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GS-II

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Practice Test-7

Question
53 out of 80
 

Self-poisoned in this fashion, civilization looks as though it might easily decline into a kind of premature senility. With a mind almost atrophied by lack of use, unable to entertain itself and grown so wearily uninterested in the readymade distractions offered from without that nothing but the grossest stimulants of an ever-increasing violence and crudity can move it, the democracy of the future will sicken of a chronic and mortal boredom. It will go perhaps, the way the Romans went: the Romans who came at last to lose, precisely as we are doing now, the capacity to distract themselves: the Romans who, like us, lived on readymade entertainments in which they had no participation. Their deadly ennui demanded ever more gladiators more tight rope-walking elephants, more rare and far fetched animals to be slaughtered. Ours would demand no less: but owing to the existence of a few idealist, doesn’t get all it asks for. The most violent forms of entertainment can only be obtained illicitly: to satisfy a taste for slaughter and cruelty you must become a member of the Ku Klux Klan. Let us not despair, however; the force of a boredom clamouring to be alleviated may yet prove too much for the idealists.


What is the inference of the writer?



A Boredom will be alleviated

B There will be more participation

C Civilization it seems will decay

D None of these

Ans. C

Practice Test-7 Flashcard List

80 flashcards
1)
 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। दुनिया में सात अरबवां नागरिक पैदा हो गया है। हालांकि इस बात को लेकर विवाद है कि यह बच्चा कौन है और कहां है? कहा यह गया था कि यह बच्चा भारतीय होगा और उत्तर प्रदेश में पैदा होगा, हालांकि इसके पहले यह भी कहा गया था कि यह बच्चा चीन में पैदा होगा। लखनऊ में पैदा हुई एक बच्ची को आधिकारिक रूप से दुनिया के सात अरबवें नागरिक की मान्यता दी गई, लेकिन विवाद फिर भी है। फिलीपीन्स में पैदा हुई एक बच्ची को भी यही अहमियत दी जा रही है। उधर रूसी भी 31 अक्टूबर की मध्यरात्रि को रूस में पैदा हुए एक बच्चे को दुनिया का सात अरबवां नागरिक मान रहे हैं। सात अरबवें नागरिक की अवधारणा एक प्रतीक मात्र है और यह कोई दावे से नहीं कह सकता कि अमुक बच्चा सात अरबवां नागरिक है, क्योंकि प्रकृति का गणित इतना आसान नहीं है। सांख्यिकीय दृष्टि से यह तय पाया गया कि 31 अक्तूबर को दुनिया की जनसंख्या सात अरब हो जाएगी और इसी तरह का कुछ गणित लगाकर यह तय किया गया कि यह बच्चा कहां और कब पैदा होगा। यूं भी जनसंख्या एक ऐसा आंकड़ा है, जिसमें विवाद की कुछ तो गुंजाइश बनी रहती है। मुद्दे की बात यह है कि दुनिया की जनसंख्या इस वक्त भूल-चूक लेनी-देनी के साथ लगभग सात अरब है और तेजी से बढ़ती जा रही है। हमारे देश की जनसंख्या भी सवा अरब के ऊपर है और हम जनसंख्या नियंत्रण के तमाम लक्ष्यों से काफी पीछे हैं। इसलिए हमें धरती पर नए मेहमानों का स्वागत तो करना चाहिए, लेकिन यह कोशिश भी करनी चाहिए कि धरती पर उनका जीवन सुख-समृद्धि में बीते, क्योंकि जिन देशों की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, उनके लिए यह कोई गौरव की बात नहीं है। जनसंख्या में वृद्धि की रफ्रतार का सीधा संबंध मानव विकास के पैमानों से है। जिस समाज में ये आंकड़े ठीक नहीं हैं, वहां जनसंख्या में वृद्धि तेजी से होती है। प्रति व्यक्ति आय, पोषण का स्तर, बाल और शिशु मृत्युदर, स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति, महिलाओं में शिक्षा का स्तर वगैरह कुछ ऐसे ठोस पैमाने हैं, जिन पर जनसंख्या वृद्धि दर निर्भर रहती है। अगर कोई समाज इन पैमानों पर बेहतर स्थिति में होता है, तो उसमें जनसंख्या का बढ़ना रुक जाता है, भले ही उसमें कोई सक्रिय जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम चल रहा हो या न चल रहा हो। जिस समाज में इन पैमानों पर पिछड़ापन है, उनमें चाहे कितना ही जोरदार या व्यापक जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम चला दिया जाए, नतीजे लगभग शून्य ही निकलेंगे। भारत के ही दक्षिणी राज्यों में जनसंख्या की औसत विकास दर दो के आसपास है, यानी तकनीकी रूप से उनमें जनसंख्या लगभग स्थिर हो गई है। उत्तरी राज्यों में खासकर हिंदी भाषी राज्यों में यह दर 2-7 के आसपास है, यानी यहां जनसंख्या में वृद्धि की दर कम तो हुई है, लेकिन देश की जनसंख्या मुख्यतः इन्हीं राज्यों में बढ़ रही है। इसकी मुख्य वजह इन राज्यों का आर्थिक और सामाजिक पिछड़ापन है। मोटे तौर पर आर्थिक विकास के मामले में ये राज्य देश से बहुत पीछे नहीं हैं, लेकिन इन राज्यों में कई ऐसे बड़े-बड़े इलाके हैं, जो पिछड़ेपन के मामले में अफ्रीका के गरीब देशों से बराबरी करते हैं। जो इलाके अपेक्षाकृत समृद्ध भी हैं, वहां स्त्री शिक्षा और उनकी सामाजिक हैसियत के मामले में पर्याप्त पिछड़ापन है। इसलिए अब यह माना जा रहा है कि भारत की आबादी2060 के आसपास स्थिर हो पाएगी, जबकि पहले लक्ष्य 2040 का था। हमारी धरती पर आने वाला हर नया मेहमान यहां खुशी-खुशी रह पाए, इसके लिए जरूरी है कि हम उसके जीवन के लिए अच्छा इंतजाम करें और उसे अवांछित न महसूस होने दें। प्रस्तुत लेखांश के उपयुक्त शीर्षक का चयन करें: A सात अरबवां नागरिक B दुनिया की जनसंख्या C जनसंख्या वृद्धि और मानव विकास D जनसंख्या नियंत्रण के लक्ष्य
2)
 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। दुनिया में सात अरबवां नागरिक पैदा हो गया है। हालांकि इस बात को लेकर विवाद है कि यह बच्चा कौन है और कहां है? कहा यह गया था कि यह बच्चा भारतीय होगा और उत्तर प्रदेश में पैदा होगा, हालांकि इसके पहले यह भी कहा गया था कि यह बच्चा चीन में पैदा होगा। लखनऊ में पैदा हुई एक बच्ची को आधिकारिक रूप से दुनिया के सात अरबवें नागरिक की मान्यता दी गई, लेकिन विवाद फिर भी है। फिलीपीन्स में पैदा हुई एक बच्ची को भी यही अहमियत दी जा रही है। उधर रूसी भी 31 अक्टूबर की मध्यरात्रि को रूस में पैदा हुए एक बच्चे को दुनिया का सात अरबवां नागरिक मान रहे हैं। सात अरबवें नागरिक की अवधारणा एक प्रतीक मात्र है और यह कोई दावे से नहीं कह सकता कि अमुक बच्चा सात अरबवां नागरिक है, क्योंकि प्रकृति का गणित इतना आसान नहीं है। सांख्यिकीय दृष्टि से यह तय पाया गया कि 31 अक्तूबर को दुनिया की जनसंख्या सात अरब हो जाएगी और इसी तरह का कुछ गणित लगाकर यह तय किया गया कि यह बच्चा कहां और कब पैदा होगा। यूं भी जनसंख्या एक ऐसा आंकड़ा है, जिसमें विवाद की कुछ तो गुंजाइश बनी रहती है। मुद्दे की बात यह है कि दुनिया की जनसंख्या इस वक्त भूल-चूक लेनी-देनी के साथ लगभग सात अरब है और तेजी से बढ़ती जा रही है। हमारे देश की जनसंख्या भी सवा अरब के ऊपर है और हम जनसंख्या नियंत्रण के तमाम लक्ष्यों से काफी पीछे हैं। इसलिए हमें धरती पर नए मेहमानों का स्वागत तो करना चाहिए, लेकिन यह कोशिश भी करनी चाहिए कि धरती पर उनका जीवन सुख-समृद्धि में बीते, क्योंकि जिन देशों की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, उनके लिए यह कोई गौरव की बात नहीं है। जनसंख्या में वृद्धि की रफ्रतार का सीधा संबंध मानव विकास के पैमानों से है। जिस समाज में ये आंकड़े ठीक नहीं हैं, वहां जनसंख्या में वृद्धि तेजी से होती है। प्रति व्यक्ति आय, पोषण का स्तर, बाल और शिशु मृत्युदर, स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति, महिलाओं में शिक्षा का स्तर वगैरह कुछ ऐसे ठोस पैमाने हैं, जिन पर जनसंख्या वृद्धि दर निर्भर रहती है। अगर कोई समाज इन पैमानों पर बेहतर स्थिति में होता है, तो उसमें जनसंख्या का बढ़ना रुक जाता है, भले ही उसमें कोई सक्रिय जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम चल रहा हो या न चल रहा हो। जिस समाज में इन पैमानों पर पिछड़ापन है, उनमें चाहे कितना ही जोरदार या व्यापक जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम चला दिया जाए, नतीजे लगभग शून्य ही निकलेंगे। भारत के ही दक्षिणी राज्यों में जनसंख्या की औसत विकास दर दो के आसपास है, यानी तकनीकी रूप से उनमें जनसंख्या लगभग स्थिर हो गई है। उत्तरी राज्यों में खासकर हिंदी भाषी राज्यों में यह दर 2-7 के आसपास है, यानी यहां जनसंख्या में वृद्धि की दर कम तो हुई है, लेकिन देश की जनसंख्या मुख्यतः इन्हीं राज्यों में बढ़ रही है। इसकी मुख्य वजह इन राज्यों का आर्थिक और सामाजिक पिछड़ापन है। मोटे तौर पर आर्थिक विकास के मामले में ये राज्य देश से बहुत पीछे नहीं हैं, लेकिन इन राज्यों में कई ऐसे बड़े-बड़े इलाके हैं, जो पिछड़ेपन के मामले में अफ्रीका के गरीब देशों से बराबरी करते हैं। जो इलाके अपेक्षाकृत समृद्ध भी हैं, वहां स्त्री शिक्षा और उनकी सामाजिक हैसियत के मामले में पर्याप्त पिछड़ापन है। इसलिए अब यह माना जा रहा है कि भारत की आबादी2060 के आसपास स्थिर हो पाएगी, जबकि पहले लक्ष्य 2040 का था। हमारी धरती पर आने वाला हर नया मेहमान यहां खुशी-खुशी रह पाए, इसके लिए जरूरी है कि हम उसके जीवन के लिए अच्छा इंतजाम करें और उसे अवांछित न महसूस होने दें। प्रस्तुत लेखांश में जनसंख्या से संदर्भित मूल बातें क्या हैं? A दुनिया में सात अरबवाँ नागरिक कहाँ जन्म लिया? B भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है C जनसंख्या नियंत्रण के साथ-साथ जीवन का सामाजिक, आर्थिक व बौद्धिक विकास D भारत की आबादी2060 के आसपास स्थिर हो जाएगी।
3)
 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। दुनिया में सात अरबवां नागरिक पैदा हो गया है। हालांकि इस बात को लेकर विवाद है कि यह बच्चा कौन है और कहां है? कहा यह गया था कि यह बच्चा भारतीय होगा और उत्तर प्रदेश में पैदा होगा, हालांकि इसके पहले यह भी कहा गया था कि यह बच्चा चीन में पैदा होगा। लखनऊ में पैदा हुई एक बच्ची को आधिकारिक रूप से दुनिया के सात अरबवें नागरिक की मान्यता दी गई, लेकिन विवाद फिर भी है। फिलीपीन्स में पैदा हुई एक बच्ची को भी यही अहमियत दी जा रही है। उधर रूसी भी 31 अक्टूबर की मध्यरात्रि को रूस में पैदा हुए एक बच्चे को दुनिया का सात अरबवां नागरिक मान रहे हैं। सात अरबवें नागरिक की अवधारणा एक प्रतीक मात्र है और यह कोई दावे से नहीं कह सकता कि अमुक बच्चा सात अरबवां नागरिक है, क्योंकि प्रकृति का गणित इतना आसान नहीं है। सांख्यिकीय दृष्टि से यह तय पाया गया कि 31 अक्तूबर को दुनिया की जनसंख्या सात अरब हो जाएगी और इसी तरह का कुछ गणित लगाकर यह तय किया गया कि यह बच्चा कहां और कब पैदा होगा। यूं भी जनसंख्या एक ऐसा आंकड़ा है, जिसमें विवाद की कुछ तो गुंजाइश बनी रहती है। मुद्दे की बात यह है कि दुनिया की जनसंख्या इस वक्त भूल-चूक लेनी-देनी के साथ लगभग सात अरब है और तेजी से बढ़ती जा रही है। हमारे देश की जनसंख्या भी सवा अरब के ऊपर है और हम जनसंख्या नियंत्रण के तमाम लक्ष्यों से काफी पीछे हैं। इसलिए हमें धरती पर नए मेहमानों का स्वागत तो करना चाहिए, लेकिन यह कोशिश भी करनी चाहिए कि धरती पर उनका जीवन सुख-समृद्धि में बीते, क्योंकि जिन देशों की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, उनके लिए यह कोई गौरव की बात नहीं है। जनसंख्या में वृद्धि की रफ्रतार का सीधा संबंध मानव विकास के पैमानों से है। जिस समाज में ये आंकड़े ठीक नहीं हैं, वहां जनसंख्या में वृद्धि तेजी से होती है। प्रति व्यक्ति आय, पोषण का स्तर, बाल और शिशु मृत्युदर, स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति, महिलाओं में शिक्षा का स्तर वगैरह कुछ ऐसे ठोस पैमाने हैं, जिन पर जनसंख्या वृद्धि दर निर्भर रहती है। अगर कोई समाज इन पैमानों पर बेहतर स्थिति में होता है, तो उसमें जनसंख्या का बढ़ना रुक जाता है, भले ही उसमें कोई सक्रिय जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम चल रहा हो या न चल रहा हो। जिस समाज में इन पैमानों पर पिछड़ापन है, उनमें चाहे कितना ही जोरदार या व्यापक जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम चला दिया जाए, नतीजे लगभग शून्य ही निकलेंगे। भारत के ही दक्षिणी राज्यों में जनसंख्या की औसत विकास दर दो के आसपास है, यानी तकनीकी रूप से उनमें जनसंख्या लगभग स्थिर हो गई है। उत्तरी राज्यों में खासकर हिंदी भाषी राज्यों में यह दर 2-7 के आसपास है, यानी यहां जनसंख्या में वृद्धि की दर कम तो हुई है, लेकिन देश की जनसंख्या मुख्यतः इन्हीं राज्यों में बढ़ रही है। इसकी मुख्य वजह इन राज्यों का आर्थिक और सामाजिक पिछड़ापन है। मोटे तौर पर आर्थिक विकास के मामले में ये राज्य देश से बहुत पीछे नहीं हैं, लेकिन इन राज्यों में कई ऐसे बड़े-बड़े इलाके हैं, जो पिछड़ेपन के मामले में अफ्रीका के गरीब देशों से बराबरी करते हैं। जो इलाके अपेक्षाकृत समृद्ध भी हैं, वहां स्त्री शिक्षा और उनकी सामाजिक हैसियत के मामले में पर्याप्त पिछड़ापन है। इसलिए अब यह माना जा रहा है कि भारत की आबादी2060 के आसपास स्थिर हो पाएगी, जबकि पहले लक्ष्य 2040 का था। हमारी धरती पर आने वाला हर नया मेहमान यहां खुशी-खुशी रह पाए, इसके लिए जरूरी है कि हम उसके जीवन के लिए अच्छा इंतजाम करें और उसे अवांछित न महसूस होने दें। देश की जनसंख्या बढ़ने के मुख्य कारण निम्नांकित है: A सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन B राजनीतिक और सामाजिक पिछड़ापन C बाल और शिशु मृत्यु दर अधिक होना D स्त्री शिक्षा में कमी।
4)
 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। दुनिया में सात अरबवां नागरिक पैदा हो गया है। हालांकि इस बात को लेकर विवाद है कि यह बच्चा कौन है और कहां है? कहा यह गया था कि यह बच्चा भारतीय होगा और उत्तर प्रदेश में पैदा होगा, हालांकि इसके पहले यह भी कहा गया था कि यह बच्चा चीन में पैदा होगा। लखनऊ में पैदा हुई एक बच्ची को आधिकारिक रूप से दुनिया के सात अरबवें नागरिक की मान्यता दी गई, लेकिन विवाद फिर भी है। फिलीपीन्स में पैदा हुई एक बच्ची को भी यही अहमियत दी जा रही है। उधर रूसी भी 31 अक्टूबर की मध्यरात्रि को रूस में पैदा हुए एक बच्चे को दुनिया का सात अरबवां नागरिक मान रहे हैं। सात अरबवें नागरिक की अवधारणा एक प्रतीक मात्र है और यह कोई दावे से नहीं कह सकता कि अमुक बच्चा सात अरबवां नागरिक है, क्योंकि प्रकृति का गणित इतना आसान नहीं है। सांख्यिकीय दृष्टि से यह तय पाया गया कि 31 अक्तूबर को दुनिया की जनसंख्या सात अरब हो जाएगी और इसी तरह का कुछ गणित लगाकर यह तय किया गया कि यह बच्चा कहां और कब पैदा होगा। यूं भी जनसंख्या एक ऐसा आंकड़ा है, जिसमें विवाद की कुछ तो गुंजाइश बनी रहती है। मुद्दे की बात यह है कि दुनिया की जनसंख्या इस वक्त भूल-चूक लेनी-देनी के साथ लगभग सात अरब है और तेजी से बढ़ती जा रही है। हमारे देश की जनसंख्या भी सवा अरब के ऊपर है और हम जनसंख्या नियंत्रण के तमाम लक्ष्यों से काफी पीछे हैं। इसलिए हमें धरती पर नए मेहमानों का स्वागत तो करना चाहिए, लेकिन यह कोशिश भी करनी चाहिए कि धरती पर उनका जीवन सुख-समृद्धि में बीते, क्योंकि जिन देशों की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, उनके लिए यह कोई गौरव की बात नहीं है। जनसंख्या में वृद्धि की रफ्रतार का सीधा संबंध मानव विकास के पैमानों से है। जिस समाज में ये आंकड़े ठीक नहीं हैं, वहां जनसंख्या में वृद्धि तेजी से होती है। प्रति व्यक्ति आय, पोषण का स्तर, बाल और शिशु मृत्युदर, स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति, महिलाओं में शिक्षा का स्तर वगैरह कुछ ऐसे ठोस पैमाने हैं, जिन पर जनसंख्या वृद्धि दर निर्भर रहती है। अगर कोई समाज इन पैमानों पर बेहतर स्थिति में होता है, तो उसमें जनसंख्या का बढ़ना रुक जाता है, भले ही उसमें कोई सक्रिय जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम चल रहा हो या न चल रहा हो। जिस समाज में इन पैमानों पर पिछड़ापन है, उनमें चाहे कितना ही जोरदार या व्यापक जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम चला दिया जाए, नतीजे लगभग शून्य ही निकलेंगे। भारत के ही दक्षिणी राज्यों में जनसंख्या की औसत विकास दर दो के आसपास है, यानी तकनीकी रूप से उनमें जनसंख्या लगभग स्थिर हो गई है। उत्तरी राज्यों में खासकर हिंदी भाषी राज्यों में यह दर 2-7 के आसपास है, यानी यहां जनसंख्या में वृद्धि की दर कम तो हुई है, लेकिन देश की जनसंख्या मुख्यतः इन्हीं राज्यों में बढ़ रही है। इसकी मुख्य वजह इन राज्यों का आर्थिक और सामाजिक पिछड़ापन है। मोटे तौर पर आर्थिक विकास के मामले में ये राज्य देश से बहुत पीछे नहीं हैं, लेकिन इन राज्यों में कई ऐसे बड़े-बड़े इलाके हैं, जो पिछड़ेपन के मामले में अफ्रीका के गरीब देशों से बराबरी करते हैं। जो इलाके अपेक्षाकृत समृद्ध भी हैं, वहां स्त्री शिक्षा और उनकी सामाजिक हैसियत के मामले में पर्याप्त पिछड़ापन है। इसलिए अब यह माना जा रहा है कि भारत की आबादी2060 के आसपास स्थिर हो पाएगी, जबकि पहले लक्ष्य 2040 का था। हमारी धरती पर आने वाला हर नया मेहमान यहां खुशी-खुशी रह पाए, इसके लिए जरूरी है कि हम उसके जीवन के लिए अच्छा इंतजाम करें और उसे अवांछित न महसूस होने दें। निम्न कथनों को ध्यानपूर्वक पढें: 1- भारत की आबादी2040 के आसपास स्थिर हो जाएगी 2- समृद्ध इलाके में स्त्री शिक्षा और सामाजिक हैसियत अच्छी है 3-कुछ राज्यों की आर्थिक स्थिति अफ्रीका के कुछ पिछड़े देशों से भी कम है 4- जनसंख्या में वृद्धि की रफ्रतार का सीधा संबंध सामाजिक विकास के पैमाने से है। उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं? A 1, 2 और 3B उपर्युक्त में से कोई सहीं नहीं C केवल4D उपरोक्त सभी
5)
माओवाद आतंकवाद है। आतंकवाद भयदोहन के लिए हिंसा या शक्ति का प्रयोग करता है। वामपंथी इसे जन संघर्ष के रूप में प्रदर्शित करते हैं किंतु प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने2004 में ही घोषणा कर दी थी कि माओवाद भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है। पिछले छह सालों में माओवादी सबसे बड़े शत्रु बने हुए हैं। इस साल अप्रैल में माओवादियों ने 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था। इसके बाद छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में उन्होंने एक बस में विस्फोट कर 30 लोगों की हत्या कर दी थी। यही नहीं, उन्होंने ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पर भयावह हमला कर निर्दोष लोगों की जानें लीं। 2004 से भारत में माओवादी सात हजार घटनाओं को अंजाम दे चुके हैं, जिनमें साढ़े पांच हजार लोग मारे गए। 2009 में माओवाद ने हर आठ घंटे में एक जान ली। माओवाद के हमदर्द विकास के अभाव का रोना रोते हैं जबकि 2008 और 2009 में दो सालों के दौरान माओवादियों ने 1700 स्कूलों को ध्वस्त कर दिया है। पिछले एक दशक में जिहादी आतंक से अधिक जानें माओवादी हमलों में गई हैं। माओवादी गुरिल्लों ने राज्य सत्ता को ‘शत्रु’ और टकराव को ‘युद्ध’ की संज्ञा दी है। भारत के छह सौ जिलों में से 220 में यानी हर तीन में से एक जिले में युद्ध छिड़ा हुआ है। देश के बीचोबीच गृहयुद्ध के हालात के मद्देनजर इस वक्त आवश्यकता राजनीतिक इच्छाशक्ति की है, तभी हम इन हिंसक लोगों से बच सकते हैं जो भारतीय संसदीय लोकतंत्र को माओवादी अधिसत्ता में बदलने में यकीन रखते हैं। हमें सशस्त्र संघर्ष द्वारा सरकार को पलटने के माओवादियों के लक्ष्यों को नहीं भूलना चाहिए। हमारा पहला कर्तव्य भारतीय लोकतंत्र को बचाना है। इसमें जितनी भी खामियां हों, किंतु अंततः आदिवासी क्षेत्रें में भी लोकतंत्र ही गरीबों के लिए आशा की एकमात्र किरण है। इन क्षेत्रें में विकास तभी हो सकता है, जब शांति कायम हो जाए। सशस्त्र विद्रोह को दबाने का एकमात्र हल जबरदस्त सैन्य कार्रवाई ही हो सकती है। जो लोग यह सोचकर खुद को भुलावे में रखते हैं कि माओवादी भटके हुए नौजवान हैं, उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि माओवादी भारत में लोकतंत्र को ध्वस्त कर इसके बदले एकल सत्तात्मक माओवाद की स्थापना करना चाहते है, जैसा कि चीन में माओत्से तुंग ने किया था। उन्हें याद रखना चाहिए कि इसी विचाराधारा के कारण चीन माओ के कार्यकाल में दशकों तक पिछड़ा रहा। इस प्रकार की विचारधारा से भारत को बचाने की लड़ाई दक्षिण दिल्ली में नवधनाढ्य वर्ग के किसी ड्राइंग रूम में बहस से नहीं जीती जा सकती। प्रस्तुत लेखांश को मद्देनजर रखते हुए उचित शीर्षक दें A माओवाद आतंकवाद हैB माओवाद: भारत का खतरा C भारतीय लोकतंत्र व माओवादD माओवाद व गृहयुद्ध
6)
माओवाद आतंकवाद है। आतंकवाद भयदोहन के लिए हिंसा या शक्ति का प्रयोग करता है। वामपंथी इसे जन संघर्ष के रूप में प्रदर्शित करते हैं किंतु प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने2004 में ही घोषणा कर दी थी कि माओवाद भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है। पिछले छह सालों में माओवादी सबसे बड़े शत्रु बने हुए हैं। इस साल अप्रैल में माओवादियों ने 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था। इसके बाद छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में उन्होंने एक बस में विस्फोट कर 30 लोगों की हत्या कर दी थी। यही नहीं, उन्होंने ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पर भयावह हमला कर निर्दोष लोगों की जानें लीं। 2004 से भारत में माओवादी सात हजार घटनाओं को अंजाम दे चुके हैं, जिनमें साढ़े पांच हजार लोग मारे गए। 2009 में माओवाद ने हर आठ घंटे में एक जान ली। माओवाद के हमदर्द विकास के अभाव का रोना रोते हैं जबकि 2008 और 2009 में दो सालों के दौरान माओवादियों ने 1700 स्कूलों को ध्वस्त कर दिया है। पिछले एक दशक में जिहादी आतंक से अधिक जानें माओवादी हमलों में गई हैं। माओवादी गुरिल्लों ने राज्य सत्ता को ‘शत्रु’ और टकराव को ‘युद्ध’ की संज्ञा दी है। भारत के छह सौ जिलों में से 220 में यानी हर तीन में से एक जिले में युद्ध छिड़ा हुआ है। देश के बीचोबीच गृहयुद्ध के हालात के मद्देनजर इस वक्त आवश्यकता राजनीतिक इच्छाशक्ति की है, तभी हम इन हिंसक लोगों से बच सकते हैं जो भारतीय संसदीय लोकतंत्र को माओवादी अधिसत्ता में बदलने में यकीन रखते हैं। हमें सशस्त्र संघर्ष द्वारा सरकार को पलटने के माओवादियों के लक्ष्यों को नहीं भूलना चाहिए। हमारा पहला कर्तव्य भारतीय लोकतंत्र को बचाना है। इसमें जितनी भी खामियां हों, किंतु अंततः आदिवासी क्षेत्रें में भी लोकतंत्र ही गरीबों के लिए आशा की एकमात्र किरण है। इन क्षेत्रें में विकास तभी हो सकता है, जब शांति कायम हो जाए। सशस्त्र विद्रोह को दबाने का एकमात्र हल जबरदस्त सैन्य कार्रवाई ही हो सकती है। जो लोग यह सोचकर खुद को भुलावे में रखते हैं कि माओवादी भटके हुए नौजवान हैं, उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि माओवादी भारत में लोकतंत्र को ध्वस्त कर इसके बदले एकल सत्तात्मक माओवाद की स्थापना करना चाहते है, जैसा कि चीन में माओत्से तुंग ने किया था। उन्हें याद रखना चाहिए कि इसी विचाराधारा के कारण चीन माओ के कार्यकाल में दशकों तक पिछड़ा रहा। इस प्रकार की विचारधारा से भारत को बचाने की लड़ाई दक्षिण दिल्ली में नवधनाढ्य वर्ग के किसी ड्राइंग रूम में बहस से नहीं जीती जा सकती। उपरोक्त लेखांश में भारत के किस मुद्दे को वर्णित किया गया है? A आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक पिछड़ापन B संसदीय परम्परा व आतंकवाद C गरीबी बनाम अमीरी D आतंकवाद द्वारा भारतीय गणतंत्र को चुनौती
7)
माओवाद आतंकवाद है। आतंकवाद भयदोहन के लिए हिंसा या शक्ति का प्रयोग करता है। वामपंथी इसे जन संघर्ष के रूप में प्रदर्शित करते हैं किंतु प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने2004 में ही घोषणा कर दी थी कि माओवाद भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है। पिछले छह सालों में माओवादी सबसे बड़े शत्रु बने हुए हैं। इस साल अप्रैल में माओवादियों ने 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था। इसके बाद छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में उन्होंने एक बस में विस्फोट कर 30 लोगों की हत्या कर दी थी। यही नहीं, उन्होंने ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पर भयावह हमला कर निर्दोष लोगों की जानें लीं। 2004 से भारत में माओवादी सात हजार घटनाओं को अंजाम दे चुके हैं, जिनमें साढ़े पांच हजार लोग मारे गए। 2009 में माओवाद ने हर आठ घंटे में एक जान ली। माओवाद के हमदर्द विकास के अभाव का रोना रोते हैं जबकि 2008 और 2009 में दो सालों के दौरान माओवादियों ने 1700 स्कूलों को ध्वस्त कर दिया है। पिछले एक दशक में जिहादी आतंक से अधिक जानें माओवादी हमलों में गई हैं। माओवादी गुरिल्लों ने राज्य सत्ता को ‘शत्रु’ और टकराव को ‘युद्ध’ की संज्ञा दी है। भारत के छह सौ जिलों में से 220 में यानी हर तीन में से एक जिले में युद्ध छिड़ा हुआ है। देश के बीचोबीच गृहयुद्ध के हालात के मद्देनजर इस वक्त आवश्यकता राजनीतिक इच्छाशक्ति की है, तभी हम इन हिंसक लोगों से बच सकते हैं जो भारतीय संसदीय लोकतंत्र को माओवादी अधिसत्ता में बदलने में यकीन रखते हैं। हमें सशस्त्र संघर्ष द्वारा सरकार को पलटने के माओवादियों के लक्ष्यों को नहीं भूलना चाहिए। हमारा पहला कर्तव्य भारतीय लोकतंत्र को बचाना है। इसमें जितनी भी खामियां हों, किंतु अंततः आदिवासी क्षेत्रें में भी लोकतंत्र ही गरीबों के लिए आशा की एकमात्र किरण है। इन क्षेत्रें में विकास तभी हो सकता है, जब शांति कायम हो जाए। सशस्त्र विद्रोह को दबाने का एकमात्र हल जबरदस्त सैन्य कार्रवाई ही हो सकती है। जो लोग यह सोचकर खुद को भुलावे में रखते हैं कि माओवादी भटके हुए नौजवान हैं, उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि माओवादी भारत में लोकतंत्र को ध्वस्त कर इसके बदले एकल सत्तात्मक माओवाद की स्थापना करना चाहते है, जैसा कि चीन में माओत्से तुंग ने किया था। उन्हें याद रखना चाहिए कि इसी विचाराधारा के कारण चीन माओ के कार्यकाल में दशकों तक पिछड़ा रहा। इस प्रकार की विचारधारा से भारत को बचाने की लड़ाई दक्षिण दिल्ली में नवधनाढ्य वर्ग के किसी ड्राइंग रूम में बहस से नहीं जीती जा सकती। आदिवासी क्षेत्रें में गरीबों के लिए आशा की एकमात्र किरण है? A रोजगारB राजनीतिक-आर्थिक पहचान C लोकतंत्र D सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक जागृति
8)
माओवाद आतंकवाद है। आतंकवाद भयदोहन के लिए हिंसा या शक्ति का प्रयोग करता है। वामपंथी इसे जन संघर्ष के रूप में प्रदर्शित करते हैं किंतु प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने2004 में ही घोषणा कर दी थी कि माओवाद भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है। पिछले छह सालों में माओवादी सबसे बड़े शत्रु बने हुए हैं। इस साल अप्रैल में माओवादियों ने 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था। इसके बाद छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में उन्होंने एक बस में विस्फोट कर 30 लोगों की हत्या कर दी थी। यही नहीं, उन्होंने ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पर भयावह हमला कर निर्दोष लोगों की जानें लीं। 2004 से भारत में माओवादी सात हजार घटनाओं को अंजाम दे चुके हैं, जिनमें साढ़े पांच हजार लोग मारे गए। 2009 में माओवाद ने हर आठ घंटे में एक जान ली। माओवाद के हमदर्द विकास के अभाव का रोना रोते हैं जबकि 2008 और 2009 में दो सालों के दौरान माओवादियों ने 1700 स्कूलों को ध्वस्त कर दिया है। पिछले एक दशक में जिहादी आतंक से अधिक जानें माओवादी हमलों में गई हैं। माओवादी गुरिल्लों ने राज्य सत्ता को ‘शत्रु’ और टकराव को ‘युद्ध’ की संज्ञा दी है। भारत के छह सौ जिलों में से 220 में यानी हर तीन में से एक जिले में युद्ध छिड़ा हुआ है। देश के बीचोबीच गृहयुद्ध के हालात के मद्देनजर इस वक्त आवश्यकता राजनीतिक इच्छाशक्ति की है, तभी हम इन हिंसक लोगों से बच सकते हैं जो भारतीय संसदीय लोकतंत्र को माओवादी अधिसत्ता में बदलने में यकीन रखते हैं। हमें सशस्त्र संघर्ष द्वारा सरकार को पलटने के माओवादियों के लक्ष्यों को नहीं भूलना चाहिए। हमारा पहला कर्तव्य भारतीय लोकतंत्र को बचाना है। इसमें जितनी भी खामियां हों, किंतु अंततः आदिवासी क्षेत्रें में भी लोकतंत्र ही गरीबों के लिए आशा की एकमात्र किरण है। इन क्षेत्रें में विकास तभी हो सकता है, जब शांति कायम हो जाए। सशस्त्र विद्रोह को दबाने का एकमात्र हल जबरदस्त सैन्य कार्रवाई ही हो सकती है। जो लोग यह सोचकर खुद को भुलावे में रखते हैं कि माओवादी भटके हुए नौजवान हैं, उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि माओवादी भारत में लोकतंत्र को ध्वस्त कर इसके बदले एकल सत्तात्मक माओवाद की स्थापना करना चाहते है, जैसा कि चीन में माओत्से तुंग ने किया था। उन्हें याद रखना चाहिए कि इसी विचाराधारा के कारण चीन माओ के कार्यकाल में दशकों तक पिछड़ा रहा। इस प्रकार की विचारधारा से भारत को बचाने की लड़ाई दक्षिण दिल्ली में नवधनाढ्य वर्ग के किसी ड्राइंग रूम में बहस से नहीं जीती जा सकती। निम्नलिखित कथनों को ध्यानपूर्वक अध्ययन कर सही उत्तरों का चयन करें। 1- माओत्से तुंग चीन का नागरिक था 2- माओवाद आतंकवाद नही है 3- माओवादी भटके हुए नौजवान हैं 4- माओवाद का समाधान शांतिपूर्ण बातचीत से हो सकता है। A उपर्युक्त सभी सही हैंB सिर्फ 1, 4 सही है C सिर्फ 1 सही हैD 2, 3, 4 सही है
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निम्नलिखित जानकारी को ध्यानपूर्वक अध्ययन कर उसके नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए- P, Q, R, S, T, U और V सात प्रोफेसर हैं। इनमें से प्रत्येक भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, अंग्रेजी, गणित, अर्थशास्त्र और भूगोल में से एक भिन्न विषय पढ़ाते है। यह जरूरी नहीं कि इसी क्रम में। इनमें से प्रत्येक सोमवार से सप्ताह के एक दिन पढ़ाता है, जरूरी नहीं इसी क्रम में। शुक्रवार को R जीव विज्ञान पढ़ाता है। प्रोफेसर U जिस दिन भी भौतिक विज्ञान पढ़ाता है उसके पूर्व दिवस पर Q गणित पढ़ाता है। V रविवार को पढ़ाता है, किन्तु वह रसायन विज्ञान या अंग्रेजी नहीं पढ़ाता है। वह जिस दिन पढ़ाता है उसके पूर्व दिवस पर अर्थशास्त्र पढ़ाता है। मंगलवार को P भूगोल पढ़ाता है। T अंग्रेजी नहीं पढ़ाता है। U कौन-से दिन पढ़ाता है? A बुधावार B गुरुवार C बुधावार या गुरुवार D डाटा अपर्याप्त है
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निम्नलिखित जानकारी को ध्यानपूर्वक अध्ययन कर उसके नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए- P, Q, R, S, T, U और V सात प्रोफेसर हैं। इनमें से प्रत्येक भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, अंग्रेजी, गणित, अर्थशास्त्र और भूगोल में से एक भिन्न विषय पढ़ाते है। यह जरूरी नहीं कि इसी क्रम में। इनमें से प्रत्येक सोमवार से सप्ताह के एक दिन पढ़ाता है, जरूरी नहीं इसी क्रम में। शुक्रवार को R जीव विज्ञान पढ़ाता है। प्रोफेसर U जिस दिन भी भौतिक विज्ञान पढ़ाता है उसके पूर्व दिवस पर Q गणित पढ़ाता है। V रविवार को पढ़ाता है, किन्तु वह रसायन विज्ञान या अंग्रेजी नहीं पढ़ाता है। वह जिस दिन पढ़ाता है उसके पूर्व दिवस पर अर्थशास्त्र पढ़ाता है। मंगलवार को P भूगोल पढ़ाता है। T अंग्रेजी नहीं पढ़ाता है। V कौन-सा विषय पढ़ाता है? A रसायन विज्ञानB अंग्रेजी C डाटा अपर्याप्त हैD जीव विज्ञान
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निम्नलिखित जानकारी को ध्यानपूर्वक अध्ययन कर उसके नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए- P, Q, R, S, T, U और V सात प्रोफेसर हैं। इनमें से प्रत्येक भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, अंग्रेजी, गणित, अर्थशास्त्र और भूगोल में से एक भिन्न विषय पढ़ाते है। यह जरूरी नहीं कि इसी क्रम में। इनमें से प्रत्येक सोमवार से सप्ताह के एक दिन पढ़ाता है, जरूरी नहीं इसी क्रम में। शुक्रवार को R जीव विज्ञान पढ़ाता है। प्रोफेसर U जिस दिन भी भौतिक विज्ञान पढ़ाता है उसके पूर्व दिवस पर Q गणित पढ़ाता है। V रविवार को पढ़ाता है, किन्तु वह रसायन विज्ञान या अंग्रेजी नहीं पढ़ाता है। वह जिस दिन पढ़ाता है उसके पूर्व दिवस पर अर्थशास्त्र पढ़ाता है। मंगलवार को P भूगोल पढ़ाता है। T अंग्रेजी नहीं पढ़ाता है। T कौन-सा दिन पढ़ाता है? A रसायन विज्ञानB भौतिक विज्ञान C रसायन या भौतिक विज्ञानD डाटा अपर्याप्त है
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निम्नलिखित जानकारी को ध्यानपूर्वक अध्ययन कर उसके नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए- P, Q, R, S, T, U और V सात प्रोफेसर हैं। इनमें से प्रत्येक भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, अंग्रेजी, गणित, अर्थशास्त्र और भूगोल में से एक भिन्न विषय पढ़ाते है। यह जरूरी नहीं कि इसी क्रम में। इनमें से प्रत्येक सोमवार से सप्ताह के एक दिन पढ़ाता है, जरूरी नहीं इसी क्रम में। शुक्रवार को R जीव विज्ञान पढ़ाता है। प्रोफेसर U जिस दिन भी भौतिक विज्ञान पढ़ाता है उसके पूर्व दिवस पर Q गणित पढ़ाता है। V रविवार को पढ़ाता है, किन्तु वह रसायन विज्ञान या अंग्रेजी नहीं पढ़ाता है। वह जिस दिन पढ़ाता है उसके पूर्व दिवस पर अर्थशास्त्र पढ़ाता है। मंगलवार को P भूगोल पढ़ाता है। T अंग्रेजी नहीं पढ़ाता है। T कौन-से दिन पढ़ाता है? A बुधावारB गुरुवार C सोमवारD डाटा अपर्याप्त है
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। करीब 31 करोड़ भारतवासी गरीबी की सरकारी परिभाषा के हिसाब से गरीबी-रेखा के नीचे रह रहे हैं। जब भारत आजाद हुआ था, तब उसकी समूची आबादी करीब 35 करोड़ थी।1973-74 में भारत में गरीबी का आकलन शुरू होने के बाद से 2004-05 तक सरकारी परिभाषा के हिसाब से गरीबी-रेखा के नीचे जीने वालों की संख्या में कुल एक करोड़ 90 लाख की कमी आई थी। गौर कीजिए, यह वही गरीबी-रेखा है, जिसके संबंध में अब यह बाकायदा साबित हो चुका है कि यह जनता के जीवन-स्तर के आकलन की तो बात ही छोड़ दी जाए, किसी तरह से जिंदा रह रहे लोगों की सही गिनती बताने के लिए भी पर्याप्त है। एक मायने में तो योजना आयोग की रिपोर्ट उसी सच्चाई की पुष्टि करती है, जो राष्ट्रीय नमूना सर्वे, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे तथा अन्य ऐसे ही सर्वेक्षणों की रिपोर्टों के जरिए पहले से ही हमारे सामने मुँह बाए खड़ी रही है। योजना आयोग की रिपोर्ट दिखाती है कि हमारे देश में ग्रामीण गरीब दो दशक पहले जितना पोषण आहार पा लेते थे, आज उन्हें वह भी हासिल नहीं हो पा रहा है।1983 से 2004-05 के बीच ग्रामीण इलाकों में कैलोरी व प्रोटीन के कुल आहार में आठ फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है और शहरी इलाकों में  3-3 फीसदी की। भूख की चिताजनक दशा का अंदाजा इस तथ्य से लग जाता है कि हमारे देश में एक भी ऐसा राज्य नहीं है, जिसका भूख सूचकांक दहाई अंक से नीचे हो। हमारे देश में तीन वर्ष से कम आयु के आधे बच्चे कुपोषित हैं, जिनकी स्थिति सब-सहारा क्षेत्र के औसत से भी खराब है। आधे बच्चों को जीवन रक्षक व रोग निरोधक सभी टीके नहीं लगते हैं और इस तरह वे ऐसी बीमारियों के ग्रास बन रहे हैं, जिन्हें पूरी तरह से रोका जा सकता है। जहाँ तक हमारे देश की जनता के स्वास्थ्य का सवाल है, स्वास्थ्य क्षेत्र पर हमारा कुल खर्च  (जिसमें सार्वजनिक व निजी, हर तरह का खर्च शामिल है) सकल घरेलू उत्पाद के पैमाने से अफ्रीकी महाद्वीप के औसत से भी कम है। आजादी के 64 साल बाद भी हमारे देश में सफाई की दशा दयनीय है और यहाँ तक कि करीब 50 फीसदी घरों में तो शौचालय तक नहीं है। इसके बावजूद, इस रिपोर्ट के जारी किए जाने के अगले ही दिन जब राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक हुई, तो ऐसा लग रहा था कि जैसे सरकार अपनी ही रिपोर्ट के निष्कर्ष पूरी तरह से भुला चुकी हो। अगर भारत को सचमुच एक महाशक्ति के रूप में उभरना है, तो यह तभी हो सकता है, जब देश के विपुल मानव संसाधन को उन्नत बनाया जाए। इसके लिए हमें अपनी जनता की जिन्दगी बेहतर बनाने पर ध्यान केन्द्रित करना पड़ेगा। ऐसा करने के लिए संसाधन हमारे पास हैं। वास्तव में अगर ऐसा नहीं हो रहा है, तो इसकी वजह सिर्फ इतनी नहीं है कि ऐसा करने की राजनीतिक इच्छा नहीं है। ऐसा नहीं हो रहा है, क्योंकि हमारे शासक वर्ग की यह सोची-समझी नीति है और यही उनकी नवउदारवादी नीतियों की दिशा है कि देश के संसाधनों का उपयोग आम जनता की कीमत पर पूंजीपतियों के मुनाफे ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने के लिए किया जाए। ये वर्ग स्वार्थ ही है, जो सोचे समझे तरीके से हमारे देश को अपनी निहित संभावनाओं को सामने लाने ओर उसके बल पर दुनिया के स्तर पर एक सच्ची विश्व शक्ति बनकर उभरने से रोक रहे हैं। प्रस्तुत लेखांश का संबंध किस क्षेत्र की ओर ध्यान निर्दिष्ट करता है? A राजनीतिक व आर्थिक पहलूB भुखमरी और भ्रष्टाचार C भारत की दुर्दशाD गरीब व राजनीति
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। करीब 31 करोड़ भारतवासी गरीबी की सरकारी परिभाषा के हिसाब से गरीबी-रेखा के नीचे रह रहे हैं। जब भारत आजाद हुआ था, तब उसकी समूची आबादी करीब 35 करोड़ थी।1973-74 में भारत में गरीबी का आकलन शुरू होने के बाद से 2004-05 तक सरकारी परिभाषा के हिसाब से गरीबी-रेखा के नीचे जीने वालों की संख्या में कुल एक करोड़ 90 लाख की कमी आई थी। गौर कीजिए, यह वही गरीबी-रेखा है, जिसके संबंध में अब यह बाकायदा साबित हो चुका है कि यह जनता के जीवन-स्तर के आकलन की तो बात ही छोड़ दी जाए, किसी तरह से जिंदा रह रहे लोगों की सही गिनती बताने के लिए भी पर्याप्त है। एक मायने में तो योजना आयोग की रिपोर्ट उसी सच्चाई की पुष्टि करती है, जो राष्ट्रीय नमूना सर्वे, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे तथा अन्य ऐसे ही सर्वेक्षणों की रिपोर्टों के जरिए पहले से ही हमारे सामने मुँह बाए खड़ी रही है। योजना आयोग की रिपोर्ट दिखाती है कि हमारे देश में ग्रामीण गरीब दो दशक पहले जितना पोषण आहार पा लेते थे, आज उन्हें वह भी हासिल नहीं हो पा रहा है।1983 से 2004-05 के बीच ग्रामीण इलाकों में कैलोरी व प्रोटीन के कुल आहार में आठ फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है और शहरी इलाकों में  3-3 फीसदी की। भूख की चिताजनक दशा का अंदाजा इस तथ्य से लग जाता है कि हमारे देश में एक भी ऐसा राज्य नहीं है, जिसका भूख सूचकांक दहाई अंक से नीचे हो। हमारे देश में तीन वर्ष से कम आयु के आधे बच्चे कुपोषित हैं, जिनकी स्थिति सब-सहारा क्षेत्र के औसत से भी खराब है। आधे बच्चों को जीवन रक्षक व रोग निरोधक सभी टीके नहीं लगते हैं और इस तरह वे ऐसी बीमारियों के ग्रास बन रहे हैं, जिन्हें पूरी तरह से रोका जा सकता है। जहाँ तक हमारे देश की जनता के स्वास्थ्य का सवाल है, स्वास्थ्य क्षेत्र पर हमारा कुल खर्च  (जिसमें सार्वजनिक व निजी, हर तरह का खर्च शामिल है) सकल घरेलू उत्पाद के पैमाने से अफ्रीकी महाद्वीप के औसत से भी कम है। आजादी के 64 साल बाद भी हमारे देश में सफाई की दशा दयनीय है और यहाँ तक कि करीब 50 फीसदी घरों में तो शौचालय तक नहीं है। इसके बावजूद, इस रिपोर्ट के जारी किए जाने के अगले ही दिन जब राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक हुई, तो ऐसा लग रहा था कि जैसे सरकार अपनी ही रिपोर्ट के निष्कर्ष पूरी तरह से भुला चुकी हो। अगर भारत को सचमुच एक महाशक्ति के रूप में उभरना है, तो यह तभी हो सकता है, जब देश के विपुल मानव संसाधन को उन्नत बनाया जाए। इसके लिए हमें अपनी जनता की जिन्दगी बेहतर बनाने पर ध्यान केन्द्रित करना पड़ेगा। ऐसा करने के लिए संसाधन हमारे पास हैं। वास्तव में अगर ऐसा नहीं हो रहा है, तो इसकी वजह सिर्फ इतनी नहीं है कि ऐसा करने की राजनीतिक इच्छा नहीं है। ऐसा नहीं हो रहा है, क्योंकि हमारे शासक वर्ग की यह सोची-समझी नीति है और यही उनकी नवउदारवादी नीतियों की दिशा है कि देश के संसाधनों का उपयोग आम जनता की कीमत पर पूंजीपतियों के मुनाफे ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने के लिए किया जाए। ये वर्ग स्वार्थ ही है, जो सोचे समझे तरीके से हमारे देश को अपनी निहित संभावनाओं को सामने लाने ओर उसके बल पर दुनिया के स्तर पर एक सच्ची विश्व शक्ति बनकर उभरने से रोक रहे हैं। दिए गए लेखांश को दृष्टिगत रखते हुए उपयुक्त शीर्षक का चयन करें। A भुखमरी, गरीबी और स्वास्थ्यB गरीबी और राजनीतिक दंभ C सरकारी आंकड़े और गरीबD कुपोषण बनाम गरीबी
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। करीब 31 करोड़ भारतवासी गरीबी की सरकारी परिभाषा के हिसाब से गरीबी-रेखा के नीचे रह रहे हैं। जब भारत आजाद हुआ था, तब उसकी समूची आबादी करीब 35 करोड़ थी।1973-74 में भारत में गरीबी का आकलन शुरू होने के बाद से 2004-05 तक सरकारी परिभाषा के हिसाब से गरीबी-रेखा के नीचे जीने वालों की संख्या में कुल एक करोड़ 90 लाख की कमी आई थी। गौर कीजिए, यह वही गरीबी-रेखा है, जिसके संबंध में अब यह बाकायदा साबित हो चुका है कि यह जनता के जीवन-स्तर के आकलन की तो बात ही छोड़ दी जाए, किसी तरह से जिंदा रह रहे लोगों की सही गिनती बताने के लिए भी पर्याप्त है। एक मायने में तो योजना आयोग की रिपोर्ट उसी सच्चाई की पुष्टि करती है, जो राष्ट्रीय नमूना सर्वे, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे तथा अन्य ऐसे ही सर्वेक्षणों की रिपोर्टों के जरिए पहले से ही हमारे सामने मुँह बाए खड़ी रही है। योजना आयोग की रिपोर्ट दिखाती है कि हमारे देश में ग्रामीण गरीब दो दशक पहले जितना पोषण आहार पा लेते थे, आज उन्हें वह भी हासिल नहीं हो पा रहा है।1983 से 2004-05 के बीच ग्रामीण इलाकों में कैलोरी व प्रोटीन के कुल आहार में आठ फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है और शहरी इलाकों में  3-3 फीसदी की। भूख की चिताजनक दशा का अंदाजा इस तथ्य से लग जाता है कि हमारे देश में एक भी ऐसा राज्य नहीं है, जिसका भूख सूचकांक दहाई अंक से नीचे हो। हमारे देश में तीन वर्ष से कम आयु के आधे बच्चे कुपोषित हैं, जिनकी स्थिति सब-सहारा क्षेत्र के औसत से भी खराब है। आधे बच्चों को जीवन रक्षक व रोग निरोधक सभी टीके नहीं लगते हैं और इस तरह वे ऐसी बीमारियों के ग्रास बन रहे हैं, जिन्हें पूरी तरह से रोका जा सकता है। जहाँ तक हमारे देश की जनता के स्वास्थ्य का सवाल है, स्वास्थ्य क्षेत्र पर हमारा कुल खर्च  (जिसमें सार्वजनिक व निजी, हर तरह का खर्च शामिल है) सकल घरेलू उत्पाद के पैमाने से अफ्रीकी महाद्वीप के औसत से भी कम है। आजादी के 64 साल बाद भी हमारे देश में सफाई की दशा दयनीय है और यहाँ तक कि करीब 50 फीसदी घरों में तो शौचालय तक नहीं है। इसके बावजूद, इस रिपोर्ट के जारी किए जाने के अगले ही दिन जब राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक हुई, तो ऐसा लग रहा था कि जैसे सरकार अपनी ही रिपोर्ट के निष्कर्ष पूरी तरह से भुला चुकी हो। अगर भारत को सचमुच एक महाशक्ति के रूप में उभरना है, तो यह तभी हो सकता है, जब देश के विपुल मानव संसाधन को उन्नत बनाया जाए। इसके लिए हमें अपनी जनता की जिन्दगी बेहतर बनाने पर ध्यान केन्द्रित करना पड़ेगा। ऐसा करने के लिए संसाधन हमारे पास हैं। वास्तव में अगर ऐसा नहीं हो रहा है, तो इसकी वजह सिर्फ इतनी नहीं है कि ऐसा करने की राजनीतिक इच्छा नहीं है। ऐसा नहीं हो रहा है, क्योंकि हमारे शासक वर्ग की यह सोची-समझी नीति है और यही उनकी नवउदारवादी नीतियों की दिशा है कि देश के संसाधनों का उपयोग आम जनता की कीमत पर पूंजीपतियों के मुनाफे ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने के लिए किया जाए। ये वर्ग स्वार्थ ही है, जो सोचे समझे तरीके से हमारे देश को अपनी निहित संभावनाओं को सामने लाने ओर उसके बल पर दुनिया के स्तर पर एक सच्ची विश्व शक्ति बनकर उभरने से रोक रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में कैलोरी व प्रोटीन के कुल आहारों में कितने प्रतिशत की गिरावट हुई? A 8%B 3-3% C 5-9%D 50%
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। करीब 31 करोड़ भारतवासी गरीबी की सरकारी परिभाषा के हिसाब से गरीबी-रेखा के नीचे रह रहे हैं। जब भारत आजाद हुआ था, तब उसकी समूची आबादी करीब 35 करोड़ थी।1973-74 में भारत में गरीबी का आकलन शुरू होने के बाद से 2004-05 तक सरकारी परिभाषा के हिसाब से गरीबी-रेखा के नीचे जीने वालों की संख्या में कुल एक करोड़ 90 लाख की कमी आई थी। गौर कीजिए, यह वही गरीबी-रेखा है, जिसके संबंध में अब यह बाकायदा साबित हो चुका है कि यह जनता के जीवन-स्तर के आकलन की तो बात ही छोड़ दी जाए, किसी तरह से जिंदा रह रहे लोगों की सही गिनती बताने के लिए भी पर्याप्त है। एक मायने में तो योजना आयोग की रिपोर्ट उसी सच्चाई की पुष्टि करती है, जो राष्ट्रीय नमूना सर्वे, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे तथा अन्य ऐसे ही सर्वेक्षणों की रिपोर्टों के जरिए पहले से ही हमारे सामने मुँह बाए खड़ी रही है। योजना आयोग की रिपोर्ट दिखाती है कि हमारे देश में ग्रामीण गरीब दो दशक पहले जितना पोषण आहार पा लेते थे, आज उन्हें वह भी हासिल नहीं हो पा रहा है।1983 से 2004-05 के बीच ग्रामीण इलाकों में कैलोरी व प्रोटीन के कुल आहार में आठ फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है और शहरी इलाकों में  3-3 फीसदी की। भूख की चिताजनक दशा का अंदाजा इस तथ्य से लग जाता है कि हमारे देश में एक भी ऐसा राज्य नहीं है, जिसका भूख सूचकांक दहाई अंक से नीचे हो। हमारे देश में तीन वर्ष से कम आयु के आधे बच्चे कुपोषित हैं, जिनकी स्थिति सब-सहारा क्षेत्र के औसत से भी खराब है। आधे बच्चों को जीवन रक्षक व रोग निरोधक सभी टीके नहीं लगते हैं और इस तरह वे ऐसी बीमारियों के ग्रास बन रहे हैं, जिन्हें पूरी तरह से रोका जा सकता है। जहाँ तक हमारे देश की जनता के स्वास्थ्य का सवाल है, स्वास्थ्य क्षेत्र पर हमारा कुल खर्च  (जिसमें सार्वजनिक व निजी, हर तरह का खर्च शामिल है) सकल घरेलू उत्पाद के पैमाने से अफ्रीकी महाद्वीप के औसत से भी कम है। आजादी के 64 साल बाद भी हमारे देश में सफाई की दशा दयनीय है और यहाँ तक कि करीब 50 फीसदी घरों में तो शौचालय तक नहीं है। इसके बावजूद, इस रिपोर्ट के जारी किए जाने के अगले ही दिन जब राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक हुई, तो ऐसा लग रहा था कि जैसे सरकार अपनी ही रिपोर्ट के निष्कर्ष पूरी तरह से भुला चुकी हो। अगर भारत को सचमुच एक महाशक्ति के रूप में उभरना है, तो यह तभी हो सकता है, जब देश के विपुल मानव संसाधन को उन्नत बनाया जाए। इसके लिए हमें अपनी जनता की जिन्दगी बेहतर बनाने पर ध्यान केन्द्रित करना पड़ेगा। ऐसा करने के लिए संसाधन हमारे पास हैं। वास्तव में अगर ऐसा नहीं हो रहा है, तो इसकी वजह सिर्फ इतनी नहीं है कि ऐसा करने की राजनीतिक इच्छा नहीं है। ऐसा नहीं हो रहा है, क्योंकि हमारे शासक वर्ग की यह सोची-समझी नीति है और यही उनकी नवउदारवादी नीतियों की दिशा है कि देश के संसाधनों का उपयोग आम जनता की कीमत पर पूंजीपतियों के मुनाफे ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने के लिए किया जाए। ये वर्ग स्वार्थ ही है, जो सोचे समझे तरीके से हमारे देश को अपनी निहित संभावनाओं को सामने लाने ओर उसके बल पर दुनिया के स्तर पर एक सच्ची विश्व शक्ति बनकर उभरने से रोक रहे हैं। निम्नलिखित कथनों को ध्यानपूर्वक पढ़ें: 1- 64 फीसदी घरों में शौचालय नहीं है। 2- 50 फीसदी घरों में स्वास्थ्य घर नहीं है। 3- 31 करोड़ लोग गरीब हैं। 4- 33% गिरावट (कैलोरी में) शहरी क्षेत्रें में हुई है। उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से कथन सही है/हैं? A केवल 3B केवल 1 C 1, 3 और 4D उपरोक्त सभी
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सत्ता का एक गुण है कि वह सबको समान रूप से प्रभावित करती है। वह जनतांत्रिक ढ़ंग से चुने गए नेता और अधिनायकवादी में फक्र नहीं करती। वह ऊपर से थोपे गए नेता और जननेता में भी भेदभाव नहीं करती। जो भी उसके प्रभाव क्षेत्र में आया उसे सबसे पहले वह अहंकारी बना देती है। सत्तारूढ़ होते ही व्यक्ति को लगता है कि अब वह सामान्य मनुष्य से नियंता बन गया है। वह जो कहेगा और जो करेगा वही कानून होगा। उसे यह स्वाभाविक बात लगती है। दरअसल किसी सरकार की लोकप्रियता और अलोकप्रियता उसके कार्यकर्ताओं के आचरण पर निर्भर करती है। सत्ता में आने के बाद वह सरकार और पार्टी दोनों का प्रतिनिधि बन जाता है। उसके व्यवहार से लोग अंदाजा लगाते हैं कि सरकार किस दिशा में जा रही है। चुनाव के दौरान और उसके पहले हाथ जोड़कर नतमस्तक रहने वाले जब मतदाता के सामने सत्ता के दर्प से तनकर खड़े होते हैं तो वह समझ जाता है कि अब कोड़ा फटकारने का समय ज्यादा दूर नहीं है, लेकिन सत्ता का अहंकार सत्ताधारियों को इस जमीनी हकीकत को समझने नहीं देता। जनतांत्रिक व्यवस्था में खामियां ढूंढ़ने वाले अक्सर कहते हैं कि यह अधिनायकों को चुनने की व्यवस्था है। आखिर हिटलर और मुसोलिनी चुनाव जीतकर ही सत्ता में आए थे। वर्षों संघर्ष के बाद सत्ता में आए कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी-एस- येद्दयुरप्पा को जेल न जाना पड़ता। राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद उनके बेटे को आय से अधिक संपत्ति का जवाब न देना पड़ता। नेता का अपने कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिए चितित होना कोई गलत बात नहीं है, लेकिन सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ता होने के नाते उनकी जिम्मेदारी विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं से ज्यादा होती है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में तो यह और भी अहम है, क्योंकि ममता और उनकी पार्टी ने प्रदेश के लोगों से वायदा किया था कि वामपंथी दलों की हिंसा की राजनीति से उन्हें मुक्ति दिलाएगी। राजनीतिक सत्ता, धन की सत्ता और बाहुबली यह मानकर चलते हैं कि वे आम आदमी से अलग हैं। वे खास हैं इसलिए कानून एवं व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों को उनके मुताबिक चलना चाहिए। सत्ता के अहंकार के सामने कानून और संविधान उन्हें बौने नजर आते हैं। कानून से बचने और जरूरत पड़े तो कानून को अपने पक्ष में करना उन्हें आता है। उन्हें लगता है कि जो कानून उनकी मनमर्जी चलाने में बाधक बने उसे बदल देना चाहिए। यह प्रवृत्ति राजनीतिक व्यवस्था के पतन की एक बड़ी वजह है। इसी सोच की वजह से राजनीति में आने वाला हर व्यक्ति केवल सत्तारूढ़ दल का सदस्य बनना चाहता है। सत्ता में आने की संभावना वाले दल का टिकट पाने के लिए वह कोई भी कीमत अदा करने को तैयार रहता है। टिकट न मिले तो किसी तरह चुनाव जीत कर दल-बदल के रास्ते सत्ता तक पहुँचने की कोशिश करता है। अब कोई विपक्ष में बैठने के लिए चुनाव नहीं लड़ना चाहता। इस देश का मतदाता सत्तारूढ़ दल की बहुत सी मनमानियों को नजर-अंदाज कर देता है, पर सत्ता के अहंकार को वह किसी हालत में बर्दाश्त नहीं करता। मतदाता को नासमझ और कमजोर याददाश्त का समझने वाले नेता और पार्टियां चुनाव में मुँह की खाते हैं। सत्ता के अहंकार को अहंकार की सत्ता बनने में ज्यादा समय नहीं लगता और मतदाता को अपनी भृकुटि टेढ़ी करने में और भी कम समय लगता है। प्रस्तुत लेखांश वर्तमान समय की किस परिस्थिति को दर्शाता है? A राजनीति का अपराधीकरणB बाहुबली व सत्ता C राजनीतिक व्यवस्थाD सत्ता का दुरूपयोग
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सत्ता का एक गुण है कि वह सबको समान रूप से प्रभावित करती है। वह जनतांत्रिक ढ़ंग से चुने गए नेता और अधिनायकवादी में फक्र नहीं करती। वह ऊपर से थोपे गए नेता और जननेता में भी भेदभाव नहीं करती। जो भी उसके प्रभाव क्षेत्र में आया उसे सबसे पहले वह अहंकारी बना देती है। सत्तारूढ़ होते ही व्यक्ति को लगता है कि अब वह सामान्य मनुष्य से नियंता बन गया है। वह जो कहेगा और जो करेगा वही कानून होगा। उसे यह स्वाभाविक बात लगती है। दरअसल किसी सरकार की लोकप्रियता और अलोकप्रियता उसके कार्यकर्ताओं के आचरण पर निर्भर करती है। सत्ता में आने के बाद वह सरकार और पार्टी दोनों का प्रतिनिधि बन जाता है। उसके व्यवहार से लोग अंदाजा लगाते हैं कि सरकार किस दिशा में जा रही है। चुनाव के दौरान और उसके पहले हाथ जोड़कर नतमस्तक रहने वाले जब मतदाता के सामने सत्ता के दर्प से तनकर खड़े होते हैं तो वह समझ जाता है कि अब कोड़ा फटकारने का समय ज्यादा दूर नहीं है, लेकिन सत्ता का अहंकार सत्ताधारियों को इस जमीनी हकीकत को समझने नहीं देता। जनतांत्रिक व्यवस्था में खामियां ढूंढ़ने वाले अक्सर कहते हैं कि यह अधिनायकों को चुनने की व्यवस्था है। आखिर हिटलर और मुसोलिनी चुनाव जीतकर ही सत्ता में आए थे। वर्षों संघर्ष के बाद सत्ता में आए कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी-एस- येद्दयुरप्पा को जेल न जाना पड़ता। राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद उनके बेटे को आय से अधिक संपत्ति का जवाब न देना पड़ता। नेता का अपने कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिए चितित होना कोई गलत बात नहीं है, लेकिन सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ता होने के नाते उनकी जिम्मेदारी विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं से ज्यादा होती है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में तो यह और भी अहम है, क्योंकि ममता और उनकी पार्टी ने प्रदेश के लोगों से वायदा किया था कि वामपंथी दलों की हिंसा की राजनीति से उन्हें मुक्ति दिलाएगी। राजनीतिक सत्ता, धन की सत्ता और बाहुबली यह मानकर चलते हैं कि वे आम आदमी से अलग हैं। वे खास हैं इसलिए कानून एवं व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों को उनके मुताबिक चलना चाहिए। सत्ता के अहंकार के सामने कानून और संविधान उन्हें बौने नजर आते हैं। कानून से बचने और जरूरत पड़े तो कानून को अपने पक्ष में करना उन्हें आता है। उन्हें लगता है कि जो कानून उनकी मनमर्जी चलाने में बाधक बने उसे बदल देना चाहिए। यह प्रवृत्ति राजनीतिक व्यवस्था के पतन की एक बड़ी वजह है। इसी सोच की वजह से राजनीति में आने वाला हर व्यक्ति केवल सत्तारूढ़ दल का सदस्य बनना चाहता है। सत्ता में आने की संभावना वाले दल का टिकट पाने के लिए वह कोई भी कीमत अदा करने को तैयार रहता है। टिकट न मिले तो किसी तरह चुनाव जीत कर दल-बदल के रास्ते सत्ता तक पहुँचने की कोशिश करता है। अब कोई विपक्ष में बैठने के लिए चुनाव नहीं लड़ना चाहता। इस देश का मतदाता सत्तारूढ़ दल की बहुत सी मनमानियों को नजर-अंदाज कर देता है, पर सत्ता के अहंकार को वह किसी हालत में बर्दाश्त नहीं करता। मतदाता को नासमझ और कमजोर याददाश्त का समझने वाले नेता और पार्टियां चुनाव में मुँह की खाते हैं। सत्ता के अहंकार को अहंकार की सत्ता बनने में ज्यादा समय नहीं लगता और मतदाता को अपनी भृकुटि टेढ़ी करने में और भी कम समय लगता है। प्रस्तुत लेखांश का उपयुक्त शीर्षक क्या है? A सत्ता व अधिनायकवादB राजनीति का पतन C जनतांत्रिक व्यवस्थाD जनतंत्र व सत्ता
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सत्ता का एक गुण है कि वह सबको समान रूप से प्रभावित करती है। वह जनतांत्रिक ढ़ंग से चुने गए नेता और अधिनायकवादी में फक्र नहीं करती। वह ऊपर से थोपे गए नेता और जननेता में भी भेदभाव नहीं करती। जो भी उसके प्रभाव क्षेत्र में आया उसे सबसे पहले वह अहंकारी बना देती है। सत्तारूढ़ होते ही व्यक्ति को लगता है कि अब वह सामान्य मनुष्य से नियंता बन गया है। वह जो कहेगा और जो करेगा वही कानून होगा। उसे यह स्वाभाविक बात लगती है। दरअसल किसी सरकार की लोकप्रियता और अलोकप्रियता उसके कार्यकर्ताओं के आचरण पर निर्भर करती है। सत्ता में आने के बाद वह सरकार और पार्टी दोनों का प्रतिनिधि बन जाता है। उसके व्यवहार से लोग अंदाजा लगाते हैं कि सरकार किस दिशा में जा रही है। चुनाव के दौरान और उसके पहले हाथ जोड़कर नतमस्तक रहने वाले जब मतदाता के सामने सत्ता के दर्प से तनकर खड़े होते हैं तो वह समझ जाता है कि अब कोड़ा फटकारने का समय ज्यादा दूर नहीं है, लेकिन सत्ता का अहंकार सत्ताधारियों को इस जमीनी हकीकत को समझने नहीं देता। जनतांत्रिक व्यवस्था में खामियां ढूंढ़ने वाले अक्सर कहते हैं कि यह अधिनायकों को चुनने की व्यवस्था है। आखिर हिटलर और मुसोलिनी चुनाव जीतकर ही सत्ता में आए थे। वर्षों संघर्ष के बाद सत्ता में आए कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी-एस- येद्दयुरप्पा को जेल न जाना पड़ता। राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद उनके बेटे को आय से अधिक संपत्ति का जवाब न देना पड़ता। नेता का अपने कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिए चितित होना कोई गलत बात नहीं है, लेकिन सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ता होने के नाते उनकी जिम्मेदारी विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं से ज्यादा होती है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में तो यह और भी अहम है, क्योंकि ममता और उनकी पार्टी ने प्रदेश के लोगों से वायदा किया था कि वामपंथी दलों की हिंसा की राजनीति से उन्हें मुक्ति दिलाएगी। राजनीतिक सत्ता, धन की सत्ता और बाहुबली यह मानकर चलते हैं कि वे आम आदमी से अलग हैं। वे खास हैं इसलिए कानून एवं व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों को उनके मुताबिक चलना चाहिए। सत्ता के अहंकार के सामने कानून और संविधान उन्हें बौने नजर आते हैं। कानून से बचने और जरूरत पड़े तो कानून को अपने पक्ष में करना उन्हें आता है। उन्हें लगता है कि जो कानून उनकी मनमर्जी चलाने में बाधक बने उसे बदल देना चाहिए। यह प्रवृत्ति राजनीतिक व्यवस्था के पतन की एक बड़ी वजह है। इसी सोच की वजह से राजनीति में आने वाला हर व्यक्ति केवल सत्तारूढ़ दल का सदस्य बनना चाहता है। सत्ता में आने की संभावना वाले दल का टिकट पाने के लिए वह कोई भी कीमत अदा करने को तैयार रहता है। टिकट न मिले तो किसी तरह चुनाव जीत कर दल-बदल के रास्ते सत्ता तक पहुँचने की कोशिश करता है। अब कोई विपक्ष में बैठने के लिए चुनाव नहीं लड़ना चाहता। इस देश का मतदाता सत्तारूढ़ दल की बहुत सी मनमानियों को नजर-अंदाज कर देता है, पर सत्ता के अहंकार को वह किसी हालत में बर्दाश्त नहीं करता। मतदाता को नासमझ और कमजोर याददाश्त का समझने वाले नेता और पार्टियां चुनाव में मुँह की खाते हैं। सत्ता के अहंकार को अहंकार की सत्ता बनने में ज्यादा समय नहीं लगता और मतदाता को अपनी भृकुटि टेढ़ी करने में और भी कम समय लगता है। उपर्युक्त लेखांश के आधार पर सही कथनों का चयन करें: 1- कुछ लोग कहते हैं कि जनतांत्रिक व्यवस्था में अधिनायकों को चुनने की व्यवस्था है। 2- ममता बनर्जी चुनकर सत्ता में आईं है। 3- हिटलर और मुसोलिनी चुनाव जीतकर आए थे। 4- कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा जेल गए। A 1, 3 और 4B 1, 2 और 4 C उपरोक्त सभीD केवल 1 और 2
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सत्ता का एक गुण है कि वह सबको समान रूप से प्रभावित करती है। वह जनतांत्रिक ढ़ंग से चुने गए नेता और अधिनायकवादी में फक्र नहीं करती। वह ऊपर से थोपे गए नेता और जननेता में भी भेदभाव नहीं करती। जो भी उसके प्रभाव क्षेत्र में आया उसे सबसे पहले वह अहंकारी बना देती है। सत्तारूढ़ होते ही व्यक्ति को लगता है कि अब वह सामान्य मनुष्य से नियंता बन गया है। वह जो कहेगा और जो करेगा वही कानून होगा। उसे यह स्वाभाविक बात लगती है। दरअसल किसी सरकार की लोकप्रियता और अलोकप्रियता उसके कार्यकर्ताओं के आचरण पर निर्भर करती है। सत्ता में आने के बाद वह सरकार और पार्टी दोनों का प्रतिनिधि बन जाता है। उसके व्यवहार से लोग अंदाजा लगाते हैं कि सरकार किस दिशा में जा रही है। चुनाव के दौरान और उसके पहले हाथ जोड़कर नतमस्तक रहने वाले जब मतदाता के सामने सत्ता के दर्प से तनकर खड़े होते हैं तो वह समझ जाता है कि अब कोड़ा फटकारने का समय ज्यादा दूर नहीं है, लेकिन सत्ता का अहंकार सत्ताधारियों को इस जमीनी हकीकत को समझने नहीं देता। जनतांत्रिक व्यवस्था में खामियां ढूंढ़ने वाले अक्सर कहते हैं कि यह अधिनायकों को चुनने की व्यवस्था है। आखिर हिटलर और मुसोलिनी चुनाव जीतकर ही सत्ता में आए थे। वर्षों संघर्ष के बाद सत्ता में आए कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी-एस- येद्दयुरप्पा को जेल न जाना पड़ता। राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद उनके बेटे को आय से अधिक संपत्ति का जवाब न देना पड़ता। नेता का अपने कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिए चितित होना कोई गलत बात नहीं है, लेकिन सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ता होने के नाते उनकी जिम्मेदारी विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं से ज्यादा होती है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में तो यह और भी अहम है, क्योंकि ममता और उनकी पार्टी ने प्रदेश के लोगों से वायदा किया था कि वामपंथी दलों की हिंसा की राजनीति से उन्हें मुक्ति दिलाएगी। राजनीतिक सत्ता, धन की सत्ता और बाहुबली यह मानकर चलते हैं कि वे आम आदमी से अलग हैं। वे खास हैं इसलिए कानून एवं व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों को उनके मुताबिक चलना चाहिए। सत्ता के अहंकार के सामने कानून और संविधान उन्हें बौने नजर आते हैं। कानून से बचने और जरूरत पड़े तो कानून को अपने पक्ष में करना उन्हें आता है। उन्हें लगता है कि जो कानून उनकी मनमर्जी चलाने में बाधक बने उसे बदल देना चाहिए। यह प्रवृत्ति राजनीतिक व्यवस्था के पतन की एक बड़ी वजह है। इसी सोच की वजह से राजनीति में आने वाला हर व्यक्ति केवल सत्तारूढ़ दल का सदस्य बनना चाहता है। सत्ता में आने की संभावना वाले दल का टिकट पाने के लिए वह कोई भी कीमत अदा करने को तैयार रहता है। टिकट न मिले तो किसी तरह चुनाव जीत कर दल-बदल के रास्ते सत्ता तक पहुँचने की कोशिश करता है। अब कोई विपक्ष में बैठने के लिए चुनाव नहीं लड़ना चाहता। इस देश का मतदाता सत्तारूढ़ दल की बहुत सी मनमानियों को नजर-अंदाज कर देता है, पर सत्ता के अहंकार को वह किसी हालत में बर्दाश्त नहीं करता। मतदाता को नासमझ और कमजोर याददाश्त का समझने वाले नेता और पार्टियां चुनाव में मुँह की खाते हैं। सत्ता के अहंकार को अहंकार की सत्ता बनने में ज्यादा समय नहीं लगता और मतदाता को अपनी भृकुटि टेढ़ी करने में और भी कम समय लगता है। लेखांश की भाषा शैली किस वर्ग से संदर्भित है? A व्यंग्यात्मकB व्याख्यात्मक C आलोचनात्मकD संवेदनात्मक
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The following questions are based on four passages in English to test the comprehension of English language. Read each passage and answer the questions. The 2011 Census, provisional results of which are now available, suggest that only a tight-lipped smile is in order because while India’s population is not growing as fast as it has been for the last 60 years, it has more than tripled in this time. 1.21 billion Indians, still growing albeit at a decelerating pace, is a cause for very serious concern. As China has discovered, even a GDP growth rate of over 10 per cent sustained over 15 or more years is not enough to bring down poverty levels in a measure that can relieve right-thinking people of a sense of guilt and apprehension. Guilt, because growth widens income disparities, and apprehension because these growing disparities lead to socially and politically unpredictable outcomes. In the end, the State and the citizen turn on each other, as we have been seeing in India, and will doubtless see in China as well. So double-digit growth in GDP can only be one side of the solution, namely, the supply side. The other side, namely the demand side, has also to be tackled. Once again, both India and China have adopted two extreme ends of policy on population. Successive Indian governments have chosen to follow a gently-as-she-goes policy while successive Chinese governments have used the crude one-child policy. In consequence, Indian population growth is slowing too slowly and Chinese population has slowed too rapidly and soon their dependency ratio will increase to Japanese levels. For India, the time has come to stop taking comfort from little gains like increase in literacy, lower mortality and so on. These are no doubt important at the individual level. But in allowing the Amartya Sen-Martha Nussbaum approach to drive policy, the big problem can be lost sight of. And, as Dr Sen would be the first to concede, the maximisation of individual utilities does not always lead to a maximisation of social utility. After all, he was amongst the first to point this out in the 1960s. So while the liberals do their bit for the individual, the Government will have to do its bit for the country and society. Perhaps, for starters, the portfolio can be brought under the PMO, just like space and atomic energy. If nothing else, it would at least send out the much-needed signal that the ghost of the 1976 forced sterilisation programme has finally been laid to rest. ‘Tight-lipped smile’ means: A to have a little satisfaction B only to smile and to speak C smile with difficulties D smile slightly before speaking
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The following questions are based on four passages in English to test the comprehension of English language. Read each passage and answer the questions. The 2011 Census, provisional results of which are now available, suggest that only a tight-lipped smile is in order because while India’s population is not growing as fast as it has been for the last 60 years, it has more than tripled in this time. 1.21 billion Indians, still growing albeit at a decelerating pace, is a cause for very serious concern. As China has discovered, even a GDP growth rate of over 10 per cent sustained over 15 or more years is not enough to bring down poverty levels in a measure that can relieve right-thinking people of a sense of guilt and apprehension. Guilt, because growth widens income disparities, and apprehension because these growing disparities lead to socially and politically unpredictable outcomes. In the end, the State and the citizen turn on each other, as we have been seeing in India, and will doubtless see in China as well. So double-digit growth in GDP can only be one side of the solution, namely, the supply side. The other side, namely the demand side, has also to be tackled. Once again, both India and China have adopted two extreme ends of policy on population. Successive Indian governments have chosen to follow a gently-as-she-goes policy while successive Chinese governments have used the crude one-child policy. In consequence, Indian population growth is slowing too slowly and Chinese population has slowed too rapidly and soon their dependency ratio will increase to Japanese levels. For India, the time has come to stop taking comfort from little gains like increase in literacy, lower mortality and so on. These are no doubt important at the individual level. But in allowing the Amartya Sen-Martha Nussbaum approach to drive policy, the big problem can be lost sight of. And, as Dr Sen would be the first to concede, the maximisation of individual utilities does not always lead to a maximisation of social utility. After all, he was amongst the first to point this out in the 1960s. So while the liberals do their bit for the individual, the Government will have to do its bit for the country and society. Perhaps, for starters, the portfolio can be brought under the PMO, just like space and atomic energy. If nothing else, it would at least send out the much-needed signal that the ghost of the 1976 forced sterilisation programme has finally been laid to rest. Low population in China and Japan will: A decrease the poverty B result in double-digit growth C need a balance in supply and demand D increase their dependency ratio
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The following questions are based on four passages in English to test the comprehension of English language. Read each passage and answer the questions. The 2011 Census, provisional results of which are now available, suggest that only a tight-lipped smile is in order because while India’s population is not growing as fast as it has been for the last 60 years, it has more than tripled in this time. 1.21 billion Indians, still growing albeit at a decelerating pace, is a cause for very serious concern. As China has discovered, even a GDP growth rate of over 10 per cent sustained over 15 or more years is not enough to bring down poverty levels in a measure that can relieve right-thinking people of a sense of guilt and apprehension. Guilt, because growth widens income disparities, and apprehension because these growing disparities lead to socially and politically unpredictable outcomes. In the end, the State and the citizen turn on each other, as we have been seeing in India, and will doubtless see in China as well. So double-digit growth in GDP can only be one side of the solution, namely, the supply side. The other side, namely the demand side, has also to be tackled. Once again, both India and China have adopted two extreme ends of policy on population. Successive Indian governments have chosen to follow a gently-as-she-goes policy while successive Chinese governments have used the crude one-child policy. In consequence, Indian population growth is slowing too slowly and Chinese population has slowed too rapidly and soon their dependency ratio will increase to Japanese levels. For India, the time has come to stop taking comfort from little gains like increase in literacy, lower mortality and so on. These are no doubt important at the individual level. But in allowing the Amartya Sen-Martha Nussbaum approach to drive policy, the big problem can be lost sight of. And, as Dr Sen would be the first to concede, the maximisation of individual utilities does not always lead to a maximisation of social utility. After all, he was amongst the first to point this out in the 1960s. So while the liberals do their bit for the individual, the Government will have to do its bit for the country and society. Perhaps, for starters, the portfolio can be brought under the PMO, just like space and atomic energy. If nothing else, it would at least send out the much-needed signal that the ghost of the 1976 forced sterilisation programme has finally been laid to rest. Who is/are of the view that ‘maximisation’ of individual utilities does not always lead to a maximisation of social utility’? A Amartya Sen B Amartya Sen and Martha Nussbaune C Marth Nussbaum D Liberals
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The following questions are based on four passages in English to test the comprehension of English language. Read each passage and answer the questions. The 2011 Census, provisional results of which are now available, suggest that only a tight-lipped smile is in order because while India’s population is not growing as fast as it has been for the last 60 years, it has more than tripled in this time. 1.21 billion Indians, still growing albeit at a decelerating pace, is a cause for very serious concern. As China has discovered, even a GDP growth rate of over 10 per cent sustained over 15 or more years is not enough to bring down poverty levels in a measure that can relieve right-thinking people of a sense of guilt and apprehension. Guilt, because growth widens income disparities, and apprehension because these growing disparities lead to socially and politically unpredictable outcomes. In the end, the State and the citizen turn on each other, as we have been seeing in India, and will doubtless see in China as well. So double-digit growth in GDP can only be one side of the solution, namely, the supply side. The other side, namely the demand side, has also to be tackled. Once again, both India and China have adopted two extreme ends of policy on population. Successive Indian governments have chosen to follow a gently-as-she-goes policy while successive Chinese governments have used the crude one-child policy. In consequence, Indian population growth is slowing too slowly and Chinese population has slowed too rapidly and soon their dependency ratio will increase to Japanese levels. For India, the time has come to stop taking comfort from little gains like increase in literacy, lower mortality and so on. These are no doubt important at the individual level. But in allowing the Amartya Sen-Martha Nussbaum approach to drive policy, the big problem can be lost sight of. And, as Dr Sen would be the first to concede, the maximisation of individual utilities does not always lead to a maximisation of social utility. After all, he was amongst the first to point this out in the 1960s. So while the liberals do their bit for the individual, the Government will have to do its bit for the country and society. Perhaps, for starters, the portfolio can be brought under the PMO, just like space and atomic energy. If nothing else, it would at least send out the much-needed signal that the ghost of the 1976 forced sterilisation programme has finally been laid to rest. Computers are able to perform many functions similar to those performed by the human brain only because A Modern man is more mechanical than human. B The brain of modern man has shrunk in size. C The sophisticated computer mechanisms have outdone human faculties. D The processes of programming and communication are similar in both cases.
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प्रत्येक प्रश्न निम्नांकित आकृति पर आधारित है, जिसमें चार प्रकार के विशेषज्ञों के समूहों को विभिन्न आकृतियों द्वारा प्रदर्शित किया गया है। वर्ग, भौतिकी विशेषज्ञों को आयत, गणितज्ञों को_ त्रिभुज, भूगोल विशेषज्ञों को तथा वृत्त, इतिहास विशेषज्ञों को प्रदर्शित करता है।   किरण ने संयोग से कहा, नीली कमीज में वह लड़का मेरे पिता की पत्नी की पुत्री के दो भाइयों में से छोटा है। किरण से वह नीली कमीज वाला लड़का किस प्रकार सम्बन्धिात है? A पिताB चाचा C भाईD भतीजा नीचे दिए गए प्रत्येक प्रश्न में एक आकृति दी गई है। इस आकृति के नीचे चार वैकल्पिक आकृतिया दी गई है, प्रत्येक में दी गई आकृति के प्रतिरूप में से एक स्थान रिक्त है जो वैकल्पिक आकृतियों में से किसी एक में है। वह वैकल्पिक आकृति कौन सी है?
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। देश भर में नशे के काले कारोबार में लगे गिरोहबाजों का जाल किस हद तक फैल चुका है और ये किस-किस तरह से अपने कारोबार को अंजाम दे रहे हैं इसका अंदाजा हाल ही में हिमाचल के औद्योगिक क्षेत्र बद्दी में हुई धरपकड़ से लगाया जा सकता है। एक छापेमारी में यहाँ करोड़ों रुपये की नकली और नशीली दवाएँ पकड़ी गई हैं। इन दवाओं को एक कूरियर कंपनी के मार्फत विदेशों में भेजा जाता रहा है। हिमाचल से लेकर दिल्ली, मुंबई और विदेशों में अमेरिका व यूरोप तक इनका जाल बिछा हुआ था। नशे के सौदागर कितने शातिराना तरीके से काम कर रहे हैं, इसका पता इस बात से चलता है कि राज्य के स्वास्थ्य विभाग को तो इसकी जानकारी तक नहीं थी जो कि राज्यों में होने वाली जन स्वास्थ्य संबंधी किसी भी तरह की गतिविधि की देखरेख के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। इसकी जानकारी सबसे पहले केन्द्रीय राजस्व प्रवर्तन निदेशालय को तब हुई जब उसने मुंबई और दिल्ली में दवा कंपनियों पर दबिश दी और वहाँ बद्दी के बागवानियां स्थित दवा उद्योग का सेंपल पाया। नशे के सौदागरों की गिरफ्रत में केवल हिमाचल ही नहीं, पंजाब और जम्मू-कश्मीर भी है, लेकिन अभी तक यहां नशे के कारोबार का जो रूप उभर कर सामने आया है, वह हिमाचल से बहुत भिन्न है। अब तक की पूरी जानकारी के मुताबिक पंजाब और जम्मू-कश्मीर में नशीले पदार्थों का कारोबार सीधे तौर पर होता है। इन राज्यों में इक्का-दुक्का कहीं दवाओं का प्रयोग नशे के तौर पर होता हो तो वह अलग बात है, लेकिन यहाँ से कहीं और नशीली दवाओं या नशे की खेप भेजे जाने की बात सामने नहीं आई है। हिमाचल की स्थिति बिल्कुल उलट है। यहाँ न केवल नशे का कारोबार बहुत गहरे तौर पर छिपकर हो रहा है, बल्कि नशीली दवाएं यहाँ से बाहर भी भेजी जा रही हैं। सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि सारा कारोबार एक ऐसी कंपनी द्वारा किया जा रहा है, जिसे सरकार ने दवाएं बनाने के लिए लाइसेंस दिया था। यह अलग बात है कि अब स्वास्थ्य विभाग ने संबंधित कंपनी का लाइसेंस निलंबित करने की कार्यवाही शुरू कर दी है, लेकिन यह सब तब शुरू किया गया जब कि बहुत देर हो चुकी है। हैरत यह है कि जो जानकारी सीधे तौर पर हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग को होनी चाहिए थी, वह उसे न होकर केन्द्रीय राजस्व प्रवर्त्तन निदेशालय (डीआरआइ) को हुई। डीआरआई ने इसकी सूचना हिमाचल प्रदेश में राज्य दवा नियंत्रक के प्रवर्तन निदेशालय को दी और इसके बाद दोनों ने मिलकर छापेमारी की। तब मालूम हुआ कि टैन्स्टार फार्मा नाम से पंजीकृत यह कंपनी चार अन्य फर्जी कंपनियों के नाम से भी दवाएं बना रही थी तथा कई दवाएं तो यह ऐसी बना रही थी जिन्हें बनाने के लिए इसके पास लाइसेंस ही नहीं था। दूसरी तरफ, कूरियर कंपनी इन नशीली दवाओं की खेप पर मिल्क बैग, ग्लूकोज सैशे और एलोवेरा प्रोडक्ट के स्टिकर लगाकर बाहर भेजती थी। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि ऐसे ही किसी तरीके से ये दवाएं अब भी देश के भी विभिन्न हिस्सों में पहुँचाई जा रही हों और युवा पीढ़ी को बर्बाद कर रही हों। प्रस्तुत लेखांश को देखते हुए उचित शीर्षक का चयन करें: A नशे के कारोबार B नकली और नशीली दवाएं C नशे का कारोबार: हिमाचल प्रदेश D नशीला व्यापार: गिरोहबाजों का जाल
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। देश भर में नशे के काले कारोबार में लगे गिरोहबाजों का जाल किस हद तक फैल चुका है और ये किस-किस तरह से अपने कारोबार को अंजाम दे रहे हैं इसका अंदाजा हाल ही में हिमाचल के औद्योगिक क्षेत्र बद्दी में हुई धरपकड़ से लगाया जा सकता है। एक छापेमारी में यहाँ करोड़ों रुपये की नकली और नशीली दवाएँ पकड़ी गई हैं। इन दवाओं को एक कूरियर कंपनी के मार्फत विदेशों में भेजा जाता रहा है। हिमाचल से लेकर दिल्ली, मुंबई और विदेशों में अमेरिका व यूरोप तक इनका जाल बिछा हुआ था। नशे के सौदागर कितने शातिराना तरीके से काम कर रहे हैं, इसका पता इस बात से चलता है कि राज्य के स्वास्थ्य विभाग को तो इसकी जानकारी तक नहीं थी जो कि राज्यों में होने वाली जन स्वास्थ्य संबंधी किसी भी तरह की गतिविधि की देखरेख के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। इसकी जानकारी सबसे पहले केन्द्रीय राजस्व प्रवर्तन निदेशालय को तब हुई जब उसने मुंबई और दिल्ली में दवा कंपनियों पर दबिश दी और वहाँ बद्दी के बागवानियां स्थित दवा उद्योग का सेंपल पाया। नशे के सौदागरों की गिरफ्रत में केवल हिमाचल ही नहीं, पंजाब और जम्मू-कश्मीर भी है, लेकिन अभी तक यहां नशे के कारोबार का जो रूप उभर कर सामने आया है, वह हिमाचल से बहुत भिन्न है। अब तक की पूरी जानकारी के मुताबिक पंजाब और जम्मू-कश्मीर में नशीले पदार्थों का कारोबार सीधे तौर पर होता है। इन राज्यों में इक्का-दुक्का कहीं दवाओं का प्रयोग नशे के तौर पर होता हो तो वह अलग बात है, लेकिन यहाँ से कहीं और नशीली दवाओं या नशे की खेप भेजे जाने की बात सामने नहीं आई है। हिमाचल की स्थिति बिल्कुल उलट है। यहाँ न केवल नशे का कारोबार बहुत गहरे तौर पर छिपकर हो रहा है, बल्कि नशीली दवाएं यहाँ से बाहर भी भेजी जा रही हैं। सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि सारा कारोबार एक ऐसी कंपनी द्वारा किया जा रहा है, जिसे सरकार ने दवाएं बनाने के लिए लाइसेंस दिया था। यह अलग बात है कि अब स्वास्थ्य विभाग ने संबंधित कंपनी का लाइसेंस निलंबित करने की कार्यवाही शुरू कर दी है, लेकिन यह सब तब शुरू किया गया जब कि बहुत देर हो चुकी है। हैरत यह है कि जो जानकारी सीधे तौर पर हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग को होनी चाहिए थी, वह उसे न होकर केन्द्रीय राजस्व प्रवर्त्तन निदेशालय (डीआरआइ) को हुई। डीआरआई ने इसकी सूचना हिमाचल प्रदेश में राज्य दवा नियंत्रक के प्रवर्तन निदेशालय को दी और इसके बाद दोनों ने मिलकर छापेमारी की। तब मालूम हुआ कि टैन्स्टार फार्मा नाम से पंजीकृत यह कंपनी चार अन्य फर्जी कंपनियों के नाम से भी दवाएं बना रही थी तथा कई दवाएं तो यह ऐसी बना रही थी जिन्हें बनाने के लिए इसके पास लाइसेंस ही नहीं था। दूसरी तरफ, कूरियर कंपनी इन नशीली दवाओं की खेप पर मिल्क बैग, ग्लूकोज सैशे और एलोवेरा प्रोडक्ट के स्टिकर लगाकर बाहर भेजती थी। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि ऐसे ही किसी तरीके से ये दवाएं अब भी देश के भी विभिन्न हिस्सों में पहुँचाई जा रही हों और युवा पीढ़ी को बर्बाद कर रही हों। उपरोक्त लेखांश का संबंध किस तथ्य से संबंधित है? A प्रशासनिक शिथिलता व कालाबाजारी B राज्य असफल नशे के नियंत्रण में C आतंकवाद व काले-कारोबार D उपरोक्त सभी
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। देश भर में नशे के काले कारोबार में लगे गिरोहबाजों का जाल किस हद तक फैल चुका है और ये किस-किस तरह से अपने कारोबार को अंजाम दे रहे हैं इसका अंदाजा हाल ही में हिमाचल के औद्योगिक क्षेत्र बद्दी में हुई धरपकड़ से लगाया जा सकता है। एक छापेमारी में यहाँ करोड़ों रुपये की नकली और नशीली दवाएँ पकड़ी गई हैं। इन दवाओं को एक कूरियर कंपनी के मार्फत विदेशों में भेजा जाता रहा है। हिमाचल से लेकर दिल्ली, मुंबई और विदेशों में अमेरिका व यूरोप तक इनका जाल बिछा हुआ था। नशे के सौदागर कितने शातिराना तरीके से काम कर रहे हैं, इसका पता इस बात से चलता है कि राज्य के स्वास्थ्य विभाग को तो इसकी जानकारी तक नहीं थी जो कि राज्यों में होने वाली जन स्वास्थ्य संबंधी किसी भी तरह की गतिविधि की देखरेख के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। इसकी जानकारी सबसे पहले केन्द्रीय राजस्व प्रवर्तन निदेशालय को तब हुई जब उसने मुंबई और दिल्ली में दवा कंपनियों पर दबिश दी और वहाँ बद्दी के बागवानियां स्थित दवा उद्योग का सेंपल पाया। नशे के सौदागरों की गिरफ्रत में केवल हिमाचल ही नहीं, पंजाब और जम्मू-कश्मीर भी है, लेकिन अभी तक यहां नशे के कारोबार का जो रूप उभर कर सामने आया है, वह हिमाचल से बहुत भिन्न है। अब तक की पूरी जानकारी के मुताबिक पंजाब और जम्मू-कश्मीर में नशीले पदार्थों का कारोबार सीधे तौर पर होता है। इन राज्यों में इक्का-दुक्का कहीं दवाओं का प्रयोग नशे के तौर पर होता हो तो वह अलग बात है, लेकिन यहाँ से कहीं और नशीली दवाओं या नशे की खेप भेजे जाने की बात सामने नहीं आई है। हिमाचल की स्थिति बिल्कुल उलट है। यहाँ न केवल नशे का कारोबार बहुत गहरे तौर पर छिपकर हो रहा है, बल्कि नशीली दवाएं यहाँ से बाहर भी भेजी जा रही हैं। सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि सारा कारोबार एक ऐसी कंपनी द्वारा किया जा रहा है, जिसे सरकार ने दवाएं बनाने के लिए लाइसेंस दिया था। यह अलग बात है कि अब स्वास्थ्य विभाग ने संबंधित कंपनी का लाइसेंस निलंबित करने की कार्यवाही शुरू कर दी है, लेकिन यह सब तब शुरू किया गया जब कि बहुत देर हो चुकी है। हैरत यह है कि जो जानकारी सीधे तौर पर हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग को होनी चाहिए थी, वह उसे न होकर केन्द्रीय राजस्व प्रवर्त्तन निदेशालय (डीआरआइ) को हुई। डीआरआई ने इसकी सूचना हिमाचल प्रदेश में राज्य दवा नियंत्रक के प्रवर्तन निदेशालय को दी और इसके बाद दोनों ने मिलकर छापेमारी की। तब मालूम हुआ कि टैन्स्टार फार्मा नाम से पंजीकृत यह कंपनी चार अन्य फर्जी कंपनियों के नाम से भी दवाएं बना रही थी तथा कई दवाएं तो यह ऐसी बना रही थी जिन्हें बनाने के लिए इसके पास लाइसेंस ही नहीं था। दूसरी तरफ, कूरियर कंपनी इन नशीली दवाओं की खेप पर मिल्क बैग, ग्लूकोज सैशे और एलोवेरा प्रोडक्ट के स्टिकर लगाकर बाहर भेजती थी। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि ऐसे ही किसी तरीके से ये दवाएं अब भी देश के भी विभिन्न हिस्सों में पहुँचाई जा रही हों और युवा पीढ़ी को बर्बाद कर रही हों। ‘‘बद्दी’’ किस कारण से महत्त्वपूर्ण है? A धार्मिक स्थल B ऐतिहासिक स्थल C औद्योगिक क्षेत्र D नशीला कारोबार व दवाई के लिए
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। देश भर में नशे के काले कारोबार में लगे गिरोहबाजों का जाल किस हद तक फैल चुका है और ये किस-किस तरह से अपने कारोबार को अंजाम दे रहे हैं इसका अंदाजा हाल ही में हिमाचल के औद्योगिक क्षेत्र बद्दी में हुई धरपकड़ से लगाया जा सकता है। एक छापेमारी में यहाँ करोड़ों रुपये की नकली और नशीली दवाएँ पकड़ी गई हैं। इन दवाओं को एक कूरियर कंपनी के मार्फत विदेशों में भेजा जाता रहा है। हिमाचल से लेकर दिल्ली, मुंबई और विदेशों में अमेरिका व यूरोप तक इनका जाल बिछा हुआ था। नशे के सौदागर कितने शातिराना तरीके से काम कर रहे हैं, इसका पता इस बात से चलता है कि राज्य के स्वास्थ्य विभाग को तो इसकी जानकारी तक नहीं थी जो कि राज्यों में होने वाली जन स्वास्थ्य संबंधी किसी भी तरह की गतिविधि की देखरेख के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। इसकी जानकारी सबसे पहले केन्द्रीय राजस्व प्रवर्तन निदेशालय को तब हुई जब उसने मुंबई और दिल्ली में दवा कंपनियों पर दबिश दी और वहाँ बद्दी के बागवानियां स्थित दवा उद्योग का सेंपल पाया। नशे के सौदागरों की गिरफ्रत में केवल हिमाचल ही नहीं, पंजाब और जम्मू-कश्मीर भी है, लेकिन अभी तक यहां नशे के कारोबार का जो रूप उभर कर सामने आया है, वह हिमाचल से बहुत भिन्न है। अब तक की पूरी जानकारी के मुताबिक पंजाब और जम्मू-कश्मीर में नशीले पदार्थों का कारोबार सीधे तौर पर होता है। इन राज्यों में इक्का-दुक्का कहीं दवाओं का प्रयोग नशे के तौर पर होता हो तो वह अलग बात है, लेकिन यहाँ से कहीं और नशीली दवाओं या नशे की खेप भेजे जाने की बात सामने नहीं आई है। हिमाचल की स्थिति बिल्कुल उलट है। यहाँ न केवल नशे का कारोबार बहुत गहरे तौर पर छिपकर हो रहा है, बल्कि नशीली दवाएं यहाँ से बाहर भी भेजी जा रही हैं। सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि सारा कारोबार एक ऐसी कंपनी द्वारा किया जा रहा है, जिसे सरकार ने दवाएं बनाने के लिए लाइसेंस दिया था। यह अलग बात है कि अब स्वास्थ्य विभाग ने संबंधित कंपनी का लाइसेंस निलंबित करने की कार्यवाही शुरू कर दी है, लेकिन यह सब तब शुरू किया गया जब कि बहुत देर हो चुकी है। हैरत यह है कि जो जानकारी सीधे तौर पर हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग को होनी चाहिए थी, वह उसे न होकर केन्द्रीय राजस्व प्रवर्त्तन निदेशालय (डीआरआइ) को हुई। डीआरआई ने इसकी सूचना हिमाचल प्रदेश में राज्य दवा नियंत्रक के प्रवर्तन निदेशालय को दी और इसके बाद दोनों ने मिलकर छापेमारी की। तब मालूम हुआ कि टैन्स्टार फार्मा नाम से पंजीकृत यह कंपनी चार अन्य फर्जी कंपनियों के नाम से भी दवाएं बना रही थी तथा कई दवाएं तो यह ऐसी बना रही थी जिन्हें बनाने के लिए इसके पास लाइसेंस ही नहीं था। दूसरी तरफ, कूरियर कंपनी इन नशीली दवाओं की खेप पर मिल्क बैग, ग्लूकोज सैशे और एलोवेरा प्रोडक्ट के स्टिकर लगाकर बाहर भेजती थी। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि ऐसे ही किसी तरीके से ये दवाएं अब भी देश के भी विभिन्न हिस्सों में पहुँचाई जा रही हों और युवा पीढ़ी को बर्बाद कर रही हों। किस नाम से पंजीकृत कंपनी चार अन्य नाम से दवाएँ बना रही है? A टैनस्टार फार्माB एलोवेरा C मिल्क बैगD सभी सही हैं।
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। जन-आंदोलनों के लिए सदैव ही यह समस्या रहती है कि वे अपने मूल उद्देश्यों से न भटकें और अपनी मर्यादा में रहें। जब अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान आरंभ किया था तभी ऐसी आशंका हुई थी। नई दिल्ली के जंतर-मंतर में अनेक लोग अनशन पर बैठे, परंतु एक अथवा दो लहरें-सी उठी और इससे ज्यादा और कुछ नहीं हुआ। अचानक ही अन्ना हजारे के आह्नान पर हजारों लोग सड़कों पर उतर पड़े। उन्होंने सामान्य आक्रोश को एक शक्ल दे दी। राष्ट्र को एक उद्देश्य मिल गया। यह भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक आह्नान था और गैर-राजनीतिक भी। वस्तुतः सभी पृष्ठभूमियों वाले बुद्धिजीवी और नेता एक मंच पर आ गए और उनके समक्ष केवल एक ही उद्देश्य था-भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष। विमत के स्वर उभरे भी तो उन्हें आंदोलन के बारे में संदेहों के रूप में देखा गया और एक किनारे कर दिया गया। सरकार को इस बात के लिए बाध्य कर दिया गया कि वह अन्ना के साथ भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए उनके जो सुझाव हैं उन पर विचार-विमर्श करे। वार्ता के नौ चरणों के बाद दोनों पक्षों ने यह पाया कि वे एक-सी सोच नहीं बना पाए। दोनों के अपने-अपने मार्ग थे किन्तु यह आश्वासन अवश्य परिणाम के रूप में समक्ष आया कि अंततः भ्रष्टाचार का उन्मूलन हो ही जाए। सरकार और सत्तारूढ़ कांग्रेस ने यह वचन दिया कि लोकपाल विधेयक अन्ना की मांगों से भी ज्यादा सख्त होगा। लोग अन्ना के पीछे जुटे रहें, क्योंकि वह गांधीवादी हैं, सादगी, सादा जीवन और मूल्यों को वह स्वर दे रहे हैं। उन्होंने राष्ट्र की आत्मा को झकझोरा। यहाँ तक कि जब अन्ना ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की, तब भी उन्हें माफ़ कर दिया गया, क्योंकि लोगों की दृष्टि तो केवल भ्रष्टाचार उन्मूलन मात्र पर केन्द्रित थी। अन्ना ने भी अपनी भूल स्वीकार की और अपनी टिप्पणी वापस ले ली, जिससे एक बार पुनः यह मुद्दा रेखांकित हुआ कि आंदोलन का एकमात्र मकसद भ्रष्टाचार का उन्मूलन मात्र ही है। भाजपा और आरएसएस ने भी उन्हें स्वीकारा और उन्हें अपने स्वयंसेवकों और नेताओं के माध्यम से अपना समग्र समर्थन प्रदान किया। उदारवादियों को यह नहीं सुहाया। तब भी अन्ना का यही निष्कपट बयान आया कि यदि भाजपा और आरएसएस उनका समर्थन करते हैं तो उसका तात्पर्य यह नहीं है कि उन्होंने उनसे समर्थन मांगा था। इस बयान से भगवा ब्रिगेड के प्रति उनके झुकाव की आशंका का निवारण हुआ। आंदोलन अपनी पटटी पर ही चला और कमोवेश गैर-राजनीतिक ही रहा। सबसे बड़ी भूल तब हुई जब अन्ना और उनकी 26 सदस्यीय टीम ने यह घोषित किया कि वे हिसार उपचुनाव में कांग्रेस का विरोध करेंगे। तब पता नहीं था कि अन्ना के दाएं हाथ अरविंद केजरीवाल हिसार से ही हैं। इस हालत में बचाव की कुछ गुंजाइश हो सकती थी, यदि यह कहा जाता कि भ्रष्ट प्रत्याशियों को पराजित किया जाए। दरअसल आह्नान तो कांग्रेस प्रत्याशी को पराजित करने का ही दिया गया। एक गैर-राजनीतिक संगठन ने राजनीतिक रंग लेना आरंभ कर दिया। स्वरूप तब से बदलता ही गया। जहां यह कहा गया कि विभिन्न पृष्ठभूमियों वाले लोग भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष के लिए एक मंच पर आ गए हैं तो यह विचार भी उभरने लगा कि क्या उनमें से अधिसंख्य अपना-अपना एजेंडा ही चला रहे हैं। इस धारणा को तब और अधिक बल मिला जब प्रशांत भूषण ने कश्मीर के बारे में कुछ टिप्पणियां की। इस बात पर आश्चर्य है कि ये टिप्पणियां तब की, जब अन्ना के शीर्ष व्यक्ति होने के कारण उन्हें विवेक बरतना चाहिए था। इससे वास्तविक मकसद पर अनावश्यक रूप से बादल ही छाए। फिर भी उनकी टिप्पणियों से भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष में अन्ना के मूल उद्देश्य से तो ध्यान भटकना ही था, क्योंकि ये टिप्पणियां राजनीतिक थीं। आशा है कि लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने में लगी संसद की स्थायी समिति ऐसा एक विधेयक लाएगी जो अन्ना की आकांक्षाओं के अनुरूप तो होगा ही, आलोचकों को भी ख़ामोश कर देगा। दोनों मुख्य राजनीतिक दलों-कांग्रेस और भाजपा के सम्मुख समस्या यह है कि वे दोनों ही भ्रष्ट हैं और वास्तविक मुद्दे पर आवरण डालने के लिए धूल उड़ाते रहते हैं। चिता यह है कि अन्ना का वह मंच लड़खड़ाने लगा जिसने अवसर की एक खिड़की खोली थी। दो सदस्य जो अन्ना की टीम से अलग हो गए वे हैं राजेन्द्र सिह और पी वी राजगोपाल। वे दोनों ही सम्मानित हैं। उन्होंने आंदोलन के राजनीतिक रूप लेने और भ्रष्टाचार से संघर्ष के मूल मुद्दे से भटकने से क्षुब्ध होकर अलग होने की बात कही है। अब यह समय है कि जब मेधा पाटेकर और स्वामी अग्निवेश जैसे व्यक्तियों को उन तत्वों को फिर से एकजुट करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए जो पहले अन्ना के नेतृत्व में लोकपाल विधेयक का प्रारूप तैयार करने के लिए जुटे थे। प्रस्तुत लेखांश के आधार पर सही शीर्षक को चुनें। A भ्रष्टाचार उन्मूलनB भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष C भ्रष्टाचार आंदोलन व भटकावD जन-आंदोलन व भ्रष्टाचार
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। जन-आंदोलनों के लिए सदैव ही यह समस्या रहती है कि वे अपने मूल उद्देश्यों से न भटकें और अपनी मर्यादा में रहें। जब अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान आरंभ किया था तभी ऐसी आशंका हुई थी। नई दिल्ली के जंतर-मंतर में अनेक लोग अनशन पर बैठे, परंतु एक अथवा दो लहरें-सी उठी और इससे ज्यादा और कुछ नहीं हुआ। अचानक ही अन्ना हजारे के आह्नान पर हजारों लोग सड़कों पर उतर पड़े। उन्होंने सामान्य आक्रोश को एक शक्ल दे दी। राष्ट्र को एक उद्देश्य मिल गया। यह भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक आह्नान था और गैर-राजनीतिक भी। वस्तुतः सभी पृष्ठभूमियों वाले बुद्धिजीवी और नेता एक मंच पर आ गए और उनके समक्ष केवल एक ही उद्देश्य था-भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष। विमत के स्वर उभरे भी तो उन्हें आंदोलन के बारे में संदेहों के रूप में देखा गया और एक किनारे कर दिया गया। सरकार को इस बात के लिए बाध्य कर दिया गया कि वह अन्ना के साथ भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए उनके जो सुझाव हैं उन पर विचार-विमर्श करे। वार्ता के नौ चरणों के बाद दोनों पक्षों ने यह पाया कि वे एक-सी सोच नहीं बना पाए। दोनों के अपने-अपने मार्ग थे किन्तु यह आश्वासन अवश्य परिणाम के रूप में समक्ष आया कि अंततः भ्रष्टाचार का उन्मूलन हो ही जाए। सरकार और सत्तारूढ़ कांग्रेस ने यह वचन दिया कि लोकपाल विधेयक अन्ना की मांगों से भी ज्यादा सख्त होगा। लोग अन्ना के पीछे जुटे रहें, क्योंकि वह गांधीवादी हैं, सादगी, सादा जीवन और मूल्यों को वह स्वर दे रहे हैं। उन्होंने राष्ट्र की आत्मा को झकझोरा। यहाँ तक कि जब अन्ना ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की, तब भी उन्हें माफ़ कर दिया गया, क्योंकि लोगों की दृष्टि तो केवल भ्रष्टाचार उन्मूलन मात्र पर केन्द्रित थी। अन्ना ने भी अपनी भूल स्वीकार की और अपनी टिप्पणी वापस ले ली, जिससे एक बार पुनः यह मुद्दा रेखांकित हुआ कि आंदोलन का एकमात्र मकसद भ्रष्टाचार का उन्मूलन मात्र ही है। भाजपा और आरएसएस ने भी उन्हें स्वीकारा और उन्हें अपने स्वयंसेवकों और नेताओं के माध्यम से अपना समग्र समर्थन प्रदान किया। उदारवादियों को यह नहीं सुहाया। तब भी अन्ना का यही निष्कपट बयान आया कि यदि भाजपा और आरएसएस उनका समर्थन करते हैं तो उसका तात्पर्य यह नहीं है कि उन्होंने उनसे समर्थन मांगा था। इस बयान से भगवा ब्रिगेड के प्रति उनके झुकाव की आशंका का निवारण हुआ। आंदोलन अपनी पटटी पर ही चला और कमोवेश गैर-राजनीतिक ही रहा। सबसे बड़ी भूल तब हुई जब अन्ना और उनकी 26 सदस्यीय टीम ने यह घोषित किया कि वे हिसार उपचुनाव में कांग्रेस का विरोध करेंगे। तब पता नहीं था कि अन्ना के दाएं हाथ अरविंद केजरीवाल हिसार से ही हैं। इस हालत में बचाव की कुछ गुंजाइश हो सकती थी, यदि यह कहा जाता कि भ्रष्ट प्रत्याशियों को पराजित किया जाए। दरअसल आह्नान तो कांग्रेस प्रत्याशी को पराजित करने का ही दिया गया। एक गैर-राजनीतिक संगठन ने राजनीतिक रंग लेना आरंभ कर दिया। स्वरूप तब से बदलता ही गया। जहां यह कहा गया कि विभिन्न पृष्ठभूमियों वाले लोग भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष के लिए एक मंच पर आ गए हैं तो यह विचार भी उभरने लगा कि क्या उनमें से अधिसंख्य अपना-अपना एजेंडा ही चला रहे हैं। इस धारणा को तब और अधिक बल मिला जब प्रशांत भूषण ने कश्मीर के बारे में कुछ टिप्पणियां की। इस बात पर आश्चर्य है कि ये टिप्पणियां तब की, जब अन्ना के शीर्ष व्यक्ति होने के कारण उन्हें विवेक बरतना चाहिए था। इससे वास्तविक मकसद पर अनावश्यक रूप से बादल ही छाए। फिर भी उनकी टिप्पणियों से भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष में अन्ना के मूल उद्देश्य से तो ध्यान भटकना ही था, क्योंकि ये टिप्पणियां राजनीतिक थीं। आशा है कि लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने में लगी संसद की स्थायी समिति ऐसा एक विधेयक लाएगी जो अन्ना की आकांक्षाओं के अनुरूप तो होगा ही, आलोचकों को भी ख़ामोश कर देगा। दोनों मुख्य राजनीतिक दलों-कांग्रेस और भाजपा के सम्मुख समस्या यह है कि वे दोनों ही भ्रष्ट हैं और वास्तविक मुद्दे पर आवरण डालने के लिए धूल उड़ाते रहते हैं। चिता यह है कि अन्ना का वह मंच लड़खड़ाने लगा जिसने अवसर की एक खिड़की खोली थी। दो सदस्य जो अन्ना की टीम से अलग हो गए वे हैं राजेन्द्र सिह और पी वी राजगोपाल। वे दोनों ही सम्मानित हैं। उन्होंने आंदोलन के राजनीतिक रूप लेने और भ्रष्टाचार से संघर्ष के मूल मुद्दे से भटकने से क्षुब्ध होकर अलग होने की बात कही है। अब यह समय है कि जब मेधा पाटेकर और स्वामी अग्निवेश जैसे व्यक्तियों को उन तत्वों को फिर से एकजुट करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए जो पहले अन्ना के नेतृत्व में लोकपाल विधेयक का प्रारूप तैयार करने के लिए जुटे थे। सरकार को भ्रष्टाचार पर बात करने के लिए अन्ना के साथ किसने बाध्य कर दिया? A स्वामी अग्निवेश व केजरीवाल B अमेरिकी व ब्रिटिश सरकार C जनस्वर D बुद्धिजीवी व नेता
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। जन-आंदोलनों के लिए सदैव ही यह समस्या रहती है कि वे अपने मूल उद्देश्यों से न भटकें और अपनी मर्यादा में रहें। जब अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान आरंभ किया था तभी ऐसी आशंका हुई थी। नई दिल्ली के जंतर-मंतर में अनेक लोग अनशन पर बैठे, परंतु एक अथवा दो लहरें-सी उठी और इससे ज्यादा और कुछ नहीं हुआ। अचानक ही अन्ना हजारे के आह्नान पर हजारों लोग सड़कों पर उतर पड़े। उन्होंने सामान्य आक्रोश को एक शक्ल दे दी। राष्ट्र को एक उद्देश्य मिल गया। यह भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक आह्नान था और गैर-राजनीतिक भी। वस्तुतः सभी पृष्ठभूमियों वाले बुद्धिजीवी और नेता एक मंच पर आ गए और उनके समक्ष केवल एक ही उद्देश्य था-भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष। विमत के स्वर उभरे भी तो उन्हें आंदोलन के बारे में संदेहों के रूप में देखा गया और एक किनारे कर दिया गया। सरकार को इस बात के लिए बाध्य कर दिया गया कि वह अन्ना के साथ भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए उनके जो सुझाव हैं उन पर विचार-विमर्श करे। वार्ता के नौ चरणों के बाद दोनों पक्षों ने यह पाया कि वे एक-सी सोच नहीं बना पाए। दोनों के अपने-अपने मार्ग थे किन्तु यह आश्वासन अवश्य परिणाम के रूप में समक्ष आया कि अंततः भ्रष्टाचार का उन्मूलन हो ही जाए। सरकार और सत्तारूढ़ कांग्रेस ने यह वचन दिया कि लोकपाल विधेयक अन्ना की मांगों से भी ज्यादा सख्त होगा। लोग अन्ना के पीछे जुटे रहें, क्योंकि वह गांधीवादी हैं, सादगी, सादा जीवन और मूल्यों को वह स्वर दे रहे हैं। उन्होंने राष्ट्र की आत्मा को झकझोरा। यहाँ तक कि जब अन्ना ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की, तब भी उन्हें माफ़ कर दिया गया, क्योंकि लोगों की दृष्टि तो केवल भ्रष्टाचार उन्मूलन मात्र पर केन्द्रित थी। अन्ना ने भी अपनी भूल स्वीकार की और अपनी टिप्पणी वापस ले ली, जिससे एक बार पुनः यह मुद्दा रेखांकित हुआ कि आंदोलन का एकमात्र मकसद भ्रष्टाचार का उन्मूलन मात्र ही है। भाजपा और आरएसएस ने भी उन्हें स्वीकारा और उन्हें अपने स्वयंसेवकों और नेताओं के माध्यम से अपना समग्र समर्थन प्रदान किया। उदारवादियों को यह नहीं सुहाया। तब भी अन्ना का यही निष्कपट बयान आया कि यदि भाजपा और आरएसएस उनका समर्थन करते हैं तो उसका तात्पर्य यह नहीं है कि उन्होंने उनसे समर्थन मांगा था। इस बयान से भगवा ब्रिगेड के प्रति उनके झुकाव की आशंका का निवारण हुआ। आंदोलन अपनी पटटी पर ही चला और कमोवेश गैर-राजनीतिक ही रहा। सबसे बड़ी भूल तब हुई जब अन्ना और उनकी 26 सदस्यीय टीम ने यह घोषित किया कि वे हिसार उपचुनाव में कांग्रेस का विरोध करेंगे। तब पता नहीं था कि अन्ना के दाएं हाथ अरविंद केजरीवाल हिसार से ही हैं। इस हालत में बचाव की कुछ गुंजाइश हो सकती थी, यदि यह कहा जाता कि भ्रष्ट प्रत्याशियों को पराजित किया जाए। दरअसल आह्नान तो कांग्रेस प्रत्याशी को पराजित करने का ही दिया गया। एक गैर-राजनीतिक संगठन ने राजनीतिक रंग लेना आरंभ कर दिया। स्वरूप तब से बदलता ही गया। जहां यह कहा गया कि विभिन्न पृष्ठभूमियों वाले लोग भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष के लिए एक मंच पर आ गए हैं तो यह विचार भी उभरने लगा कि क्या उनमें से अधिसंख्य अपना-अपना एजेंडा ही चला रहे हैं। इस धारणा को तब और अधिक बल मिला जब प्रशांत भूषण ने कश्मीर के बारे में कुछ टिप्पणियां की। इस बात पर आश्चर्य है कि ये टिप्पणियां तब की, जब अन्ना के शीर्ष व्यक्ति होने के कारण उन्हें विवेक बरतना चाहिए था। इससे वास्तविक मकसद पर अनावश्यक रूप से बादल ही छाए। फिर भी उनकी टिप्पणियों से भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष में अन्ना के मूल उद्देश्य से तो ध्यान भटकना ही था, क्योंकि ये टिप्पणियां राजनीतिक थीं। आशा है कि लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने में लगी संसद की स्थायी समिति ऐसा एक विधेयक लाएगी जो अन्ना की आकांक्षाओं के अनुरूप तो होगा ही, आलोचकों को भी ख़ामोश कर देगा। दोनों मुख्य राजनीतिक दलों-कांग्रेस और भाजपा के सम्मुख समस्या यह है कि वे दोनों ही भ्रष्ट हैं और वास्तविक मुद्दे पर आवरण डालने के लिए धूल उड़ाते रहते हैं। चिता यह है कि अन्ना का वह मंच लड़खड़ाने लगा जिसने अवसर की एक खिड़की खोली थी। दो सदस्य जो अन्ना की टीम से अलग हो गए वे हैं राजेन्द्र सिह और पी वी राजगोपाल। वे दोनों ही सम्मानित हैं। उन्होंने आंदोलन के राजनीतिक रूप लेने और भ्रष्टाचार से संघर्ष के मूल मुद्दे से भटकने से क्षुब्ध होकर अलग होने की बात कही है। अब यह समय है कि जब मेधा पाटेकर और स्वामी अग्निवेश जैसे व्यक्तियों को उन तत्वों को फिर से एकजुट करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए जो पहले अन्ना के नेतृत्व में लोकपाल विधेयक का प्रारूप तैयार करने के लिए जुटे थे। निम्नलिखित कथनों का अवलोकन करें - 1- जन-आंदोलन हमेशा मूल उद्देश्य से भटक जाता है। 2- भ्रष्टाचार के विरूद्ध आह्नान गैर-राजनीतिक था। 3- लोकपाल विधेयक से भ्रष्टाचार मिट जाएगा। 4- अन्ना ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की। उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं? A केवल 1, 3, 4B केवल 4 C केवल 3D केवल 1, 2, 4
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। जन-आंदोलनों के लिए सदैव ही यह समस्या रहती है कि वे अपने मूल उद्देश्यों से न भटकें और अपनी मर्यादा में रहें। जब अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान आरंभ किया था तभी ऐसी आशंका हुई थी। नई दिल्ली के जंतर-मंतर में अनेक लोग अनशन पर बैठे, परंतु एक अथवा दो लहरें-सी उठी और इससे ज्यादा और कुछ नहीं हुआ। अचानक ही अन्ना हजारे के आह्नान पर हजारों लोग सड़कों पर उतर पड़े। उन्होंने सामान्य आक्रोश को एक शक्ल दे दी। राष्ट्र को एक उद्देश्य मिल गया। यह भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक आह्नान था और गैर-राजनीतिक भी। वस्तुतः सभी पृष्ठभूमियों वाले बुद्धिजीवी और नेता एक मंच पर आ गए और उनके समक्ष केवल एक ही उद्देश्य था-भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष। विमत के स्वर उभरे भी तो उन्हें आंदोलन के बारे में संदेहों के रूप में देखा गया और एक किनारे कर दिया गया। सरकार को इस बात के लिए बाध्य कर दिया गया कि वह अन्ना के साथ भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए उनके जो सुझाव हैं उन पर विचार-विमर्श करे। वार्ता के नौ चरणों के बाद दोनों पक्षों ने यह पाया कि वे एक-सी सोच नहीं बना पाए। दोनों के अपने-अपने मार्ग थे किन्तु यह आश्वासन अवश्य परिणाम के रूप में समक्ष आया कि अंततः भ्रष्टाचार का उन्मूलन हो ही जाए। सरकार और सत्तारूढ़ कांग्रेस ने यह वचन दिया कि लोकपाल विधेयक अन्ना की मांगों से भी ज्यादा सख्त होगा। लोग अन्ना के पीछे जुटे रहें, क्योंकि वह गांधीवादी हैं, सादगी, सादा जीवन और मूल्यों को वह स्वर दे रहे हैं। उन्होंने राष्ट्र की आत्मा को झकझोरा। यहाँ तक कि जब अन्ना ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की, तब भी उन्हें माफ़ कर दिया गया, क्योंकि लोगों की दृष्टि तो केवल भ्रष्टाचार उन्मूलन मात्र पर केन्द्रित थी। अन्ना ने भी अपनी भूल स्वीकार की और अपनी टिप्पणी वापस ले ली, जिससे एक बार पुनः यह मुद्दा रेखांकित हुआ कि आंदोलन का एकमात्र मकसद भ्रष्टाचार का उन्मूलन मात्र ही है। भाजपा और आरएसएस ने भी उन्हें स्वीकारा और उन्हें अपने स्वयंसेवकों और नेताओं के माध्यम से अपना समग्र समर्थन प्रदान किया। उदारवादियों को यह नहीं सुहाया। तब भी अन्ना का यही निष्कपट बयान आया कि यदि भाजपा और आरएसएस उनका समर्थन करते हैं तो उसका तात्पर्य यह नहीं है कि उन्होंने उनसे समर्थन मांगा था। इस बयान से भगवा ब्रिगेड के प्रति उनके झुकाव की आशंका का निवारण हुआ। आंदोलन अपनी पटटी पर ही चला और कमोवेश गैर-राजनीतिक ही रहा। सबसे बड़ी भूल तब हुई जब अन्ना और उनकी 26 सदस्यीय टीम ने यह घोषित किया कि वे हिसार उपचुनाव में कांग्रेस का विरोध करेंगे। तब पता नहीं था कि अन्ना के दाएं हाथ अरविंद केजरीवाल हिसार से ही हैं। इस हालत में बचाव की कुछ गुंजाइश हो सकती थी, यदि यह कहा जाता कि भ्रष्ट प्रत्याशियों को पराजित किया जाए। दरअसल आह्नान तो कांग्रेस प्रत्याशी को पराजित करने का ही दिया गया। एक गैर-राजनीतिक संगठन ने राजनीतिक रंग लेना आरंभ कर दिया। स्वरूप तब से बदलता ही गया। जहां यह कहा गया कि विभिन्न पृष्ठभूमियों वाले लोग भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष के लिए एक मंच पर आ गए हैं तो यह विचार भी उभरने लगा कि क्या उनमें से अधिसंख्य अपना-अपना एजेंडा ही चला रहे हैं। इस धारणा को तब और अधिक बल मिला जब प्रशांत भूषण ने कश्मीर के बारे में कुछ टिप्पणियां की। इस बात पर आश्चर्य है कि ये टिप्पणियां तब की, जब अन्ना के शीर्ष व्यक्ति होने के कारण उन्हें विवेक बरतना चाहिए था। इससे वास्तविक मकसद पर अनावश्यक रूप से बादल ही छाए। फिर भी उनकी टिप्पणियों से भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष में अन्ना के मूल उद्देश्य से तो ध्यान भटकना ही था, क्योंकि ये टिप्पणियां राजनीतिक थीं। आशा है कि लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने में लगी संसद की स्थायी समिति ऐसा एक विधेयक लाएगी जो अन्ना की आकांक्षाओं के अनुरूप तो होगा ही, आलोचकों को भी ख़ामोश कर देगा। दोनों मुख्य राजनीतिक दलों-कांग्रेस और भाजपा के सम्मुख समस्या यह है कि वे दोनों ही भ्रष्ट हैं और वास्तविक मुद्दे पर आवरण डालने के लिए धूल उड़ाते रहते हैं। चिता यह है कि अन्ना का वह मंच लड़खड़ाने लगा जिसने अवसर की एक खिड़की खोली थी। दो सदस्य जो अन्ना की टीम से अलग हो गए वे हैं राजेन्द्र सिह और पी वी राजगोपाल। वे दोनों ही सम्मानित हैं। उन्होंने आंदोलन के राजनीतिक रूप लेने और भ्रष्टाचार से संघर्ष के मूल मुद्दे से भटकने से क्षुब्ध होकर अलग होने की बात कही है। अब यह समय है कि जब मेधा पाटेकर और स्वामी अग्निवेश जैसे व्यक्तियों को उन तत्वों को फिर से एकजुट करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए जो पहले अन्ना के नेतृत्व में लोकपाल विधेयक का प्रारूप तैयार करने के लिए जुटे थे। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन-आंदोलन के विमुख होने के मुख्य कारण क्या हैं? A सरकार की गलत नीति B बुद्धिजीवियों का सहयोग नहीं मिलना C आंदोलन का राजनीतिकरण D स्वामी अग्निवेश, मेधा पाटेकर का बाहर होना
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आपको यूएनडीपी द्वारा राज्य आपदा प्रबंधन प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया है। राज्य की वर्तमान हालत यह है कि वहाँ कोई भी प्रभावी आपदा प्रबंधन तंत्र मौजूद नहीं है। आपसे राज्य के आपदा प्रतिक्रिया कार्यतंत्र को सुधारने के लिए कहा जाता है। अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए आप निम्नलिखित में से कौन-से अनुक्रमानुसार कार्यवाही करेंगे? कार्यवाही A: आपदा प्रतिक्रिया के बारे में प्रशिक्षित करने के लिए पूरे राज्य के जिला प्रशासन प्राधिकारियों के साथ समन्वय करना कार्यवाही B: जिला स्तरों पर जिम्मेदारी लेने के लिए अनुभवी पेशेवरों को भर्ती करना कार्यवाही C: स्कूलों, बाजार स्थलों इत्यादि में प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करके सामान्य जनता को प्रशिक्षित करना कार्यवाही D: अपने आधिकारिक कार्यों को प्रभावी ढंग से निष्पादित करने के लिए सहायता हेतु एक सचिवालयी कार्यालय की स्थापना करना A ABCDB BADC C DABCD DBAC
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आपके जिले में स्थित सरकारी विद्यालय शिक्षकों के अनुपस्थित रहने की समस्या का सामना कर रहे हैं। जाँच करने पर आप यह पाते हैं कि यह समस्या व्यक्ति शिक्षकों की नहीं बल्कि शिक्षा विभाग की सामान्य संस्कृति से जुड़ी है। विभाग में नया भर्ती होने वाला शिक्षक भी पुराने शिक्षकों की तरह व्यवहार करना शुरू कर देता है क्योंकि वहाँ के माहौल ने उन्हें यही सिखाया है। राज्य के शिक्षा विभाग के सचिव के रूप में आप A बेहतर प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए वेतन संरचना और सुविधाओं को सुधारने के लिए सिफारिश करेंगे जिसे आप विभाग की संस्कृति में सुधार लाने के लिए आवश्यक मानते हैं B पुरस्कार और दंड की एक व्यवस्था शुरू करंगे जो सही व्यवहार के लिए पुरस्कार और गलत व्यवहार के लिए कड़ा दंड सुनिश्चित करेगी C दोषियों को पकड़ने और उन्हें सबक सिखाने के लिए आकस्मिक उपस्थिति निरीक्षण करेंगे D जिलाधिकारियों को एक सर्कुलर भेजेंगे और इस व्यवहार पर अपना असंतोष प्रकट करते हुए स्थिति में सुधार न होने पर कड़ी कार्यवाही के लिए जिलों को चेतावनी देंगे।
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। दो वरिष्ठ सरकारी अधिकारी (जो आपस में एक-दूसरे के संबंधी भी हैं) अपने पुरखों की भूमि के एक टुकड़े के लिए एक पारिवारिक लड़ाई में उलझे हैं। आप संबंधित क्षेत्र के जिला अधिकारी हैं। वे दोनों आप पर अपने-अपने पक्ष समर्थन के लिए दबाव बना रहे हैं। इस स्थिति में आपकी सर्वोत्तम कार्यवाही क्या होगी? A मामले की विस्तृत जानकारी करना और उस व्यक्ति का समर्थन करना जिसे आप सही मानते हैं B उपयुक्त वैधानिक सलाहकार से परामर्श लेकर सम्पत्ति की वैध स्थिति पता करना और उस व्यक्ति के समर्थन में खड़ा होना जिसे आप कानूनी रूप से वैध स्वामी मानते हैं इसके बाद दूसरे पक्ष को सम्पत्ति की वैध स्थिति का सम्मान करने के लिए विनम्र रूप से सलाह देना C दोनों पार्टियों के बीच एक समझौता कराने का प्रयास करना ताकि स्थानीय शांति बनी रहे D लड़ाई में तटस्थ बने रहना और घटनाओं को उनके हाल पर छोड़ देना फिर भी घटनाओं पर इस दृष्टि से निगाह रखना कि यह सुनिश्चित हो सके कि कोई भी पक्ष कानून को अपने हाथों में न ले और इसके लिए दोनों पक्षों के बीच एक पंच की भूमिका भी निभायी जा सकती है।
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। शहर के बाहरी हिस्से में एक औद्योगिक इकाई कुछ समय पहले बाल श्रमिकों की सेवाओं का उपयोग करते हुए पकड़ी गयी थी। जाँच करने पर यह पाया गया कि वास्तव में बच्चों के अभिभावकों ने ही इकाई के स्वामी को इस बात के लिए बाध्य किया था कि वे उनके बच्चों को काम पर रखें। ये अभिभावक खुद भी इकाई में कार्य करते थे और इकाई स्वामी को यह धमकी देते थे कि यदि उसने उनके बच्चों को काम पर रखने की बजाय बाहरी लोगों को काम पर रखा तो वे इकाई में हड़ताल कर देंगे। क्षेत्र के प्रशासनिक अधिकारी के रूप में आपको निम्नलिखित में से कौन-सी सर्वोत्तम कार्यवाही करनी चाहिए? A इकाई स्वामी को गिरफ्रतार करना क्योंकि बाल श्रम एक दंडनीय अपराध है B बाल श्रम में संलिप्तता के लिए इकाई स्वामी के साथ-साथ अभिभावकों को भी गिरफ्रतार करना C औद्योगिक इकाई के परिसर को सील करना और सभी संबंधित लोगों को गिरफ्रतार करना D उन दोषियों को गिरफ्रतार करना जो स्पष्ट रूप से पहचान योग्य (इकाई स्वामी सहित) हैं और स्थानीय क्षेत्र में काम करने वाले अच्छे स्वयंसेवी संगठनों को बढ़ावा देते हुए क्षेत्र के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक कार्यक्रम शुरू करने की पहल करना
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। एक इलाके में किसानों को आर्गेनिक बीजों के वितरण हेतु आप प्रभारी प्रशासनिक अधिकारी हैं। नियमों के अनुसार प्रति एकड़ भूमि हेतु बीजों की मात्र देने का कोटा है। उस क्षेत्र का एक प्रगतिशील किसान आपसे, उसे दिए गए कोटे से अधिक देने के लिए कह रहा है। उसका कहना है कि उसने खेती की एक संशोधित पद्धति विकसित की है जिससे उसका उत्पादन बढ़ेगा जिसके लिए उसे अतिरिक्त बीजों की जरूरत है आप- A आप उसकी बात मानकर उसे अतिरिक्त बीज दे देंगे। B उसकी बात की सच्चाई का पता लगाएँगें और यदि ठीक हो तो उसे कोटे से अधिक बीज दे देंगे। C कठोरता से नियमानुसार चलेंगे और उसे बीज देने से इंकार कर देंगे। D यह मामला अपने वरिष्ठ को भेजेंगे और किसान को अतिरिक्त बीज देने की अनुमति मांगेंगे।
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आपका तत्काल अधीनस्थ तीन हफ्रते के अध्ययन अवकाश पर जा रहा है। इस बीच वह आपके विभाग में सबसे बहुत ही अभद्रता (अशिष्टता) से व्यवहार कर रहा है और काम के प्रति बहुत नकारात्मक रवैया दिखा रहा है- अक्सर देर से आता है और अपनी जिम्मेदारियों की उपेक्षा करता है इसके बारे में उसे पहले भी समझाया गया था किन्तु उसका नकारात्मक रवैया जारी रहा। वास्तव में उसका व्यवहार पिछले कुछ दिनों से बहुत खराब हो गया है, वह आपका व अन्य कर्मचारियों का अनादर भी करने लगा है। आप- A उसे नौकरी से निकालने के लिए तत्काल कार्रवाई शुरू कर देंगे। B विभाग की ओर से उसे देय राशियों को रोक लेने के लिए कार्रवाई शुरू कर देंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि उसको देय राशि न दी जाएँ। C उसके बुरे व्यवहार की जड़ तक जाने की कोशिश करेंगे_ पता लगाएँगे कि ऐसी कुछ समस्याएं हैं जिनको सुलझाने में आप उसकी मदद कर सकेंगे। D उससे अन्तिम बार बात करेंगे और उसे चेतावनी देंगे कि अगली बार उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी जो उसे नौकरी से निकालना/उसको देय राशियों के भुगतान रोक देना हो सकता है।
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आप एक राज्य के पुलिस महानिदेशक हैं। प्रोन्नति के लिए पुलिस निरीक्षकों को 10 किमी- दौड़कर अपनी फिटनेस साबित करनी होती है। ऐसी ही एक दौड़ में 2 निरीक्षक निढाल होकर गिर पड़े थे और हृदयघात के कारण उनकी मौत हो गयी थी। प्रेस आपके पीछे पड़ी है और अपने कर्मचारी सदस्यों के प्रति अमानवीय होने के कारण पुलिस की आलोचना हो रही है। पुलिस महानिदेशक के रूप में आप- A प्रोन्नति के लिए एक अनिवार्यता के रूप में दौड़ की अवधि को काम कर देंगे B एक प्रेस वार्ता बुलायेंगे और प्रोन्नति के लोगों को चयनित करने के लिए विभाग द्वारा तय की गयी प्रक्रियाओं का बचाव करेंगे C एक जाँच समिति का गठन करेंगे जो कि मामले, विशेष रूप से मौत के कारणों, की जाँच करेगी D विभाग के सभी स्तरों पर एक फिटनेस अभियान शुरू करेंगे ताकि पुलिस पदानुक्रम के सभी फिटनेस स्तरों को ऊपर उठाया जा सके।
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आपके पुराने वरिष्ठ अधिकारियों में से एक (सेवानिवृत्त), जिनका आप बहुत सम्मान करते हैं, परिवार सहित आपके अधिकार क्षेत्र में स्थित एक तीर्थ स्थल के निजी भ्रमण पर आये हैं। उन्होंने आपसे उनके और उनके परिवार के लिए एक सरकारी कार उपलब्ध कराने के लिए कहा है। आप स्थिति का सामना किस प्रकार करेंगे: A एक सरकारी ड्राइवर के साथ उन्हें कार उपलब्ध करायेंगे B उन्हें एक सरकारी ड्राइवर के साथ कार उपलब्ध करायेंगे लेकिन यह सुनिश्चित करेंगे कि आपके वरिष्ठ अधिकारी इसके लिए भुगतान करें क्योंकि निजी कार्य के लिए सरकारी कार का प्रयोग करने के लिए वे अधिकृत नहीं है C उन्हें एक सरकारी ड्राइवर के साथ कार उपलब्ध करायेंगे लेकिन ईंधन खर्चे का भुगतान स्वयं करेंगे D उन्हें विनम्रता से मना कर देंगे और उन्हें बताये बिना अपने खुद के निजी खर्च पर एक टैक्सी का प्रबंधन करेंगे।
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निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आप एक अग्रणी सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम में कार्यरत हैं। आपका कार्य निष्पादन उत्कृष्ट रहा है और आपको पिछले 2 वर्षों में किये गये सहमति रखते हैं। फिर भी जिस दिन प्रोन्नति का निर्णय करने के लिए समिति की बैठक होती है उस दिन वे आपको कमरे में बुलाते हैं और आपको बताते हैं कि यद्यपि वे सभी यह महसूस करते हैं कि आप प्रोन्नति के हकदार हैं लेकिन वे एक नैतिक दुविधा का सामना कर रहे हैं। इनमें से एक व्यक्ति, जिसकी जगह आपको लेनी है, इस वर्ष सेवानिवृत्त होने वाला है। वह अपना अगला स्केल खो देगा यदि समिति आपको प्रोन्नत करती है और वह उस ग्रेड पर कभी नहीं पहुँच पायेगा जिसके कारण उसके पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ इत्यादि प्रभावित हो रहे हैं। समिति के अध्यक्ष आपसे प्रोन्नति का अवसर छोड़ने के लिए कहते हैं और आपको अगले वर्ष प्रोन्नत करने का आश्वासन देते हैं जो अभी भी आपकी नियम प्रोन्नति से एक वर्ष पहले है। आप- A इस बात पर जोर देंगे कि समिति तार्किक आधार पर विचार करे और भावनाओं को परिदृश्य से अलग रखे। B मामले के बारे में अपनी नाराजगी व्यक्त करेंगे लेकिन अंत में अपने पक्ष को मजबूती के साथ पेश करने के बाद निर्णय समिति के हाथों में सौंप देंगे। इसी समय स्पष्ट अर्थों में उन्हें इस बात से भी अवगत करायेंगे कि समिति द्वारा इस प्रकार की कार्यवाही आपके कार्य निष्पादन पर एक नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। C समिति के निवेदन को शिष्टतापूर्वक स्वीकार करेंगे और उनसे वरिष्ठ व्यक्ति को प्रोन्नति देने के लिए कहेंगे D प्रोन्नति के लिए अपने मामले को पेश करेंगे और अपने दृष्टिकोण को पूर्ण रूप से समिति के सामने रखेंगे तथा निर्णय को शिष्टतापूर्वक समिति के हाथों में छोड़ देंगे।