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GS-II

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Practice Test-10

Question
64 out of 80
 

The following questions are based on four passages in English to test the comprehension of English language. Read each passage and answer the questions.

To a greater or less degree all the civilized communities of the modern world are made up of a small class of rulers, corrupted by too much power, and of a large class of subjects, corrupted by too much passive and irresponsible obedience. Participation in a social order of this kind makes it very difficult for individuals to achieve that non-attachment in the midst of activity, which is the distinguishing mark of the ideally excellent human being; and where there is not at least a considerable degree of non-attachment in activity, the ideal society of the prophets cannot be realized. 
A desirable social order is one that delivers us from avoidable evils. A bad social order is one that leads us into temptation which, if matters were more sensibly arranged, would never rise. Our present business is to discover what large-scale changes are best calculated to deliver us from the evils of too much power and of too much passive and irresponsible obedience. It has been shown that the economic reforms, so dear to ‘advanced thinker’s are not in themselves sufficient to produce desirable changes in the character of society and of the individuals composing it unless carried out by the right sort of means and in the right sort of governmental, administrative and educational context such reforms are their fruitless or actually fruitful of evil. In order to create the proper contexts for economic reform we must change our machinery of government, our methods of public administration, our system of education and our metaphysical and ethical beliefs.


The author does not say?



A By participating in this kind of society one cannot remain non-attached

B Subjects indulge in obedience

C Bad social order leads to temptations

D None of these

Ans. D

Practice Test-10 Flashcard List

80 flashcards
1)
निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। तेज रफ्ऱतार जिंदगी में जब संवेदना से सरोकार दूर होते जा रहे हों, तब यह पढ़ते हुए शायद ही किसी को आश्चर्य हो कि देश की जो राजधानी अपनी सौवीं वर्षगांठ मना रही है, वहां रोज सात बच्चे लापता हो जाते हैं। भयावह स्थिति यह है कि इनमे से आधे से कम ही बच्चों का पता लग पाता है। ख़बरें कहती हैं कि लापता होने वाले बच्चों का इस्तेमाल अंग प्रत्यारोपण व्यापार, देह व्यापार और बाल मजदूरी के लिए होता है। उच्चतम न्यायालय ने लापता बच्चों का पता लगाने के लिए विशेष दल का गठन करने की बात कही थी, लेकिन इस बारे में हमारी संवेदनहीन सरकार ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग चवालीस हजार बच्चे हर साल लापता हो जाते हैं और उनमें से करीब ग्यारह हजार का ही पता लग पाता है। लापता होने वाले अधिकतर बच्चे गरीब परिवार के होते हैं। ऐसे परिवार के लोग जब थाने में रिपोर्ट लिखवाने जाते हैं तो पहले उन्हें टरकाया जाता है। अगर रिपोर्ट लिख भी ली जाए तो उन्हें ढूंढ़ने में पुलिस लापरवाही बरतती है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस घृणित अपराध को रोकने के लिए कई सुझाव दिए। पर सुझाव तो सुझाव होते हैं, आदेश नहीं। जब उच्चतम न्यायालय के आदेश पर अभी तक ठोस कदम नहीं उठे, तो भला सरकार इतनी आसानी से ऐसे सुझावों को क्यों मानने लगी। उपर्युक्त लेखांश की विषय वस्तु निम्नलिखित में से किस पर केन्द्रित है? A उत्पीडि़त लोगों की मनोदशा पर B बच्चों का अवैध व्यापार C सभ्यता के विकास पर D लापता बच्चों की दशा
2)
निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। तेज रफ्ऱतार जिंदगी में जब संवेदना से सरोकार दूर होते जा रहे हों, तब यह पढ़ते हुए शायद ही किसी को आश्चर्य हो कि देश की जो राजधानी अपनी सौवीं वर्षगांठ मना रही है, वहां रोज सात बच्चे लापता हो जाते हैं। भयावह स्थिति यह है कि इनमे से आधे से कम ही बच्चों का पता लग पाता है। ख़बरें कहती हैं कि लापता होने वाले बच्चों का इस्तेमाल अंग प्रत्यारोपण व्यापार, देह व्यापार और बाल मजदूरी के लिए होता है। उच्चतम न्यायालय ने लापता बच्चों का पता लगाने के लिए विशेष दल का गठन करने की बात कही थी, लेकिन इस बारे में हमारी संवेदनहीन सरकार ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग चवालीस हजार बच्चे हर साल लापता हो जाते हैं और उनमें से करीब ग्यारह हजार का ही पता लग पाता है। लापता होने वाले अधिकतर बच्चे गरीब परिवार के होते हैं। ऐसे परिवार के लोग जब थाने में रिपोर्ट लिखवाने जाते हैं तो पहले उन्हें टरकाया जाता है। अगर रिपोर्ट लिख भी ली जाए तो उन्हें ढूंढ़ने में पुलिस लापरवाही बरतती है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस घृणित अपराध को रोकने के लिए कई सुझाव दिए। पर सुझाव तो सुझाव होते हैं, आदेश नहीं। जब उच्चतम न्यायालय के आदेश पर अभी तक ठोस कदम नहीं उठे, तो भला सरकार इतनी आसानी से ऐसे सुझावों को क्यों मानने लगी। लेखांश के संदर्भ में, निम्न कथनों पर विचार कीजिए: 1- जब गरीब बच्चे लापता होते हैं तो उनके परिवार के लोग थाने में रिपोर्ट लिखवाने का प्रयास नहीं करते। 2- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस घृणित अपराध को रोकने के लिए कई आदेश दिए हैं। उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? A केवल 1 B केवल 2 C 1 और 2 दोनों D न तो 1 और न ही 2
3)
निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। तेज रफ्ऱतार जिंदगी में जब संवेदना से सरोकार दूर होते जा रहे हों, तब यह पढ़ते हुए शायद ही किसी को आश्चर्य हो कि देश की जो राजधानी अपनी सौवीं वर्षगांठ मना रही है, वहां रोज सात बच्चे लापता हो जाते हैं। भयावह स्थिति यह है कि इनमे से आधे से कम ही बच्चों का पता लग पाता है। ख़बरें कहती हैं कि लापता होने वाले बच्चों का इस्तेमाल अंग प्रत्यारोपण व्यापार, देह व्यापार और बाल मजदूरी के लिए होता है। उच्चतम न्यायालय ने लापता बच्चों का पता लगाने के लिए विशेष दल का गठन करने की बात कही थी, लेकिन इस बारे में हमारी संवेदनहीन सरकार ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग चवालीस हजार बच्चे हर साल लापता हो जाते हैं और उनमें से करीब ग्यारह हजार का ही पता लग पाता है। लापता होने वाले अधिकतर बच्चे गरीब परिवार के होते हैं। ऐसे परिवार के लोग जब थाने में रिपोर्ट लिखवाने जाते हैं तो पहले उन्हें टरकाया जाता है। अगर रिपोर्ट लिख भी ली जाए तो उन्हें ढूंढ़ने में पुलिस लापरवाही बरतती है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस घृणित अपराध को रोकने के लिए कई सुझाव दिए। पर सुझाव तो सुझाव होते हैं, आदेश नहीं। जब उच्चतम न्यायालय के आदेश पर अभी तक ठोस कदम नहीं उठे, तो भला सरकार इतनी आसानी से ऐसे सुझावों को क्यों मानने लगी। लेखांश के संदर्भ में, निम्न में से कौन-सा कथन सत्य है? A लापता बच्चों का पता लगाने के लिए सरकार हर संभव प्रयास करती है B लापता हुए लगभग सभी बच्चों का पता लगा लिया जाता है C लापता होने वाले अधिकतर बच्चे गरीब परिवार के होते हैं इसलिए उन्हें ढूंढ़ने में फ़र्क करती है D लापता बच्चे गरीब परिवार के होने से पुलिस उन्हें ढूंढ़ने में लापरवाही बरतती है।
4)
निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। तेज रफ्ऱतार जिंदगी में जब संवेदना से सरोकार दूर होते जा रहे हों, तब यह पढ़ते हुए शायद ही किसी को आश्चर्य हो कि देश की जो राजधानी अपनी सौवीं वर्षगांठ मना रही है, वहां रोज सात बच्चे लापता हो जाते हैं। भयावह स्थिति यह है कि इनमे से आधे से कम ही बच्चों का पता लग पाता है। ख़बरें कहती हैं कि लापता होने वाले बच्चों का इस्तेमाल अंग प्रत्यारोपण व्यापार, देह व्यापार और बाल मजदूरी के लिए होता है। उच्चतम न्यायालय ने लापता बच्चों का पता लगाने के लिए विशेष दल का गठन करने की बात कही थी, लेकिन इस बारे में हमारी संवेदनहीन सरकार ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग चवालीस हजार बच्चे हर साल लापता हो जाते हैं और उनमें से करीब ग्यारह हजार का ही पता लग पाता है। लापता होने वाले अधिकतर बच्चे गरीब परिवार के होते हैं। ऐसे परिवार के लोग जब थाने में रिपोर्ट लिखवाने जाते हैं तो पहले उन्हें टरकाया जाता है। अगर रिपोर्ट लिख भी ली जाए तो उन्हें ढूंढ़ने में पुलिस लापरवाही बरतती है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस घृणित अपराध को रोकने के लिए कई सुझाव दिए। पर सुझाव तो सुझाव होते हैं, आदेश नहीं। जब उच्चतम न्यायालय के आदेश पर अभी तक ठोस कदम नहीं उठे, तो भला सरकार इतनी आसानी से ऐसे सुझावों को क्यों मानने लगी। किसके अनुसार प्रत्येक वर्ष चवालीस हजार बच्चे लापता हो जाते हैं? A राष्ट्रीय सांख्यिकीय विभाग B राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग C राष्ट्रीय मजदूर संगठन सर्वे D उपरोक्त सभी के अनुसार
5)
निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर हैरत जताई है। उसने साफ कहा है कि आयोग का यह निर्देश समझ से परे है। गरीबी रेखा की अधिकतम सीमा इस तरह कैसे तय की जा सकती हैं ? क्या किसी राज्य में युवाओं या बुजुर्गों की अधिकतम संख्या का निर्धारण हो सकता है? आयोग का काम गरीबी मिटाने का लक्ष्यबद्ध कार्यक्रम बनाना है। लेकिन ऐसा लगता है कि उसकी ज्यादा दिलचस्पी इस बात में है कि गरीबों की संख्या किस तरह कम करके दिखाई जाए। और इस चक्कर में उसने अर्थशास्त्रीय मानदंडों को ताक पर रख दिया है। हमारे नीति-नियंता और योजनाकार गरीबों की संख्या को न सिर्फ कम करके बल्कि उसे लगातार घटते हुए दिखाना चाहते हैं, ताकि प्रचलित नीतियों की सार्थकता नजर आए। वे सबसिडी का बोझ और बीपीएल परिवारों के मद्देनजर होने वाला योजनागत व्यय भी कम करना चाहते हैं। यही कारण है कि गरीबी रेखा का जो मापदंड 2004 में था वही आज भी है। जबकि इस बीच सरकारी बाबुओं की तनख्वाहों और भत्तों में कई बार बढ़ोतरी हुई है, संगठित निजी क्षेत्र की भी आय में इजाफा होता गया है। सांसदों और विधायकों के वेतन-भत्ते कई गुना बढ़े हैं। लेकिन गरीबों की बेहतरी के बारे में सोचने के बजाय आँकड़ों में उनकी संख्या जहाँ तक हो सके घटा कर दिखाने की कोशिश हो रही है, इसलिए कि अगर सच्चाई सामने आती रहेगी तो कहीं देर-सबेर नीतियों और प्राथमिकताओं में बदलाव की मांग न उठने लगे। हर साल संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट यह बता देती है कि भारत में अधिकांश आबादी कैसे बदहाली में जी रही है। दूसरे अध्ययनों से भी इसकी पुष्टि होती है। इसलिए सरकार और योजना आयोग को कृत्रिम आँकड़े गढ़ने के बजाय हकीकत स्वीकार करनी चाहिए। हमारे नीति नियंता और योजनाकार किसको कम करके दिखाना चाहते हैं? A बीपीएल परिवारों की संख्या B सरकारी बाबुओं की तनख्वाह C गरीबों की संख्या D सांसदों और विधायकों के वेतन
6)
निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर हैरत जताई है। उसने साफ कहा है कि आयोग का यह निर्देश समझ से परे है। गरीबी रेखा की अधिकतम सीमा इस तरह कैसे तय की जा सकती हैं ? क्या किसी राज्य में युवाओं या बुजुर्गों की अधिकतम संख्या का निर्धारण हो सकता है? आयोग का काम गरीबी मिटाने का लक्ष्यबद्ध कार्यक्रम बनाना है। लेकिन ऐसा लगता है कि उसकी ज्यादा दिलचस्पी इस बात में है कि गरीबों की संख्या किस तरह कम करके दिखाई जाए। और इस चक्कर में उसने अर्थशास्त्रीय मानदंडों को ताक पर रख दिया है। हमारे नीति-नियंता और योजनाकार गरीबों की संख्या को न सिर्फ कम करके बल्कि उसे लगातार घटते हुए दिखाना चाहते हैं, ताकि प्रचलित नीतियों की सार्थकता नजर आए। वे सबसिडी का बोझ और बीपीएल परिवारों के मद्देनजर होने वाला योजनागत व्यय भी कम करना चाहते हैं। यही कारण है कि गरीबी रेखा का जो मापदंड 2004 में था वही आज भी है। जबकि इस बीच सरकारी बाबुओं की तनख्वाहों और भत्तों में कई बार बढ़ोतरी हुई है, संगठित निजी क्षेत्र की भी आय में इजाफा होता गया है। सांसदों और विधायकों के वेतन-भत्ते कई गुना बढ़े हैं। लेकिन गरीबों की बेहतरी के बारे में सोचने के बजाय आँकड़ों में उनकी संख्या जहाँ तक हो सके घटा कर दिखाने की कोशिश हो रही है, इसलिए कि अगर सच्चाई सामने आती रहेगी तो कहीं देर-सबेर नीतियों और प्राथमिकताओं में बदलाव की मांग न उठने लगे। हर साल संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट यह बता देती है कि भारत में अधिकांश आबादी कैसे बदहाली में जी रही है। दूसरे अध्ययनों से भी इसकी पुष्टि होती है। इसलिए सरकार और योजना आयोग को कृत्रिम आँकड़े गढ़ने के बजाय हकीकत स्वीकार करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने किस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हैरत जताई है? A गरीबी रेखा की अधिकतम सीमा B राज्य में युवाओं या बुजुर्गों की अधिकतम संख्या। C देश के विभिन्न राज्यों के बीच अन्तर D गरीबी रेखा से नीचे की आबादी को 36 फीसदी तक सीमित करने
7)
निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर हैरत जताई है। उसने साफ कहा है कि आयोग का यह निर्देश समझ से परे है। गरीबी रेखा की अधिकतम सीमा इस तरह कैसे तय की जा सकती हैं ? क्या किसी राज्य में युवाओं या बुजुर्गों की अधिकतम संख्या का निर्धारण हो सकता है? आयोग का काम गरीबी मिटाने का लक्ष्यबद्ध कार्यक्रम बनाना है। लेकिन ऐसा लगता है कि उसकी ज्यादा दिलचस्पी इस बात में है कि गरीबों की संख्या किस तरह कम करके दिखाई जाए। और इस चक्कर में उसने अर्थशास्त्रीय मानदंडों को ताक पर रख दिया है। हमारे नीति-नियंता और योजनाकार गरीबों की संख्या को न सिर्फ कम करके बल्कि उसे लगातार घटते हुए दिखाना चाहते हैं, ताकि प्रचलित नीतियों की सार्थकता नजर आए। वे सबसिडी का बोझ और बीपीएल परिवारों के मद्देनजर होने वाला योजनागत व्यय भी कम करना चाहते हैं। यही कारण है कि गरीबी रेखा का जो मापदंड 2004 में था वही आज भी है। जबकि इस बीच सरकारी बाबुओं की तनख्वाहों और भत्तों में कई बार बढ़ोतरी हुई है, संगठित निजी क्षेत्र की भी आय में इजाफा होता गया है। सांसदों और विधायकों के वेतन-भत्ते कई गुना बढ़े हैं। लेकिन गरीबों की बेहतरी के बारे में सोचने के बजाय आँकड़ों में उनकी संख्या जहाँ तक हो सके घटा कर दिखाने की कोशिश हो रही है, इसलिए कि अगर सच्चाई सामने आती रहेगी तो कहीं देर-सबेर नीतियों और प्राथमिकताओं में बदलाव की मांग न उठने लगे। हर साल संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट यह बता देती है कि भारत में अधिकांश आबादी कैसे बदहाली में जी रही है। दूसरे अध्ययनों से भी इसकी पुष्टि होती है। इसलिए सरकार और योजना आयोग को कृत्रिम आँकड़े गढ़ने के बजाय हकीकत स्वीकार करनी चाहिए। उपर्युक्त परिच्छेद की विषय वस्तु निम्न में से किस पर केन्द्रित है? A गरीबी रेखा पर B ग्रामीण इलाकों पर C गरीबी के आकलन पर D उपरोक्त सभी पर
8)
निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर हैरत जताई है। उसने साफ कहा है कि आयोग का यह निर्देश समझ से परे है। गरीबी रेखा की अधिकतम सीमा इस तरह कैसे तय की जा सकती हैं ? क्या किसी राज्य में युवाओं या बुजुर्गों की अधिकतम संख्या का निर्धारण हो सकता है? आयोग का काम गरीबी मिटाने का लक्ष्यबद्ध कार्यक्रम बनाना है। लेकिन ऐसा लगता है कि उसकी ज्यादा दिलचस्पी इस बात में है कि गरीबों की संख्या किस तरह कम करके दिखाई जाए। और इस चक्कर में उसने अर्थशास्त्रीय मानदंडों को ताक पर रख दिया है। हमारे नीति-नियंता और योजनाकार गरीबों की संख्या को न सिर्फ कम करके बल्कि उसे लगातार घटते हुए दिखाना चाहते हैं, ताकि प्रचलित नीतियों की सार्थकता नजर आए। वे सबसिडी का बोझ और बीपीएल परिवारों के मद्देनजर होने वाला योजनागत व्यय भी कम करना चाहते हैं। यही कारण है कि गरीबी रेखा का जो मापदंड 2004 में था वही आज भी है। जबकि इस बीच सरकारी बाबुओं की तनख्वाहों और भत्तों में कई बार बढ़ोतरी हुई है, संगठित निजी क्षेत्र की भी आय में इजाफा होता गया है। सांसदों और विधायकों के वेतन-भत्ते कई गुना बढ़े हैं। लेकिन गरीबों की बेहतरी के बारे में सोचने के बजाय आँकड़ों में उनकी संख्या जहाँ तक हो सके घटा कर दिखाने की कोशिश हो रही है, इसलिए कि अगर सच्चाई सामने आती रहेगी तो कहीं देर-सबेर नीतियों और प्राथमिकताओं में बदलाव की मांग न उठने लगे। हर साल संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट यह बता देती है कि भारत में अधिकांश आबादी कैसे बदहाली में जी रही है। दूसरे अध्ययनों से भी इसकी पुष्टि होती है। इसलिए सरकार और योजना आयोग को कृत्रिम आँकड़े गढ़ने के बजाय हकीकत स्वीकार करनी चाहिए। किन क्षेत्रें के वेतन में इजाफा किया गया है? 1- सरकारी क्षेत्र 2- संगठित निजी क्षेत्र 3- सांसदों और विधायकों के वेतन 4- कृषि क्षेत्र दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए: A 1, 2, 4 B 1, 2, 3 C 2, 3, 4 D सभी
9)
(i) A, B, C, D, E, F एक समूह के छः सदस्य हैं। जिसमें से तीन पुरूष और तीन स्त्रियाँ हैं। (ii) इनमें से दो इंजीनियर, दो वकील, एक अधयापक, एक डॉक्टर है। (iii) B, E, A और C दो विवाहित युगल हैं और इनमें से कोई भी व्यक्ति एक से व्यवसाय में नहीं है। (iv) E जो कि नीले परिधान वाली अध्यपिका है, एक कत्थई परिधान वाले पुरूष वकील के साथ विवाहित है। (v) दोनों पत्नियों के परिधानों का रंग एक सा है और दोनों पतियों के परिधानों का रंग भी एकसा ही है। (vi) दो व्यक्तियों के परिधान नीले हैं, दो के परिधान कत्थई हैं, जबकि शेष में से एक काले और एक हरे रंग के परिधान वाला है। (vii) A एक पुरूष इंजीनियर है और उसकी बहन D भी एक इंजीनियर है। (viii) B एक डॉक्टर है। 'F' के परिधान का क्या रंग है? A काला B हरा C काला या हरा D जानकारी अधूरी है
10)
(i) A, B, C, D, E, F एक समूह के छः सदस्य हैं। जिसमें से तीन पुरूष और तीन स्त्रियाँ हैं। (ii) इनमें से दो इंजीनियर, दो वकील, एक अधयापक, एक डॉक्टर है। (iii) B, E, A और C दो विवाहित युगल हैं और इनमें से कोई भी व्यक्ति एक से व्यवसाय में नहीं है। (iv) E जो कि नीले परिधान वाली अध्यपिका है, एक कत्थई परिधान वाले पुरूष वकील के साथ विवाहित है। (v) दोनों पत्नियों के परिधानों का रंग एक सा है और दोनों पतियों के परिधानों का रंग भी एकसा ही है। (vi) दो व्यक्तियों के परिधान नीले हैं, दो के परिधान कत्थई हैं, जबकि शेष में से एक काले और एक हरे रंग के परिधान वाला है। (vii) A एक पुरूष इंजीनियर है और उसकी बहन D भी एक इंजीनियर है। (viii) B एक डॉक्टर है। निम्नलिखित में से कौन सा विवाहित स्त्रियों का जोड़ा है? A E, D B A, C C B, E D जानकारी अधूरी है
11)
(i) A, B, C, D, E, F एक समूह के छः सदस्य हैं। जिसमें से तीन पुरूष और तीन स्त्रियाँ हैं। (ii) इनमें से दो इंजीनियर, दो वकील, एक अधयापक, एक डॉक्टर है। (iii) B, E, A और C दो विवाहित युगल हैं और इनमें से कोई भी व्यक्ति एक से व्यवसाय में नहीं है। (iv) E जो कि नीले परिधान वाली अध्यपिका है, एक कत्थई परिधान वाले पुरूष वकील के साथ विवाहित है। (v) दोनों पत्नियों के परिधानों का रंग एक सा है और दोनों पतियों के परिधानों का रंग भी एकसा ही है। (vi) दो व्यक्तियों के परिधान नीले हैं, दो के परिधान कत्थई हैं, जबकि शेष में से एक काले और एक हरे रंग के परिधान वाला है। (vii) A एक पुरूष इंजीनियर है और उसकी बहन D भी एक इंजीनियर है। (viii) B एक डॉक्टर है। नीचे दिए गए में से कौन सा स्त्रियों का समूह है? A BEF B FDE C BDE D BDC
12)
(i) A, B, C, D, E, F एक समूह के छः सदस्य हैं। जिसमें से तीन पुरूष और तीन स्त्रियाँ हैं। (ii) इनमें से दो इंजीनियर, दो वकील, एक अधयापक, एक डॉक्टर है। (iii) B, E, A और C दो विवाहित युगल हैं और इनमें से कोई भी व्यक्ति एक से व्यवसाय में नहीं है। (iv) E जो कि नीले परिधान वाली अध्यपिका है, एक कत्थई परिधान वाले पुरूष वकील के साथ विवाहित है। (v) दोनों पत्नियों के परिधानों का रंग एक सा है और दोनों पतियों के परिधानों का रंग भी एकसा ही है। (vi) दो व्यक्तियों के परिधान नीले हैं, दो के परिधान कत्थई हैं, जबकि शेष में से एक काले और एक हरे रंग के परिधान वाला है। (vii) A एक पुरूष इंजीनियर है और उसकी बहन D भी एक इंजीनियर है। (viii) B एक डॉक्टर है। A की पत्नी कौन है? A B B E C C D D
13)
14)
15)
16)
17)
18)
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20)
21)
22)
23)
24)
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आने वाले समय में विज्ञान के विकास से जनसंहार के अस्त्रें की उपलब्धि इतनी सहज हो जाएगी कि कोई भी असंतुष्ट ग्रुप बड़ी घटना को अंजाम दे सकता है। ऐसे में सवाल केवल एक या दो देशों का नहीं है। किसी एक देश में होने वाली हिसात्मक गतिविधियों का विश्वव्यापी प्रभाव पड़ सकता है। 9/11 की घटना इस बात का स्पष्ट संकेत है इसलिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इन देशों के बारे में सचेत रहने की आवश्यकता है। समस्या यह है कि औद्योगिक क्रांति के बाद की उत्पादन व्यवस्था और उससे जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था पूरी तरह से संकट में है। पूंजीवाद अपने कैंसर स्वरूप में है और द्रुतगति से व्यापक स्तर पर मनुष्य के अस्तित्व के लिए खतरे के रूप में सामने आ रहा है। पूंजीवादी व्यक्तिगत संपत्ति की व्यवस्था ने प्रारंभिक दौर में भले ही उत्पादन में भारी बढ़ोतरी की हो, अब मनुष्य के लिए संकट का कारण हो गई है। प्रजातंत्र का  प्रतिनिधित्ववादी मॉडल भी संकट में है। प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाएँ जनहित के बदले पूंजी के हित में निर्णय लेने लगी हैं। इन संस्थाओं से लोगों का विश्वास ही उठता जा रहा है। सबसे बुरी स्थिति राजनीतिक दलों की हुई है। ब्रिटेन जैसे देश में भी राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक मतभेद खत्म से हो गए हैं और कई मसलों पर वे एक जैसे जन-विरोधी विचार रखते हैं। सरकार का नेतृत्व बदलने से नीतियों में कोई खास परिवर्तन नहीं होता। लेबर और कंजरवेटिव दलों के बीच अंतर समाप्त हो जाने से समस्याओं के राजनीतिक  समाधान पर लोगों का विश्वास डिगता जा रहा है। पूंजीवाद की इस अवस्था में राजनीतिक पार्टियों के पास विकल्पहीनता का नारा है जिसका सहारा लेकर वे जन-विरोधी नीतियों को लागू करती हैं और इस प्रक्रिया में नेतृत्व पूंजी के साथ मिल कर व्यक्तिगत लाभ कमाता है। भारत में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। जो आक्रोश लंदन, फ्रांस, इजराइल या अरब देशों में है भारत में भी कुछ वैसा ही पल-बढ़ रहा है। यहाँ भी साधनहीन युवा वर्ग असंतोष और हताशा के दौर से गुजर रहा हे। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हिसात्मक न हो लेकिन समाज में व्याप्त हिंसा को भारत के राजनीतिज्ञ भी सामान्य अपराध की तरह ही समझने की भूल कर रहे हैं। वे जनता के असंतोष को नियम-कानून की भाषा से दूर करने की कोशिश करते हैं। प्रधानमंत्री जन-आंदोलन को अनैतिक बताने की भी भूल करते हैं। दुनिया भर में वर्तमान व्यवस्था प्रहरियों को ऐसी गलतियां करते देखा जा सकता है। लेकिन उससे खतरनाक बात यह है कि नेतृत्व ने एक तरफ तो जनता की विश्वसनीयता खो दी है, दूसरी तरफ वे घोर दंभी और अक्खड़ हो गए हैं राजदर्प ने उन्हें दीवारों की लिखावट और जनता के बीच की फुसफुसाहट को समझने की क्षमता से वंचित कर दिया है। लेखक की भाषा शैली कैसी है? A वर्णनात्मक B व्याख्यात्मक C विश्लेषणात्मक D वैज्ञानिक
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आने वाले समय में विज्ञान के विकास से जनसंहार के अस्त्रें की उपलब्धि इतनी सहज हो जाएगी कि कोई भी असंतुष्ट ग्रुप बड़ी घटना को अंजाम दे सकता है। ऐसे में सवाल केवल एक या दो देशों का नहीं है। किसी एक देश में होने वाली हिसात्मक गतिविधियों का विश्वव्यापी प्रभाव पड़ सकता है। 9/11 की घटना इस बात का स्पष्ट संकेत है इसलिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इन देशों के बारे में सचेत रहने की आवश्यकता है। समस्या यह है कि औद्योगिक क्रांति के बाद की उत्पादन व्यवस्था और उससे जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था पूरी तरह से संकट में है। पूंजीवाद अपने कैंसर स्वरूप में है और द्रुतगति से व्यापक स्तर पर मनुष्य के अस्तित्व के लिए खतरे के रूप में सामने आ रहा है। पूंजीवादी व्यक्तिगत संपत्ति की व्यवस्था ने प्रारंभिक दौर में भले ही उत्पादन में भारी बढ़ोतरी की हो, अब मनुष्य के लिए संकट का कारण हो गई है। प्रजातंत्र का  प्रतिनिधित्ववादी मॉडल भी संकट में है। प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाएँ जनहित के बदले पूंजी के हित में निर्णय लेने लगी हैं। इन संस्थाओं से लोगों का विश्वास ही उठता जा रहा है। सबसे बुरी स्थिति राजनीतिक दलों की हुई है। ब्रिटेन जैसे देश में भी राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक मतभेद खत्म से हो गए हैं और कई मसलों पर वे एक जैसे जन-विरोधी विचार रखते हैं। सरकार का नेतृत्व बदलने से नीतियों में कोई खास परिवर्तन नहीं होता। लेबर और कंजरवेटिव दलों के बीच अंतर समाप्त हो जाने से समस्याओं के राजनीतिक  समाधान पर लोगों का विश्वास डिगता जा रहा है। पूंजीवाद की इस अवस्था में राजनीतिक पार्टियों के पास विकल्पहीनता का नारा है जिसका सहारा लेकर वे जन-विरोधी नीतियों को लागू करती हैं और इस प्रक्रिया में नेतृत्व पूंजी के साथ मिल कर व्यक्तिगत लाभ कमाता है। भारत में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। जो आक्रोश लंदन, फ्रांस, इजराइल या अरब देशों में है भारत में भी कुछ वैसा ही पल-बढ़ रहा है। यहाँ भी साधनहीन युवा वर्ग असंतोष और हताशा के दौर से गुजर रहा हे। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हिसात्मक न हो लेकिन समाज में व्याप्त हिंसा को भारत के राजनीतिज्ञ भी सामान्य अपराध की तरह ही समझने की भूल कर रहे हैं। वे जनता के असंतोष को नियम-कानून की भाषा से दूर करने की कोशिश करते हैं। प्रधानमंत्री जन-आंदोलन को अनैतिक बताने की भी भूल करते हैं। दुनिया भर में वर्तमान व्यवस्था प्रहरियों को ऐसी गलतियां करते देखा जा सकता है। लेकिन उससे खतरनाक बात यह है कि नेतृत्व ने एक तरफ तो जनता की विश्वसनीयता खो दी है, दूसरी तरफ वे घोर दंभी और अक्खड़ हो गए हैं राजदर्प ने उन्हें दीवारों की लिखावट और जनता के बीच की फुसफुसाहट को समझने की क्षमता से वंचित कर दिया है। लेखांश का उपयुक्त शीर्षक है - A भविष्य में आंदोलन B आंदोलन का बदलता स्वरूप C सरकार की नीति का पुनर्मूल्यांकन D a और b दोनों
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आने वाले समय में विज्ञान के विकास से जनसंहार के अस्त्रें की उपलब्धि इतनी सहज हो जाएगी कि कोई भी असंतुष्ट ग्रुप बड़ी घटना को अंजाम दे सकता है। ऐसे में सवाल केवल एक या दो देशों का नहीं है। किसी एक देश में होने वाली हिसात्मक गतिविधियों का विश्वव्यापी प्रभाव पड़ सकता है। 9/11 की घटना इस बात का स्पष्ट संकेत है इसलिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इन देशों के बारे में सचेत रहने की आवश्यकता है। समस्या यह है कि औद्योगिक क्रांति के बाद की उत्पादन व्यवस्था और उससे जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था पूरी तरह से संकट में है। पूंजीवाद अपने कैंसर स्वरूप में है और द्रुतगति से व्यापक स्तर पर मनुष्य के अस्तित्व के लिए खतरे के रूप में सामने आ रहा है। पूंजीवादी व्यक्तिगत संपत्ति की व्यवस्था ने प्रारंभिक दौर में भले ही उत्पादन में भारी बढ़ोतरी की हो, अब मनुष्य के लिए संकट का कारण हो गई है। प्रजातंत्र का  प्रतिनिधित्ववादी मॉडल भी संकट में है। प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाएँ जनहित के बदले पूंजी के हित में निर्णय लेने लगी हैं। इन संस्थाओं से लोगों का विश्वास ही उठता जा रहा है। सबसे बुरी स्थिति राजनीतिक दलों की हुई है। ब्रिटेन जैसे देश में भी राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक मतभेद खत्म से हो गए हैं और कई मसलों पर वे एक जैसे जन-विरोधी विचार रखते हैं। सरकार का नेतृत्व बदलने से नीतियों में कोई खास परिवर्तन नहीं होता। लेबर और कंजरवेटिव दलों के बीच अंतर समाप्त हो जाने से समस्याओं के राजनीतिक  समाधान पर लोगों का विश्वास डिगता जा रहा है। पूंजीवाद की इस अवस्था में राजनीतिक पार्टियों के पास विकल्पहीनता का नारा है जिसका सहारा लेकर वे जन-विरोधी नीतियों को लागू करती हैं और इस प्रक्रिया में नेतृत्व पूंजी के साथ मिल कर व्यक्तिगत लाभ कमाता है। भारत में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। जो आक्रोश लंदन, फ्रांस, इजराइल या अरब देशों में है भारत में भी कुछ वैसा ही पल-बढ़ रहा है। यहाँ भी साधनहीन युवा वर्ग असंतोष और हताशा के दौर से गुजर रहा हे। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हिसात्मक न हो लेकिन समाज में व्याप्त हिंसा को भारत के राजनीतिज्ञ भी सामान्य अपराध की तरह ही समझने की भूल कर रहे हैं। वे जनता के असंतोष को नियम-कानून की भाषा से दूर करने की कोशिश करते हैं। प्रधानमंत्री जन-आंदोलन को अनैतिक बताने की भी भूल करते हैं। दुनिया भर में वर्तमान व्यवस्था प्रहरियों को ऐसी गलतियां करते देखा जा सकता है। लेकिन उससे खतरनाक बात यह है कि नेतृत्व ने एक तरफ तो जनता की विश्वसनीयता खो दी है, दूसरी तरफ वे घोर दंभी और अक्खड़ हो गए हैं राजदर्प ने उन्हें दीवारों की लिखावट और जनता के बीच की फुसफुसाहट को समझने की क्षमता से वंचित कर दिया है। किस क्रांति के बाद राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह से संकट में है? A औद्योगिक क्रांति B पूंजीवाद C प्रजातांत्रिक व्यवस्था D भ्रष्टाचार के विरूद्ध स्वर
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। आने वाले समय में विज्ञान के विकास से जनसंहार के अस्त्रें की उपलब्धि इतनी सहज हो जाएगी कि कोई भी असंतुष्ट ग्रुप बड़ी घटना को अंजाम दे सकता है। ऐसे में सवाल केवल एक या दो देशों का नहीं है। किसी एक देश में होने वाली हिसात्मक गतिविधियों का विश्वव्यापी प्रभाव पड़ सकता है। 9/11 की घटना इस बात का स्पष्ट संकेत है इसलिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इन देशों के बारे में सचेत रहने की आवश्यकता है। समस्या यह है कि औद्योगिक क्रांति के बाद की उत्पादन व्यवस्था और उससे जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था पूरी तरह से संकट में है। पूंजीवाद अपने कैंसर स्वरूप में है और द्रुतगति से व्यापक स्तर पर मनुष्य के अस्तित्व के लिए खतरे के रूप में सामने आ रहा है। पूंजीवादी व्यक्तिगत संपत्ति की व्यवस्था ने प्रारंभिक दौर में भले ही उत्पादन में भारी बढ़ोतरी की हो, अब मनुष्य के लिए संकट का कारण हो गई है। प्रजातंत्र का  प्रतिनिधित्ववादी मॉडल भी संकट में है। प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाएँ जनहित के बदले पूंजी के हित में निर्णय लेने लगी हैं। इन संस्थाओं से लोगों का विश्वास ही उठता जा रहा है। सबसे बुरी स्थिति राजनीतिक दलों की हुई है। ब्रिटेन जैसे देश में भी राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक मतभेद खत्म से हो गए हैं और कई मसलों पर वे एक जैसे जन-विरोधी विचार रखते हैं। सरकार का नेतृत्व बदलने से नीतियों में कोई खास परिवर्तन नहीं होता। लेबर और कंजरवेटिव दलों के बीच अंतर समाप्त हो जाने से समस्याओं के राजनीतिक  समाधान पर लोगों का विश्वास डिगता जा रहा है। पूंजीवाद की इस अवस्था में राजनीतिक पार्टियों के पास विकल्पहीनता का नारा है जिसका सहारा लेकर वे जन-विरोधी नीतियों को लागू करती हैं और इस प्रक्रिया में नेतृत्व पूंजी के साथ मिल कर व्यक्तिगत लाभ कमाता है। भारत में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। जो आक्रोश लंदन, फ्रांस, इजराइल या अरब देशों में है भारत में भी कुछ वैसा ही पल-बढ़ रहा है। यहाँ भी साधनहीन युवा वर्ग असंतोष और हताशा के दौर से गुजर रहा हे। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हिसात्मक न हो लेकिन समाज में व्याप्त हिंसा को भारत के राजनीतिज्ञ भी सामान्य अपराध की तरह ही समझने की भूल कर रहे हैं। वे जनता के असंतोष को नियम-कानून की भाषा से दूर करने की कोशिश करते हैं। प्रधानमंत्री जन-आंदोलन को अनैतिक बताने की भी भूल करते हैं। दुनिया भर में वर्तमान व्यवस्था प्रहरियों को ऐसी गलतियां करते देखा जा सकता है। लेकिन उससे खतरनाक बात यह है कि नेतृत्व ने एक तरफ तो जनता की विश्वसनीयता खो दी है, दूसरी तरफ वे घोर दंभी और अक्खड़ हो गए हैं राजदर्प ने उन्हें दीवारों की लिखावट और जनता के बीच की फुसफुसाहट को समझने की क्षमता से वंचित कर दिया है। आंदोलन में हिस्सा लेने वाले हैं - A आर्थिक रूप से मजबूत B साधनविहीन वर्ग C उपरोक्त दोनों D कोई भी नहीं
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। समस्त राजनैतिक प्रणालियों को वैयक्तिक सम्पत्ति और जनता की शक्ति के बीच के सम्बन्धों में मध्यस्थता करने की आवश्यकता होती है। जो इसमें असफल होते हैं उनकी सरकार पर धनी वर्ग के हितों के दबाव में आकर ठीक से काम न कर पाने का खतरा बना रहता है। भ्रष्टाचार इस असफलता का एक लक्षण है जिसमें व्यक्ति पैसे देने (रिश्वत) को तैयार रहता है और इससे सार्वजनिक हित का लक्ष्य पूरा नहीं होता। प्राइवेट व्यक्ति और वाणिज्य प्रतिष्ठान अपना दैनंदिन काम निकालने के लिए नौकरशाही के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को पैसा देते हैं। वे अपने टैक्स कम करने के लिए सख्त कानूनों से बचाने के लिए रिश्वत देते हैं और ऊँची दरों पर ठेके प्राप्त करते हैं तथा प्राइवेट प्रतिष्ठानों को कम कीमत पर रियायतें प्राप्त करवाते हैं। यदि भ्रष्टाचार एक बीमारी बन चुका है तो नौकरशाह और जनप्रतिनिधि दोनों मिलकर जनता के हित की योजनाओं को व्यक्तिगत लाभ के लिए बदल सकते हैं, जिसमें जनता का हित कम और व्यक्तिगत लाभ के अवसर अधिक होते हैं। वास्तव में रिश्वत, कमीशन और बड़े सौदों में हिस्सा सरकार की असफलता का एक प्रकार है। अच्छे अभिशासन के लिए प्रयास, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से अधिक व्यापक होना चाहिए। सरकारें ईमानदार किन्तु अकुशल हो सकती हैं जिसके कारण कर्मचारियों को उनकी उत्पादकता के कार्य के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता और राज्य के छोटे अधिकारियों द्वारा नीति को बहुत प्रभावित किया जाता है। रिश्वत सुस्त, कामचोर को कठिन मेहनत करने को प्रेरित कर सकती है और जो भीतरी चौकड़ी में शामिल नहीं हैं उन्हें पैसे का लाभ प्राप्त करने का अवसर देती हैं फिर भी इन मामलों में भी भ्रष्टाचार केवल इन ‘काम के’ (Functional) क्षेत्रें तक सीमित नहीं किया जा सकता। जब भी वैयक्तिक लाभ सकारात्मक माना जाएगा, तो वहाँ प्रलोभन अवश्य रहेगा,यह कठोर वास्तविकता की तर्कसंगत अनुक्रिया (Response) है लेकिन कालांतर में यह विकराल रूप धारण करेगी। सार्वजनिक/व्यक्तिगत कर्मचारियों के लिए उत्पादकता से प्रोत्साहन को जोड़ा जाना निम्नलिखित का संकेतक है- A कार्यकुशल सरकार B बुरा अभिशासन C अकुशल सरकार D भ्रष्टाचार
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। समस्त राजनैतिक प्रणालियों को वैयक्तिक सम्पत्ति और जनता की शक्ति के बीच के सम्बन्धों में मध्यस्थता करने की आवश्यकता होती है। जो इसमें असफल होते हैं उनकी सरकार पर धनी वर्ग के हितों के दबाव में आकर ठीक से काम न कर पाने का खतरा बना रहता है। भ्रष्टाचार इस असफलता का एक लक्षण है जिसमें व्यक्ति पैसे देने (रिश्वत) को तैयार रहता है और इससे सार्वजनिक हित का लक्ष्य पूरा नहीं होता। प्राइवेट व्यक्ति और वाणिज्य प्रतिष्ठान अपना दैनंदिन काम निकालने के लिए नौकरशाही के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को पैसा देते हैं। वे अपने टैक्स कम करने के लिए सख्त कानूनों से बचाने के लिए रिश्वत देते हैं और ऊँची दरों पर ठेके प्राप्त करते हैं तथा प्राइवेट प्रतिष्ठानों को कम कीमत पर रियायतें प्राप्त करवाते हैं। यदि भ्रष्टाचार एक बीमारी बन चुका है तो नौकरशाह और जनप्रतिनिधि दोनों मिलकर जनता के हित की योजनाओं को व्यक्तिगत लाभ के लिए बदल सकते हैं, जिसमें जनता का हित कम और व्यक्तिगत लाभ के अवसर अधिक होते हैं। वास्तव में रिश्वत, कमीशन और बड़े सौदों में हिस्सा सरकार की असफलता का एक प्रकार है। अच्छे अभिशासन के लिए प्रयास, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से अधिक व्यापक होना चाहिए। सरकारें ईमानदार किन्तु अकुशल हो सकती हैं जिसके कारण कर्मचारियों को उनकी उत्पादकता के कार्य के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता और राज्य के छोटे अधिकारियों द्वारा नीति को बहुत प्रभावित किया जाता है। रिश्वत सुस्त, कामचोर को कठिन मेहनत करने को प्रेरित कर सकती है और जो भीतरी चौकड़ी में शामिल नहीं हैं उन्हें पैसे का लाभ प्राप्त करने का अवसर देती हैं फिर भी इन मामलों में भी भ्रष्टाचार केवल इन ‘काम के’ (Functional) क्षेत्रें तक सीमित नहीं किया जा सकता। जब भी वैयक्तिक लाभ सकारात्मक माना जाएगा, तो वहाँ प्रलोभन अवश्य रहेगा,यह कठोर वास्तविकता की तर्कसंगत अनुक्रिया (Response) है लेकिन कालांतर में यह विकराल रूप धारण करेगी। जो सरकारें व्यक्तिगत सम्पति और सार्वजनिक शक्ति के भेद के ऊपर ध्यान केन्द्रित करने में असफल होती हैं, उनके निम्नलिखित बनने की सम्भावना होती है- A प्रक्रियात्मक B अप्रक्रियात्मक C सामान्य प्रक्रियात्मक D अच्छा अभिशासन
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। समस्त राजनैतिक प्रणालियों को वैयक्तिक सम्पत्ति और जनता की शक्ति के बीच के सम्बन्धों में मध्यस्थता करने की आवश्यकता होती है। जो इसमें असफल होते हैं उनकी सरकार पर धनी वर्ग के हितों के दबाव में आकर ठीक से काम न कर पाने का खतरा बना रहता है। भ्रष्टाचार इस असफलता का एक लक्षण है जिसमें व्यक्ति पैसे देने (रिश्वत) को तैयार रहता है और इससे सार्वजनिक हित का लक्ष्य पूरा नहीं होता। प्राइवेट व्यक्ति और वाणिज्य प्रतिष्ठान अपना दैनंदिन काम निकालने के लिए नौकरशाही के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को पैसा देते हैं। वे अपने टैक्स कम करने के लिए सख्त कानूनों से बचाने के लिए रिश्वत देते हैं और ऊँची दरों पर ठेके प्राप्त करते हैं तथा प्राइवेट प्रतिष्ठानों को कम कीमत पर रियायतें प्राप्त करवाते हैं। यदि भ्रष्टाचार एक बीमारी बन चुका है तो नौकरशाह और जनप्रतिनिधि दोनों मिलकर जनता के हित की योजनाओं को व्यक्तिगत लाभ के लिए बदल सकते हैं, जिसमें जनता का हित कम और व्यक्तिगत लाभ के अवसर अधिक होते हैं। वास्तव में रिश्वत, कमीशन और बड़े सौदों में हिस्सा सरकार की असफलता का एक प्रकार है। अच्छे अभिशासन के लिए प्रयास, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से अधिक व्यापक होना चाहिए। सरकारें ईमानदार किन्तु अकुशल हो सकती हैं जिसके कारण कर्मचारियों को उनकी उत्पादकता के कार्य के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता और राज्य के छोटे अधिकारियों द्वारा नीति को बहुत प्रभावित किया जाता है। रिश्वत सुस्त, कामचोर को कठिन मेहनत करने को प्रेरित कर सकती है और जो भीतरी चौकड़ी में शामिल नहीं हैं उन्हें पैसे का लाभ प्राप्त करने का अवसर देती हैं फिर भी इन मामलों में भी भ्रष्टाचार केवल इन ‘काम के’ (Functional) क्षेत्रें तक सीमित नहीं किया जा सकता। जब भी वैयक्तिक लाभ सकारात्मक माना जाएगा, तो वहाँ प्रलोभन अवश्य रहेगा,यह कठोर वास्तविकता की तर्कसंगत अनुक्रिया (Response) है लेकिन कालांतर में यह विकराल रूप धारण करेगी। बुरे अभिशासन का एक महत्वपूर्ण लक्षण है- A भ्रष्टाचार B उच्चतम कर C पेचीदे अधिनियम और विनियम D मंहगाई
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। समस्त राजनैतिक प्रणालियों को वैयक्तिक सम्पत्ति और जनता की शक्ति के बीच के सम्बन्धों में मध्यस्थता करने की आवश्यकता होती है। जो इसमें असफल होते हैं उनकी सरकार पर धनी वर्ग के हितों के दबाव में आकर ठीक से काम न कर पाने का खतरा बना रहता है। भ्रष्टाचार इस असफलता का एक लक्षण है जिसमें व्यक्ति पैसे देने (रिश्वत) को तैयार रहता है और इससे सार्वजनिक हित का लक्ष्य पूरा नहीं होता। प्राइवेट व्यक्ति और वाणिज्य प्रतिष्ठान अपना दैनंदिन काम निकालने के लिए नौकरशाही के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को पैसा देते हैं। वे अपने टैक्स कम करने के लिए सख्त कानूनों से बचाने के लिए रिश्वत देते हैं और ऊँची दरों पर ठेके प्राप्त करते हैं तथा प्राइवेट प्रतिष्ठानों को कम कीमत पर रियायतें प्राप्त करवाते हैं। यदि भ्रष्टाचार एक बीमारी बन चुका है तो नौकरशाह और जनप्रतिनिधि दोनों मिलकर जनता के हित की योजनाओं को व्यक्तिगत लाभ के लिए बदल सकते हैं, जिसमें जनता का हित कम और व्यक्तिगत लाभ के अवसर अधिक होते हैं। वास्तव में रिश्वत, कमीशन और बड़े सौदों में हिस्सा सरकार की असफलता का एक प्रकार है। अच्छे अभिशासन के लिए प्रयास, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से अधिक व्यापक होना चाहिए। सरकारें ईमानदार किन्तु अकुशल हो सकती हैं जिसके कारण कर्मचारियों को उनकी उत्पादकता के कार्य के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता और राज्य के छोटे अधिकारियों द्वारा नीति को बहुत प्रभावित किया जाता है। रिश्वत सुस्त, कामचोर को कठिन मेहनत करने को प्रेरित कर सकती है और जो भीतरी चौकड़ी में शामिल नहीं हैं उन्हें पैसे का लाभ प्राप्त करने का अवसर देती हैं फिर भी इन मामलों में भी भ्रष्टाचार केवल इन ‘काम के’ (Functional) क्षेत्रें तक सीमित नहीं किया जा सकता। जब भी वैयक्तिक लाभ सकारात्मक माना जाएगा, तो वहाँ प्रलोभन अवश्य रहेगा,यह कठोर वास्तविकता की तर्कसंगत अनुक्रिया (Response) है लेकिन कालांतर में यह विकराल रूप धारण करेगी। बढ़ते हुए भ्रष्टाचार को रोकने का उपाय है- A व्यक्तिगत मुनाफा B भ्रष्टाचार विरोधी अभियान C अच्छा अभिशासन D कमीशन और हिस्सा देना
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हमारे पूरे देश में कई ऐसी दवाएं खुले आम बिकती हैं, जोकि कानूनन प्रतिबंधित हैं। यही नहीं, हमारे यहां कई ऐसी दवाओं पर अभी प्रतिबंध लगाया ही नहीं गया है, जो कई विकसित देशों में पूरी तरह प्रतिबंधित हैं। डाक्टर के पर्चे के बगैर दवाएं बेचना तो यहां आम है ही, दवाओं की दुकानदारी के मामले में भी कई तरह की गड़बड़ियां हैं। दवा की अधिकतर दुकानें वास्तव में उन नियमों पर खरी नहीं उतरतीं, जिनका अनुपालन उनके मामले में हर हाल में होना ही चाहिए। आमतौर पर सिर्फ खानापूर्ती की जाती है। इसका पता इस बात से भी चलता है कि जाने कितने दिनों से यह काला कारोबार चल रहा है। जाहिर है, जिम्मेदार लोगों ने कभी इस संबंध में जांच-पड़ताल की जरूरत ही नहीं समझी कि विभाग ने कंपनियों को जिस काम के लिए लाइसेंस दिया है, वे वही काम कर रही हैं या कुछ और। कई काम संबंधित अधिकारियों और तथाकथित कारोबारियों की आपसी समझ से होता है। यह एक दुखद सत्य है कि आपसी समझ की हमारे देश में कोई सीमा नहीं है। यह कहीं से शुरू होकर कहीं तक जा सकती है और यहां तक कि बहुत बड़ी आबादी के लिए जानलेवा भी साबित हो सकती है। नशीली दवाओं का यह काला कारोबार पूरे भारत की साख खराब करने वाला है। यह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में हमारी बदनामी का कारण है और इसका खामियाजा हमारे देश के वाजिब उद्योगपतियों व व्यापारियों को भुगतना पड़ा है। क्योंकि जब कुछ टुच्चे लोगों के चलते किसी देश की साख खराब हो जाती है तो उसके सही लोगों के लिए अपने बनाए हुए सामान का निर्यात करना मुश्किल हो जाता है। सच तो यह है कि सिर्फ नशे के कारोबार जोकि भारत व दूसरे देशों के युवाओं को बर्बाद ही नहीं, करते बल्कि इस भारतीय अर्थव्यवस्था के खिलाफ एक गहरी साजिश के तौर पर देखा जाना चाहिए। इन काले कारनामों के शिकार सबसे अधिक हमारे सीमावर्ती प्रदेश ही हो रहे हैं। पड़ोसी देश पाकिस्तान से नशीले पदार्थों की खेप जम्मू-कश्मीर और पंजाब के रास्ते भारत आने का खुलासा पहले ही हो चुका है। नकली नोटों के कारोबार का मामला भी इससे बहुत भिन्न नहीं है। देश के विभिन्न हिस्सों में फैले भिन्न-भिन्न तरह के आतंकवाद को भी इससे अलग करके देखना ठीक नहीं होगा। मामले का ठीक तरह से पर्दाफाश हो सके, इसके लिए जरूरी है कि इन सभी चीजों को जोड़कर एक साथ देखा जाए। देश की सभी सतर्कता एजेंसियों का समन्वय कर इसके लिए एक नेटवर्क बनाया जाना चाहिए ताकि पूरे भारत की सघन जांच कर इसकी तह तक पहुंचा जाए और वास्तविक जिम्मेदारों को सलाखों के पीछे पहुंचा कर देश में शांति स्थापित की जा सके। प्रस्तुत लेखांश के आधार पर उपयुक्त शीर्षक का नाम दीजिए: A दवाएँ: काला कारोबार B दवाएँ: जानलेवा C प्रतिबंधित दवाएँ व कारोबार D नशीली दवाएँ: भारत की साख
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हमारे पूरे देश में कई ऐसी दवाएं खुले आम बिकती हैं, जोकि कानूनन प्रतिबंधित हैं। यही नहीं, हमारे यहां कई ऐसी दवाओं पर अभी प्रतिबंध लगाया ही नहीं गया है, जो कई विकसित देशों में पूरी तरह प्रतिबंधित हैं। डाक्टर के पर्चे के बगैर दवाएं बेचना तो यहां आम है ही, दवाओं की दुकानदारी के मामले में भी कई तरह की गड़बड़ियां हैं। दवा की अधिकतर दुकानें वास्तव में उन नियमों पर खरी नहीं उतरतीं, जिनका अनुपालन उनके मामले में हर हाल में होना ही चाहिए। आमतौर पर सिर्फ खानापूर्ती की जाती है। इसका पता इस बात से भी चलता है कि जाने कितने दिनों से यह काला कारोबार चल रहा है। जाहिर है, जिम्मेदार लोगों ने कभी इस संबंध में जांच-पड़ताल की जरूरत ही नहीं समझी कि विभाग ने कंपनियों को जिस काम के लिए लाइसेंस दिया है, वे वही काम कर रही हैं या कुछ और। कई काम संबंधित अधिकारियों और तथाकथित कारोबारियों की आपसी समझ से होता है। यह एक दुखद सत्य है कि आपसी समझ की हमारे देश में कोई सीमा नहीं है। यह कहीं से शुरू होकर कहीं तक जा सकती है और यहां तक कि बहुत बड़ी आबादी के लिए जानलेवा भी साबित हो सकती है। नशीली दवाओं का यह काला कारोबार पूरे भारत की साख खराब करने वाला है। यह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में हमारी बदनामी का कारण है और इसका खामियाजा हमारे देश के वाजिब उद्योगपतियों व व्यापारियों को भुगतना पड़ा है। क्योंकि जब कुछ टुच्चे लोगों के चलते किसी देश की साख खराब हो जाती है तो उसके सही लोगों के लिए अपने बनाए हुए सामान का निर्यात करना मुश्किल हो जाता है। सच तो यह है कि सिर्फ नशे के कारोबार जोकि भारत व दूसरे देशों के युवाओं को बर्बाद ही नहीं, करते बल्कि इस भारतीय अर्थव्यवस्था के खिलाफ एक गहरी साजिश के तौर पर देखा जाना चाहिए। इन काले कारनामों के शिकार सबसे अधिक हमारे सीमावर्ती प्रदेश ही हो रहे हैं। पड़ोसी देश पाकिस्तान से नशीले पदार्थों की खेप जम्मू-कश्मीर और पंजाब के रास्ते भारत आने का खुलासा पहले ही हो चुका है। नकली नोटों के कारोबार का मामला भी इससे बहुत भिन्न नहीं है। देश के विभिन्न हिस्सों में फैले भिन्न-भिन्न तरह के आतंकवाद को भी इससे अलग करके देखना ठीक नहीं होगा। मामले का ठीक तरह से पर्दाफाश हो सके, इसके लिए जरूरी है कि इन सभी चीजों को जोड़कर एक साथ देखा जाए। देश की सभी सतर्कता एजेंसियों का समन्वय कर इसके लिए एक नेटवर्क बनाया जाना चाहिए ताकि पूरे भारत की सघन जांच कर इसकी तह तक पहुंचा जाए और वास्तविक जिम्मेदारों को सलाखों के पीछे पहुंचा कर देश में शांति स्थापित की जा सके। कथन (A): नशीली दवाओं का काला कारोबार भारत की साख खराब करने वाला है। कारण (R): भारतीय अर्थव्यवस्था के खिलाफ एक गहरी साजिश है। निम्नांकित कूटों की सहायता से सही उत्तर का चयन कीजिए: A (A) तथा (R) दोनों सही हैं। B (A) तथा (R) दोनों सही हैं एवं एक-दूसरे की सही व्याख्या करते हैं। C (A) सही है जबकि (R) गलत है, D (A) तथा (R) सही है लेकिन एक-दूसरे की सही व्याख्या नहीं करते हैं।
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हमारे पूरे देश में कई ऐसी दवाएं खुले आम बिकती हैं, जोकि कानूनन प्रतिबंधित हैं। यही नहीं, हमारे यहां कई ऐसी दवाओं पर अभी प्रतिबंध लगाया ही नहीं गया है, जो कई विकसित देशों में पूरी तरह प्रतिबंधित हैं। डाक्टर के पर्चे के बगैर दवाएं बेचना तो यहां आम है ही, दवाओं की दुकानदारी के मामले में भी कई तरह की गड़बड़ियां हैं। दवा की अधिकतर दुकानें वास्तव में उन नियमों पर खरी नहीं उतरतीं, जिनका अनुपालन उनके मामले में हर हाल में होना ही चाहिए। आमतौर पर सिर्फ खानापूर्ती की जाती है। इसका पता इस बात से भी चलता है कि जाने कितने दिनों से यह काला कारोबार चल रहा है। जाहिर है, जिम्मेदार लोगों ने कभी इस संबंध में जांच-पड़ताल की जरूरत ही नहीं समझी कि विभाग ने कंपनियों को जिस काम के लिए लाइसेंस दिया है, वे वही काम कर रही हैं या कुछ और। कई काम संबंधित अधिकारियों और तथाकथित कारोबारियों की आपसी समझ से होता है। यह एक दुखद सत्य है कि आपसी समझ की हमारे देश में कोई सीमा नहीं है। यह कहीं से शुरू होकर कहीं तक जा सकती है और यहां तक कि बहुत बड़ी आबादी के लिए जानलेवा भी साबित हो सकती है। नशीली दवाओं का यह काला कारोबार पूरे भारत की साख खराब करने वाला है। यह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में हमारी बदनामी का कारण है और इसका खामियाजा हमारे देश के वाजिब उद्योगपतियों व व्यापारियों को भुगतना पड़ा है। क्योंकि जब कुछ टुच्चे लोगों के चलते किसी देश की साख खराब हो जाती है तो उसके सही लोगों के लिए अपने बनाए हुए सामान का निर्यात करना मुश्किल हो जाता है। सच तो यह है कि सिर्फ नशे के कारोबार जोकि भारत व दूसरे देशों के युवाओं को बर्बाद ही नहीं, करते बल्कि इस भारतीय अर्थव्यवस्था के खिलाफ एक गहरी साजिश के तौर पर देखा जाना चाहिए। इन काले कारनामों के शिकार सबसे अधिक हमारे सीमावर्ती प्रदेश ही हो रहे हैं। पड़ोसी देश पाकिस्तान से नशीले पदार्थों की खेप जम्मू-कश्मीर और पंजाब के रास्ते भारत आने का खुलासा पहले ही हो चुका है। नकली नोटों के कारोबार का मामला भी इससे बहुत भिन्न नहीं है। देश के विभिन्न हिस्सों में फैले भिन्न-भिन्न तरह के आतंकवाद को भी इससे अलग करके देखना ठीक नहीं होगा। मामले का ठीक तरह से पर्दाफाश हो सके, इसके लिए जरूरी है कि इन सभी चीजों को जोड़कर एक साथ देखा जाए। देश की सभी सतर्कता एजेंसियों का समन्वय कर इसके लिए एक नेटवर्क बनाया जाना चाहिए ताकि पूरे भारत की सघन जांच कर इसकी तह तक पहुंचा जाए और वास्तविक जिम्मेदारों को सलाखों के पीछे पहुंचा कर देश में शांति स्थापित की जा सके। नशे के कारोबारी न सिप़्फ़र् युवा वर्ग बल्कि भारत के निम्नलिखित पहलुओं को भी बर्बाद करना चाहते हैं। A समाज B अंतर्राष्ट्रीय सम्मान C अर्थव्यवस्था D विदेश नीति
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 ‘मुस्लिम आरक्षण’ वोट बैंकवादी राजनीति का हथियार है। यहां मूलभूत प्रश्न है कि क्या ऐसा आरक्षण सांप्रदायिक राजनीति की अंतिम इच्छा है। इसके बाद गरीबी, सामाजिक और आर्थिक न्याय के प्रश्नों पर सांप्रदायिक उन्मादी राजनीति नहीं होगी। डॉ- अंबेडकर ने लिखा था, ‘1938 में जिन्ना ने 14 मांगें रखी। यह नई सूची देखकर भी नहीं कहा जा सकता कि उनकी मांगों का अंत क्या होगा ? एक साल के भीतर ही 1939 में उन्होंने हर चीज में 50 फीसदी हिस्सा फिर से मांगा।’ मुस्लिम लीग अंग्रेजों से जितना मांगती थी वे उससे ज्यादा देते थे। आधुनिक सांप्रदायिक राजनीति भी अंग्रेजी रास्ते पर है। मुसलमान बुनियादी सुविधाएं मांगते हैं, सरकार मदरसा अनुदान देती है। वे रोजगार और मूलभूत अवसर मांगते हैं, लेकिन सरकार राष्ट्रतोड़क सांप्रदायिक हिंसा विधेयक लाती है। वे भारत का विकास चाहते हैं, भाईचारे के साथ मिलकर रहना चाहते हैं, सरकार उन्हें अलगाववादी आरक्षण देने को तैयार है। वोट बैंकवादी दल उनकी तरफ से नई मांगें रखते हैं, फिर इन्हीं मांगों की पूर्ति के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। मुसलमान उनके लिए वोट बैंक हैं। चुनाव में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री हैं। उनका वोट इस तरह के अलगाववादी टोटकों से ही लिया जाता है। देश की सबसे बड़ी समस्या यहां की ‘सांप्रदायिक वोट बैंक राजनीति’ है। दुनिया के किसी भी देश की राजनीति सांप्रदायिक अलगाववाद नहीं बढ़ाती। भारत की राजनीति ही क्षेत्रवाद, अलगाववाद और सांप्रदायिकता की पोषक है। देश के हरेक गरीब, पिछड़े, अनुसूचित को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय दीजिए। मुसलमान इसी देश के अभिन्न परिजन हैं, उन्हें अलग ‘विशेष राजनीतिक प्राणि समूह’ न मानिए। उन्हें अलग से चिह्नित करना उनका और राष्ट्र का अपमान है। संविधान की उद्देश्यिका में हरेक व्यक्ति के लिए ‘आर्थिक सामाजिक व राजनीतिक न्याय’ की प्रतिभूति है। भारतीय राष्ट्र पंथनिरपेक्ष है। उपर्युक्त/उपरोक्त लेखांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए एवं लेखांश के आधारपर निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर दीजिएः प्रस्तुत लेखांश को मनन करते हुए उपयुक्त शीर्षक का अवलोकन कीजिए A मुस्लिम आरक्षण B मुसलमान: सांप्रदायिक राजनीति C अलगाववाद और साम्प्रदायिकता D मुसलमान: वोट बैंक
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 ‘मुस्लिम आरक्षण’ वोट बैंकवादी राजनीति का हथियार है। यहां मूलभूत प्रश्न है कि क्या ऐसा आरक्षण सांप्रदायिक राजनीति की अंतिम इच्छा है। इसके बाद गरीबी, सामाजिक और आर्थिक न्याय के प्रश्नों पर सांप्रदायिक उन्मादी राजनीति नहीं होगी। डॉ- अंबेडकर ने लिखा था, ‘1938 में जिन्ना ने 14 मांगें रखी। यह नई सूची देखकर भी नहीं कहा जा सकता कि उनकी मांगों का अंत क्या होगा ? एक साल के भीतर ही 1939 में उन्होंने हर चीज में 50 फीसदी हिस्सा फिर से मांगा।’ मुस्लिम लीग अंग्रेजों से जितना मांगती थी वे उससे ज्यादा देते थे। आधुनिक सांप्रदायिक राजनीति भी अंग्रेजी रास्ते पर है। मुसलमान बुनियादी सुविधाएं मांगते हैं, सरकार मदरसा अनुदान देती है। वे रोजगार और मूलभूत अवसर मांगते हैं, लेकिन सरकार राष्ट्रतोड़क सांप्रदायिक हिंसा विधेयक लाती है। वे भारत का विकास चाहते हैं, भाईचारे के साथ मिलकर रहना चाहते हैं, सरकार उन्हें अलगाववादी आरक्षण देने को तैयार है। वोट बैंकवादी दल उनकी तरफ से नई मांगें रखते हैं, फिर इन्हीं मांगों की पूर्ति के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। मुसलमान उनके लिए वोट बैंक हैं। चुनाव में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री हैं। उनका वोट इस तरह के अलगाववादी टोटकों से ही लिया जाता है। देश की सबसे बड़ी समस्या यहां की ‘सांप्रदायिक वोट बैंक राजनीति’ है। दुनिया के किसी भी देश की राजनीति सांप्रदायिक अलगाववाद नहीं बढ़ाती। भारत की राजनीति ही क्षेत्रवाद, अलगाववाद और सांप्रदायिकता की पोषक है। देश के हरेक गरीब, पिछड़े, अनुसूचित को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय दीजिए। मुसलमान इसी देश के अभिन्न परिजन हैं, उन्हें अलग ‘विशेष राजनीतिक प्राणि समूह’ न मानिए। उन्हें अलग से चिह्नित करना उनका और राष्ट्र का अपमान है। संविधान की उद्देश्यिका में हरेक व्यक्ति के लिए ‘आर्थिक सामाजिक व राजनीतिक न्याय’ की प्रतिभूति है। भारतीय राष्ट्र पंथनिरपेक्ष है। उपर्युक्त/उपरोक्त लेखांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए एवं लेखांश के आधारपर निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर दीजिएः भारत की उद्देशिका में राष्ट्र को क्या कहा गया है? A आर्यावर्त B धर्मनिरपेक्ष C प्रस्तावना D पंथनिरपेक्ष
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 ‘मुस्लिम आरक्षण’ वोट बैंकवादी राजनीति का हथियार है। यहां मूलभूत प्रश्न है कि क्या ऐसा आरक्षण सांप्रदायिक राजनीति की अंतिम इच्छा है। इसके बाद गरीबी, सामाजिक और आर्थिक न्याय के प्रश्नों पर सांप्रदायिक उन्मादी राजनीति नहीं होगी। डॉ- अंबेडकर ने लिखा था, ‘1938 में जिन्ना ने 14 मांगें रखी। यह नई सूची देखकर भी नहीं कहा जा सकता कि उनकी मांगों का अंत क्या होगा ? एक साल के भीतर ही 1939 में उन्होंने हर चीज में 50 फीसदी हिस्सा फिर से मांगा।’ मुस्लिम लीग अंग्रेजों से जितना मांगती थी वे उससे ज्यादा देते थे। आधुनिक सांप्रदायिक राजनीति भी अंग्रेजी रास्ते पर है। मुसलमान बुनियादी सुविधाएं मांगते हैं, सरकार मदरसा अनुदान देती है। वे रोजगार और मूलभूत अवसर मांगते हैं, लेकिन सरकार राष्ट्रतोड़क सांप्रदायिक हिंसा विधेयक लाती है। वे भारत का विकास चाहते हैं, भाईचारे के साथ मिलकर रहना चाहते हैं, सरकार उन्हें अलगाववादी आरक्षण देने को तैयार है। वोट बैंकवादी दल उनकी तरफ से नई मांगें रखते हैं, फिर इन्हीं मांगों की पूर्ति के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। मुसलमान उनके लिए वोट बैंक हैं। चुनाव में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री हैं। उनका वोट इस तरह के अलगाववादी टोटकों से ही लिया जाता है। देश की सबसे बड़ी समस्या यहां की ‘सांप्रदायिक वोट बैंक राजनीति’ है। दुनिया के किसी भी देश की राजनीति सांप्रदायिक अलगाववाद नहीं बढ़ाती। भारत की राजनीति ही क्षेत्रवाद, अलगाववाद और सांप्रदायिकता की पोषक है। देश के हरेक गरीब, पिछड़े, अनुसूचित को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय दीजिए। मुसलमान इसी देश के अभिन्न परिजन हैं, उन्हें अलग ‘विशेष राजनीतिक प्राणि समूह’ न मानिए। उन्हें अलग से चिह्नित करना उनका और राष्ट्र का अपमान है। संविधान की उद्देश्यिका में हरेक व्यक्ति के लिए ‘आर्थिक सामाजिक व राजनीतिक न्याय’ की प्रतिभूति है। भारतीय राष्ट्र पंथनिरपेक्ष है। उपर्युक्त/उपरोक्त लेखांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए एवं लेखांश के आधारपर निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर दीजिएः प्रस्तुत लेखांश भारत के किस पहलू को रेखांकित करता है ? A साम्प्रदायिक राजनीति को B मुस्लिमों के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक आदि पहलुओं को C राजनीति के विकृत रूप को D मुस्लिम अलगाववाद को
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 ‘मुस्लिम आरक्षण’ वोट बैंकवादी राजनीति का हथियार है। यहां मूलभूत प्रश्न है कि क्या ऐसा आरक्षण सांप्रदायिक राजनीति की अंतिम इच्छा है। इसके बाद गरीबी, सामाजिक और आर्थिक न्याय के प्रश्नों पर सांप्रदायिक उन्मादी राजनीति नहीं होगी। डॉ- अंबेडकर ने लिखा था, ‘1938 में जिन्ना ने 14 मांगें रखी। यह नई सूची देखकर भी नहीं कहा जा सकता कि उनकी मांगों का अंत क्या होगा ? एक साल के भीतर ही 1939 में उन्होंने हर चीज में 50 फीसदी हिस्सा फिर से मांगा।’ मुस्लिम लीग अंग्रेजों से जितना मांगती थी वे उससे ज्यादा देते थे। आधुनिक सांप्रदायिक राजनीति भी अंग्रेजी रास्ते पर है। मुसलमान बुनियादी सुविधाएं मांगते हैं, सरकार मदरसा अनुदान देती है। वे रोजगार और मूलभूत अवसर मांगते हैं, लेकिन सरकार राष्ट्रतोड़क सांप्रदायिक हिंसा विधेयक लाती है। वे भारत का विकास चाहते हैं, भाईचारे के साथ मिलकर रहना चाहते हैं, सरकार उन्हें अलगाववादी आरक्षण देने को तैयार है। वोट बैंकवादी दल उनकी तरफ से नई मांगें रखते हैं, फिर इन्हीं मांगों की पूर्ति के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। मुसलमान उनके लिए वोट बैंक हैं। चुनाव में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री हैं। उनका वोट इस तरह के अलगाववादी टोटकों से ही लिया जाता है। देश की सबसे बड़ी समस्या यहां की ‘सांप्रदायिक वोट बैंक राजनीति’ है। दुनिया के किसी भी देश की राजनीति सांप्रदायिक अलगाववाद नहीं बढ़ाती। भारत की राजनीति ही क्षेत्रवाद, अलगाववाद और सांप्रदायिकता की पोषक है। देश के हरेक गरीब, पिछड़े, अनुसूचित को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय दीजिए। मुसलमान इसी देश के अभिन्न परिजन हैं, उन्हें अलग ‘विशेष राजनीतिक प्राणि समूह’ न मानिए। उन्हें अलग से चिह्नित करना उनका और राष्ट्र का अपमान है। संविधान की उद्देश्यिका में हरेक व्यक्ति के लिए ‘आर्थिक सामाजिक व राजनीतिक न्याय’ की प्रतिभूति है। भारतीय राष्ट्र पंथनिरपेक्ष है। उपर्युक्त/उपरोक्त लेखांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए एवं लेखांश के आधारपर निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर दीजिएः ‘‘विशेष राजनीतिक प्राणी समूह’’ किसके लिए प्रयुक्त किया गया है? A मुस्लिम B अनुसूचित जनजाति C पिछड़े गरीब वर्ग को D उपरोक्त सभी
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The following questions are based on four passages in English to test the comprehension of English language. Read each passage and answer the questions. To a greater or less degree all the civilized communities of the modern world are made up of a small class of rulers, corrupted by too much power, and of a large class of subjects, corrupted by too much passive and irresponsible obedience. Participation in a social order of this kind makes it very difficult for individuals to achieve that non-attachment in the midst of activity, which is the distinguishing mark of the ideally excellent human being; and where there is not at least a considerable degree of non-attachment in activity, the ideal society of the prophets cannot be realized.  A desirable social order is one that delivers us from avoidable evils. A bad social order is one that leads us into temptation which, if matters were more sensibly arranged, would never rise. Our present business is to discover what large-scale changes are best calculated to deliver us from the evils of too much power and of too much passive and irresponsible obedience. It has been shown that the economic reforms, so dear to ‘advanced thinker’s are not in themselves sufficient to produce desirable changes in the character of society and of the individuals composing it unless carried out by the right sort of means and in the right sort of governmental, administrative and educational context such reforms are their fruitless or actually fruitful of evil. In order to create the proper contexts for economic reform we must change our machinery of government, our methods of public administration, our system of education and our metaphysical and ethical beliefs. What is the inference that author derives? A Changes in the character of society are necessary B Ideal society is envisaged by prophets C It is the marks of ideally excellent human beings D None of these
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The following questions are based on four passages in English to test the comprehension of English language. Read each passage and answer the questions. To a greater or less degree all the civilized communities of the modern world are made up of a small class of rulers, corrupted by too much power, and of a large class of subjects, corrupted by too much passive and irresponsible obedience. Participation in a social order of this kind makes it very difficult for individuals to achieve that non-attachment in the midst of activity, which is the distinguishing mark of the ideally excellent human being; and where there is not at least a considerable degree of non-attachment in activity, the ideal society of the prophets cannot be realized.  A desirable social order is one that delivers us from avoidable evils. A bad social order is one that leads us into temptation which, if matters were more sensibly arranged, would never rise. Our present business is to discover what large-scale changes are best calculated to deliver us from the evils of too much power and of too much passive and irresponsible obedience. It has been shown that the economic reforms, so dear to ‘advanced thinker’s are not in themselves sufficient to produce desirable changes in the character of society and of the individuals composing it unless carried out by the right sort of means and in the right sort of governmental, administrative and educational context such reforms are their fruitless or actually fruitful of evil. In order to create the proper contexts for economic reform we must change our machinery of government, our methods of public administration, our system of education and our metaphysical and ethical beliefs. The author does not say? A By participating in this kind of society one cannot remain non-attached B Subjects indulge in obedience C Bad social order leads to temptations D None of these
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निम्नलिखित प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। रेलगाड़ी में बिना टिकट यात्र करने वालों की एक नियमित चेकिंग के दौरान आपको एक ऐसा व्यक्ति मिला है जो एसी थर्ड की टिकट लेकर एसी फर्स्ट के डिब्बे में यात्र कर रहा है। वह आरोप लगाता है कि उसने टिकट कलेक्टर को पैसे दिये थे लेकिन बदले में टिकट प्राप्त नहीं की थी। क्योंकि टिकट कलेक्टर ने कहा था कि वह उसे सुबह टिकट देगा। टिकट कलेक्टर उस व्यक्ति को झूठा बताता है और उससे धन लेने की बात को नकार देता है। आप- A बिना टिकट यात्र करने वाले व्यक्ति को अर्थदंडित करेंगे। B दावे की सत्यता को परखने के लिए अन्य यात्रियों से बात करेंगे। C बिना टिकट यात्र करने वाले व्यक्ति को अर्थदंडित करेंगे और साथ ही टिकट कलेक्टर को भ्रष्टाचार की जाँच को लम्बित करने की कर्तव्य अवहेलना के लिए अर्थदंडित करेंगे। D बिना टिकट वाले व्यक्ति को अर्थदंडित करेंगे और साथ ही टिकट कलेक्टर को निलम्बित करेंगे।
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निम्नलिखित प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आपके ध्यान में यह बात आई है कि आपके एक जूनियर अफसर ने, कार्यालय में अनापत्ति के लिए आई परियोजना को अनापत्ति देने के लिए रिश्वत माँगी है। इस मामले में आप क्या कार्रवाई करेंगे? A उस अफसर का पिछला रिकॉर्ड देखेंगे और उसकी ईमानदारी के स्तरों को देखते हुए निर्णय करेंगे B संबंधित भ्रष्टाचार-निरोध ब्यूरो को सूचित करेंगे C अपने वरिष्ठों को मामला बता कर उसकी सलाह माँगेंगे D चुप रहेंगे और अपनी ईमानदारी बनाए रखेंगे। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करेंगे कि संबंधित अधिकारी सभी भावी मामलों से अलग रहे
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निम्नलिखित प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आप स्थानीय जिला मजिस्ट्रेट (कलेक्टर) के तौर पर मराठवाड़ा के क्षेत्रें में सूखा राहत कार्यों के प्रभारी हैं। अपने सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद भी आप पर दी गई निधि में से धन कमाने के आरोप लगे हैं। ऐसे में आप- A प्रेस सम्मेलन बुला कर अपना बचाव करेंगे तथा बताएंगे कि किस प्रकार निहित स्वार्थ आपके पीछे पड़े हैं और अपने आर्थिक लाभ के लिए यह सब कर रहे हैं क्योंकि आपकी त्वरित कार्रवाई ने उनकी कमाई को खत्म कर दिया है। B लम्बी छुट्टी पर चले जाएंगे और अपना कार्यभार किसी और को दे देंगे। C अपने वरिष्ठों से आपको बचाने के लिए कहेंगे। D आप इस मामले में आपके खिलाफ की जाने वाली इन्क्वायरी के लिए स्वयं को स्वेच्छा से प्रस्तुत कर देंगे-इन्क्वायरी से सत्य को बाहर आने देंगे।
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निम्नलिखित प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। एक चोर को आपके अधिकारियों द्वारा रंगे-हाथों पकड़ा गया है और उन्होंने सार्वजनिक स्थल पर उसकी पिटाई की है। दुर्भाग्य से इस घटना की फुटेज मीडिया चैनलों के पास पहुँच जाती है और राष्ट्रीय इलैक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा इस सार्वजनिक पिटाई का प्रसारण किया गया है जिसके कारण मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का व्यापक विरोध शुरू हो गया है। एक विस्तृत जाँच के बाद आप यह जानकारी पाते हैं कि संबंधित चोर एक सिलसिलेवार अपराधी है और वह कई बार जेल की सजा काटने के बाद भी नहीं सुधरा है। ऊपर से आपके विभाग पर यह दबाव बनाया जा रहा है कि आप वीडियो में दिखाये गये अधिकारियों को निलम्बित करें। स्थिति से आप कैसे निपटेंगे? A ऊपर से आने वाले दबावों को मानते हुए संबंधित अधिकारियों को निलंबित कर देंगे। B अपने अधिकारियों का बचाव करेंगे और उनके कृत्य को अपराधी की पृष्ठभूमि के संदर्भ में न्याय प्रमाणित करेंगे। C संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध एक जाँच समिति का गठन करके मामले के ठंडा होने का इंतजार करेंगे। आप यह नहीं मानते हैं कि उन अधिकारियों ने कोई गलत कार्य किया है। इसलिए आप उन्हें बुद्धिमानीपूर्वक बचाना चाहेंगे। D संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध एक जाँच समिति का गठन करके मामले के ठंडा होने का इंतजार करेंगे। इसी बीच संबंधित अधिकारियों को अपने पास बुलायेंगे और उन्हें एक कड़ा संदेश देंगे कि इस प्रकार का व्यवहार भविष्य में सहन नहीं किया जायेगा।
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निम्नलिखित प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। स्थानीय संसद सदस्य के विरुद्ध एक संयुक्त भ्रष्टाचार अन्वेषण पर आपके साथ आपके ही दर्जे का अधिकारी साथ है। अन्वेषण के दौरान आप देखते हैं कि आपके साथ का अधिकारी जांच कार्य में शॉटर््-कट्स ले रहा है और आपका विचार है कि इससे जांच की क्वालिटी प्रभावित हो रही है। आपकी सर्वोत्तम कार्रवाई होगी- A अपने साथी अधिकारी की कार्य पद्धति की कमियों (दोषों) की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को देंगे और जो कुछ कमियां आपने देखी हैं, उनको विस्तार से बताते हुए ई-मेल भेजेंगे। B अपने अधिकारी को सही तौर पर कार्रवाई करने के लिए समझाएंगे और उसे आधी-अधूरी जांच के विपरीत प्रभाव बताएंगे। C अपने साथी अधिकारी के काम की ढील को यह सुनिश्चित कर पूरा करेंगे कि जांच करते समय कोई पद्धति छूट न गई हो तथा उन्हें फिर से कर सर्वोच्च क्वालिटी के मानक सुनिश्चित करेंगे। D अपने देखे को अनदेखा कर अपने हिस्से का काम करेंगे-भई, अब अपने साथी के मामले में टांग अड़ाना जरूरी तो नहीं है।
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निम्नलिखित प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। मान लीजिए आपका स्थानान्तरण एसीपी के रूप में एक ऐसे शहर में किया गया है, जहाँ अपराध का ग्राफ काफी ऊँचा है। छोटी-मोटी चोरियाँ, छीना-झपटी और अपहरण जैसी वारदातों ने आम लोगों का जीना मुहाल कर रखा है और प्रशासनिक कानून व्यवस्था से उनका भरोसा उठ चुका है। ऐसी स्थिति में लोगों के विश्वास को जीतने और अपराध पर अंकुश लगाने की दिशा में आप सबसे पहला कदम क्या उठाएँगे? A सभी अपराधियों को पकड़कर जेल में बंद कर देंगे। B अपने अधीनस्थों को अब तक बरती गई लापरवाही के लिए कड़ी डाँट लगाएँगे। C अपने विभाग में एक शिकायत पेटी लगावाएँगे और साथ ही सभी लोगों को स्वयं से मिलकर अपनी बात कहने का मौका प्रदान करेगें। D पूरे शहर में यह घोषणा करवाएँगे कि लोग अपनी सुरक्षा के प्रति विशेष रूप से जागरूक रहें।
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निम्नलिखित प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। आप किसी जिले के एसपी हैं। आपको एक बड़े एवं प्रभावी नेता के विरुद्ध भ्रष्टाचार एवं घोटाले की जाँच की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उक्त नेता की पहुँच काफी ऊपर तक है और अपनी पहुँच के बल पर वह आपको स्थानांतरित या निलम्बित भी करा सकता है। ऐसे में आप क्या करेंगे? A कोई व्यक्तिगत समस्या का बहाना बनाकर उक्त मामले की जाँच की जिम्मेदारी लेने से इंकार कर देंगे। B जिम्मेदारी ले तो लेंगे लेकिन जाँच के दौरान ऐसे तथ्य प्रस्तुत करेंगे जो उन्हें निर्दोष ठहराते हों। C परिणाम की परवाह न करते हुए पूरी निष्ठा से अपनी जिम्मेदारी को निभाएँगे। D अपने मन की शंका को अपने वरिष्ठ अधिकारी को बताएँगे और उनसे इस विषय में सलाह माँगेंगे।
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निम्नलिखित प्रश्नों में एक स्थिति का वर्णन है, जिसके पश्चात् उसके चार संभव उत्तर दिए गए हैं। जिस उत्तर को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं, उसे अपने उत्तर के रूप में इंगित कीजिए। एक गाँव के लोगों द्वारा एक राजमार्ग को बाधित कर दिया गया है क्योंकि वहाँ एक ग्रामीण बुजुर्ग की दुर्घटना में मौत हो चुकी है। आप एक स्थानीय प्रशासक के रूप में A मामले में हस्तक्षेप करेंगे और स्थानीय लोगों को शांत करने के साथ-साथ पुलिस और प्रशासन के अन्य प्रकोष्ठों जैसे प्रशासनिक कुमुक को बुलाकर निष्क्रिय रूप में तैयार रखेंगे ताकि स्थिति बिगड़ने पर उसे नियंत्रित किया जा सके। B मामले में हस्तक्षेप करेंगे और स्थानीय लोगों को इस बात का आश्वासन देंगे कि मश्तक के परिवार को सभी संभव आर्थिक सहायता दी जायेगी तथा लोगों से कानून को अपने हाथों में लेने से रोकने को कहेंगे C मामले के ठंडा होने तक इंतजार करेंगे क्योंकि इस प्रकार के मामलों के हल होने का खुद का एक तरीका होता है D घटनास्थल पर पुलिस बलों को बुलायेंगे और उसके बाद स्थानीय लोगों के साथ मामले पर विचार करेंगे