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GS-II

Open Flashcards

Practice Test-6

Question
60 out of 80
 

The following questions are based on four passages in English to test the comprehension of English language. Read each passage and answer the questions.

 

The Yoga system is divided into two principal parts—Hatha and Raja Yoga. Hatha Yoga deals principally with the physiological part of man with a view to establish his health and train his will. The processes prescribed to arrive at this end are so difficult that only a few resolute souls go through all the stages of its practice. Many have failed and some have died in the attempt. It is therefore strongly denounced by all the philosophers. The most illustrious Shankaracharya has remarked in his treatise called Aparokshanubhuti that “the system of Hatha Yoga was intended for those whose worldly desires are not pacified or uprooted.”


Why is Raja yoga preferred over Hath yoga?



A Hath yoga trains only mind.

B Though Hath yoga is simple, yet it is not much in practice these days.

C Unlike Hath yoga, Raja yoga cannot have dire consequences.

D None of these

Ans. C

Practice Test-6 Flashcard List

80 flashcards
1)
 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।   जब कोई देश विदेशी प्रभुत्व के अधीन होता है, तब वह किसी विलुप्त युग के सपनों में वर्तमान से पलायन ढूँढ़ता है और अपने बीते महान् कल की कल्पनाओं में सांत्वना पाता है। यह एक मूर्खतापूर्ण और खतरनाक विनोद है, जिसमें हम में से अनेक मग्न रहते हैं। हम भारतीयों का यह आचरण भी उतना ही प्रश्नास्पद है कि हम अब भी यह सोचते हैं कि हम आध्यात्मिक दृष्टि से महान् हैं, जबकि हम अन्य विषयों में विश्व में नीचे आ चुके हैं। आध्यात्मिक या अन्य कोई महानता, स्वतंत्रता और अवसर के अभाव में या भुखमरी और दुःख के रहते हुए संस्थापित नहीं की जा सकती। बहुत से पाश्चात्य लेखकों ने इस धारणा को बढ़ावा दिया है कि भारतीय परलोक परायण हैं। मैं समझता हूँ कि हर देश में निर्धन और अभागे लोग, कुछ हद तक परलोक-परायण बन जाते हैं, जब तक कि वे क्रांतिकारी ही न बन जायें, क्योंकि यह लोक प्रत्यक्षतः उनके लिए नहीं है। पराधीन जनों की भी यही स्थिति है। जैसे-जैसे विकसित होकर कोई व्यक्ति परिपक्व होता है, वैसे-वैसे वह बाहरी वस्तुपरक दुनिया में न तो पूर्णतः तल्लीन रहता है न ही उससे संतुष्ट होता है। वह कुछ आंतरिक अर्थ भी ढूँढ़ना चाहता है, कुछ मनोवैज्ञानिक और भौतिक संतोष भी तलाशना चाहता है। यही स्थिति जनों और सभ्यताओं की भी होती है। जैसे-जैसे वे परिपक्व और विकसित होकर वयस्क होते हैं। प्रत्येक सभ्यता और प्रत्येक जन बाह्य जीवन और आंतरिक जीवन की इन समानांतर धाराओं को प्रदर्शित करते हैं जब ये धाराएँ आपस में मिल जाती है या एक दूसरे के सिन्नकट रहती है, तब संतुलन और स्थिरता बनी रहती है। जब ये भिन्न दिशाओं में चली जाती है, संघर्ष उत्पन्न हो जाता है तथा मन और आत्मा को यंत्रणा देने वाली संकटावस्था उत्पन्न हो जाती है। लेखांश में उल्लेख है कि ‘‘यह लोक प्रत्यक्षतः उनके लिए नहीं है।’’ यह उन लोगों को निर्दिष्ट करता है, जो 1- विदेशी प्रभुत्व से स्वतंत्रता चाहते हैं। 2- भुखमरी और दुःख का जीवन जीते हैं। 3- क्रांतिकारी बन जाते हैं। उपर्युक्त में से कौन-सा/कौन-से कथन सही है/हैं? A 1 और 2B केवल 2 C 2 और 3D केवल 3
2)
 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।   जब कोई देश विदेशी प्रभुत्व के अधीन होता है, तब वह किसी विलुप्त युग के सपनों में वर्तमान से पलायन ढूँढ़ता है और अपने बीते महान् कल की कल्पनाओं में सांत्वना पाता है। यह एक मूर्खतापूर्ण और खतरनाक विनोद है, जिसमें हम में से अनेक मग्न रहते हैं। हम भारतीयों का यह आचरण भी उतना ही प्रश्नास्पद है कि हम अब भी यह सोचते हैं कि हम आध्यात्मिक दृष्टि से महान् हैं, जबकि हम अन्य विषयों में विश्व में नीचे आ चुके हैं। आध्यात्मिक या अन्य कोई महानता, स्वतंत्रता और अवसर के अभाव में या भुखमरी और दुःख के रहते हुए संस्थापित नहीं की जा सकती। बहुत से पाश्चात्य लेखकों ने इस धारणा को बढ़ावा दिया है कि भारतीय परलोक परायण हैं। मैं समझता हूँ कि हर देश में निर्धन और अभागे लोग, कुछ हद तक परलोक-परायण बन जाते हैं, जब तक कि वे क्रांतिकारी ही न बन जायें, क्योंकि यह लोक प्रत्यक्षतः उनके लिए नहीं है। पराधीन जनों की भी यही स्थिति है। जैसे-जैसे विकसित होकर कोई व्यक्ति परिपक्व होता है, वैसे-वैसे वह बाहरी वस्तुपरक दुनिया में न तो पूर्णतः तल्लीन रहता है न ही उससे संतुष्ट होता है। वह कुछ आंतरिक अर्थ भी ढूँढ़ना चाहता है, कुछ मनोवैज्ञानिक और भौतिक संतोष भी तलाशना चाहता है। यही स्थिति जनों और सभ्यताओं की भी होती है। जैसे-जैसे वे परिपक्व और विकसित होकर वयस्क होते हैं। प्रत्येक सभ्यता और प्रत्येक जन बाह्य जीवन और आंतरिक जीवन की इन समानांतर धाराओं को प्रदर्शित करते हैं जब ये धाराएँ आपस में मिल जाती है या एक दूसरे के सिन्नकट रहती है, तब संतुलन और स्थिरता बनी रहती है। जब ये भिन्न दिशाओं में चली जाती है, संघर्ष उत्पन्न हो जाता है तथा मन और आत्मा को यंत्रणा देने वाली संकटावस्था उत्पन्न हो जाती है। निम्नलिखित मान्यताओं पर विचार कीजिए: 1- विदेशी प्रभुत्व के अधीन एक देश आध्यात्मिक अनुसरण में मग्न नहीं हो सकता। 2- आध्यात्मिक अनुसरण में निर्धनता अवरोधक है। 3- पराधीन जन परलोक-परायण बन सकते हैं। प्रस्तुत लेखांश के संदर्भ में कौन सी उपर्युक्त मान्यता/वैध है/हैं? A 1 और 2B केवल 2 C 2 और 3D केवल 3
3)
 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।   जब कोई देश विदेशी प्रभुत्व के अधीन होता है, तब वह किसी विलुप्त युग के सपनों में वर्तमान से पलायन ढूँढ़ता है और अपने बीते महान् कल की कल्पनाओं में सांत्वना पाता है। यह एक मूर्खतापूर्ण और खतरनाक विनोद है, जिसमें हम में से अनेक मग्न रहते हैं। हम भारतीयों का यह आचरण भी उतना ही प्रश्नास्पद है कि हम अब भी यह सोचते हैं कि हम आध्यात्मिक दृष्टि से महान् हैं, जबकि हम अन्य विषयों में विश्व में नीचे आ चुके हैं। आध्यात्मिक या अन्य कोई महानता, स्वतंत्रता और अवसर के अभाव में या भुखमरी और दुःख के रहते हुए संस्थापित नहीं की जा सकती। बहुत से पाश्चात्य लेखकों ने इस धारणा को बढ़ावा दिया है कि भारतीय परलोक परायण हैं। मैं समझता हूँ कि हर देश में निर्धन और अभागे लोग, कुछ हद तक परलोक-परायण बन जाते हैं, जब तक कि वे क्रांतिकारी ही न बन जायें, क्योंकि यह लोक प्रत्यक्षतः उनके लिए नहीं है। पराधीन जनों की भी यही स्थिति है। जैसे-जैसे विकसित होकर कोई व्यक्ति परिपक्व होता है, वैसे-वैसे वह बाहरी वस्तुपरक दुनिया में न तो पूर्णतः तल्लीन रहता है न ही उससे संतुष्ट होता है। वह कुछ आंतरिक अर्थ भी ढूँढ़ना चाहता है, कुछ मनोवैज्ञानिक और भौतिक संतोष भी तलाशना चाहता है। यही स्थिति जनों और सभ्यताओं की भी होती है। जैसे-जैसे वे परिपक्व और विकसित होकर वयस्क होते हैं। प्रत्येक सभ्यता और प्रत्येक जन बाह्य जीवन और आंतरिक जीवन की इन समानांतर धाराओं को प्रदर्शित करते हैं जब ये धाराएँ आपस में मिल जाती है या एक दूसरे के सिन्नकट रहती है, तब संतुलन और स्थिरता बनी रहती है। जब ये भिन्न दिशाओं में चली जाती है, संघर्ष उत्पन्न हो जाता है तथा मन और आत्मा को यंत्रणा देने वाली संकटावस्था उत्पन्न हो जाती है। उपर्युक्त लेखांश की विषय-वस्तु निम्नलिखित में से किस पर केन्द्रित है? A उत्पीड़ित लोगों की मनोदशा पर B भुखमरी और दुःख पर C सभ्यता के विकास पर D सामान्य लोगों के तन, मन और आत्मा पर
4)
 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।   जब कोई देश विदेशी प्रभुत्व के अधीन होता है, तब वह किसी विलुप्त युग के सपनों में वर्तमान से पलायन ढूँढ़ता है और अपने बीते महान् कल की कल्पनाओं में सांत्वना पाता है। यह एक मूर्खतापूर्ण और खतरनाक विनोद है, जिसमें हम में से अनेक मग्न रहते हैं। हम भारतीयों का यह आचरण भी उतना ही प्रश्नास्पद है कि हम अब भी यह सोचते हैं कि हम आध्यात्मिक दृष्टि से महान् हैं, जबकि हम अन्य विषयों में विश्व में नीचे आ चुके हैं। आध्यात्मिक या अन्य कोई महानता, स्वतंत्रता और अवसर के अभाव में या भुखमरी और दुःख के रहते हुए संस्थापित नहीं की जा सकती। बहुत से पाश्चात्य लेखकों ने इस धारणा को बढ़ावा दिया है कि भारतीय परलोक परायण हैं। मैं समझता हूँ कि हर देश में निर्धन और अभागे लोग, कुछ हद तक परलोक-परायण बन जाते हैं, जब तक कि वे क्रांतिकारी ही न बन जायें, क्योंकि यह लोक प्रत्यक्षतः उनके लिए नहीं है। पराधीन जनों की भी यही स्थिति है। जैसे-जैसे विकसित होकर कोई व्यक्ति परिपक्व होता है, वैसे-वैसे वह बाहरी वस्तुपरक दुनिया में न तो पूर्णतः तल्लीन रहता है न ही उससे संतुष्ट होता है। वह कुछ आंतरिक अर्थ भी ढूँढ़ना चाहता है, कुछ मनोवैज्ञानिक और भौतिक संतोष भी तलाशना चाहता है। यही स्थिति जनों और सभ्यताओं की भी होती है। जैसे-जैसे वे परिपक्व और विकसित होकर वयस्क होते हैं। प्रत्येक सभ्यता और प्रत्येक जन बाह्य जीवन और आंतरिक जीवन की इन समानांतर धाराओं को प्रदर्शित करते हैं जब ये धाराएँ आपस में मिल जाती है या एक दूसरे के सिन्नकट रहती है, तब संतुलन और स्थिरता बनी रहती है। जब ये भिन्न दिशाओं में चली जाती है, संघर्ष उत्पन्न हो जाता है तथा मन और आत्मा को यंत्रणा देने वाली संकटावस्था उत्पन्न हो जाती है। प्रस्तुत लेखांश का सही शीर्षक क्या है? A विदेशी प्रभुत्वB अध्यात्म व परिपक्वता C निर्धनता व ज्ञानD स्वतंत्रता व अध्यात्म
5)
जन समुदाय के विभिन्न हिस्सों की पहचान को ही सांप्रदायिक बना देने और उन्हें हाशिए पर धकेलने की यह प्रवृत्ति धार्मिक अल्पसंख्यकों-सिखों व मुसलमानों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय जनसमुदाय का वह समूह जो सामाजिक रूप से सबसे ज्यादा असुविधाओं का शिकार है, यानी अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों का अत्यंत पिछड़ा हिस्सा भी ऐसे ही दबावों का शिकार है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रें में शारीरिक हमलों के साथ-साथ ‘आरक्षण’ के अधिकार के ऊपर घनघोर और उग्र हमलों के जरिए इन समूहों को भी झुकने पर मजबूर किया जा रहा है। उनके सामने ऐसी स्थिति बना दी गई है जिससे कि वे कानून द्वारा प्रदत्त अत्यंत ही सीमित अवसरों की रक्षा में उलझे रहें और सामाजिक न्याय व बदलाव के वृहत्तर आंदोलनों में भाग न लें। विकास परियोजनाओं के नाम पर पूंजीवादी और औपनिवेशिक किस्म के शोषण ने आदिवासियों व जंगलवासियों को संसाधनों से वंचित किया है। उन्हें उनके परंपरागत निवास स्थानों से विस्थापित किया है। उनकी सांस्कृतिक पहचान, आर्थिक स्थायित्व तथा आत्मनिर्भरता को खतरे में डाल दिया है। राजव्यवस्था उन्हें या तो कानून व व्यवस्था के नजरिए से देखती है या फिर ऐसा नृवंशीय और विजातीय समूह मानती है जिनके साथ एक प्रकार का क्षेत्रीय समझौता जरूरी है। उन्हें धन का लालच दिया जाता है ताकि वे और ज्यादा स्वायत्ततता की माँग और अपनी परंपराओं व रीति-रिवाजों को छोड़ दें। हिमालय पर्वतमाला के पूरे विस्तार में, तराई के विशाल क्षेत्र में गढ़वाल, छत्तीसगढ़, झारखंड में और मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के उत्तरी हिस्से के कबायली इलाको में भयंकर पारिस्थितिक बर्बादी हुई है। इसको रोकने के लिए तत्काल आवश्यक कदम उठाने के बजाए सेना द्वारा नियंत्रित ‘सुरक्षा’ का विशाल तंत्र और दलगत राजनीति, दोनों ही इसकी अनदेखी करते हैं। लिहाजा आदिवासियों और दूसरे जंगलवासियों को अपनी न्यायोचित आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए संकीर्ण, नृवंशीय, सांप्रदायिक और संकुचित दृष्टिकोण अपनाने को मजबूर होना पड़ता है। परिणामतः वे ‘रियायतों’ के लिए केन्द्र का मुँह ताकने को बाध्य हो जाते हैं। जैसे-जैसे वे इस बतार्व को स्वीकार करते जाएँगे, उनका आर्थिक शोषण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए महानगरीय और अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ता जाएगा। सांप्रदायिक रूझान जितना मजबूत होगा, आत्म रक्षा और जीविकोपार्जन की उनकी क्षमता उतनी ही कम होती जाएगी। लेखक ने आदिवासियों के पलायन को दर्शाने के लिए किस उक्ति का प्रयोग किया है? A विकास के नाम पर शोषण ने आदिवासियों में बड़े मुद्दों पर लड़ने के बजाए उनमें अपने अधिकारों के प्रति अदूरदर्शिता की स्थिति को बढ़ावा दिया। B प्रशासन द्वारा आदिवासियों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जाना। C आदिवासियों द्वारा अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सांप्रदायिक और संकुचित दृष्टिकोण का विकास करना। D विकल्प A और C दोनों सही हैं।
6)
जन समुदाय के विभिन्न हिस्सों की पहचान को ही सांप्रदायिक बना देने और उन्हें हाशिए पर धकेलने की यह प्रवृत्ति धार्मिक अल्पसंख्यकों-सिखों व मुसलमानों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय जनसमुदाय का वह समूह जो सामाजिक रूप से सबसे ज्यादा असुविधाओं का शिकार है, यानी अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों का अत्यंत पिछड़ा हिस्सा भी ऐसे ही दबावों का शिकार है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रें में शारीरिक हमलों के साथ-साथ ‘आरक्षण’ के अधिकार के ऊपर घनघोर और उग्र हमलों के जरिए इन समूहों को भी झुकने पर मजबूर किया जा रहा है। उनके सामने ऐसी स्थिति बना दी गई है जिससे कि वे कानून द्वारा प्रदत्त अत्यंत ही सीमित अवसरों की रक्षा में उलझे रहें और सामाजिक न्याय व बदलाव के वृहत्तर आंदोलनों में भाग न लें। विकास परियोजनाओं के नाम पर पूंजीवादी और औपनिवेशिक किस्म के शोषण ने आदिवासियों व जंगलवासियों को संसाधनों से वंचित किया है। उन्हें उनके परंपरागत निवास स्थानों से विस्थापित किया है। उनकी सांस्कृतिक पहचान, आर्थिक स्थायित्व तथा आत्मनिर्भरता को खतरे में डाल दिया है। राजव्यवस्था उन्हें या तो कानून व व्यवस्था के नजरिए से देखती है या फिर ऐसा नृवंशीय और विजातीय समूह मानती है जिनके साथ एक प्रकार का क्षेत्रीय समझौता जरूरी है। उन्हें धन का लालच दिया जाता है ताकि वे और ज्यादा स्वायत्ततता की माँग और अपनी परंपराओं व रीति-रिवाजों को छोड़ दें। हिमालय पर्वतमाला के पूरे विस्तार में, तराई के विशाल क्षेत्र में गढ़वाल, छत्तीसगढ़, झारखंड में और मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के उत्तरी हिस्से के कबायली इलाको में भयंकर पारिस्थितिक बर्बादी हुई है। इसको रोकने के लिए तत्काल आवश्यक कदम उठाने के बजाए सेना द्वारा नियंत्रित ‘सुरक्षा’ का विशाल तंत्र और दलगत राजनीति, दोनों ही इसकी अनदेखी करते हैं। लिहाजा आदिवासियों और दूसरे जंगलवासियों को अपनी न्यायोचित आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए संकीर्ण, नृवंशीय, सांप्रदायिक और संकुचित दृष्टिकोण अपनाने को मजबूर होना पड़ता है। परिणामतः वे ‘रियायतों’ के लिए केन्द्र का मुँह ताकने को बाध्य हो जाते हैं। जैसे-जैसे वे इस बतार्व को स्वीकार करते जाएँगे, उनका आर्थिक शोषण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए महानगरीय और अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ता जाएगा। सांप्रदायिक रूझान जितना मजबूत होगा, आत्म रक्षा और जीविकोपार्जन की उनकी क्षमता उतनी ही कम होती जाएगी। विभिन्न धार्मिक, अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों, पिछडे़ वर्गों या आदिवासियों को हासिये पर लाने के लिए कौन-से कारक उत्तरदायी हो सकते हैं? (i) विकास के नाम पर अत्यधिक शोषण (ii) सांप्रदायिक माँगों में वृद्धि (iii) प्रशासन का प्रभुत्व (iv) उनके लिए उपलब्ध वृद्धि का सीमित क्षेत्र कूट- A (i), (ii) और (iii)B केवल (i) और (ii) C (i), (ii) और (iv)D (i), (ii), (iii) और (iv)
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जन समुदाय के विभिन्न हिस्सों की पहचान को ही सांप्रदायिक बना देने और उन्हें हाशिए पर धकेलने की यह प्रवृत्ति धार्मिक अल्पसंख्यकों-सिखों व मुसलमानों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय जनसमुदाय का वह समूह जो सामाजिक रूप से सबसे ज्यादा असुविधाओं का शिकार है, यानी अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों का अत्यंत पिछड़ा हिस्सा भी ऐसे ही दबावों का शिकार है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रें में शारीरिक हमलों के साथ-साथ ‘आरक्षण’ के अधिकार के ऊपर घनघोर और उग्र हमलों के जरिए इन समूहों को भी झुकने पर मजबूर किया जा रहा है। उनके सामने ऐसी स्थिति बना दी गई है जिससे कि वे कानून द्वारा प्रदत्त अत्यंत ही सीमित अवसरों की रक्षा में उलझे रहें और सामाजिक न्याय व बदलाव के वृहत्तर आंदोलनों में भाग न लें। विकास परियोजनाओं के नाम पर पूंजीवादी और औपनिवेशिक किस्म के शोषण ने आदिवासियों व जंगलवासियों को संसाधनों से वंचित किया है। उन्हें उनके परंपरागत निवास स्थानों से विस्थापित किया है। उनकी सांस्कृतिक पहचान, आर्थिक स्थायित्व तथा आत्मनिर्भरता को खतरे में डाल दिया है। राजव्यवस्था उन्हें या तो कानून व व्यवस्था के नजरिए से देखती है या फिर ऐसा नृवंशीय और विजातीय समूह मानती है जिनके साथ एक प्रकार का क्षेत्रीय समझौता जरूरी है। उन्हें धन का लालच दिया जाता है ताकि वे और ज्यादा स्वायत्ततता की माँग और अपनी परंपराओं व रीति-रिवाजों को छोड़ दें। हिमालय पर्वतमाला के पूरे विस्तार में, तराई के विशाल क्षेत्र में गढ़वाल, छत्तीसगढ़, झारखंड में और मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के उत्तरी हिस्से के कबायली इलाको में भयंकर पारिस्थितिक बर्बादी हुई है। इसको रोकने के लिए तत्काल आवश्यक कदम उठाने के बजाए सेना द्वारा नियंत्रित ‘सुरक्षा’ का विशाल तंत्र और दलगत राजनीति, दोनों ही इसकी अनदेखी करते हैं। लिहाजा आदिवासियों और दूसरे जंगलवासियों को अपनी न्यायोचित आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए संकीर्ण, नृवंशीय, सांप्रदायिक और संकुचित दृष्टिकोण अपनाने को मजबूर होना पड़ता है। परिणामतः वे ‘रियायतों’ के लिए केन्द्र का मुँह ताकने को बाध्य हो जाते हैं। जैसे-जैसे वे इस बतार्व को स्वीकार करते जाएँगे, उनका आर्थिक शोषण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए महानगरीय और अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ता जाएगा। सांप्रदायिक रूझान जितना मजबूत होगा, आत्म रक्षा और जीविकोपार्जन की उनकी क्षमता उतनी ही कम होती जाएगी। लेखक इनमें से सबसे अधिक किससे सहमत है? A आदिवासियों को अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक होना चाहिए और उन्हें इनकी बलपूर्वक माँग करनी चाहिए। B आदिवासियों को उनकी वन्य भूमि के बदले उद्योग द्वारा दिए जाने वाले लाभप्रद प्रस्ताव स्वीकार कर लेने चाहिए। C आदिवासियों या यहां तक कि किसी भी धामिक अल्पसंख्यक को अपने लाभ और उत्थान के लिए अपने सांप्रदायिक वर्ग से ऊपर उठना चाहिए। D पूँजीवादी, उपनिवेशवादी, औद्योगिक प्रशासन को धार्मिक अल्पसंख्यक और आदिवासियों के मामले में बिना हस्तक्षेप की नीति का विकास करना चाहिए।
8)
जन समुदाय के विभिन्न हिस्सों की पहचान को ही सांप्रदायिक बना देने और उन्हें हाशिए पर धकेलने की यह प्रवृत्ति धार्मिक अल्पसंख्यकों-सिखों व मुसलमानों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय जनसमुदाय का वह समूह जो सामाजिक रूप से सबसे ज्यादा असुविधाओं का शिकार है, यानी अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों का अत्यंत पिछड़ा हिस्सा भी ऐसे ही दबावों का शिकार है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रें में शारीरिक हमलों के साथ-साथ ‘आरक्षण’ के अधिकार के ऊपर घनघोर और उग्र हमलों के जरिए इन समूहों को भी झुकने पर मजबूर किया जा रहा है। उनके सामने ऐसी स्थिति बना दी गई है जिससे कि वे कानून द्वारा प्रदत्त अत्यंत ही सीमित अवसरों की रक्षा में उलझे रहें और सामाजिक न्याय व बदलाव के वृहत्तर आंदोलनों में भाग न लें। विकास परियोजनाओं के नाम पर पूंजीवादी और औपनिवेशिक किस्म के शोषण ने आदिवासियों व जंगलवासियों को संसाधनों से वंचित किया है। उन्हें उनके परंपरागत निवास स्थानों से विस्थापित किया है। उनकी सांस्कृतिक पहचान, आर्थिक स्थायित्व तथा आत्मनिर्भरता को खतरे में डाल दिया है। राजव्यवस्था उन्हें या तो कानून व व्यवस्था के नजरिए से देखती है या फिर ऐसा नृवंशीय और विजातीय समूह मानती है जिनके साथ एक प्रकार का क्षेत्रीय समझौता जरूरी है। उन्हें धन का लालच दिया जाता है ताकि वे और ज्यादा स्वायत्ततता की माँग और अपनी परंपराओं व रीति-रिवाजों को छोड़ दें। हिमालय पर्वतमाला के पूरे विस्तार में, तराई के विशाल क्षेत्र में गढ़वाल, छत्तीसगढ़, झारखंड में और मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के उत्तरी हिस्से के कबायली इलाको में भयंकर पारिस्थितिक बर्बादी हुई है। इसको रोकने के लिए तत्काल आवश्यक कदम उठाने के बजाए सेना द्वारा नियंत्रित ‘सुरक्षा’ का विशाल तंत्र और दलगत राजनीति, दोनों ही इसकी अनदेखी करते हैं। लिहाजा आदिवासियों और दूसरे जंगलवासियों को अपनी न्यायोचित आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए संकीर्ण, नृवंशीय, सांप्रदायिक और संकुचित दृष्टिकोण अपनाने को मजबूर होना पड़ता है। परिणामतः वे ‘रियायतों’ के लिए केन्द्र का मुँह ताकने को बाध्य हो जाते हैं। जैसे-जैसे वे इस बतार्व को स्वीकार करते जाएँगे, उनका आर्थिक शोषण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए महानगरीय और अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ता जाएगा। सांप्रदायिक रूझान जितना मजबूत होगा, आत्म रक्षा और जीविकोपार्जन की उनकी क्षमता उतनी ही कम होती जाएगी। गद्यांश के अनसार ‘सामाजिक न्याय’ की परिभाषा के रूप में निम्नलिखित मे से किसे समाहित किया जा सकता है? A एक ऐसे समाज का सृजन करना जो उनके धर्म या संस्कृति से भिन्न समाज अवसर पर आधारित हो। B किसी विशेष धार्मिक अल्पसंख्यक को आरक्षण देना। C पूँजीवादियों को वन्य संसाधनों के उपयोग की अनुमति देना और बदले में वे आदिवासियों को क्षतिपूर्ति करेंगे। D एक ऐसी प्रणाली का विकास जिसमें समाज के व्यवसायी वर्ग और हासिए वाले वर्ग दोनों समान अधिकारों का उपभोग करें।
9)
(i) सात व्यक्ति P, Q, R, S, T, V और M विभिन्न नगरों जैसे-दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, बंगलौर, हैदराबाद और त्रिवेन्द्रम के हैं। किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि वह इसी क्रम में हों, वह अमेरिका के एक        सम्मेलन में भाग लेने गए हैं। उनमें से प्रत्येक विभिन्न विषयों जैसे-साहित्य, भौतिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, विपणन, कम्प्यूटर, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग तथा सूचना टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ हैं। (ii) S चेन्नई से है, V और Q टेक्सटाइल या अर्थशास्त्र में विशेषज्ञ नहीं है। R विपणन का विशेषज्ञ है, जो मुम्बई से आया है। कोलकाता वाला व्यक्ति कम्प्यूटर में विशेषज्ञ है, P जो साहित्य में विशेषज्ञ है वह दिल्ली का नहीं है।V जो भौतिकशास्त्र में विशेषज्ञ है वह त्रिवेन्द्रम से है। सूचना टेक्नोलॉजी का विशेषज्ञ M था जो बंगलौर का है। टेक्सटाइल इंजीनियर कौन है? A SB T C VD S या T
10)
(i) सात व्यक्ति P, Q, R, S, T, V और M विभिन्न नगरों जैसे-दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, बंगलौर, हैदराबाद और त्रिवेन्द्रम के हैं। किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि वह इसी क्रम में हों, वह अमेरिका के एक        सम्मेलन में भाग लेने गए हैं। उनमें से प्रत्येक विभिन्न विषयों जैसे-साहित्य, भौतिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, विपणन, कम्प्यूटर, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग तथा सूचना टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ हैं। (ii) S चेन्नई से है, V और Q टेक्सटाइल या अर्थशास्त्र में विशेषज्ञ नहीं है। R विपणन का विशेषज्ञ है, जो मुम्बई से आया है। कोलकाता वाला व्यक्ति कम्प्यूटर में विशेषज्ञ है, P जो साहित्य में विशेषज्ञ है वह दिल्ली का नहीं है।V जो भौतिकशास्त्र में विशेषज्ञ है वह त्रिवेन्द्रम से है। सूचना टेक्नोलॉजी का विशेषज्ञ M था जो बंगलौर का है। साहित्य विशेषज्ञ व्यक्ति निम्नलिखित में से किस शहर का है? A बंगलौरB कोलकाता C दिल्लीD हैदराबाद
11)
(i) सात व्यक्ति P, Q, R, S, T, V और M विभिन्न नगरों जैसे-दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, बंगलौर, हैदराबाद और त्रिवेन्द्रम के हैं। किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि वह इसी क्रम में हों, वह अमेरिका के एक        सम्मेलन में भाग लेने गए हैं। उनमें से प्रत्येक विभिन्न विषयों जैसे-साहित्य, भौतिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, विपणन, कम्प्यूटर, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग तथा सूचना टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ हैं। (ii) S चेन्नई से है, V और Q टेक्सटाइल या अर्थशास्त्र में विशेषज्ञ नहीं है। R विपणन का विशेषज्ञ है, जो मुम्बई से आया है। कोलकाता वाला व्यक्ति कम्प्यूटर में विशेषज्ञ है, P जो साहित्य में विशेषज्ञ है वह दिल्ली का नहीं है।V जो भौतिकशास्त्र में विशेषज्ञ है वह त्रिवेन्द्रम से है। सूचना टेक्नोलॉजी का विशेषज्ञ M था जो बंगलौर का है। निम्नलिखित में से किस व्यक्ति नगर तथा विशेषज्ञ का संयोजन सही है? A S चेन्नई-अर्थशास्त्र B S चेन्नई-टेक्सटाइल C Q कोलकाता-कम्प्यूटर D T दिल्ली-अर्थशास्त्र
12)
(i) सात व्यक्ति P, Q, R, S, T, V और M विभिन्न नगरों जैसे-दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, बंगलौर, हैदराबाद और त्रिवेन्द्रम के हैं। किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि वह इसी क्रम में हों, वह अमेरिका के एक        सम्मेलन में भाग लेने गए हैं। उनमें से प्रत्येक विभिन्न विषयों जैसे-साहित्य, भौतिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, विपणन, कम्प्यूटर, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग तथा सूचना टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ हैं। (ii) S चेन्नई से है, V और Q टेक्सटाइल या अर्थशास्त्र में विशेषज्ञ नहीं है। R विपणन का विशेषज्ञ है, जो मुम्बई से आया है। कोलकाता वाला व्यक्ति कम्प्यूटर में विशेषज्ञ है, P जो साहित्य में विशेषज्ञ है वह दिल्ली का नहीं है।V जो भौतिकशास्त्र में विशेषज्ञ है वह त्रिवेन्द्रम से है। सूचना टेक्नोलॉजी का विशेषज्ञ M था जो बंगलौर का है। कम्प्यूटर में कौन विशेषज्ञ है? A Q B S C T D इनमें से कोई नहीं
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 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रधानमंत्री के सामने चुनौती सरकार के उस कदम का बचाव करने की थी, जिसके पक्ष में बेहद कम विवेकपूर्ण तर्क मौजूद हैं। पहले अन्ना हजारे की गिरफ्रतारी और फिर जन दबाव में रिहाई की बेतुकी कार्रवाइयों को ढकने के लिए उन्होंने संसद की सर्वोच्चता की दलील का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि विधेयक बनाना सरकार का विशेषाधिकार है और उसे पास कर कानून का रूप देना संसद का। सरकार ने लोकपाल बिल तैयार कर संसद में रख दिया है। अब यह संसद पर है कि वह चाहे तो उसमें पहले संशोधन कर फिर उसे पास करे। मगर इस पूरे प्रकरण की यह महज तकनीकी व्याख्या है। प्रधानमंत्री की बात अगर सही है, तो सवाल है कि टीम अन्ना के साथ संयुक्त ड्राफ्रिटग कमेटी का गठन क्यों किया गया था? क्या वह कमेटी बनाकर खुद सरकार ने अपने और संसद के विशेषाधिकारों की अवहेलना की थी। और अगर कमेटी बनी तो टीम अन्ना के सुझावों को संसद के सामने रखने से उसने क्यों मना कर दिया? सिविल सोसायटी की मांग थी कि सरकार अपने विधेयक एवं टीम अन्ना के जन लोकपाल प्रारूप दोनों को संसद में पेश करे और फिर देश के सर्वोच्च मंच को उस पर फैसला करने दे। मगर ऐसा होता, तो ताजा संकट शायद खड़ा ही नहीं होता। दूसरी तरफ सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न शांतिपूर्ण विरोध जताने के अधिकार का है, जिसे दिल्ली पुलिस के माध्यम से केन्द्र सरकार ने नियंत्रित करने का प्रयास किया है और जिसको लेकर देशभर में गुस्सा भड़का है। एक बार फिर अपने दस्तूर के मुताबिक सरकार ने पहले अन्ना को गिरफ्रतार किया और फिर जनता का मूड देखने के बाद उन्हें उसी रोज रिहा कर दिया। क्या यह भी सरकार की दिशा एवं नीतिहीनता की मिसाल नहीं है? जब यह सरकार खुद को जख्मी करने पर आमादा हो, तो प्रधानमंत्री ऐसे गड़बड़झाले के लिए किसी अन्य को दोषी नहीं ठहरा सकते। लेखांश के संदर्भ में सरकार की दिशाहीनता के बारे में कौन-कौन से कथन सही हैं? (1) पहले अन्ना हजारे को गिरफ्रतार करना फिर जनदबाव के कारण उन्हें रिहा करना। (2) शांतिपूर्ण विरोध जताने के अधिकार को दिल्ली पुलिस के माध्यम से नियंत्रित करना। उपर्युक्त में से कौन-कौन से कथन सही है/हैं? A केवल (1)B केवल (2) C (1) और (2) दोनोंD दोनों में से कोई नहीं
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 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रधानमंत्री के सामने चुनौती सरकार के उस कदम का बचाव करने की थी, जिसके पक्ष में बेहद कम विवेकपूर्ण तर्क मौजूद हैं। पहले अन्ना हजारे की गिरफ्रतारी और फिर जन दबाव में रिहाई की बेतुकी कार्रवाइयों को ढकने के लिए उन्होंने संसद की सर्वोच्चता की दलील का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि विधेयक बनाना सरकार का विशेषाधिकार है और उसे पास कर कानून का रूप देना संसद का। सरकार ने लोकपाल बिल तैयार कर संसद में रख दिया है। अब यह संसद पर है कि वह चाहे तो उसमें पहले संशोधन कर फिर उसे पास करे। मगर इस पूरे प्रकरण की यह महज तकनीकी व्याख्या है। प्रधानमंत्री की बात अगर सही है, तो सवाल है कि टीम अन्ना के साथ संयुक्त ड्राफ्रिटग कमेटी का गठन क्यों किया गया था? क्या वह कमेटी बनाकर खुद सरकार ने अपने और संसद के विशेषाधिकारों की अवहेलना की थी। और अगर कमेटी बनी तो टीम अन्ना के सुझावों को संसद के सामने रखने से उसने क्यों मना कर दिया? सिविल सोसायटी की मांग थी कि सरकार अपने विधेयक एवं टीम अन्ना के जन लोकपाल प्रारूप दोनों को संसद में पेश करे और फिर देश के सर्वोच्च मंच को उस पर फैसला करने दे। मगर ऐसा होता, तो ताजा संकट शायद खड़ा ही नहीं होता। दूसरी तरफ सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न शांतिपूर्ण विरोध जताने के अधिकार का है, जिसे दिल्ली पुलिस के माध्यम से केन्द्र सरकार ने नियंत्रित करने का प्रयास किया है और जिसको लेकर देशभर में गुस्सा भड़का है। एक बार फिर अपने दस्तूर के मुताबिक सरकार ने पहले अन्ना को गिरफ्रतार किया और फिर जनता का मूड देखने के बाद उन्हें उसी रोज रिहा कर दिया। क्या यह भी सरकार की दिशा एवं नीतिहीनता की मिसाल नहीं है? जब यह सरकार खुद को जख्मी करने पर आमादा हो, तो प्रधानमंत्री ऐसे गड़बड़झाले के लिए किसी अन्य को दोषी नहीं ठहरा सकते। लेखांश का मर्म क्या है? (1) जनदबाव में रिहाई की बेतुकी कार्यवाहियाँ (2) सरकार की दिशा एवं नीतिहीनता (3) सिविल सोसायटी की मांग की अवहेलना करना उपर्युक्त में से कौन-कौन से कथन सही है? A केवल (2)B केवल (3) C (1) और (2) दोनोंD उपर्युक्त सभी
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 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रधानमंत्री के सामने चुनौती सरकार के उस कदम का बचाव करने की थी, जिसके पक्ष में बेहद कम विवेकपूर्ण तर्क मौजूद हैं। पहले अन्ना हजारे की गिरफ्रतारी और फिर जन दबाव में रिहाई की बेतुकी कार्रवाइयों को ढकने के लिए उन्होंने संसद की सर्वोच्चता की दलील का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि विधेयक बनाना सरकार का विशेषाधिकार है और उसे पास कर कानून का रूप देना संसद का। सरकार ने लोकपाल बिल तैयार कर संसद में रख दिया है। अब यह संसद पर है कि वह चाहे तो उसमें पहले संशोधन कर फिर उसे पास करे। मगर इस पूरे प्रकरण की यह महज तकनीकी व्याख्या है। प्रधानमंत्री की बात अगर सही है, तो सवाल है कि टीम अन्ना के साथ संयुक्त ड्राफ्रिटग कमेटी का गठन क्यों किया गया था? क्या वह कमेटी बनाकर खुद सरकार ने अपने और संसद के विशेषाधिकारों की अवहेलना की थी। और अगर कमेटी बनी तो टीम अन्ना के सुझावों को संसद के सामने रखने से उसने क्यों मना कर दिया? सिविल सोसायटी की मांग थी कि सरकार अपने विधेयक एवं टीम अन्ना के जन लोकपाल प्रारूप दोनों को संसद में पेश करे और फिर देश के सर्वोच्च मंच को उस पर फैसला करने दे। मगर ऐसा होता, तो ताजा संकट शायद खड़ा ही नहीं होता। दूसरी तरफ सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न शांतिपूर्ण विरोध जताने के अधिकार का है, जिसे दिल्ली पुलिस के माध्यम से केन्द्र सरकार ने नियंत्रित करने का प्रयास किया है और जिसको लेकर देशभर में गुस्सा भड़का है। एक बार फिर अपने दस्तूर के मुताबिक सरकार ने पहले अन्ना को गिरफ्रतार किया और फिर जनता का मूड देखने के बाद उन्हें उसी रोज रिहा कर दिया। क्या यह भी सरकार की दिशा एवं नीतिहीनता की मिसाल नहीं है? जब यह सरकार खुद को जख्मी करने पर आमादा हो, तो प्रधानमंत्री ऐसे गड़बड़झाले के लिए किसी अन्य को दोषी नहीं ठहरा सकते। केन्द्र सरकार ने आंदोलन को नियंत्रित करने का प्रयास कैसे किया? A पुलिस सेB संसद से C धमकी सेD उपरोक्त सभी
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 निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रधानमंत्री के सामने चुनौती सरकार के उस कदम का बचाव करने की थी, जिसके पक्ष में बेहद कम विवेकपूर्ण तर्क मौजूद हैं। पहले अन्ना हजारे की गिरफ्रतारी और फिर जन दबाव में रिहाई की बेतुकी कार्रवाइयों को ढकने के लिए उन्होंने संसद की सर्वोच्चता की दलील का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि विधेयक बनाना सरकार का विशेषाधिकार है और उसे पास कर कानून का रूप देना संसद का। सरकार ने लोकपाल बिल तैयार कर संसद में रख दिया है। अब यह संसद पर है कि वह चाहे तो उसमें पहले संशोधन कर फिर उसे पास करे। मगर इस पूरे प्रकरण की यह महज तकनीकी व्याख्या है। प्रधानमंत्री की बात अगर सही है, तो सवाल है कि टीम अन्ना के साथ संयुक्त ड्राफ्रिटग कमेटी का गठन क्यों किया गया था? क्या वह कमेटी बनाकर खुद सरकार ने अपने और संसद के विशेषाधिकारों की अवहेलना की थी। और अगर कमेटी बनी तो टीम अन्ना के सुझावों को संसद के सामने रखने से उसने क्यों मना कर दिया? सिविल सोसायटी की मांग थी कि सरकार अपने विधेयक एवं टीम अन्ना के जन लोकपाल प्रारूप दोनों को संसद में पेश करे और फिर देश के सर्वोच्च मंच को उस पर फैसला करने दे। मगर ऐसा होता, तो ताजा संकट शायद खड़ा ही नहीं होता। दूसरी तरफ सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न शांतिपूर्ण विरोध जताने के अधिकार का है, जिसे दिल्ली पुलिस के माध्यम से केन्द्र सरकार ने नियंत्रित करने का प्रयास किया है और जिसको लेकर देशभर में गुस्सा भड़का है। एक बार फिर अपने दस्तूर के मुताबिक सरकार ने पहले अन्ना को गिरफ्रतार किया और फिर जनता का मूड देखने के बाद उन्हें उसी रोज रिहा कर दिया। क्या यह भी सरकार की दिशा एवं नीतिहीनता की मिसाल नहीं है? जब यह सरकार खुद को जख्मी करने पर आमादा हो, तो प्रधानमंत्री ऐसे गड़बड़झाले के लिए किसी अन्य को दोषी नहीं ठहरा सकते। संसद की सर्वोच्चता का सहारा किसने लिया? A प्रधानमंत्रीB सरकार C अन्नाD जनता
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यूरोपीय देश नार्वे के इतिहास में पहली बार हुए बम विस्फोट और भीषण जनसंहार ने विश्व राजनीति के सामने कई सवाल खड़े किए हैं। पेट्रोलियम पदार्थों, प्राकृतिक गैस, खनिज पदार्थों, पनबिजली, सी-फूड से भरपूर देश नार्वे अशांत और पिछड़े एशियाई और अफ्रीकी देशों के मुकाबले अपने नागरिकों को बेहतर सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है। इसलिए नार्वे की हालिया हिसा को पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे अस्थिर देशों की राजनीति से लेकर संस्कृति, समाज और आर्थिकी को प्रभावित कर रहे अमेरिकी प्रभुत्व के खिलाफ हिसा के तौर पर नहीं देखा जा सकता। मानव विकास सूचकांक में शीर्ष क्रम में रहने वाले देश में यह हिसा कई मायने में पिछड़े, मगर प्राकृतिक संपदा संपन्न देशों में इनकी लड़ाई यूरोप के इस्लामीकरण के खिलाफ थी। उसने अपने देश की सरकार पर मुस्लिमों को आयातित करके देश के साथ धोखेबाजी का आरोप भी लगाया। डेढ़ हजार से ज्यादा पन्नों के घोषणापत्र में एक सौ दो पन्नों में भारत का उल्लेख करते हुए यहाँ की दक्षिणपंथी ताकतों को दुनिया से लोकतंत्र खत्म करने में सहायक बताया है। ब्रेविक ने बहुलतावादी संस्कृति से दूर रहने के लिए जापान की तारीफ की। हर घटना को पश्चिमी नजरिये से देखने के आदी हो चुके टेलीविजन, इंटरनेट और समाचार पत्रें के वेब संस्करण जैसे तमाम समाचार माध्यमों ने आनन-फानन में इसे नार्वे का9/11 का नाम दिया। घटना के पीछे अलकायदा को जिम्मेदार ठहराने की होड़ मचाए समाचार माध्यमों ने इसे अफ़गानिस्तानी नहीं, यमनी अल कायदा की शैली का हमला बताया। समाचार चैनलों पर बहसों का मुख्य सवाल यह था कि देश के अल्पसंख्यकों में सबसे ज्यादा संख्या वाले मुसलमान नार्वे से क्यों नफरत करते हैं। हालांकि इस सब के बीच घटना के प्रत्यक्षदर्शी ट्विटर के जरिए जानकारी दे रहे थे कि हमलावर एक ईसाई हैं और स्थानीय भाषा नार्वेइयन (नास्को) में बात कर रहा था। दुनिया को ‘इस्लामी आतंकवाद’ की शब्दावली देने वाले अमेरिका ने ब्रेविक की मंशा का खुलासा होने के बावजूद इस हत्याकांड की व्याख्या के लिए ‘ईसाई आतंकवाद’ का नाम नहीं गढ़ा। ब्रेविक का हमला भारतीय हिन्दू संगठनों के ‘धर्म शांति का माध्यम है’ का संदेश देने वालों के लिए एक सवाल है। अगर धार्मिक रास्तों पर चल कर एक समतामूलक समाज का निर्माण संभव होता तो सबसे पहले धर्म ने ही अपने स्वभाव में समानता लाने की कोशिश की होती। एक ही पंथ या धर्म के अंदर लोगों को लिग, जाति, वर्ग आदि आधार पर बांट कर उनके साथ होने वाला भेदभाव देखने को नहीं मिलता। ब्रेविक ने अपनी कार्यवाई को भारतीय हिन्दू धार्मिक संगठनों की तरह मुस्लिम तुष्टीकरण के खिलाफ एक कदम बताया। इस हमले को विस्फोट बहुल भारत के संदर्भ में समझने की कोशिश करें तो यह आजादी के पहले क्रांतिकारियों का हुकूमत के कान खोलने के लिए की गई कोशिश से बिल्कुल अलग हैं। उस धमाके में आसान और साफ-साफ लक्ष्य होते हुए भी किसी को निशाना नहीं बनाया गया था। यह देश के बीहड़, मगर खनिज तत्त्वों से संपन्न इलाकों में आदिवासियों की जमीन पर कब्जा किए बैठे सरकारी तंत्र के नुमाइंदों पर होने वाले हमलों से भी हट कर है। यहाँ पर अपने जंगल, पहाड़ों और नदियों पर सरकारी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आधिपत्य के खिलाफ लड़ाई का नारा काम करता है। यह देश के सिर (मस्तक/भाल) कश्मीर में भारत-पाकिस्तान के हुक्मरानों, उनके लड़ाकों और अमेरिका की कारगुजारियों से बने रहने वाले दर्द (हिसा) से भी अलग हैं। यह भारत के कई हिस्सों में सामने आई दक्षिणपंथी अतिवादी तत्त्वों की प्रतिक्रियावादी अभिव्यक्ति और पश्चिमी देशों में पहचान के संकट से जूझ रही पीढ़ी की मानसिकता का मिला-जुला रूप है। इसके अलावा, यह पश्चिमी देशों में महज खुद को सामने लाने, भीड़ से अलग अपनी पहचान बनाने की खातिर किशोरों के अपने स्कूलों, कॉलेजों में गोलीबारी से साथियों की जान ले लेने वाली पीढ़ी की मनोवैज्ञानिक समस्या से भी उपजी है। लेखांश के अनुसार नार्वे देश है - A संपत्ति प्रधानB संसाधन सम्पन्न C दूसरों की मदद करने वालाD एशियाई देश
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यूरोपीय देश नार्वे के इतिहास में पहली बार हुए बम विस्फोट और भीषण जनसंहार ने विश्व राजनीति के सामने कई सवाल खड़े किए हैं। पेट्रोलियम पदार्थों, प्राकृतिक गैस, खनिज पदार्थों, पनबिजली, सी-फूड से भरपूर देश नार्वे अशांत और पिछड़े एशियाई और अफ्रीकी देशों के मुकाबले अपने नागरिकों को बेहतर सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है। इसलिए नार्वे की हालिया हिसा को पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे अस्थिर देशों की राजनीति से लेकर संस्कृति, समाज और आर्थिकी को प्रभावित कर रहे अमेरिकी प्रभुत्व के खिलाफ हिसा के तौर पर नहीं देखा जा सकता। मानव विकास सूचकांक में शीर्ष क्रम में रहने वाले देश में यह हिसा कई मायने में पिछड़े, मगर प्राकृतिक संपदा संपन्न देशों में इनकी लड़ाई यूरोप के इस्लामीकरण के खिलाफ थी। उसने अपने देश की सरकार पर मुस्लिमों को आयातित करके देश के साथ धोखेबाजी का आरोप भी लगाया। डेढ़ हजार से ज्यादा पन्नों के घोषणापत्र में एक सौ दो पन्नों में भारत का उल्लेख करते हुए यहाँ की दक्षिणपंथी ताकतों को दुनिया से लोकतंत्र खत्म करने में सहायक बताया है। ब्रेविक ने बहुलतावादी संस्कृति से दूर रहने के लिए जापान की तारीफ की। हर घटना को पश्चिमी नजरिये से देखने के आदी हो चुके टेलीविजन, इंटरनेट और समाचार पत्रें के वेब संस्करण जैसे तमाम समाचार माध्यमों ने आनन-फानन में इसे नार्वे का9/11 का नाम दिया। घटना के पीछे अलकायदा को जिम्मेदार ठहराने की होड़ मचाए समाचार माध्यमों ने इसे अफ़गानिस्तानी नहीं, यमनी अल कायदा की शैली का हमला बताया। समाचार चैनलों पर बहसों का मुख्य सवाल यह था कि देश के अल्पसंख्यकों में सबसे ज्यादा संख्या वाले मुसलमान नार्वे से क्यों नफरत करते हैं। हालांकि इस सब के बीच घटना के प्रत्यक्षदर्शी ट्विटर के जरिए जानकारी दे रहे थे कि हमलावर एक ईसाई हैं और स्थानीय भाषा नार्वेइयन (नास्को) में बात कर रहा था। दुनिया को ‘इस्लामी आतंकवाद’ की शब्दावली देने वाले अमेरिका ने ब्रेविक की मंशा का खुलासा होने के बावजूद इस हत्याकांड की व्याख्या के लिए ‘ईसाई आतंकवाद’ का नाम नहीं गढ़ा। ब्रेविक का हमला भारतीय हिन्दू संगठनों के ‘धर्म शांति का माध्यम है’ का संदेश देने वालों के लिए एक सवाल है। अगर धार्मिक रास्तों पर चल कर एक समतामूलक समाज का निर्माण संभव होता तो सबसे पहले धर्म ने ही अपने स्वभाव में समानता लाने की कोशिश की होती। एक ही पंथ या धर्म के अंदर लोगों को लिग, जाति, वर्ग आदि आधार पर बांट कर उनके साथ होने वाला भेदभाव देखने को नहीं मिलता। ब्रेविक ने अपनी कार्यवाई को भारतीय हिन्दू धार्मिक संगठनों की तरह मुस्लिम तुष्टीकरण के खिलाफ एक कदम बताया। इस हमले को विस्फोट बहुल भारत के संदर्भ में समझने की कोशिश करें तो यह आजादी के पहले क्रांतिकारियों का हुकूमत के कान खोलने के लिए की गई कोशिश से बिल्कुल अलग हैं। उस धमाके में आसान और साफ-साफ लक्ष्य होते हुए भी किसी को निशाना नहीं बनाया गया था। यह देश के बीहड़, मगर खनिज तत्त्वों से संपन्न इलाकों में आदिवासियों की जमीन पर कब्जा किए बैठे सरकारी तंत्र के नुमाइंदों पर होने वाले हमलों से भी हट कर है। यहाँ पर अपने जंगल, पहाड़ों और नदियों पर सरकारी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आधिपत्य के खिलाफ लड़ाई का नारा काम करता है। यह देश के सिर (मस्तक/भाल) कश्मीर में भारत-पाकिस्तान के हुक्मरानों, उनके लड़ाकों और अमेरिका की कारगुजारियों से बने रहने वाले दर्द (हिसा) से भी अलग हैं। यह भारत के कई हिस्सों में सामने आई दक्षिणपंथी अतिवादी तत्त्वों की प्रतिक्रियावादी अभिव्यक्ति और पश्चिमी देशों में पहचान के संकट से जूझ रही पीढ़ी की मानसिकता का मिला-जुला रूप है। इसके अलावा, यह पश्चिमी देशों में महज खुद को सामने लाने, भीड़ से अलग अपनी पहचान बनाने की खातिर किशोरों के अपने स्कूलों, कॉलेजों में गोलीबारी से साथियों की जान ले लेने वाली पीढ़ी की मनोवैज्ञानिक समस्या से भी उपजी है। लेखांश के संदर्भ में निम्न कथनों पर विचार करें - 1- नार्वे मानव विकास सूचकांक में शीर्षक्रम में था। 2- ब्रेविक की लड़ाई समूचे विश्व के इस्लामीकरण के खिलाफ थी। 3- नार्वे एक बहुसंख्यक मुस्लिम राष्ट्र है। 4- अमेरिका ने दुनिया को एक नया शब्द ‘इस्लामी आतंकवाद’ दिया। उपर्युक्त वाक्यों के संदर्भ में कौन से कथन असत्य है? A केवल 3B 1 और 2 दोनों C 2 और 3 दोनोंD 1 और 4
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यूरोपीय देश नार्वे के इतिहास में पहली बार हुए बम विस्फोट और भीषण जनसंहार ने विश्व राजनीति के सामने कई सवाल खड़े किए हैं। पेट्रोलियम पदार्थों, प्राकृतिक गैस, खनिज पदार्थों, पनबिजली, सी-फूड से भरपूर देश नार्वे अशांत और पिछड़े एशियाई और अफ्रीकी देशों के मुकाबले अपने नागरिकों को बेहतर सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है। इसलिए नार्वे की हालिया हिसा को पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे अस्थिर देशों की राजनीति से लेकर संस्कृति, समाज और आर्थिकी को प्रभावित कर रहे अमेरिकी प्रभुत्व के खिलाफ हिसा के तौर पर नहीं देखा जा सकता। मानव विकास सूचकांक में शीर्ष क्रम में रहने वाले देश में यह हिसा कई मायने में पिछड़े, मगर प्राकृतिक संपदा संपन्न देशों में इनकी लड़ाई यूरोप के इस्लामीकरण के खिलाफ थी। उसने अपने देश की सरकार पर मुस्लिमों को आयातित करके देश के साथ धोखेबाजी का आरोप भी लगाया। डेढ़ हजार से ज्यादा पन्नों के घोषणापत्र में एक सौ दो पन्नों में भारत का उल्लेख करते हुए यहाँ की दक्षिणपंथी ताकतों को दुनिया से लोकतंत्र खत्म करने में सहायक बताया है। ब्रेविक ने बहुलतावादी संस्कृति से दूर रहने के लिए जापान की तारीफ की। हर घटना को पश्चिमी नजरिये से देखने के आदी हो चुके टेलीविजन, इंटरनेट और समाचार पत्रें के वेब संस्करण जैसे तमाम समाचार माध्यमों ने आनन-फानन में इसे नार्वे का9/11 का नाम दिया। घटना के पीछे अलकायदा को जिम्मेदार ठहराने की होड़ मचाए समाचार माध्यमों ने इसे अफ़गानिस्तानी नहीं, यमनी अल कायदा की शैली का हमला बताया। समाचार चैनलों पर बहसों का मुख्य सवाल यह था कि देश के अल्पसंख्यकों में सबसे ज्यादा संख्या वाले मुसलमान नार्वे से क्यों नफरत करते हैं। हालांकि इस सब के बीच घटना के प्रत्यक्षदर्शी ट्विटर के जरिए जानकारी दे रहे थे कि हमलावर एक ईसाई हैं और स्थानीय भाषा नार्वेइयन (नास्को) में बात कर रहा था। दुनिया को ‘इस्लामी आतंकवाद’ की शब्दावली देने वाले अमेरिका ने ब्रेविक की मंशा का खुलासा होने के बावजूद इस हत्याकांड की व्याख्या के लिए ‘ईसाई आतंकवाद’ का नाम नहीं गढ़ा। ब्रेविक का हमला भारतीय हिन्दू संगठनों के ‘धर्म शांति का माध्यम है’ का संदेश देने वालों के लिए एक सवाल है। अगर धार्मिक रास्तों पर चल कर एक समतामूलक समाज का निर्माण संभव होता तो सबसे पहले धर्म ने ही अपने स्वभाव में समानता लाने की कोशिश की होती। एक ही पंथ या धर्म के अंदर लोगों को लिग, जाति, वर्ग आदि आधार पर बांट कर उनके साथ होने वाला भेदभाव देखने को नहीं मिलता। ब्रेविक ने अपनी कार्यवाई को भारतीय हिन्दू धार्मिक संगठनों की तरह मुस्लिम तुष्टीकरण के खिलाफ एक कदम बताया। इस हमले को विस्फोट बहुल भारत के संदर्भ में समझने की कोशिश करें तो यह आजादी के पहले क्रांतिकारियों का हुकूमत के कान खोलने के लिए की गई कोशिश से बिल्कुल अलग हैं। उस धमाके में आसान और साफ-साफ लक्ष्य होते हुए भी किसी को निशाना नहीं बनाया गया था। यह देश के बीहड़, मगर खनिज तत्त्वों से संपन्न इलाकों में आदिवासियों की जमीन पर कब्जा किए बैठे सरकारी तंत्र के नुमाइंदों पर होने वाले हमलों से भी हट कर है। यहाँ पर अपने जंगल, पहाड़ों और नदियों पर सरकारी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आधिपत्य के खिलाफ लड़ाई का नारा काम करता है। यह देश के सिर (मस्तक/भाल) कश्मीर में भारत-पाकिस्तान के हुक्मरानों, उनके लड़ाकों और अमेरिका की कारगुजारियों से बने रहने वाले दर्द (हिसा) से भी अलग हैं। यह भारत के कई हिस्सों में सामने आई दक्षिणपंथी अतिवादी तत्त्वों की प्रतिक्रियावादी अभिव्यक्ति और पश्चिमी देशों में पहचान के संकट से जूझ रही पीढ़ी की मानसिकता का मिला-जुला रूप है। इसके अलावा, यह पश्चिमी देशों में महज खुद को सामने लाने, भीड़ से अलग अपनी पहचान बनाने की खातिर किशोरों के अपने स्कूलों, कॉलेजों में गोलीबारी से साथियों की जान ले लेने वाली पीढ़ी की मनोवैज्ञानिक समस्या से भी उपजी है। लेखांश के अनुसार ब्रेविक की दृष्टि में जापान - A सबसे कठिन समय से गुजर रहा है। B बहुलतावादी संस्कृति से परे रहता है। C एशियाई और विकसित राष्ट्र है। D उपर्युक्त तीनों
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यूरोपीय देश नार्वे के इतिहास में पहली बार हुए बम विस्फोट और भीषण जनसंहार ने विश्व राजनीति के सामने कई सवाल खड़े किए हैं। पेट्रोलियम पदार्थों, प्राकृतिक गैस, खनिज पदार्थों, पनबिजली, सी-फूड से भरपूर देश नार्वे अशांत और पिछड़े एशियाई और अफ्रीकी देशों के मुकाबले अपने नागरिकों को बेहतर सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है। इसलिए नार्वे की हालिया हिसा को पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे अस्थिर देशों की राजनीति से लेकर संस्कृति, समाज और आर्थिकी को प्रभावित कर रहे अमेरिकी प्रभुत्व के खिलाफ हिसा के तौर पर नहीं देखा जा सकता। मानव विकास सूचकांक में शीर्ष क्रम में रहने वाले देश में यह हिसा कई मायने में पिछड़े, मगर प्राकृतिक संपदा संपन्न देशों में इनकी लड़ाई यूरोप के इस्लामीकरण के खिलाफ थी। उसने अपने देश की सरकार पर मुस्लिमों को आयातित करके देश के साथ धोखेबाजी का आरोप भी लगाया। डेढ़ हजार से ज्यादा पन्नों के घोषणापत्र में एक सौ दो पन्नों में भारत का उल्लेख करते हुए यहाँ की दक्षिणपंथी ताकतों को दुनिया से लोकतंत्र खत्म करने में सहायक बताया है। ब्रेविक ने बहुलतावादी संस्कृति से दूर रहने के लिए जापान की तारीफ की। हर घटना को पश्चिमी नजरिये से देखने के आदी हो चुके टेलीविजन, इंटरनेट और समाचार पत्रें के वेब संस्करण जैसे तमाम समाचार माध्यमों ने आनन-फानन में इसे नार्वे का9/11 का नाम दिया। घटना के पीछे अलकायदा को जिम्मेदार ठहराने की होड़ मचाए समाचार माध्यमों ने इसे अफ़गानिस्तानी नहीं, यमनी अल कायदा की शैली का हमला बताया। समाचार चैनलों पर बहसों का मुख्य सवाल यह था कि देश के अल्पसंख्यकों में सबसे ज्यादा संख्या वाले मुसलमान नार्वे से क्यों नफरत करते हैं। हालांकि इस सब के बीच घटना के प्रत्यक्षदर्शी ट्विटर के जरिए जानकारी दे रहे थे कि हमलावर एक ईसाई हैं और स्थानीय भाषा नार्वेइयन (नास्को) में बात कर रहा था। दुनिया को ‘इस्लामी आतंकवाद’ की शब्दावली देने वाले अमेरिका ने ब्रेविक की मंशा का खुलासा होने के बावजूद इस हत्याकांड की व्याख्या के लिए ‘ईसाई आतंकवाद’ का नाम नहीं गढ़ा। ब्रेविक का हमला भारतीय हिन्दू संगठनों के ‘धर्म शांति का माध्यम है’ का संदेश देने वालों के लिए एक सवाल है। अगर धार्मिक रास्तों पर चल कर एक समतामूलक समाज का निर्माण संभव होता तो सबसे पहले धर्म ने ही अपने स्वभाव में समानता लाने की कोशिश की होती। एक ही पंथ या धर्म के अंदर लोगों को लिग, जाति, वर्ग आदि आधार पर बांट कर उनके साथ होने वाला भेदभाव देखने को नहीं मिलता। ब्रेविक ने अपनी कार्यवाई को भारतीय हिन्दू धार्मिक संगठनों की तरह मुस्लिम तुष्टीकरण के खिलाफ एक कदम बताया। इस हमले को विस्फोट बहुल भारत के संदर्भ में समझने की कोशिश करें तो यह आजादी के पहले क्रांतिकारियों का हुकूमत के कान खोलने के लिए की गई कोशिश से बिल्कुल अलग हैं। उस धमाके में आसान और साफ-साफ लक्ष्य होते हुए भी किसी को निशाना नहीं बनाया गया था। यह देश के बीहड़, मगर खनिज तत्त्वों से संपन्न इलाकों में आदिवासियों की जमीन पर कब्जा किए बैठे सरकारी तंत्र के नुमाइंदों पर होने वाले हमलों से भी हट कर है। यहाँ पर अपने जंगल, पहाड़ों और नदियों पर सरकारी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आधिपत्य के खिलाफ लड़ाई का नारा काम करता है। यह देश के सिर (मस्तक/भाल) कश्मीर में भारत-पाकिस्तान के हुक्मरानों, उनके लड़ाकों और अमेरिका की कारगुजारियों से बने रहने वाले दर्द (हिसा) से भी अलग हैं। यह भारत के कई हिस्सों में सामने आई दक्षिणपंथी अतिवादी तत्त्वों की प्रतिक्रियावादी अभिव्यक्ति और पश्चिमी देशों में पहचान के संकट से जूझ रही पीढ़ी की मानसिकता का मिला-जुला रूप है। इसके अलावा, यह पश्चिमी देशों में महज खुद को सामने लाने, भीड़ से अलग अपनी पहचान बनाने की खातिर किशोरों के अपने स्कूलों, कॉलेजों में गोलीबारी से साथियों की जान ले लेने वाली पीढ़ी की मनोवैज्ञानिक समस्या से भी उपजी है। दुनिया को ‘इस्लामी आतंकवाद’ नामक शब्दावली किसने दि? A अमेरिकाB नॉर्वे C ब्रिटेनD भारत
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निम्नलिखित परिच्छेद को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। अनेक उदाहरणों में ज्ञान का सृजन रचनात्मकता तथा विचारों की उद्भावना की अपेक्षा रखता है। वैकल्पिक निर्णय-समर्थक समाधानों की उद्भावना में यह विशेष महत्व रखता हैै। कुछ लोगों का यह मत है कि व्यक्ति विशेष की रचनात्मक क्षमता का उद्भव वैयक्तिक गुणों-यथा आविष्कारी प्रवृत्ति, स्वातंत्र्य, वैयक्तिकता, उत्साह और नमनीयता से होता है। परन्तु अनेक अध्ययनों से यह पता चला है कि रचनात्मकता, जिसे पहले व्यक्ति-विशेष के गुणों का कृत्य माना गया था, वह गुणों का उतना परिणाम नहीं है और वैयक्तिक रचनात्मकता सीखी जा सकती है और उसका सुधार भी हो सकता है। इस विचार ने आविष्कारी कम्पनियों को यह आभास कराया है कि विचारसृजन कार्य वातावरण का विकास रचनात्मकता के संवर्धन की कुंजी है। परिणामतः व्यक्तियों अथवा समूहों के द्वारा प्रयोज्य विधियों तथा तकनीकों का विकास किया जा रहा है। विचार-सृजन के समर्थन के लिए मानवीय विधियां-यथा विचारों का आदान-प्रदान कुछ परिस्थितियों में अत्यन्त सफल हो सकती हैं, परन्तु अन्य परिस्थितियों में यह प्रस्ताव न आर्थिक दृष्टि से साध्य है और न सम्भव है। उदाहरण के लिए, मानवीय विधियां सामूहिक रचनात्मकता के क्षणों में नहीं कार्य कर सकेंगी या प्रभावी नहीं होगी, जब (1) उचित विचार-सृजन सत्र को संचालित करने के समय का अभाव हो, (2) सुविधा देने वाला अक्षम हो (या सुविधा देने वाला कोई भी न हो) (3) विचार-सृजन का सत्र संचालन अत्यंत व्ययसाध्य हो, (4) आमने-सामने के सत्र के लिए विषय-वस्तु अत्यन्त संवेदनशील हो, अथवा (5) पर्याप्त प्रतिभागी न हों, प्रतिभागियों का सम्मिश्रण इष्टतम न हो या विचार-सृजन का वातावरण न हो। ऐसी परिस्थितियों में कम्यूटर के द्वारा विचार-सृजन की विधियों का प्रयोग किया गया है, इसमें पर्याप्त सफलता भी मिली है। विचार-सृजन का सॉफ्रटवेयर एक व्यक्ति के या समूह के लिए किया गया है, जो व्यक्ति या समूह को नए विचारों, विकल्पों और (विचारों के) चयन के लिए प्रेरित करता है। प्रयोक्ता सारा कार्य करता है, पर सॉफ्रटवेयर, एक प्रशिक्षक के समान उसे प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। यद्यपि विचार-सृजन का सॉफ्रटेवयर अपेक्षाकृत अभी नया है, फिर भी बाजार में इसके अनेक ‘पैकेज’ उपलब्ध हैं। विचार-सृजन सॉफ्रटवेयर के प्रयोक्ता के द्वारा विचारों के प्रवाह की अभिवृद्धि के लिए विविध प्रयोग किये जा रहे हैं। उदाहरणार्थ, शब्द और वाक्य हैं। इन सम्बन्धपरक कड़ियों ने प्रयोक्ता को विषय-विशेष से सम्बन्धित शब्दों का ‘फीड’ (भरण) आसान बना दिया है। कुछ ‘सॉफ्रटवेयर पैकेज’ ऐसे प्रश्नो का प्रयोग करते हैं, जो प्रयोक्ता को नए अनन्तिष्ट विचार सारणियों के प्रयोग करते हैं, जो प्रति प्रेरित करते हैं। यह प्रयोक्ताओं को चाक्रिक चिन्तन की परिपाटी से मुक्त करने में, उनके मानसिक अवरोधों पर विजय पाने तथा उनकी दीर्घसूत्रता के दौर के दूर करने में सहायक होता है। उपर्युक्त उद्धरण में लेखक ने अपना ध्यान केन्द्रित किया है: A ज्ञान-सृजन परB विचारों की उद्भावना पर C रचनात्मकता परD वैयक्तिक गुणों पर
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निम्नलिखित परिच्छेद को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। अनेक उदाहरणों में ज्ञान का सृजन रचनात्मकता तथा विचारों की उद्भावना की अपेक्षा रखता है। वैकल्पिक निर्णय-समर्थक समाधानों की उद्भावना में यह विशेष महत्व रखता हैै। कुछ लोगों का यह मत है कि व्यक्ति विशेष की रचनात्मक क्षमता का उद्भव वैयक्तिक गुणों-यथा आविष्कारी प्रवृत्ति, स्वातंत्र्य, वैयक्तिकता, उत्साह और नमनीयता से होता है। परन्तु अनेक अध्ययनों से यह पता चला है कि रचनात्मकता, जिसे पहले व्यक्ति-विशेष के गुणों का कृत्य माना गया था, वह गुणों का उतना परिणाम नहीं है और वैयक्तिक रचनात्मकता सीखी जा सकती है और उसका सुधार भी हो सकता है। इस विचार ने आविष्कारी कम्पनियों को यह आभास कराया है कि विचारसृजन कार्य वातावरण का विकास रचनात्मकता के संवर्धन की कुंजी है। परिणामतः व्यक्तियों अथवा समूहों के द्वारा प्रयोज्य विधियों तथा तकनीकों का विकास किया जा रहा है। विचार-सृजन के समर्थन के लिए मानवीय विधियां-यथा विचारों का आदान-प्रदान कुछ परिस्थितियों में अत्यन्त सफल हो सकती हैं, परन्तु अन्य परिस्थितियों में यह प्रस्ताव न आर्थिक दृष्टि से साध्य है और न सम्भव है। उदाहरण के लिए, मानवीय विधियां सामूहिक रचनात्मकता के क्षणों में नहीं कार्य कर सकेंगी या प्रभावी नहीं होगी, जब (1) उचित विचार-सृजन सत्र को संचालित करने के समय का अभाव हो, (2) सुविधा देने वाला अक्षम हो (या सुविधा देने वाला कोई भी न हो) (3) विचार-सृजन का सत्र संचालन अत्यंत व्ययसाध्य हो, (4) आमने-सामने के सत्र के लिए विषय-वस्तु अत्यन्त संवेदनशील हो, अथवा (5) पर्याप्त प्रतिभागी न हों, प्रतिभागियों का सम्मिश्रण इष्टतम न हो या विचार-सृजन का वातावरण न हो। ऐसी परिस्थितियों में कम्यूटर के द्वारा विचार-सृजन की विधियों का प्रयोग किया गया है, इसमें पर्याप्त सफलता भी मिली है। विचार-सृजन का सॉफ्रटवेयर एक व्यक्ति के या समूह के लिए किया गया है, जो व्यक्ति या समूह को नए विचारों, विकल्पों और (विचारों के) चयन के लिए प्रेरित करता है। प्रयोक्ता सारा कार्य करता है, पर सॉफ्रटवेयर, एक प्रशिक्षक के समान उसे प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। यद्यपि विचार-सृजन का सॉफ्रटेवयर अपेक्षाकृत अभी नया है, फिर भी बाजार में इसके अनेक ‘पैकेज’ उपलब्ध हैं। विचार-सृजन सॉफ्रटवेयर के प्रयोक्ता के द्वारा विचारों के प्रवाह की अभिवृद्धि के लिए विविध प्रयोग किये जा रहे हैं। उदाहरणार्थ, शब्द और वाक्य हैं। इन सम्बन्धपरक कड़ियों ने प्रयोक्ता को विषय-विशेष से सम्बन्धित शब्दों का ‘फीड’ (भरण) आसान बना दिया है। कुछ ‘सॉफ्रटवेयर पैकेज’ ऐसे प्रश्नो का प्रयोग करते हैं, जो प्रयोक्ता को नए अनन्तिष्ट विचार सारणियों के प्रयोग करते हैं, जो प्रति प्रेरित करते हैं। यह प्रयोक्ताओं को चाक्रिक चिन्तन की परिपाटी से मुक्त करने में, उनके मानसिक अवरोधों पर विजय पाने तथा उनकी दीर्घसूत्रता के दौर के दूर करने में सहायक होता है। रचनात्मकता के संवर्धन के वातावरण के लिए अपेक्षित है: A निर्णय-समर्थन पद्धति B विचार सृजन कार्य वातावरण का विकास C निर्णय-समर्थन समाधान D वैकल्पिक वैयक्तिक कारण
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निम्नलिखित परिच्छेद को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। अनेक उदाहरणों में ज्ञान का सृजन रचनात्मकता तथा विचारों की उद्भावना की अपेक्षा रखता है। वैकल्पिक निर्णय-समर्थक समाधानों की उद्भावना में यह विशेष महत्व रखता हैै। कुछ लोगों का यह मत है कि व्यक्ति विशेष की रचनात्मक क्षमता का उद्भव वैयक्तिक गुणों-यथा आविष्कारी प्रवृत्ति, स्वातंत्र्य, वैयक्तिकता, उत्साह और नमनीयता से होता है। परन्तु अनेक अध्ययनों से यह पता चला है कि रचनात्मकता, जिसे पहले व्यक्ति-विशेष के गुणों का कृत्य माना गया था, वह गुणों का उतना परिणाम नहीं है और वैयक्तिक रचनात्मकता सीखी जा सकती है और उसका सुधार भी हो सकता है। इस विचार ने आविष्कारी कम्पनियों को यह आभास कराया है कि विचारसृजन कार्य वातावरण का विकास रचनात्मकता के संवर्धन की कुंजी है। परिणामतः व्यक्तियों अथवा समूहों के द्वारा प्रयोज्य विधियों तथा तकनीकों का विकास किया जा रहा है। विचार-सृजन के समर्थन के लिए मानवीय विधियां-यथा विचारों का आदान-प्रदान कुछ परिस्थितियों में अत्यन्त सफल हो सकती हैं, परन्तु अन्य परिस्थितियों में यह प्रस्ताव न आर्थिक दृष्टि से साध्य है और न सम्भव है। उदाहरण के लिए, मानवीय विधियां सामूहिक रचनात्मकता के क्षणों में नहीं कार्य कर सकेंगी या प्रभावी नहीं होगी, जब (1) उचित विचार-सृजन सत्र को संचालित करने के समय का अभाव हो, (2) सुविधा देने वाला अक्षम हो (या सुविधा देने वाला कोई भी न हो) (3) विचार-सृजन का सत्र संचालन अत्यंत व्ययसाध्य हो, (4) आमने-सामने के सत्र के लिए विषय-वस्तु अत्यन्त संवेदनशील हो, अथवा (5) पर्याप्त प्रतिभागी न हों, प्रतिभागियों का सम्मिश्रण इष्टतम न हो या विचार-सृजन का वातावरण न हो। ऐसी परिस्थितियों में कम्यूटर के द्वारा विचार-सृजन की विधियों का प्रयोग किया गया है, इसमें पर्याप्त सफलता भी मिली है। विचार-सृजन का सॉफ्रटवेयर एक व्यक्ति के या समूह के लिए किया गया है, जो व्यक्ति या समूह को नए विचारों, विकल्पों और (विचारों के) चयन के लिए प्रेरित करता है। प्रयोक्ता सारा कार्य करता है, पर सॉफ्रटवेयर, एक प्रशिक्षक के समान उसे प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। यद्यपि विचार-सृजन का सॉफ्रटेवयर अपेक्षाकृत अभी नया है, फिर भी बाजार में इसके अनेक ‘पैकेज’ उपलब्ध हैं। विचार-सृजन सॉफ्रटवेयर के प्रयोक्ता के द्वारा विचारों के प्रवाह की अभिवृद्धि के लिए विविध प्रयोग किये जा रहे हैं। उदाहरणार्थ, शब्द और वाक्य हैं। इन सम्बन्धपरक कड़ियों ने प्रयोक्ता को विषय-विशेष से सम्बन्धित शब्दों का ‘फीड’ (भरण) आसान बना दिया है। कुछ ‘सॉफ्रटवेयर पैकेज’ ऐसे प्रश्नो का प्रयोग करते हैं, जो प्रयोक्ता को नए अनन्तिष्ट विचार सारणियों के प्रयोग करते हैं, जो प्रति प्रेरित करते हैं। यह प्रयोक्ताओं को चाक्रिक चिन्तन की परिपाटी से मुक्त करने में, उनके मानसिक अवरोधों पर विजय पाने तथा उनकी दीर्घसूत्रता के दौर के दूर करने में सहायक होता है। विचार की उद्भावना के लिए मानवीय तरीके, कुछ परिस्थितियों में: A विकल्पतः प्रभावी हैं। B कम व्ययसाध्य हैं। C सुविधाप्रदायक की अपेक्षा नहीं रखते हैं। D इष्टतम प्रतिभागियों का सम्मिश्रण अपेक्षित है।
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निम्नलिखित परिच्छेद को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। अनेक उदाहरणों में ज्ञान का सृजन रचनात्मकता तथा विचारों की उद्भावना की अपेक्षा रखता है। वैकल्पिक निर्णय-समर्थक समाधानों की उद्भावना में यह विशेष महत्व रखता हैै। कुछ लोगों का यह मत है कि व्यक्ति विशेष की रचनात्मक क्षमता का उद्भव वैयक्तिक गुणों-यथा आविष्कारी प्रवृत्ति, स्वातंत्र्य, वैयक्तिकता, उत्साह और नमनीयता से होता है। परन्तु अनेक अध्ययनों से यह पता चला है कि रचनात्मकता, जिसे पहले व्यक्ति-विशेष के गुणों का कृत्य माना गया था, वह गुणों का उतना परिणाम नहीं है और वैयक्तिक रचनात्मकता सीखी जा सकती है और उसका सुधार भी हो सकता है। इस विचार ने आविष्कारी कम्पनियों को यह आभास कराया है कि विचारसृजन कार्य वातावरण का विकास रचनात्मकता के संवर्धन की कुंजी है। परिणामतः व्यक्तियों अथवा समूहों के द्वारा प्रयोज्य विधियों तथा तकनीकों का विकास किया जा रहा है। विचार-सृजन के समर्थन के लिए मानवीय विधियां-यथा विचारों का आदान-प्रदान कुछ परिस्थितियों में अत्यन्त सफल हो सकती हैं, परन्तु अन्य परिस्थितियों में यह प्रस्ताव न आर्थिक दृष्टि से साध्य है और न सम्भव है। उदाहरण के लिए, मानवीय विधियां सामूहिक रचनात्मकता के क्षणों में नहीं कार्य कर सकेंगी या प्रभावी नहीं होगी, जब (1) उचित विचार-सृजन सत्र को संचालित करने के समय का अभाव हो, (2) सुविधा देने वाला अक्षम हो (या सुविधा देने वाला कोई भी न हो) (3) विचार-सृजन का सत्र संचालन अत्यंत व्ययसाध्य हो, (4) आमने-सामने के सत्र के लिए विषय-वस्तु अत्यन्त संवेदनशील हो, अथवा (5) पर्याप्त प्रतिभागी न हों, प्रतिभागियों का सम्मिश्रण इष्टतम न हो या विचार-सृजन का वातावरण न हो। ऐसी परिस्थितियों में कम्यूटर के द्वारा विचार-सृजन की विधियों का प्रयोग किया गया है, इसमें पर्याप्त सफलता भी मिली है। विचार-सृजन का सॉफ्रटवेयर एक व्यक्ति के या समूह के लिए किया गया है, जो व्यक्ति या समूह को नए विचारों, विकल्पों और (विचारों के) चयन के लिए प्रेरित करता है। प्रयोक्ता सारा कार्य करता है, पर सॉफ्रटवेयर, एक प्रशिक्षक के समान उसे प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। यद्यपि विचार-सृजन का सॉफ्रटेवयर अपेक्षाकृत अभी नया है, फिर भी बाजार में इसके अनेक ‘पैकेज’ उपलब्ध हैं। विचार-सृजन सॉफ्रटवेयर के प्रयोक्ता के द्वारा विचारों के प्रवाह की अभिवृद्धि के लिए विविध प्रयोग किये जा रहे हैं। उदाहरणार्थ, शब्द और वाक्य हैं। इन सम्बन्धपरक कड़ियों ने प्रयोक्ता को विषय-विशेष से सम्बन्धित शब्दों का ‘फीड’ (भरण) आसान बना दिया है। कुछ ‘सॉफ्रटवेयर पैकेज’ ऐसे प्रश्नो का प्रयोग करते हैं, जो प्रयोक्ता को नए अनन्तिष्ट विचार सारणियों के प्रयोग करते हैं, जो प्रति प्रेरित करते हैं। यह प्रयोक्ताओं को चाक्रिक चिन्तन की परिपाटी से मुक्त करने में, उनके मानसिक अवरोधों पर विजय पाने तथा उनकी दीर्घसूत्रता के दौर के दूर करने में सहायक होता है। विचारों की उद्भावना का सॉफ्रटवेयर कार्य करता है: A प्रेरणा प्रदाता के रूप में B ज्ञान के ‘पैकेज’ के रूप में C प्रयोक्ताक के मित्र प्रशिक्षक के रूप में D वातावरण-सृजक के रूप में
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आमूल रूप से बदल रहे मानसून प्रारूप, शीत ट्टतु की धान की उपज और श्वास रोगों में काफी वृद्धि सभी बदलते पर्यावरणीय परिदृश्य का हिस्सा है। जिसका दक्षिण एशिया में बाजा बज रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम रिपोर्ट के अनुसार, राख, अम्ल, वायु धुन्ध एवं अन्य कणों से युक्त प्रदूषण के घातक तीन किमी- लम्बे गहन आवरण के भयानक कॉकटेल ने इस क्षेत्र को आच्छादित किया हुआ है। भारत, जो पहले ही सूखे की स्थिति से जूझ रहा है, के लिए इसका निहितार्थ सर्वनाश ही है और फसल की ओर विफलता का अर्थ बहुत से भारतीयों के लिए जीवन एवं मौत के समान होगा। अपरिपक्व मौतों में वृद्धि के प्रतिकूल सामाजिक व आर्थिक प्रभाव होंगे और रुग्णता (रोगों) वृद्धि हमारी जीर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था पर असहनीय भार डालेगी। इसके लिए हम अपने सिवाय किसी अन्य को दोषारोपित नहीं कर सकते हैं। सरकारी एवं कॉर्पोरेट भारत दोनों ही स्वच्छ प्रौद्योगिकी के किसी भी जिक्र के प्रति हमेशा से एलर्जिक रहे हैं। अधिकांश यान्त्रिक दुपहिया वाहन, प्रदूषण नियन्त्रण की उचित व्यवस्था के बिना ही एसेम्बली लाईन से बन कर निकलते हैं। सरल प्रौद्योगिकियां, जो लोगों के जीवन एवं पर्यावरण में मार्मिक परिवर्तन ला सकती हैं, पर आर एवं डी के लिए कम प्रयत्न किया जाता है। तथापि, जबकि इससे कोई इंकार नहीं कि दक्षिण एशिया को अपने कृत्य को स्वच्छ करना चाहिए, शंकाशील लोग हेज रिपोर्ट के समय के बारे में प्रश्न खड़ा कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन पर क्योटो अधिवेशन के होने में सिर्फ दो हफ्रते ही रह गए हैं और विकासशील विश्व एवं पश्चिम, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच प्रायिक युद्ध के लिए स्थिति तैयार हो गई है। राष्ट्रपति बुश ने किसी भी कच्चे मसौदे (प्रोटोकल) पर हस्ताक्षर करने से दृढ़ता से इन्कार कर दिया था जबकि इसका अर्थ अमेरिका के उपभोग स्तर में परिवर्तन की शस्त्रशाला में स्थान प्राप्त कर सकेगी क्योंकि उसके संयंत्र भारत और चीन जैसे नियन्त्रणों की ओर आरोपी अंगुली उठा रहे हैं। फिर भी, यू- एस- ए- कारोबारी कोटा (नियतांश) समाप्त करने के मामले संदिग्ध भूमिका से शायद ही इन्कार कर सकेगा। धनी देश, गरीब देशों से आसानी से अत्यधिक ट्टण ले सकते हैं और प्रदूषण जारी रख सकते हैं। बजाए इसके कि विकासशील देशों का ज्यादा अच्छा करने की कोशिश करें, जिन्होंने, बेशक पश्चिम के साथ चलने की अपनी कोशिश में पर्यावरणीय संक्षिप्त उपाय किए हैं, यू- एस- ए- को अपने देश में व्याप्त पर्यावरणीय दुराचार को देखना चाहिए। तेल की खोज के लिए अछूते क्षेत्रें को खोलने से लेकर पेयजल के मानक शिथिल करने तक, बुश की नीतियां वास्तव में लाभदेय नहीं थी, अमेरिका के हितों के लिए भी नहीं। हमने समझ लिया कि इसमें हम सभी संलग्न है और किसी भी क्षेत्र में प्रदूषण हो वह वैश्विक सरोकार होना चाहिए अन्यथा गुफा के अन्त में सिर्फ ज्यादा गुफाएं ही होगी। सरकारी एवं कॉरपोरेट भारत दोनों किसके प्रति एलर्जिक हैं? A मानसून की विफलता B निर्धनता एवं असमानता C औद्योगिक उत्पादन की मन्दगति D स्वच्छ प्रौद्योगिकी की जिक्र
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आमूल रूप से बदल रहे मानसून प्रारूप, शीत ट्टतु की धान की उपज और श्वास रोगों में काफी वृद्धि सभी बदलते पर्यावरणीय परिदृश्य का हिस्सा है। जिसका दक्षिण एशिया में बाजा बज रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम रिपोर्ट के अनुसार, राख, अम्ल, वायु धुन्ध एवं अन्य कणों से युक्त प्रदूषण के घातक तीन किमी- लम्बे गहन आवरण के भयानक कॉकटेल ने इस क्षेत्र को आच्छादित किया हुआ है। भारत, जो पहले ही सूखे की स्थिति से जूझ रहा है, के लिए इसका निहितार्थ सर्वनाश ही है और फसल की ओर विफलता का अर्थ बहुत से भारतीयों के लिए जीवन एवं मौत के समान होगा। अपरिपक्व मौतों में वृद्धि के प्रतिकूल सामाजिक व आर्थिक प्रभाव होंगे और रुग्णता (रोगों) वृद्धि हमारी जीर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था पर असहनीय भार डालेगी। इसके लिए हम अपने सिवाय किसी अन्य को दोषारोपित नहीं कर सकते हैं। सरकारी एवं कॉर्पोरेट भारत दोनों ही स्वच्छ प्रौद्योगिकी के किसी भी जिक्र के प्रति हमेशा से एलर्जिक रहे हैं। अधिकांश यान्त्रिक दुपहिया वाहन, प्रदूषण नियन्त्रण की उचित व्यवस्था के बिना ही एसेम्बली लाईन से बन कर निकलते हैं। सरल प्रौद्योगिकियां, जो लोगों के जीवन एवं पर्यावरण में मार्मिक परिवर्तन ला सकती हैं, पर आर एवं डी के लिए कम प्रयत्न किया जाता है। तथापि, जबकि इससे कोई इंकार नहीं कि दक्षिण एशिया को अपने कृत्य को स्वच्छ करना चाहिए, शंकाशील लोग हेज रिपोर्ट के समय के बारे में प्रश्न खड़ा कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन पर क्योटो अधिवेशन के होने में सिर्फ दो हफ्रते ही रह गए हैं और विकासशील विश्व एवं पश्चिम, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच प्रायिक युद्ध के लिए स्थिति तैयार हो गई है। राष्ट्रपति बुश ने किसी भी कच्चे मसौदे (प्रोटोकल) पर हस्ताक्षर करने से दृढ़ता से इन्कार कर दिया था जबकि इसका अर्थ अमेरिका के उपभोग स्तर में परिवर्तन की शस्त्रशाला में स्थान प्राप्त कर सकेगी क्योंकि उसके संयंत्र भारत और चीन जैसे नियन्त्रणों की ओर आरोपी अंगुली उठा रहे हैं। फिर भी, यू- एस- ए- कारोबारी कोटा (नियतांश) समाप्त करने के मामले संदिग्ध भूमिका से शायद ही इन्कार कर सकेगा। धनी देश, गरीब देशों से आसानी से अत्यधिक ट्टण ले सकते हैं और प्रदूषण जारी रख सकते हैं। बजाए इसके कि विकासशील देशों का ज्यादा अच्छा करने की कोशिश करें, जिन्होंने, बेशक पश्चिम के साथ चलने की अपनी कोशिश में पर्यावरणीय संक्षिप्त उपाय किए हैं, यू- एस- ए- को अपने देश में व्याप्त पर्यावरणीय दुराचार को देखना चाहिए। तेल की खोज के लिए अछूते क्षेत्रें को खोलने से लेकर पेयजल के मानक शिथिल करने तक, बुश की नीतियां वास्तव में लाभदेय नहीं थी, अमेरिका के हितों के लिए भी नहीं। हमने समझ लिया कि इसमें हम सभी संलग्न है और किसी भी क्षेत्र में प्रदूषण हो वह वैश्विक सरोकार होना चाहिए अन्यथा गुफा के अन्त में सिर्फ ज्यादा गुफाएं ही होगी। यदि अपरिपक्व मृत्यु की दर बढ़ती है तो यह A जीर्ण-शीर्ण अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त भार डालेगी B प्रतिकूल सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव डालेंगी C जनसंख्या नियंत्रण के हमारे प्रयत्न पर सकारात्मक प्रभाव डालेगी D समाज में नौकरी के उम्मीदवार कम होंगे
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आमूल रूप से बदल रहे मानसून प्रारूप, शीत ट्टतु की धान की उपज और श्वास रोगों में काफी वृद्धि सभी बदलते पर्यावरणीय परिदृश्य का हिस्सा है। जिसका दक्षिण एशिया में बाजा बज रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम रिपोर्ट के अनुसार, राख, अम्ल, वायु धुन्ध एवं अन्य कणों से युक्त प्रदूषण के घातक तीन किमी- लम्बे गहन आवरण के भयानक कॉकटेल ने इस क्षेत्र को आच्छादित किया हुआ है। भारत, जो पहले ही सूखे की स्थिति से जूझ रहा है, के लिए इसका निहितार्थ सर्वनाश ही है और फसल की ओर विफलता का अर्थ बहुत से भारतीयों के लिए जीवन एवं मौत के समान होगा। अपरिपक्व मौतों में वृद्धि के प्रतिकूल सामाजिक व आर्थिक प्रभाव होंगे और रुग्णता (रोगों) वृद्धि हमारी जीर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था पर असहनीय भार डालेगी। इसके लिए हम अपने सिवाय किसी अन्य को दोषारोपित नहीं कर सकते हैं। सरकारी एवं कॉर्पोरेट भारत दोनों ही स्वच्छ प्रौद्योगिकी के किसी भी जिक्र के प्रति हमेशा से एलर्जिक रहे हैं। अधिकांश यान्त्रिक दुपहिया वाहन, प्रदूषण नियन्त्रण की उचित व्यवस्था के बिना ही एसेम्बली लाईन से बन कर निकलते हैं। सरल प्रौद्योगिकियां, जो लोगों के जीवन एवं पर्यावरण में मार्मिक परिवर्तन ला सकती हैं, पर आर एवं डी के लिए कम प्रयत्न किया जाता है। तथापि, जबकि इससे कोई इंकार नहीं कि दक्षिण एशिया को अपने कृत्य को स्वच्छ करना चाहिए, शंकाशील लोग हेज रिपोर्ट के समय के बारे में प्रश्न खड़ा कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन पर क्योटो अधिवेशन के होने में सिर्फ दो हफ्रते ही रह गए हैं और विकासशील विश्व एवं पश्चिम, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच प्रायिक युद्ध के लिए स्थिति तैयार हो गई है। राष्ट्रपति बुश ने किसी भी कच्चे मसौदे (प्रोटोकल) पर हस्ताक्षर करने से दृढ़ता से इन्कार कर दिया था जबकि इसका अर्थ अमेरिका के उपभोग स्तर में परिवर्तन की शस्त्रशाला में स्थान प्राप्त कर सकेगी क्योंकि उसके संयंत्र भारत और चीन जैसे नियन्त्रणों की ओर आरोपी अंगुली उठा रहे हैं। फिर भी, यू- एस- ए- कारोबारी कोटा (नियतांश) समाप्त करने के मामले संदिग्ध भूमिका से शायद ही इन्कार कर सकेगा। धनी देश, गरीब देशों से आसानी से अत्यधिक ट्टण ले सकते हैं और प्रदूषण जारी रख सकते हैं। बजाए इसके कि विकासशील देशों का ज्यादा अच्छा करने की कोशिश करें, जिन्होंने, बेशक पश्चिम के साथ चलने की अपनी कोशिश में पर्यावरणीय संक्षिप्त उपाय किए हैं, यू- एस- ए- को अपने देश में व्याप्त पर्यावरणीय दुराचार को देखना चाहिए। तेल की खोज के लिए अछूते क्षेत्रें को खोलने से लेकर पेयजल के मानक शिथिल करने तक, बुश की नीतियां वास्तव में लाभदेय नहीं थी, अमेरिका के हितों के लिए भी नहीं। हमने समझ लिया कि इसमें हम सभी संलग्न है और किसी भी क्षेत्र में प्रदूषण हो वह वैश्विक सरोकार होना चाहिए अन्यथा गुफा के अन्त में सिर्फ ज्यादा गुफाएं ही होगी। परिच्छेद के अनुसार दुपहिया उद्योग किसके बारे में पर्याप्त सरोकार नहीं रखता है: A सड़कों पर यात्रियों की सुरक्षा B वाहन स्वामी का जीवन सुरक्षा बीमा C वाहन में प्रदूषण नियन्त्रण व्यवस्था D दुपहिया वाहन की बढ़ती लागत
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आमूल रूप से बदल रहे मानसून प्रारूप, शीत ट्टतु की धान की उपज और श्वास रोगों में काफी वृद्धि सभी बदलते पर्यावरणीय परिदृश्य का हिस्सा है। जिसका दक्षिण एशिया में बाजा बज रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम रिपोर्ट के अनुसार, राख, अम्ल, वायु धुन्ध एवं अन्य कणों से युक्त प्रदूषण के घातक तीन किमी- लम्बे गहन आवरण के भयानक कॉकटेल ने इस क्षेत्र को आच्छादित किया हुआ है। भारत, जो पहले ही सूखे की स्थिति से जूझ रहा है, के लिए इसका निहितार्थ सर्वनाश ही है और फसल की ओर विफलता का अर्थ बहुत से भारतीयों के लिए जीवन एवं मौत के समान होगा। अपरिपक्व मौतों में वृद्धि के प्रतिकूल सामाजिक व आर्थिक प्रभाव होंगे और रुग्णता (रोगों) वृद्धि हमारी जीर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था पर असहनीय भार डालेगी। इसके लिए हम अपने सिवाय किसी अन्य को दोषारोपित नहीं कर सकते हैं। सरकारी एवं कॉर्पोरेट भारत दोनों ही स्वच्छ प्रौद्योगिकी के किसी भी जिक्र के प्रति हमेशा से एलर्जिक रहे हैं। अधिकांश यान्त्रिक दुपहिया वाहन, प्रदूषण नियन्त्रण की उचित व्यवस्था के बिना ही एसेम्बली लाईन से बन कर निकलते हैं। सरल प्रौद्योगिकियां, जो लोगों के जीवन एवं पर्यावरण में मार्मिक परिवर्तन ला सकती हैं, पर आर एवं डी के लिए कम प्रयत्न किया जाता है। तथापि, जबकि इससे कोई इंकार नहीं कि दक्षिण एशिया को अपने कृत्य को स्वच्छ करना चाहिए, शंकाशील लोग हेज रिपोर्ट के समय के बारे में प्रश्न खड़ा कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन पर क्योटो अधिवेशन के होने में सिर्फ दो हफ्रते ही रह गए हैं और विकासशील विश्व एवं पश्चिम, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच प्रायिक युद्ध के लिए स्थिति तैयार हो गई है। राष्ट्रपति बुश ने किसी भी कच्चे मसौदे (प्रोटोकल) पर हस्ताक्षर करने से दृढ़ता से इन्कार कर दिया था जबकि इसका अर्थ अमेरिका के उपभोग स्तर में परिवर्तन की शस्त्रशाला में स्थान प्राप्त कर सकेगी क्योंकि उसके संयंत्र भारत और चीन जैसे नियन्त्रणों की ओर आरोपी अंगुली उठा रहे हैं। फिर भी, यू- एस- ए- कारोबारी कोटा (नियतांश) समाप्त करने के मामले संदिग्ध भूमिका से शायद ही इन्कार कर सकेगा। धनी देश, गरीब देशों से आसानी से अत्यधिक ट्टण ले सकते हैं और प्रदूषण जारी रख सकते हैं। बजाए इसके कि विकासशील देशों का ज्यादा अच्छा करने की कोशिश करें, जिन्होंने, बेशक पश्चिम के साथ चलने की अपनी कोशिश में पर्यावरणीय संक्षिप्त उपाय किए हैं, यू- एस- ए- को अपने देश में व्याप्त पर्यावरणीय दुराचार को देखना चाहिए। तेल की खोज के लिए अछूते क्षेत्रें को खोलने से लेकर पेयजल के मानक शिथिल करने तक, बुश की नीतियां वास्तव में लाभदेय नहीं थी, अमेरिका के हितों के लिए भी नहीं। हमने समझ लिया कि इसमें हम सभी संलग्न है और किसी भी क्षेत्र में प्रदूषण हो वह वैश्विक सरोकार होना चाहिए अन्यथा गुफा के अन्त में सिर्फ ज्यादा गुफाएं ही होगी। क्योटो अधिवेशन के बिल्कुल पहले ही हेज रिपोर्ट के समय निर्धारण के पीछे क्या कारण होगा? A संयुक्त राष्ट्र यू- एस- ए- के साथ मिलकर कार्य कर रहा है B आगामी अधिवेशन के संयोजक/संचालन यू- एस- ए- को पाठ पढ़ाना चाहते हैं। C पर्यावरण अवनति के विध्वंसकारी प्रभावों की ओर विश्व का ध्यान खींचना D आगामी अधिवेशन में, यू- एस- ए- इसे विकासशील देशों के विरुद्ध अवसर के रूप में उपयोग करना चाहता है
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India is not, as you may imagine, a distant strange, at the very utmost a curious country. India for the future belongs to Europe, it has its place in the Indo-European world, it has its place in our own history and in what is the very life of history, the history of the human mind. You know how some of the best talents and the noblest genius of our age have been devoted to the study of the development of the outward or material world, the growth of the earth, the first appearance of the living cells, their combination and differentiation leading upto the beginning of organic life, and its steady progress from the lowest to the highest stages. Is there not an ‘intellectual world’ also which has to be studied in its historical development, from the first appearance of predictive and demonstrative roots, their combination and differentiation, leading upto the beginning of rational thought in its steady progress from the lowest to the highest stages? And in that study of the history of the human mind, in that study of ourselves, of our true selves, India occupies a place second to no other country. Whatever sphere of the human mind you may select for your special study, whether it be language, or religion, or mythology, or philosophy, whether it be laws or customs, primitive art or primitive science, everywhere you have to go to India, whether you like it or not, because some of the most valuable and most instructive materials in the history of man are treasured up in India, and in India only. In what field of human endeavour has India surpassed the rest of mankind? A in materialism B in industrialization C in study of the history of the human mind D in games and sports
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India is not, as you may imagine, a distant strange, at the very utmost a curious country. India for the future belongs to Europe, it has its place in the Indo-European world, it has its place in our own history and in what is the very life of history, the history of the human mind. You know how some of the best talents and the noblest genius of our age have been devoted to the study of the development of the outward or material world, the growth of the earth, the first appearance of the living cells, their combination and differentiation leading upto the beginning of organic life, and its steady progress from the lowest to the highest stages. Is there not an ‘intellectual world’ also which has to be studied in its historical development, from the first appearance of predictive and demonstrative roots, their combination and differentiation, leading upto the beginning of rational thought in its steady progress from the lowest to the highest stages? And in that study of the history of the human mind, in that study of ourselves, of our true selves, India occupies a place second to no other country. Whatever sphere of the human mind you may select for your special study, whether it be language, or religion, or mythology, or philosophy, whether it be laws or customs, primitive art or primitive science, everywhere you have to go to India, whether you like it or not, because some of the most valuable and most instructive materials in the history of man are treasured up in India, and in India only. What position does India occupy in the study of the history of the human mind. A First placeB Third place C No place at allD Second place
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India is not, as you may imagine, a distant strange, at the very utmost a curious country. India for the future belongs to Europe, it has its place in the Indo-European world, it has its place in our own history and in what is the very life of history, the history of the human mind. You know how some of the best talents and the noblest genius of our age have been devoted to the study of the development of the outward or material world, the growth of the earth, the first appearance of the living cells, their combination and differentiation leading upto the beginning of organic life, and its steady progress from the lowest to the highest stages. Is there not an ‘intellectual world’ also which has to be studied in its historical development, from the first appearance of predictive and demonstrative roots, their combination and differentiation, leading upto the beginning of rational thought in its steady progress from the lowest to the highest stages? And in that study of the history of the human mind, in that study of ourselves, of our true selves, India occupies a place second to no other country. Whatever sphere of the human mind you may select for your special study, whether it be language, or religion, or mythology, or philosophy, whether it be laws or customs, primitive art or primitive science, everywhere you have to go to India, whether you like it or not, because some of the most valuable and most instructive materials in the history of man are treasured up in India, and in India only. The historical development of intellectual world leads up to: A Spiritual illumination B The beginning of rational thought C Physical development D Deflation
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 निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आप एक जिले में जिलाधिकारी हैं। जिले में सांसद निधि के दुरूपयोग का मामला आपके संज्ञान में लाया जाता है, कि अमुक सांसद अनुदान प्राप्तकर्ताओं की मिली-भगत से इस सार्वजनिक धन का स्वहितों के लिए उपयोग कर रहे हैं। आपका कदम होगा- A एक उच्च स्तरीय समिति से मामले की जांच कराएंगे और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्यवाही करेंगे। B स्वयं शिकायतों की जांच करेंगे और जांच पूरी होने तक सांसद निधि की राशि अवमुक्त नहीं करेंगे। C मामले की स्वयं जांच करेंगे और संबंधित सांसद की शिकायत केंद्र सरकार से करेंगे। D अनुदान प्राप्तकर्ताओं को अवमुक्त राशि एवं वस्तुस्थिति का स्वयं मौके पर निरीक्षण कर उचित कार्यवाही करेंगे।
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 निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आप जिले के विकास अधिकारी हैं और कई क्षेत्रें में औचक निरीक्षण करने पर आपको पता चलता है कि, अनेक सार्वजनिक राशन की दुकानों को चलाने वाले अनाज एवं मिट्टी के तेल की कालाबाजारी कर रहे हैं और इस काम में अनेक अधिकारी/कर्मचारी भी लिप्त हैं। इस परिस्थिति में आपके द्वारा क्या कार्यवाही अपेक्षित होगी? A आप इस पूरे नेटवर्क की विस्तृत जांचकर दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाएंगे। B आप इस बारे में जिलाधिकारी को सूचित करेंगे तथा उन्हें अपेक्षित कार्यवाही के लिए लिखेंगे। C दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराएंगे तथा उनकी गिरफ्रतारी के निर्देश देंगे। D दोषी कोटेदारों के लाइसेंस निरस्त करने की कार्यवाही करेंगे और संलिप्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों के ऊपर विभागीय कार्यवाही के लिए कदम उठाएंगे।
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 निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आप एक जिले के प्रशासक हैं और जिले के सरकारी अस्पतालों का नियमित निरीक्षण करते समय आप यह खोजते हैं कि वहाँ जिले के अस्पतालों में पुरानी निष्प्रयोज्य दवाओं को ताजा दवाओं के रूप में बेचने का एक धंधा चल रहा है। आप- A इस धंधे के बारे में मुख्य चिकित्सा अधिकारी को सूचित करेंगे और उससे मामले की जाँच पड़ताल करने के लिए कहेंगे B मामले की एक जाँच बिठायेंगे, धंधे को चलाने में गुप्त रूप से मदद करने वाले संबंधित अधिकारियों पर जवाबदेही तय करने से पहले धंधे के बारे में और अधिक तथ्यों को खोजने का प्रयास करेंगे C तुरंत संबंधित स्थल पर सभी दवा नमूनों को जब्त करेंगे और इन दवाओं का व्यवहार रोकने के लिए पहले क्षेत्र के सभी अस्पतालों पर छापा मारने के लिए एक टीम का गठन करेंगे और इसके बाद संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करेंगे D मामले के बारे में अधिक सूचनाएँ प्राप्त करने के लिए मामले की विवेकानुसार जाँच आरंभ करेंगे
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 निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आपके संज्ञान में आया है कि आपके कार्यालय का एक कर्मचारी नियमित रूप से शराब पीता और अपनी पत्नी को पीटता है। उसकी पत्नी और बच्चे इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए आपके पास पहुँचते हैं। आप- A मामले को अपने हाल पर छोड़ देंगे आप इसमें उलझना नहीं चाहेंगे और यह वास्तविक रूप से अनुचित होगा कि आप एक ऐसे मामले में हस्तक्षेप करें जो कि अनिवार्य रूप से एक पारिवारिक मामला है। B अन्य कर्मचारियों को बुलायेंगे और उनसे मामले में हस्तक्षेप करने के लिए कहेंगे C उस कर्मचारी को बुलायेंगे और उसे परामर्श देंगे D कर्मचारी को परामर्श देंगे और जरूरत पड़ने पर उसके नशे की लत को छुड़ाने के लिए उसका उपचार करने का प्रबंध करेंगे।
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 निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आपकी नियुक्ति पुलिस अधीक्षक (यातायात) के रूप में एक अति विशिष्ट मंत्री के जिले में है। मंत्रीजी के एक विश्वासपात्र के सुपुत्र का उसके साथियों के साथ यातायात नियमों के गंभीर उल्लघंन के आरोप में यातायात निरीक्षक द्वारा चालान कर दिया गया है जिसके विरोध में शहर के मुख्य चौराहे पर स्थानीय नेताओं द्वारा हंगामा किया जा रहा है। सूचना मिलने पर आप------ A संबंधित यातायात निरीक्षक को फोन करके मामले को अपने स्तर पर सुलझाने का निर्देश देंगे। B मौके पर जाकर यातायात निरीक्षक को डांटेंगे तथा आरोपियों को छोड़ देने के लिए कहेंगे। C आरोपियों को बलवा करने के आरोप में गिरफ्रतार कर जेल भेजने का निर्देश देंगे। D मौके पर जाकर आरोपियों और संबंधित यातायात निरीक्षक से मामले की पूरी जानकारी लेंगे और तदनुसार नियमानुकूल उचित कार्यवाही करेंगे।
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 निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आप जिस जिले में जिलाधिकारी के रूप में तैनात हैं वहां प्रस्तावित विद्युत संयंत्र के लिए किसानों की भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। अधिक मुआवजे की मांग को लेकर वहां के किसान धरने पर बैठे हैं। आपको सूचना मिलती है कि प्रस्तावित विद्युत संयंत्र के स्थल का निरीक्षण करने गए निर्माण कंपनी के अधिकारियों को किसानों द्वारा बंधक बना लिया गया है। ऐसी स्थिति में आप---------------- A पुलिस बल के साथ वहां जाकर बल प्रयोग कर बंधकों को छुड़ाएंगे। B किसानों के नेतृत्व से वार्ता कर उनकी मांगों को शासन तक पहुंचाने का आश्वासन देंगे और बंधकों को छोड़ने के लिए कहेंगे। C धरने पर बैठे किसानों को गिरफ्रतार करने का आदेश जारी करेंगे। D मामले के राजनीतिक स्वरूप को देखते हुए राजनीतिज्ञों से मामले के समाधान का आग्रह करेंगे।
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 निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। किसी भूकम्प प्रभावित क्षेत्र में भूकम्प के बाद जीवित बचे लोगों को मूलभूत चिकित्सा सुविधाएँ प्रदान करने के लिए आपको प्रभारी अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया गया है। आपकी हर संभव कोशिशों के बावजूद, लोग आपके ऊपर यह आरोप लगा रहे हैं कि आप राहत के लिए दी गई राशि से पैसे बना रहे हैं। ऐसे में आप क्या करेंगे? A आप चाहेंगे कि इस संबंध में जाँच पड़ताल की जाए। B अपने वरिष्ठ अधिकारी से निवेदन करेंगे कि वे आपके स्थान पर किसी दूसरे व्यक्ति को नियुक्त कर दें। C इन आरोपों पर कोई ध्यान नहीं देंगे और अपना कार्य करते रहेंगे। D जब तक मामला सुलझ नहीं जाता, कार्य में आगे कोई पहल नहीं करेंगे।
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 निम्नलिख्ति प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। एक नवजात शिशु शहर के मन्दिर पर परित्यक्त पाया गया है। पुजारी ने प्रशासन को उस लड़के बारे में सूचना दी है और समाधान पूछा है। स्थानीय प्रशासक के रूप में आप- A पुजारी को स्थिति से खुद ही निबटने के लिए कहेंगे क्योंकि परित्यक्त बच्चों की देखभाल करना प्रशासन का काम नहीं है। B मामले को देखने और उपयुक्त कदम उठाने के लिए शिशु देखभाल करने वाले गैर-सरकारी संगठनों से संपर्क करेंगे। C पुजारी से उस बच्चे की देखभाल करने के लिए कहेंगे और इसी बीच बच्चे के वास्तविक माता-पिता का पता लगाने के लिए प्रशासनिक तंत्र का प्रयोग करेंगे। D बच्चे की तुरंत जरूरतों की देखभाल करेंगे और मामले को बाल देखभाल केंद्र चलाने वाली किसी प्रतिष्ठित स्वयंसेवी संस्था को सौंप देंगे ताकि बच्चे का दीर्घकालिक भविष्य सुनिश्चित किया जा सके।