यही है कि ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम शिक्षित हों और समाज में बेहतर दर्जा हासिल करें, इसके लिए धर्म की राजनीति करने वाले नेताओं को किनारे करना जरूरी है। लेकिन इसी के साथ बहुसंख्यक हिन्दू समाज और उनके नेताओं को भी यह साबित करना होगा कि वे मुस्लिम समाज के हितों का ख्याल करते हैं। पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद और गुजरात के दंगों जैसी घटनाओं ने दोनों समाजों के बीच खाई को चौड़ा कर दिया है। दोनों समुदायों के कुछ नेता इस दूरी का राजनीतिक फायदा उठाना चाहते हैं, लेकिन व्यापक मुस्लिम समाज इस खाई को खतरा समझ रहा है। दारुल उलूम जैसे संगठन और कल्बे सादिक जैसे नेताओं के बयान इसी ओर संकेत करते हैं। बहुसंख्यक समाज भी अगर इस बात को समझे, तो इसमें देश की भलाई है। निम्न कथनों पर ध्यान दें: 1- आधुनिकतावादी नेता का मतलब उदारवाद व राष्ट्रवाद है। 2- परंपरावादी का अर्थ पाखंडवाद व राष्ट्रविरोधी है। 3- देवबंद के लोग पाकिस्तान में कट्टरवाद के विरोधी हो गए। 4- शिया धर्म गुरु के अनुसार वोट चरित्र के आधार पर दें। उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से कथन सही है/हैं? A 1, 2 और 4B 1, 3 और 4 C केवल 4D 1, 2 और 3
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रतिदिन की बातचीत में हम अच्छी याददाश्त का जिक्र करते हैं, बुरी याददाश्त का भी जिक्र करते हैं और उन-उन चेहरों को उनके नाम से ज्यादा याद रखते हैं जिनकी याददाश्त अच्छी रही है अथवा जिनकी याददाश्त बहुत बुरी रही है। वफ़ुछ बातों से यह तथ्य सामने आता है कि याददाश्त एक वस्तु है। एक वस्तु जिसे हम उसी तरह रखते हैं जिस तरह एक माथे या पैर के एक बडे़ अंगूठे को रखते हैं। अतः यह सही कहा जाता है कि याददाश्त जैसी कोई चीज नहीं पैर का एक बड़ा अंगूठा देखा और छुआ जा सकता है लेकिन याददाश्त को नहीं। कोई यदि यह दावा करता है कि उसकी याददाश्त अति उत्तम है तो हम उसके दावे की सत्यता की जाँच उसी तरह नहीं कर सकते जिस तरह यदि कोई यह कहता है कि उसके पास काफी बड़ा ग्रंथागार/पुस्तकालय है। हम उससे उसकी याददाश्त दिखाने के लिए नहीं कह सकते। हालाँकि जो हम कर सकते हैं वह बस इतना कि उसके अनुभव कितने पुराने हैं और उसने आजतक जितनी किताबें पढ़ी हैं उनके नाम उसे याद तक हैं भी या नहीं। याददाश्त भविष्य में इस्तेमाल की जाने वाली अतीत की भौतिक एवं मानसिक स्मृति है। मस्तिष्क एवं शरीर अनुभवों को भुला देता है। जो या तो अनुपयोगी हैं अथवा अवांछित हैं। लेखक कहता है किः- A याददाश्त मूर्त नहीं है। B याददाश्त पैर के बड़े अंगूठे के समान है। C पैर के बड़ें अंगूठे याददाश्त से ज्यादा मूर्त होते हैं। D याददाश्त एक वस्तु है।
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रतिदिन की बातचीत में हम अच्छी याददाश्त का जिक्र करते हैं, बुरी याददाश्त का भी जिक्र करते हैं और उन-उन चेहरों को उनके नाम से ज्यादा याद रखते हैं जिनकी याददाश्त अच्छी रही है अथवा जिनकी याददाश्त बहुत बुरी रही है। वफ़ुछ बातों से यह तथ्य सामने आता है कि याददाश्त एक वस्तु है। एक वस्तु जिसे हम उसी तरह रखते हैं जिस तरह एक माथे या पैर के एक बडे़ अंगूठे को रखते हैं। अतः यह सही कहा जाता है कि याददाश्त जैसी कोई चीज नहीं पैर का एक बड़ा अंगूठा देखा और छुआ जा सकता है लेकिन याददाश्त को नहीं। कोई यदि यह दावा करता है कि उसकी याददाश्त अति उत्तम है तो हम उसके दावे की सत्यता की जाँच उसी तरह नहीं कर सकते जिस तरह यदि कोई यह कहता है कि उसके पास काफी बड़ा ग्रंथागार/पुस्तकालय है। हम उससे उसकी याददाश्त दिखाने के लिए नहीं कह सकते। हालाँकि जो हम कर सकते हैं वह बस इतना कि उसके अनुभव कितने पुराने हैं और उसने आजतक जितनी किताबें पढ़ी हैं उनके नाम उसे याद तक हैं भी या नहीं। याददाश्त भविष्य में इस्तेमाल की जाने वाली अतीत की भौतिक एवं मानसिक स्मृति है। मस्तिष्क एवं शरीर अनुभवों को भुला देता है। जो या तो अनुपयोगी हैं अथवा अवांछित हैं। लेखक का तात्पर्य है किः- A याददाश्त मस्तिष्क के साथ की जानेवाली कोई छेडछाड़ है B याददाश्त मस्तिष्क के साथ की जानेवाली कोई छेडछाड़ नहीं है C याददाश्त एक बहुत अच्छे से संग्रहित किए गए पुस्तकालय की तरह है D याददाश्त अनुभव है।
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रतिदिन की बातचीत में हम अच्छी याददाश्त का जिक्र करते हैं, बुरी याददाश्त का भी जिक्र करते हैं और उन-उन चेहरों को उनके नाम से ज्यादा याद रखते हैं जिनकी याददाश्त अच्छी रही है अथवा जिनकी याददाश्त बहुत बुरी रही है। वफ़ुछ बातों से यह तथ्य सामने आता है कि याददाश्त एक वस्तु है। एक वस्तु जिसे हम उसी तरह रखते हैं जिस तरह एक माथे या पैर के एक बडे़ अंगूठे को रखते हैं। अतः यह सही कहा जाता है कि याददाश्त जैसी कोई चीज नहीं पैर का एक बड़ा अंगूठा देखा और छुआ जा सकता है लेकिन याददाश्त को नहीं। कोई यदि यह दावा करता है कि उसकी याददाश्त अति उत्तम है तो हम उसके दावे की सत्यता की जाँच उसी तरह नहीं कर सकते जिस तरह यदि कोई यह कहता है कि उसके पास काफी बड़ा ग्रंथागार/पुस्तकालय है। हम उससे उसकी याददाश्त दिखाने के लिए नहीं कह सकते। हालाँकि जो हम कर सकते हैं वह बस इतना कि उसके अनुभव कितने पुराने हैं और उसने आजतक जितनी किताबें पढ़ी हैं उनके नाम उसे याद तक हैं भी या नहीं। याददाश्त भविष्य में इस्तेमाल की जाने वाली अतीत की भौतिक एवं मानसिक स्मृति है। मस्तिष्क एवं शरीर अनुभवों को भुला देता है। जो या तो अनुपयोगी हैं अथवा अवांछित हैं। याददाश्त संबंधित हैः A अतीत के साथB वर्तमान के साथ C भविष्य के साथD अतीत और वर्तमान दोनों के साथ
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पूर्वी एशिया में आर्थिक विकास में भू-सुधारों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इस बारे में भी चीन की सुधारपूर्व सफलताओं ने सुधारोपरान्त आर्थिक प्रसार का मार्ग सहज बनाने का बड़ा कार्य किया है। जैसे चीन की व्यवस्था केवल भू-सुधारों तक सीमित नहीं रही, वहां तो इनसे कहीं आगे बढने का प्रयास किया गया था, किंतु कृषि के सामुदायिकरण के पराकाष्ठा काल में जो ज्यादतियाँ हुईं उनके परिणामस्वरूप सुधारपूर्व अवधि के कृषि प्रसार में बहुत बाधाएं आयी थीं। फिर भी उस सामुदायीकरण ने चीन में भूस्वामित्व व्यवस्था में एक निर्णयक बदलाव ला ही दिया वहां से जमींदारी जैसी समामन्तयुगीन प्रथा का उन्मूलन हो गया। इसके बाद जब चीन सरकार ने कृषि में ‘उत्तरदायित्व व्यवस्था’ प्रारंभ करने का निर्णय लिया तो वहां एक ऐसी भूस्वामित्व प्रणाली विद्यमान थी जिसे बिचौलियों रहित व्यक्तिगत किसानी व्यवस्था में परिवर्तित करना बहुत सरल था। इस प्रकार चीन की कृषि व्यवस्था की सरंचना भारत के अनेक भागों में प्रचलित व्यवस्था के विपरीत प्रभावकारी बंधनों से मुक्त रही। यह भी ध्यान देने की बात है कि सारे पूर्वी एशियाई देशो में जिन संस्थागत परिर्तनों ने व्यापक भागीदारीपूर्ण आर्थिक प्रसार का मार्ग प्रशस्त किया है, उनकी शुरूआत अलग-अलग ढंग से हुई थी। (इन सुधारों में प्रमुख रहे हैं प्राथमिक शिक्षक ओर स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रसार तथा जमींदारी जैसी प्रथाओं का अंत।) कुछ मामलों में तो विदेशियों के कब्जे ने ही भू-सुधार का काम आरंभ किया था। उदाहरणस्वरूप ताईवान एवं द- कोरिया में यह कार्य जापानी उपनिवेशवाद की देन रहा। सुधारों के ये कार्य देश ने अपनी स्वप्रेरणा से भी आरभ किए किंतु प्रत्येक अवस्था में बाजार पर आधारित आर्थिक प्रसार के कार्यक्रमो में समाज में आए इन मौलिक परिवर्तनों का बहुत बडा योगदान रहा है। गद्यांश के अनुसार ‘जवाबदेही की व्यवस्था’ के रूप में निम्नलिखित में से किसे सम्मिलित किया जा सकता है? A किसी भी जटिलता के बिना संपत्ति का पंजीकरण या अर्जन। B किसी भी कमीशन मध्यस्थ की मदद के बिना शेयर बाजार में सीधे निवेश करना। C किसी प्रभावशाली व्यक्ति के परामर्श के बिना एक छोटा कृषक भी भूमि रखने या अर्जन के लिए स्वतंत्र होता है। D उपरोक्त सभी
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पूर्वी एशिया में आर्थिक विकास में भू-सुधारों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इस बारे में भी चीन की सुधारपूर्व सफलताओं ने सुधारोपरान्त आर्थिक प्रसार का मार्ग सहज बनाने का बड़ा कार्य किया है। जैसे चीन की व्यवस्था केवल भू-सुधारों तक सीमित नहीं रही, वहां तो इनसे कहीं आगे बढने का प्रयास किया गया था, किंतु कृषि के सामुदायिकरण के पराकाष्ठा काल में जो ज्यादतियाँ हुईं उनके परिणामस्वरूप सुधारपूर्व अवधि के कृषि प्रसार में बहुत बाधाएं आयी थीं। फिर भी उस सामुदायीकरण ने चीन में भूस्वामित्व व्यवस्था में एक निर्णयक बदलाव ला ही दिया वहां से जमींदारी जैसी समामन्तयुगीन प्रथा का उन्मूलन हो गया। इसके बाद जब चीन सरकार ने कृषि में ‘उत्तरदायित्व व्यवस्था’ प्रारंभ करने का निर्णय लिया तो वहां एक ऐसी भूस्वामित्व प्रणाली विद्यमान थी जिसे बिचौलियों रहित व्यक्तिगत किसानी व्यवस्था में परिवर्तित करना बहुत सरल था। इस प्रकार चीन की कृषि व्यवस्था की सरंचना भारत के अनेक भागों में प्रचलित व्यवस्था के विपरीत प्रभावकारी बंधनों से मुक्त रही। यह भी ध्यान देने की बात है कि सारे पूर्वी एशियाई देशो में जिन संस्थागत परिर्तनों ने व्यापक भागीदारीपूर्ण आर्थिक प्रसार का मार्ग प्रशस्त किया है, उनकी शुरूआत अलग-अलग ढंग से हुई थी। (इन सुधारों में प्रमुख रहे हैं प्राथमिक शिक्षक ओर स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रसार तथा जमींदारी जैसी प्रथाओं का अंत।) कुछ मामलों में तो विदेशियों के कब्जे ने ही भू-सुधार का काम आरंभ किया था। उदाहरणस्वरूप ताईवान एवं द- कोरिया में यह कार्य जापानी उपनिवेशवाद की देन रहा। सुधारों के ये कार्य देश ने अपनी स्वप्रेरणा से भी आरभ किए किंतु प्रत्येक अवस्था में बाजार पर आधारित आर्थिक प्रसार के कार्यक्रमो में समाज में आए इन मौलिक परिवर्तनों का बहुत बडा योगदान रहा है। लेखक ने किस संदर्भ में चीन और भारत की कृषि व्यवस्था की तुलना की है? A चीन में भारत से बहुत पहले ही जवाबदेही की व्यवस्था का आगमन हो चुका था। B चीन में भारत से बहुत पहले ही भूमि सुधार प्रारंभ हो चुके थे। C चीन में सामंतवादी प्रथा समाप्त हो चुकी थी जबकि उसी समय भारत में यह प्रथा विद्यमान थी। D कृषि सुधारों के बाद भी भारत में सामंतवादी प्रथा का प्रचलन रहा जबकि चीन में नहीं
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पूर्वी एशिया में आर्थिक विकास में भू-सुधारों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इस बारे में भी चीन की सुधारपूर्व सफलताओं ने सुधारोपरान्त आर्थिक प्रसार का मार्ग सहज बनाने का बड़ा कार्य किया है। जैसे चीन की व्यवस्था केवल भू-सुधारों तक सीमित नहीं रही, वहां तो इनसे कहीं आगे बढने का प्रयास किया गया था, किंतु कृषि के सामुदायिकरण के पराकाष्ठा काल में जो ज्यादतियाँ हुईं उनके परिणामस्वरूप सुधारपूर्व अवधि के कृषि प्रसार में बहुत बाधाएं आयी थीं। फिर भी उस सामुदायीकरण ने चीन में भूस्वामित्व व्यवस्था में एक निर्णयक बदलाव ला ही दिया वहां से जमींदारी जैसी समामन्तयुगीन प्रथा का उन्मूलन हो गया। इसके बाद जब चीन सरकार ने कृषि में ‘उत्तरदायित्व व्यवस्था’ प्रारंभ करने का निर्णय लिया तो वहां एक ऐसी भूस्वामित्व प्रणाली विद्यमान थी जिसे बिचौलियों रहित व्यक्तिगत किसानी व्यवस्था में परिवर्तित करना बहुत सरल था। इस प्रकार चीन की कृषि व्यवस्था की सरंचना भारत के अनेक भागों में प्रचलित व्यवस्था के विपरीत प्रभावकारी बंधनों से मुक्त रही। यह भी ध्यान देने की बात है कि सारे पूर्वी एशियाई देशो में जिन संस्थागत परिर्तनों ने व्यापक भागीदारीपूर्ण आर्थिक प्रसार का मार्ग प्रशस्त किया है, उनकी शुरूआत अलग-अलग ढंग से हुई थी। (इन सुधारों में प्रमुख रहे हैं प्राथमिक शिक्षक ओर स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रसार तथा जमींदारी जैसी प्रथाओं का अंत।) कुछ मामलों में तो विदेशियों के कब्जे ने ही भू-सुधार का काम आरंभ किया था। उदाहरणस्वरूप ताईवान एवं द- कोरिया में यह कार्य जापानी उपनिवेशवाद की देन रहा। सुधारों के ये कार्य देश ने अपनी स्वप्रेरणा से भी आरभ किए किंतु प्रत्येक अवस्था में बाजार पर आधारित आर्थिक प्रसार के कार्यक्रमो में समाज में आए इन मौलिक परिवर्तनों का बहुत बडा योगदान रहा है। पूर्वी एशिया में आर्थिक विकास के प्राथमिक कारण क्या थे? (i) भूमि सुधार(ii) औपनिवेशीकरण (iii) सामंती प्रथा का उन्मूलन करना(iv) मुक्त बाजार व्यवस्था कूट- A (i), (ii) और (iii)B केवल (i) और (iii) C (i), (ii), (iii) और (iv)D (i), (iii) और (iv)
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The following questions are based on four passages in English to test the comprehension of English language. Read each passage and answer the questions.   Read the following passage carefully and answer the questions that follow: It was during one of the most dreadful small pox epidemics in England that Edward Jenner, a country doctor, made a discovery which was to alter the course of history. Jenner noticed that the disease seldom struck those who lived in a rural areas and worked around cattle. Most farmers and dairy workers had contracted cowpox and had recovered with nothing more serious than a pustule which left a scar. This observation led Dr. Jenner to think: why not vaccinate people with cowpox to protect them from smallpox? On May 14, 1876, Dr. Jenner took a healthy boy, James Philips, to a diary maid, Sarah Nelmes, who had a cowpox pustule on her hand resulting from an infection from her master’s cow. Dr. Jenner made two shallow cuts on James Phillips arm and inoculated them with matter taken from the cow pox sore. A pustule developed on the boy’s arm formed a scab and heated. In July of the same year. Dr. Jenner inoculated James with matter from a small pox pustule. During the next two weeks, the doctor watched for signs of small pox. They did not develop. The vaccination was successful. Dr. Jenner wrote a paper explaining his method of vaccination. At first the doctors were hostile and would not listen to a ridiculous procedure. In many towns people organized anti-vaccination campaigns. Gradually, however, the doctors and their patients accepted vaccination. The fact that Edward Jenner was a country doctor, was important in the discovery of small pox vaccine, because A he noticed that the disease was prevalent where people worked around cattle B he noticed that the disease seldom struck people who worked around the cattle C he had enough time to ____ research in the rural areas D he found that he could convince rural people more easily than city people
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The following questions are based on four passages in English to test the comprehension of English language. Read each passage and answer the questions.   Read the following passage carefully and answer the questions that follow: It was during one of the most dreadful small pox epidemics in England that Edward Jenner, a country doctor, made a discovery which was to alter the course of history. Jenner noticed that the disease seldom struck those who lived in a rural areas and worked around cattle. Most farmers and dairy workers had contracted cowpox and had recovered with nothing more serious than a pustule which left a scar. This observation led Dr. Jenner to think: why not vaccinate people with cowpox to protect them from smallpox? On May 14, 1876, Dr. Jenner took a healthy boy, James Philips, to a diary maid, Sarah Nelmes, who had a cowpox pustule on her hand resulting from an infection from her master’s cow. Dr. Jenner made two shallow cuts on James Phillips arm and inoculated them with matter taken from the cow pox sore. A pustule developed on the boy’s arm formed a scab and heated. In July of the same year. Dr. Jenner inoculated James with matter from a small pox pustule. During the next two weeks, the doctor watched for signs of small pox. They did not develop. The vaccination was successful. Dr. Jenner wrote a paper explaining his method of vaccination. At first the doctors were hostile and would not listen to a ridiculous procedure. In many towns people organized anti-vaccination campaigns. Gradually, however, the doctors and their patients accepted vaccination. Dr. Jenner was successful as cowpox virus produces A a mild infection in humans which is enough to produce active immunity B no infection in humans C severe infection in humans resulting in deaths D a mild infection in humans which is not enough to produce active immunity.
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The following questions are based on four passages in English to test the comprehension of English language. Read each passage and answer the questions.   Read the following passage carefully and answer the questions that follow: It was during one of the most dreadful small pox epidemics in England that Edward Jenner, a country doctor, made a discovery which was to alter the course of history. Jenner noticed that the disease seldom struck those who lived in a rural areas and worked around cattle. Most farmers and dairy workers had contracted cowpox and had recovered with nothing more serious than a pustule which left a scar. This observation led Dr. Jenner to think: why not vaccinate people with cowpox to protect them from smallpox? On May 14, 1876, Dr. Jenner took a healthy boy, James Philips, to a diary maid, Sarah Nelmes, who had a cowpox pustule on her hand resulting from an infection from her master’s cow. Dr. Jenner made two shallow cuts on James Phillips arm and inoculated them with matter taken from the cow pox sore. A pustule developed on the boy’s arm formed a scab and heated. In July of the same year. Dr. Jenner inoculated James with matter from a small pox pustule. During the next two weeks, the doctor watched for signs of small pox. They did not develop. The vaccination was successful. Dr. Jenner wrote a paper explaining his method of vaccination. At first the doctors were hostile and would not listen to a ridiculous procedure. In many towns people organized anti-vaccination campaigns. Gradually, however, the doctors and their patients accepted vaccination. Dr. Jenner made his experiment on a healthy boy who A could not be relieved of his mark of pustule B developed the signs of pustule on his body when he was injected the matter of cowpox C died after experimentation D was paid for it
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Read the following passage carefully and answer the questions that follow: A person who takes the trouble to form his own opinions and beliefs, will feel that he owes no responsibility to the majority for his conclusions. If he is genuine lover of truth, if he is inspired by the passion for seeing things as they are and an abhorrence of holding ideas which do not confirm to facts, he will be wholly independent of the assent of these around him. When he proceeds to apply his beliefs in practical conduct of life. The position is different. There are then good reasons why his attitude should be less inflexible. The society in which he is placed, is an ancient with composite growth. The people, from whom he dissents have not come by their opinions, customs and institutions by a process of mere haphazard. These opinions and customs all had their origin in a certain real or supposed fitness. They have certain depth of root in the lives of a proportion of existing generation. Their fitness for satisfying human needs may have vanished and congruity with one another may have to come an end. That is the only one side of the truth. The most zealous propagandism can not penetrate to him. In common language, we speak of a generation as something possessing of a kind except unity, with all its parts and members homogenous, yet plainly it is not this. It is a whole, but a whole in a state of constant flux. Its factors and elements are eternally shifting. It is not one but many generations. Each of seven ages of man is neighbours to all the rest. The colours of the newest recruits is forming to each its traditions, its tendency and its possibilities. Only a proportion of each can have nerve enough grasp the banner of a new truth and endurance to bear it along rugged and untrodden ways. Then we must remember the stuff of which life is made. We must consider what an overwhelming preponderance of the most tenacious energies and most concentrated interests of a society must be absorbed between material cares and the solitude of the affections. It is obviously unreasonable to lose patience and quarrel with one’s time because it is tardy in throwing off its institutions and beliefs and slow to achieve the transformation which is the problem in front of it. Men and women have to live. The task for most of us is arduous enough to make us well pleased with even such imperfect shelter as we find in daily use and want. To insist on a whole community being made at once to submit to the reign of new practices and ideas that have just begun to commend themselves to the most advanced speculative intelligence of the time-this, even if it were a possible process, would do much to make life impracticable and to hurry of on a social dissolution. What is the hard task, the author is reforming to in the third paragraph? A To change the societyB To earn a living C To find shelterD To live a normal life
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Study the passage and answer questions that follow: Some religious teachers have taught that Man is made up of a body and a soul: but they have been silent about the intellect. Their followers try to feed the body on earth and to save soul from perdition after death but they neglected the claims of the mind. Bread for the body and virtue for the soul these are regarded as the indispensable requisites of human welfare here and hereafter. Nothing is said about knowledge and education. Thus Jesus Christ spoke much of feeding the hungry, healing the sick, and converting the sinners: but he never taught the duty of teaching the ignorant and increasing scientific knowledge. He himself was not a well educated man, an intellectual pursuits were beyond his horizon. Gautam Buddha also laid stress on morality, meditation and as criticism, but he did not attach great importance to history, science, art and literature. St. Ambrose depreciated scientific studies and wrote, “To discuss the nature and position of the earth does not help us in our hope for life to come”. St. Basil said very frankly and follishly. “It is not a matter of interest for us whether the earth is a sphere or a cylinder or disc”. Thomas Carlyle also followed the Christian tradition when he declared that he honoured only two men and no third. That the manual labour and the religious teacher. He forgot the scientist, the scholar and the artist the cynics of Greece despised education at last? According to the author the attitude of self-opinionated person in the practical social life should be A OptimisitB CFlexible C RigidD Generous
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Study the passage and answer questions that follow: Some religious teachers have taught that Man is made up of a body and a soul: but they have been silent about the intellect. Their followers try to feed the body on earth and to save soul from perdition after death but they neglected the claims of the mind. Bread for the body and virtue for the soul these are regarded as the indispensable requisites of human welfare here and hereafter. Nothing is said about knowledge and education. Thus Jesus Christ spoke much of feeding the hungry, healing the sick, and converting the sinners: but he never taught the duty of teaching the ignorant and increasing scientific knowledge. He himself was not a well educated man, an intellectual pursuits were beyond his horizon. Gautam Buddha also laid stress on morality, meditation and as criticism, but he did not attach great importance to history, science, art and literature. St. Ambrose depreciated scientific studies and wrote, “To discuss the nature and position of the earth does not help us in our hope for life to come”. St. Basil said very frankly and follishly. “It is not a matter of interest for us whether the earth is a sphere or a cylinder or disc”. Thomas Carlyle also followed the Christian tradition when he declared that he honoured only two men and no third. That the manual labour and the religious teacher. He forgot the scientist, the scholar and the artist the cynics of Greece despised education at last? What have the religious teachers taught in the past? A That man is made up of body only B That man is made up of body and soul together C That man is made up of soul only D That man is made up of bubbles
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Study the passage and answer questions that follow: Some religious teachers have taught that Man is made up of a body and a soul: but they have been silent about the intellect. Their followers try to feed the body on earth and to save soul from perdition after death but they neglected the claims of the mind. Bread for the body and virtue for the soul these are regarded as the indispensable requisites of human welfare here and hereafter. Nothing is said about knowledge and education. Thus Jesus Christ spoke much of feeding the hungry, healing the sick, and converting the sinners: but he never taught the duty of teaching the ignorant and increasing scientific knowledge. He himself was not a well educated man, an intellectual pursuits were beyond his horizon. Gautam Buddha also laid stress on morality, meditation and as criticism, but he did not attach great importance to history, science, art and literature. St. Ambrose depreciated scientific studies and wrote, “To discuss the nature and position of the earth does not help us in our hope for life to come”. St. Basil said very frankly and follishly. “It is not a matter of interest for us whether the earth is a sphere or a cylinder or disc”. Thomas Carlyle also followed the Christian tradition when he declared that he honoured only two men and no third. That the manual labour and the religious teacher. He forgot the scientist, the scholar and the artist the cynics of Greece despised education at last? Intellectuals pursuits have been neglected because: (i) they make people dwarf (ii) they make people deaf (iii) they lead people to hell A only i is correctB only ii is correct C only iii is correctD only i and ii are correct
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Read the following passage carefully and answer the questions that follow: To a greater or less degree all the civilized communities of the modern world are made up of a small class of ruler, corrupted by too much power, and of a large class subjects, corrupted by too much passive and irresponsible obedience. Participation in a social order to this kind makes it very difficult for individuals to achieve that non attachment in the midst of activity, which is the distinguishing mark of the ideally excellent human being; and where three is not at least a considerable degree of non attachment in activity, the ideal society of the prophets cannot be realized. A desirable social order is one that delivers us from avoidable evils. A bad social order is one that leads us into temptation which if matters were more sensibly arranged, would never rise. Our present business is to discover what large scale changes are best calculated to deliver us from the evils of too much power and of too much passive and irresponsible obedience. It has been shown that the economic reforms, so dear to advanced thinker’s are not in themselves sufficient to produce desirable changes in the character of society and of the individuals composing it unless carried out by the right sort of means and in the right sort of governmental, administrative and educational contexts such reforms are either fruitless or actually fruitful of evil. In order to create the proper contexts for economic reform we must change our machinery of government, our methods of public administration, our system of education and our metaphysical and ethical beliefs. What is the inference that author derives? A Ideal society is envisaged by prophets B Changes in the character of society are necessary C It is the mark of ideally excellent human beings D None of these
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Read the following passage carefully and answer the questions that follow: To a greater or less degree all the civilized communities of the modern world are made up of a small class of ruler, corrupted by too much power, and of a large class subjects, corrupted by too much passive and irresponsible obedience. Participation in a social order to this kind makes it very difficult for individuals to achieve that non attachment in the midst of activity, which is the distinguishing mark of the ideally excellent human being; and where three is not at least a considerable degree of non attachment in activity, the ideal society of the prophets cannot be realized. A desirable social order is one that delivers us from avoidable evils. A bad social order is one that leads us into temptation which if matters were more sensibly arranged, would never rise. Our present business is to discover what large scale changes are best calculated to deliver us from the evils of too much power and of too much passive and irresponsible obedience. It has been shown that the economic reforms, so dear to advanced thinker’s are not in themselves sufficient to produce desirable changes in the character of society and of the individuals composing it unless carried out by the right sort of means and in the right sort of governmental, administrative and educational contexts such reforms are either fruitless or actually fruitful of evil. In order to create the proper contexts for economic reform we must change our machinery of government, our methods of public administration, our system of education and our metaphysical and ethical beliefs. The author does not say: A By participating in this kind of society one cannot remain non attached B Bad social order leads into-temptations C Subject indulge in obedience D None of these
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(i) सात व्यक्ति A, B, C, D, E, F, और G एक संस्था में प्रबन्धाक के तीन स्तरों, यथा स्तर-I स्तर-II और स्तर-III पर काम करते हैं। स्तर-I सबसे निचला स्तर है, स्तर-III सबसे ऊचा स्तर है, इस समूह में दो विवाहित जोड़े हैं। पति-पत्नी का कोई भी जोड़ा समान स्तर पर काम नहीं करता है। प्रत्येक स्तर में कम-से-कम दो व्यक्ति हैं और वे समान लिंग के नहीं हैं। (ii) D, स्तर-II में काम करता है और A से विवाहित है। B और E पुरूष हैं और क्रमशः स्तर-III और स्तर-I में काम करते है F, G से एक स्तर नीचे काम करती है, जो C की पत्नी है। C स्तर-I में काम करता है। A किस स्तर में काम करता है? A स्तर-IIB स्तर-III C स्तर-ID तथ्य अधूरे हैं 80### निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए।
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कारागार अधीक्षक के रूप में आपकी जेल को अदालत द्वारा एक वरिष्ठ राजनीतिज्ञ को ठहराने के लिए चुना गया है। इस राजनीतिज्ञ को न्यायिक संरक्षा में लिया गया है। आपकी जेल में पहुँचने के एक सप्ताह के भीतर राजनीतिज्ञ सूचित करता है कि उसे किडनी की समस्या है और वह आपसे अस्पताल में भर्ती करने की अनुमति माँगता है। आप- A राजनीतिज्ञ के निवेदन को स्वीकार कर लेंगे B दावे की सत्यता को सुनिश्चित करने के लिए सरकारी चिकित्सक से कहेंगे C राजनीतिज्ञ के स्वास्थ्य मापदंडों की पूर्ण जांच पर आधारित सर्वोत्तम कार्यवाही को अनुशंसित करने के लिए प्रासंगिक चिकित्सा विशेषज्ञों को बुलायेंगे D निवेदन को नामंजूर कर देंगे- जेल के वातावरण से बचने के लिए अस्पताल में भर्ती होना हाई प्रोफाइल कैदियों के लिए अब एक फैशन बन चुका है
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आपके राज्य में मुख्यमंत्री ने आपको (जिलाधिकारी) एक परामर्श नोट भेजा है जिसमें आपसे एक व्यक्ति के लिए एक भूखंड आवंटित करने हेतु अपनी विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग करने के लिए कहा गया है। कथित भूमि नगर योजना में एक बस स्टैंड के रूप में प्रयुक्त किये जाने के लिए सीमांकित की जा चुकी है। आप A सलाह मानने से पहले मुख्यमंत्री को एक प्रभावी आदेश जारी करने के लिए कहेंगे B मुख्यमंत्री की इच्छाओं का सम्मान करेंगे C परामर्श नोट पर ध्यान नहीं देंगे और अपने खुद के कर्तव्यों को निभाते रहेंगे D मुख्यमंत्री कार्यालय को सूचित करेंगे कि इस प्रकार का पक्षपात नहीं किया जा सकता क्योंकि यह मानदंडों के विरुद्ध है
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आपका एक अधीनस्थ लम्बे समय से काम पर नहीं आ रहा है। बार-बार स्मरण-पत्र भेजने के बावजूद उसने कोई उत्तर नहीं दिया है। आपने उसे निलम्बन की धमकी भी दी है लेकिन उसकी पत्नी और बच्चे आपके दरवाजे पर आते हैं और आपसे कोई भी कठोर कदम न उठाने की याचना करते हैं क्योंकि उनकी आर्थिक उत्तरजीविता उस कर्मचारी के वेतन पर निर्भर है। आप- A तुरंत ही संबंधित अधीनस्थ के विरुद्ध निलम्बन की कार्यवाही शुरू करेंगे B उसे परामर्श की मेज पर बुलायेंगे और उसे अपनी उपस्थिति के बारे में अधिक सजग होने की सलाह देंगे C मामले की जानकारी कार्मिक विभाग को सभी तथ्यों और आँकड़ों के साथ देंगे तथा कार्यवाही का फैसला विभाग पर ही छोड़ देंगे D इस बारे में कुछ नहीं करेंगे क्योंकि उसकी अनुपस्थिति से आपका कार्यचालन किसी भी रूप में प्रभावित नहीं हो रहा है और आप उसके समर्थन के बिना अपने सभी कर्तव्यों को पूरा करने में सक्षम हैं
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एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में आपका सामना एक नई औद्योगिक इकाई से जुड़े मामले से होता है। यह इकाई आपके क्षेत्र में खुल रही है। इस इकाई से स्थानीय क्षेत्र और आस-पास रहने वाले लोगों की अर्थव्यवस्था पर अत्यधिक सकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशा है। फिर भी आपके संज्ञान में आया है कि औद्योगिक इकाई द्वारा कुछ पर्यावरणीय मानदंडों का उल्लघंन किया जा रहा है। आप A इकाई की स्थापना हेतु की जाने वाली सभी गतिविधियों को रोकने का त्वरित आदेश जारी करेंगे और यह रोक तब तक नहीं हटेगी जब तक कि सभी पर्यावरणीय मानदंडों का पालन सुनिश्चित न हो B इकाई को धीमी गति से कार्य करने की अनुमति देंगे और उनसे स्पष्ट रूप से पर्यावरणीय समाशोधन प्राप्त करने को कहेंगे C इकाई के मुखिया को एक पत्र लिखेंगे_ उल्लंघन किये जा रहे पर्यावरणीय मानदंडों का एक प्रेक्षण करेंगे और उसके मुखिया को एक कारण बताओ नोटिस जारी करके पूछेंगे कि उसके खिलाफ कोई कार्यवाही क्यों नहीं की जानी चाहिए? D कानून तोड़ने के कारण इकाई के संबंधित अधिकारियों को तुरंत ही गिरफ्रतार करेंगे।
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आप एक वर्ष के अध्ययन अवकाश पर हैं। आपने इस अवधि के दौरान अपने विभाग के एक महत्वपूर्ण कार्य को करने के लिए अपने अधीनस्थों में से एक को चिन्हांकित किया है। उसे सूचित करने पर वह ऐसे कठिन कार्य को निष्पादित करने में अपनी अक्षमता व्यक्त करता है। एक अच्छे नेतृत्वकर्ता के रूप में आप निम्नलिखित में से कौन-सा कदम उठायेंगे? A अपने अधीनस्थ के सुरक्षित अधिकारों को स्वीकार करेंगे और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को किसी और को सौंप देंगे B अपने अधीनस्थ के सुरक्षित अधिकारों को नकार देंगे और उस पर जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए दबाव डालेंगे C अपने अधीनस्थ सहकर्मियों को उसे इस बारे में आश्वस्त करने के लिए कहेंगे कि वह इस कार्य के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम है D अपने अधीनस्थ की योग्यताओं में विश्वास करेंगे और उसे अपने खुद की और संगठन की वृद्धि के लिए जिम्मेदारी को उठाने के लिए आश्वस्त करेंगे
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