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GS-II

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Practice Test-5

Question
12 out of 80
 

 (i) S, T, U, V, W, X, Y और Z एक वर्गाकार मेज के चारों ओर बैठे हैं। वे हर ओर से दो-दो करके बैठे हैं।

(ii) तीन महिलाए हैं और वे एक-दूसरे के पास नहीं बैठी हैं।

(iii) 'X', 'Z' और P के बीच बैठा है।

(iv) 'V', 'Z' और 'Y' के बीच बैठी है।

(v) 'V' एक महिला है, जो X के बाईं ओर दूसरी है।

(vi) 'P' जोकि पुरूष सदस्य है, S के सामने बैठा है, जोकि महिला सदस्या है।

(vii) P और W के बीच एक महिला बैठी है।


Y और P के मधय कितने लोग हैं?



A एक

B दो

C तीन

D इनमें से कोई नहीं

Ans. C

Practice Test-5 Flashcard List

80 flashcards
1)
निम्नलिखित परिच्छेद को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। समावेशी संवृद्धि की प्राप्ति के लिए राज्य की भूमिका पर पुनर्विचार की गंभीर आवश्यकता है। सरकार के आकार के विषय में अर्थशास्त्रियों के बीच हुई आरंभिक बहस भ्रामक हो सकती है। समय की आवश्यकता है कि एक सामर्थ्यकारी सरकार हो। राज्य सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके, यह भारत राष्ट्र के विशाल और जटिल स्वरूप को देखते हुए आसान नहीं है। सरकार सभी अनिवार्य वस्तुओं का उत्पादन करे, सभी आवश्यक नौकरियों का सृजन करे और सभी वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखे, ऐसी अपेक्षा विशाल बोझिल नौकरशाही और व्यापक भ्रष्टाचार की ओर ले जाएगी। लक्ष्य यह होना चाहिए कि राष्ट्र के संस्थापकों ने जिस समावेशी संवृद्धि का उद्देश्य रखा था, हम उसके साथ बने रहें और साथ ही इसके प्रति एक अपेक्षाकृत अधिक आधुनिक दृष्टिकोण अपनाएँ कि राज्य यथार्थतः क्या प्रदान कर सकता है। यही एक सामर्थ्यकारी राज्य के विचार की ओर ले जाता है, अर्थात् एक ऐसी सरकार जो नागरिकों को उनकी आवश्यकता की हर चीज की प्रत्यक्षतः पूर्ति कराने का प्रयास नहीं करती। बल्कि, (1) वह बाजार के लिए एक सामर्थ्यकारी लोकाचार का सृजन करता है ताकि व्यष्टिक उद्यम फल-फूल सके और नागरिक, अधिकांश भाग के लिए एक-दूसरे की आवश्यकताओं के लिए प्रावधान कर सके और (2) वह ऐसे लोगों की मदद के लिए आगे आती है जो स्वयं अपनी बेहतरी नहीं कर पाते क्योंकि कैसी भी व्यवस्था क्यों न हो, कुछ लोग हमेशा ऐसे होते हैं जिन्हें सहारे और मदद की आवश्यकता होती है। अतः हमें एक ऐसी सरकार की जरूरत है जो बाजार के मामले में प्रभावी, प्रोत्साहन-अनुकूल नियम स्थापित करे और न्यूनतम हस्तक्षेप करती हुई हाशिए पर बनी रहे, और साथ ही साथ, निर्धनों को शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएँ तथा पर्याप्त पोषण और आहार की उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए उनकी प्रत्यक्ष सहायता करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएँ। लेखांश के अनुसार - 1- समावेशी संवृद्धि का उद्देश्य राष्ट्र के संस्थापकों द्वारा रखा गया था। 2- समय की आवश्यकता है कि एक सामर्थ्यकारी सरकार हो। 3- सरकार को बाजार की प्रक्रियाओं में अधिकतम हस्तक्षेप रखना चाहिए। 4- आवश्यकता है कि सरकार के आकार में परिवर्तन हो। उपर्युक्त में से कौन-कौन से कथन सही हैं? A केवल (1) और (2) B केवल (2) और (3) C केवल (1) और (4) D उपरोक्त सभी
2)
निम्नलिखित परिच्छेद को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। समावेशी संवृद्धि की प्राप्ति के लिए राज्य की भूमिका पर पुनर्विचार की गंभीर आवश्यकता है। सरकार के आकार के विषय में अर्थशास्त्रियों के बीच हुई आरंभिक बहस भ्रामक हो सकती है। समय की आवश्यकता है कि एक सामर्थ्यकारी सरकार हो। राज्य सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके, यह भारत राष्ट्र के विशाल और जटिल स्वरूप को देखते हुए आसान नहीं है। सरकार सभी अनिवार्य वस्तुओं का उत्पादन करे, सभी आवश्यक नौकरियों का सृजन करे और सभी वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखे, ऐसी अपेक्षा विशाल बोझिल नौकरशाही और व्यापक भ्रष्टाचार की ओर ले जाएगी। लक्ष्य यह होना चाहिए कि राष्ट्र के संस्थापकों ने जिस समावेशी संवृद्धि का उद्देश्य रखा था, हम उसके साथ बने रहें और साथ ही इसके प्रति एक अपेक्षाकृत अधिक आधुनिक दृष्टिकोण अपनाएँ कि राज्य यथार्थतः क्या प्रदान कर सकता है। यही एक सामर्थ्यकारी राज्य के विचार की ओर ले जाता है, अर्थात् एक ऐसी सरकार जो नागरिकों को उनकी आवश्यकता की हर चीज की प्रत्यक्षतः पूर्ति कराने का प्रयास नहीं करती। बल्कि, (1) वह बाजार के लिए एक सामर्थ्यकारी लोकाचार का सृजन करता है ताकि व्यष्टिक उद्यम फल-फूल सके और नागरिक, अधिकांश भाग के लिए एक-दूसरे की आवश्यकताओं के लिए प्रावधान कर सके और (2) वह ऐसे लोगों की मदद के लिए आगे आती है जो स्वयं अपनी बेहतरी नहीं कर पाते क्योंकि कैसी भी व्यवस्था क्यों न हो, कुछ लोग हमेशा ऐसे होते हैं जिन्हें सहारे और मदद की आवश्यकता होती है। अतः हमें एक ऐसी सरकार की जरूरत है जो बाजार के मामले में प्रभावी, प्रोत्साहन-अनुकूल नियम स्थापित करे और न्यूनतम हस्तक्षेप करती हुई हाशिए पर बनी रहे, और साथ ही साथ, निर्धनों को शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएँ तथा पर्याप्त पोषण और आहार की उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए उनकी प्रत्यक्ष सहायता करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएँ। लेखांश के अनुसार, निम्नलिखित में से किस एक पर संकेंद्रित करके समावेशी संवृद्धि की कार्यनीति कार्यरूप में परिणीत की जा सकती है? A देश के प्रत्येक नागरिक की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर B विनिर्माण क्षेत्र पर विनियमों को बढ़ा कर C विनिर्मित वस्तुओं के वितरण का नियंत्रण कर D समाज के वंचित वर्गों को बुनियादी सेवाएँ प्रदान कर
3)
निम्नलिखित परिच्छेद को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। समावेशी संवृद्धि की प्राप्ति के लिए राज्य की भूमिका पर पुनर्विचार की गंभीर आवश्यकता है। सरकार के आकार के विषय में अर्थशास्त्रियों के बीच हुई आरंभिक बहस भ्रामक हो सकती है। समय की आवश्यकता है कि एक सामर्थ्यकारी सरकार हो। राज्य सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके, यह भारत राष्ट्र के विशाल और जटिल स्वरूप को देखते हुए आसान नहीं है। सरकार सभी अनिवार्य वस्तुओं का उत्पादन करे, सभी आवश्यक नौकरियों का सृजन करे और सभी वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखे, ऐसी अपेक्षा विशाल बोझिल नौकरशाही और व्यापक भ्रष्टाचार की ओर ले जाएगी। लक्ष्य यह होना चाहिए कि राष्ट्र के संस्थापकों ने जिस समावेशी संवृद्धि का उद्देश्य रखा था, हम उसके साथ बने रहें और साथ ही इसके प्रति एक अपेक्षाकृत अधिक आधुनिक दृष्टिकोण अपनाएँ कि राज्य यथार्थतः क्या प्रदान कर सकता है। यही एक सामर्थ्यकारी राज्य के विचार की ओर ले जाता है, अर्थात् एक ऐसी सरकार जो नागरिकों को उनकी आवश्यकता की हर चीज की प्रत्यक्षतः पूर्ति कराने का प्रयास नहीं करती। बल्कि, (1) वह बाजार के लिए एक सामर्थ्यकारी लोकाचार का सृजन करता है ताकि व्यष्टिक उद्यम फल-फूल सके और नागरिक, अधिकांश भाग के लिए एक-दूसरे की आवश्यकताओं के लिए प्रावधान कर सके और (2) वह ऐसे लोगों की मदद के लिए आगे आती है जो स्वयं अपनी बेहतरी नहीं कर पाते क्योंकि कैसी भी व्यवस्था क्यों न हो, कुछ लोग हमेशा ऐसे होते हैं जिन्हें सहारे और मदद की आवश्यकता होती है। अतः हमें एक ऐसी सरकार की जरूरत है जो बाजार के मामले में प्रभावी, प्रोत्साहन-अनुकूल नियम स्थापित करे और न्यूनतम हस्तक्षेप करती हुई हाशिए पर बनी रहे, और साथ ही साथ, निर्धनों को शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएँ तथा पर्याप्त पोषण और आहार की उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए उनकी प्रत्यक्ष सहायता करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएँ। सामर्थ्यकारी सरकार के संघटक क्या हैं? 1- विशाल नौकरशाही 2- प्रतिनिधियों के माध्यम से कल्याण कार्यक्रमों को लागू करना। 3- ऐसे लोकाचार का सृजन करना जिसमें व्यष्टिक उद्यम को मदद मिले। 4- उन्हें संसाधन उपलब्ध कराना जो अल्प सुविधाप्राप्त हैं। 5- निर्धनों को बुनियादी सेवाओं के संबंध में सीधे मदद देना। नीचे दिये गये कूट की सहायता से सही उत्तर चुनिए: A केवल 1, 2 और 3 B केवल 4 और 5 C केवल 3, 4 और 5 D उपरोक्त सभी
4)
निम्नलिखित परिच्छेद को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। समावेशी संवृद्धि की प्राप्ति के लिए राज्य की भूमिका पर पुनर्विचार की गंभीर आवश्यकता है। सरकार के आकार के विषय में अर्थशास्त्रियों के बीच हुई आरंभिक बहस भ्रामक हो सकती है। समय की आवश्यकता है कि एक सामर्थ्यकारी सरकार हो। राज्य सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके, यह भारत राष्ट्र के विशाल और जटिल स्वरूप को देखते हुए आसान नहीं है। सरकार सभी अनिवार्य वस्तुओं का उत्पादन करे, सभी आवश्यक नौकरियों का सृजन करे और सभी वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखे, ऐसी अपेक्षा विशाल बोझिल नौकरशाही और व्यापक भ्रष्टाचार की ओर ले जाएगी। लक्ष्य यह होना चाहिए कि राष्ट्र के संस्थापकों ने जिस समावेशी संवृद्धि का उद्देश्य रखा था, हम उसके साथ बने रहें और साथ ही इसके प्रति एक अपेक्षाकृत अधिक आधुनिक दृष्टिकोण अपनाएँ कि राज्य यथार्थतः क्या प्रदान कर सकता है। यही एक सामर्थ्यकारी राज्य के विचार की ओर ले जाता है, अर्थात् एक ऐसी सरकार जो नागरिकों को उनकी आवश्यकता की हर चीज की प्रत्यक्षतः पूर्ति कराने का प्रयास नहीं करती। बल्कि, (1) वह बाजार के लिए एक सामर्थ्यकारी लोकाचार का सृजन करता है ताकि व्यष्टिक उद्यम फल-फूल सके और नागरिक, अधिकांश भाग के लिए एक-दूसरे की आवश्यकताओं के लिए प्रावधान कर सके और (2) वह ऐसे लोगों की मदद के लिए आगे आती है जो स्वयं अपनी बेहतरी नहीं कर पाते क्योंकि कैसी भी व्यवस्था क्यों न हो, कुछ लोग हमेशा ऐसे होते हैं जिन्हें सहारे और मदद की आवश्यकता होती है। अतः हमें एक ऐसी सरकार की जरूरत है जो बाजार के मामले में प्रभावी, प्रोत्साहन-अनुकूल नियम स्थापित करे और न्यूनतम हस्तक्षेप करती हुई हाशिए पर बनी रहे, और साथ ही साथ, निर्धनों को शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएँ तथा पर्याप्त पोषण और आहार की उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए उनकी प्रत्यक्ष सहायता करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएँ। राज्य क्यों ‘‘सभी आवश्यकताओं की पूर्ति’’ करने में असमर्थ है? 1- उसके पास पर्याप्त नौकरशाही नहीं है। 2- वह समावेशी संवृद्धि को प्रोत्साहित नहीं करता। नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर चुनिए: A केवल 1 B केवल 2 C 1 और 2 दोनों D दोनों में से कोई नहीं
5)
द्वेष मन का वह कुभाव है जो दूसरे की उÂति अथवा दूसरे के सुख से उत्पÂ होता है। यह शत्रुता को जन्म देता है। यह वह बीज है जिसमें ईर्ष्या की खाद व अहित भाव का जल शत्रुता का वृक्ष उत्पÂ कर देता है, जो सबके लिए विनाशकारी है। इसका नाश किए बिना मन की शांति संभव नहीं है। मन एक समय में एक ही कार्य कर सकता है। वह अपने अंदर सुविचारों व सद्भावनाओं को उत्पन्न नहीं कर सकता। उसका सारा समय जलन में ही चला जाता है। जैसे आग में भौतिक वस्तुएं भस्म हो जाती हैं वैसे ही द्वेष की आग में अच्छे गुण व विचार जलकर भस्म हो जाते हैं। मानव द्वेष भाव से ग्रसित होने पर सत्कार्य नहीं कर सकता। द्वेष भाव के कारण बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धिहीन मानव पशु के समान हो जाता है। मानव साधन संपन्न होने से द्वेष भाव के वशीभूत होकर दूसरे का नाश कर सकता है। द्वेष की भावना मन को दूषित कर देती है। द्वेष भाव मानव के बहुमूल्य समय का नाश कर देता है। मानव विवेक खोकर द्वेषवश दूसरे के अहित के विषय में सोचता है और स्वयं के समय का सदुपयोग नहीं कर पाता। अतः उसकी स्वयं की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है। जो लोग द्वेषवश दूसरों को कटुवचन बोलते हैं वे अपनी ही जिह्ना गंदी करते हैं। वे स्वयं ही स्वयं की प्रगति में बाधक बनते हैं। द्वेष दावानल की भांति दूसरों के साथ खुद के सद्गुणों को भी भस्म कर डालता है। जैसे जंगल में आग लगने पर एक दूसरे के संपर्क से सभी वृक्ष जलने लगते हैं, यहाँ तक कि निर्दोष पशु-पक्षी भी भस्म हो जाते हैं, उसी तरह ईर्ष्यालू-द्वेष की भावना स्वयं का और दूसरे का नाश करती है। इसका उपाय एक ही है-सज्जनों की संगति। परोपकारी व सदाचारी व्यक्तियों का साथ द्वेष की भावना का विनाश कर देता है। सद्ग्रंथों के पढ़ने, सर्वहितकारी मनुष्यों का संग, संत महात्माओं व परोपकारी महापुरुषों का जीवन चरित्र पढ़ने व उनके रचित ग्रंथ पढ़ने से द्वेष भाव की औषधि निश्चय ही प्राप्त हो जाती है। प्रस्तुत लेखांश के आधार पर सही शीर्षक का चुनाव कीजिए: A द्वेष: मन का कुभावB द्वेष: बुद्धि का नाश C द्वेष: दावानल की भांति D द्वेष: मानव-पशु
6)
द्वेष मन का वह कुभाव है जो दूसरे की उÂति अथवा दूसरे के सुख से उत्पÂ होता है। यह शत्रुता को जन्म देता है। यह वह बीज है जिसमें ईर्ष्या की खाद व अहित भाव का जल शत्रुता का वृक्ष उत्पÂ कर देता है, जो सबके लिए विनाशकारी है। इसका नाश किए बिना मन की शांति संभव नहीं है। मन एक समय में एक ही कार्य कर सकता है। वह अपने अंदर सुविचारों व सद्भावनाओं को उत्पन्न नहीं कर सकता। उसका सारा समय जलन में ही चला जाता है। जैसे आग में भौतिक वस्तुएं भस्म हो जाती हैं वैसे ही द्वेष की आग में अच्छे गुण व विचार जलकर भस्म हो जाते हैं। मानव द्वेष भाव से ग्रसित होने पर सत्कार्य नहीं कर सकता। द्वेष भाव के कारण बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धिहीन मानव पशु के समान हो जाता है। मानव साधन संपन्न होने से द्वेष भाव के वशीभूत होकर दूसरे का नाश कर सकता है। द्वेष की भावना मन को दूषित कर देती है। द्वेष भाव मानव के बहुमूल्य समय का नाश कर देता है। मानव विवेक खोकर द्वेषवश दूसरे के अहित के विषय में सोचता है और स्वयं के समय का सदुपयोग नहीं कर पाता। अतः उसकी स्वयं की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है। जो लोग द्वेषवश दूसरों को कटुवचन बोलते हैं वे अपनी ही जिह्ना गंदी करते हैं। वे स्वयं ही स्वयं की प्रगति में बाधक बनते हैं। द्वेष दावानल की भांति दूसरों के साथ खुद के सद्गुणों को भी भस्म कर डालता है। जैसे जंगल में आग लगने पर एक दूसरे के संपर्क से सभी वृक्ष जलने लगते हैं, यहाँ तक कि निर्दोष पशु-पक्षी भी भस्म हो जाते हैं, उसी तरह ईर्ष्यालू-द्वेष की भावना स्वयं का और दूसरे का नाश करती है। इसका उपाय एक ही है-सज्जनों की संगति। परोपकारी व सदाचारी व्यक्तियों का साथ द्वेष की भावना का विनाश कर देता है। सद्ग्रंथों के पढ़ने, सर्वहितकारी मनुष्यों का संग, संत महात्माओं व परोपकारी महापुरुषों का जीवन चरित्र पढ़ने व उनके रचित ग्रंथ पढ़ने से द्वेष भाव की औषधि निश्चय ही प्राप्त हो जाती है। प्रस्तुत लेखांश में मानव जीवन के किस रहस्य को दर्शाया गया है? A प्रेम तथा त्याग B अध्यात्म व चितन C द्वेष व इर्ष्या D सज्जनों की संगति
7)
द्वेष मन का वह कुभाव है जो दूसरे की उÂति अथवा दूसरे के सुख से उत्पÂ होता है। यह शत्रुता को जन्म देता है। यह वह बीज है जिसमें ईर्ष्या की खाद व अहित भाव का जल शत्रुता का वृक्ष उत्पÂ कर देता है, जो सबके लिए विनाशकारी है। इसका नाश किए बिना मन की शांति संभव नहीं है। मन एक समय में एक ही कार्य कर सकता है। वह अपने अंदर सुविचारों व सद्भावनाओं को उत्पन्न नहीं कर सकता। उसका सारा समय जलन में ही चला जाता है। जैसे आग में भौतिक वस्तुएं भस्म हो जाती हैं वैसे ही द्वेष की आग में अच्छे गुण व विचार जलकर भस्म हो जाते हैं। मानव द्वेष भाव से ग्रसित होने पर सत्कार्य नहीं कर सकता। द्वेष भाव के कारण बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धिहीन मानव पशु के समान हो जाता है। मानव साधन संपन्न होने से द्वेष भाव के वशीभूत होकर दूसरे का नाश कर सकता है। द्वेष की भावना मन को दूषित कर देती है। द्वेष भाव मानव के बहुमूल्य समय का नाश कर देता है। मानव विवेक खोकर द्वेषवश दूसरे के अहित के विषय में सोचता है और स्वयं के समय का सदुपयोग नहीं कर पाता। अतः उसकी स्वयं की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है। जो लोग द्वेषवश दूसरों को कटुवचन बोलते हैं वे अपनी ही जिह्ना गंदी करते हैं। वे स्वयं ही स्वयं की प्रगति में बाधक बनते हैं। द्वेष दावानल की भांति दूसरों के साथ खुद के सद्गुणों को भी भस्म कर डालता है। जैसे जंगल में आग लगने पर एक दूसरे के संपर्क से सभी वृक्ष जलने लगते हैं, यहाँ तक कि निर्दोष पशु-पक्षी भी भस्म हो जाते हैं, उसी तरह ईर्ष्यालू-द्वेष की भावना स्वयं का और दूसरे का नाश करती है। इसका उपाय एक ही है-सज्जनों की संगति। परोपकारी व सदाचारी व्यक्तियों का साथ द्वेष की भावना का विनाश कर देता है। सद्ग्रंथों के पढ़ने, सर्वहितकारी मनुष्यों का संग, संत महात्माओं व परोपकारी महापुरुषों का जीवन चरित्र पढ़ने व उनके रचित ग्रंथ पढ़ने से द्वेष भाव की औषधि निश्चय ही प्राप्त हो जाती है। कैसी भावना स्वयं का व दूसरों का नाश करती है? A सज्जनों की संगति B दुर्जनों की संगति C ईर्ष्या-द्वेष D कटुवचन
8)
द्वेष मन का वह कुभाव है जो दूसरे की उÂति अथवा दूसरे के सुख से उत्पÂ होता है। यह शत्रुता को जन्म देता है। यह वह बीज है जिसमें ईर्ष्या की खाद व अहित भाव का जल शत्रुता का वृक्ष उत्पÂ कर देता है, जो सबके लिए विनाशकारी है। इसका नाश किए बिना मन की शांति संभव नहीं है। मन एक समय में एक ही कार्य कर सकता है। वह अपने अंदर सुविचारों व सद्भावनाओं को उत्पन्न नहीं कर सकता। उसका सारा समय जलन में ही चला जाता है। जैसे आग में भौतिक वस्तुएं भस्म हो जाती हैं वैसे ही द्वेष की आग में अच्छे गुण व विचार जलकर भस्म हो जाते हैं। मानव द्वेष भाव से ग्रसित होने पर सत्कार्य नहीं कर सकता। द्वेष भाव के कारण बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धिहीन मानव पशु के समान हो जाता है। मानव साधन संपन्न होने से द्वेष भाव के वशीभूत होकर दूसरे का नाश कर सकता है। द्वेष की भावना मन को दूषित कर देती है। द्वेष भाव मानव के बहुमूल्य समय का नाश कर देता है। मानव विवेक खोकर द्वेषवश दूसरे के अहित के विषय में सोचता है और स्वयं के समय का सदुपयोग नहीं कर पाता। अतः उसकी स्वयं की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है। जो लोग द्वेषवश दूसरों को कटुवचन बोलते हैं वे अपनी ही जिह्ना गंदी करते हैं। वे स्वयं ही स्वयं की प्रगति में बाधक बनते हैं। द्वेष दावानल की भांति दूसरों के साथ खुद के सद्गुणों को भी भस्म कर डालता है। जैसे जंगल में आग लगने पर एक दूसरे के संपर्क से सभी वृक्ष जलने लगते हैं, यहाँ तक कि निर्दोष पशु-पक्षी भी भस्म हो जाते हैं, उसी तरह ईर्ष्यालू-द्वेष की भावना स्वयं का और दूसरे का नाश करती है। इसका उपाय एक ही है-सज्जनों की संगति। परोपकारी व सदाचारी व्यक्तियों का साथ द्वेष की भावना का विनाश कर देता है। सद्ग्रंथों के पढ़ने, सर्वहितकारी मनुष्यों का संग, संत महात्माओं व परोपकारी महापुरुषों का जीवन चरित्र पढ़ने व उनके रचित ग्रंथ पढ़ने से द्वेष भाव की औषधि निश्चय ही प्राप्त हो जाती है। द्वेष भावना की औषधि किसे कहा गया है? A महापुरुषों के संग सोना B सज्जनों की संपत्ति C सर्वहितकारी मनुष्यों का संग D उपरोक्त सभी सत्य है
9)
10)
11)
12)
13)
पांच बॉक्स हैं, जोकि बिल्कुल एक जैसे दिखते हैं पर उनमें जो चीजें रखी गई हैं, वे अलग-अलग हैं और उनमें से प्रत्येक के अन्दर क्या चीज है, उसका लेबल लगा हुआ है। हरेक बॉक्स का लेबल और उसमें रखी वस्तुओं का विवरण निम्नवत् है- अन्दर रखी वस्तु लेबल दो पिन P P दो गेदें B B दो क्लिपें C C एक पिन और एक क्लिप P C एक गेंद और एक क्लिप B C किसी ने शैतानी करते हुए इन बॉक्सों के लेबल बदल दिए हैं और इस कारण अब किसी भी बॉक्स का लेबल सही-सही स्पष्टीकरण नहीं बतलाता कि उसमें रखी चीज क्या है? यदि यह सूचना हो कि PC बॉक्सों में न तो पिन न ही कोई क्लिप है और बॉक्स PP में कोई पिन नहीं है CC में एक क्लिप और एक गेंद है, तो निम्नलिखित में से कौन सा निश्चित रूप से सत्य होगा, बशर्ते की शेष कोई भी एक बॉक्स खोला जाए? A इसमें कम-से-कम एक क्लिप होगी B इसमें कम-से-कम एक पिन होगी C इसमें दो पिनें होंगी D इसमें एक पिन और एक क्लिप होगी
14)
पांच बॉक्स हैं, जोकि बिल्कुल एक जैसे दिखते हैं पर उनमें जो चीजें रखी गई हैं, वे अलग-अलग हैं और उनमें से प्रत्येक के अन्दर क्या चीज है, उसका लेबल लगा हुआ है। हरेक बॉक्स का लेबल और उसमें रखी वस्तुओं का विवरण निम्नवत् है- अन्दर रखी वस्तु लेबल दो पिन P P दो गेदें B B दो क्लिपें C C एक पिन और एक क्लिप P C एक गेंद और एक क्लिप B C किसी ने शैतानी करते हुए इन बॉक्सों के लेबल बदल दिए हैं और इस कारण अब किसी भी बॉक्स का लेबल सही-सही स्पष्टीकरण नहीं बतलाता कि उसमें रखी चीज क्या है? यदि PP बॉक्स में दो क्लिप हैं और CC बॉक्स में दो पिनें हैं और बॉक्स BB में कम-से-कम एक गेंद है, तो निम्नलिखित में से कौन सा एक निश्चित रूप से सत्य नहीं है? A बॉक्स PC में दो गेंदे होंगी B बॉक्स BB में एक क्लिप होगी C बॉक्स BB में दो गेंदे होंगी D बॉक्स BC में एक पिन और एक लिप होंगी
15)
पांच बॉक्स हैं, जोकि बिल्कुल एक जैसे दिखते हैं पर उनमें जो चीजें रखी गई हैं, वे अलग-अलग हैं और उनमें से प्रत्येक के अन्दर क्या चीज है, उसका लेबल लगा हुआ है। हरेक बॉक्स का लेबल और उसमें रखी वस्तुओं का विवरण निम्नवत् है- अन्दर रखी वस्तु लेबल दो पिन P P दो गेदें B B दो क्लिपें C C एक पिन और एक क्लिप P C एक गेंद और एक क्लिप B C किसी ने शैतानी करते हुए इन बॉक्सों के लेबल बदल दिए हैं और इस कारण अब किसी भी बॉक्स का लेबल सही-सही स्पष्टीकरण नहीं बतलाता कि उसमें रखी चीज क्या है? जब BC लेबल वाला पहला बॉक्स खोला गया तो यह पाया गया कि एक वस्तु तो गेंद है, तो निम्नलिखित में से कौन सा निश्चित रूप से सत्य है? A दूसरी वस्तु गेंद तो हो ही नहीं सकती है B दूसरी वस्तु भी गेंद होगी C BB लेबल वाले दूसरे बॉक्स में एक गेंद और एक क्लिप होगी D दूसरी वस्तु या तो गेंद हो सकती है या क्लिप
16)
पांच बॉक्स हैं, जोकि बिल्कुल एक जैसे दिखते हैं पर उनमें जो चीजें रखी गई हैं, वे अलग-अलग हैं और उनमें से प्रत्येक के अन्दर क्या चीज है, उसका लेबल लगा हुआ है। हरेक बॉक्स का लेबल और उसमें रखी वस्तुओं का विवरण निम्नवत् है- अन्दर रखी वस्तु लेबल दो पिन P P दो गेदें B B दो क्लिपें C C एक पिन और एक क्लिप P C एक गेंद और एक क्लिप B C किसी ने शैतानी करते हुए इन बॉक्सों के लेबल बदल दिए हैं और इस कारण अब किसी भी बॉक्स का लेबल सही-सही स्पष्टीकरण नहीं बतलाता कि उसमें रखी चीज क्या है? जो पहला बॉक्स खोला गया उसमें PP लेबल लगा है और दूसरा बॉक्स PC लेबल वाला है उसे खोला तो चारों संयुक्त वस्तुओं में से एक गेंद निकली। बताइए निम्नलिखित में से कौन सा निश्चित रूप से सत्य है? A दूसरी तीनों वस्तुओं में से कोई क्लिप तो नहीं होगी B दूसरी तीनों वस्तुओं में कम-से-कम एक क्लिप होगी C दूसरी तीनों वस्तुओं में से दो पिनें नहीं होंगी D इनमें से कोई नहीं
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20)
21)
22)
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। संसद में महंगाई पर गरमागरम बहस हुई और तमाम पार्टियों ने महंगाई कम करने के उपाए करने पर जोर दिया। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि फिलहाल महंगाई से निजात मिलना तकरीबन असंभव है, बल्कि कुछ जरुरी चीजें ज्यादा महंगी हो सकती हैं। पेट्रोलियम मंत्रलय की स्थायी संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि छह लाख रुपये सालाना से ज्यादा आमदनी वाले परिवार को रसोई गैस पर कोई सब्सिडी न दी जाए। एक और सुझाव पर भी सरकार विचार कर रही है कि साल में हर परिवार को सिर्फ चार सिलेंडर ही घटे दामों पर मिलें, उसके बाद के सिलेंडरों के लिए पूरी कीमत वसूली जाए। फिलहाल हर सिलेंडर पर सरकार 247 रुपए सब्सिडी देती है। यह सब्सिडी हटा ली जाए, तो एक सिलेंडर 646 रुपए का पड़ेगा। संसद में महंगाई पर चर्चा के दौरान वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि सरकार निजी कारों को बाजार के दाम पर डीजल बेचने की सोच रही है। पेट्रोल, डीजल, केरोसिन वगैरा के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार के हिसाब से तय होते हैं। लेकिन सब्सिडी की वजह से भारत में डीजल और पेट्रोल के बीच लगभग 22 रुपए का फर्क है। इसकी वजह से डीजल कारों की खपत तेजी से बढ़ रही है। अभी देश में 30 प्रतिशत कारें डीजल पर चलती है और इस दशक के अंत तक यह आंकड़ा 50 प्रतिशत हो जाएगा। जाहिर है, रसोई गैस हो या डीजल, सब्सिडी घटाने की मार तो आम आदमी पर ही पड़ेगी, जो कि महंगाई के बोझ से दबा जा रहा है। तार्किक रूप से इसमें कोई गलत बात नहीं है कि रसोई गैस या डीजल या पेट्रोल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार के मुताबिक ही तय हों। अगर ये चीजें सरकार महंगी खरीदे और सस्ती बेचे तो इससे सरकार का घाटा बढ़ेगा और वह जनकल्याणकारी कामों में खर्च कम कर पाएगी। पर समस्या यह है कि दाम सिर्फ पेट्रोलियम पदार्थों के ही नहीं बढ़ रहे हैं। खाद्य पदार्थों की महंगाई आसमान छू रही है। भारतीय उपभोक्ता दुनिया में शायद सबसे महंगी बिजली खरीदता है और वह भी उसे नियमित नहीं मिलती, इसलिए जनरेटर या इन्वर्टर पर पैसा खर्च करता है। भारत में मकानों के दाम असाधारण रूप से ऊँचे हैं, जिसके पीछे गलत नीतियों और काले पैसे की भूमिका है। ऐसे में, रसाई गैस या डीजल के दाम बढ़ना उपभोक्ता के बोझ को भारी बना देगा। यह सही है कि इस वक्त पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ रही है और कुछ आर्थिक विशेषज्ञों की यह बात भी दुरुस्त लगती है कि जब कोई विकासशील अर्थव्यवस्था विकसित अर्थव्यवस्था बनने की राह पर होती है, तब उसे महंगाई के दौर से गुजरना ही पड़ता है। लेकिन सरकार को यह भी देखना चाहिए कि आर्थिक विकास का जो फायदा आम परिवारों को हो रहा है, जिनका जीवन स्तर सुधर रहा है, इस महंगाई के बोझ से यह फायदा खत्म न हो जाए। अगर सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर से मूल्य नियंत्रण हटाना चाहती है, तो उसे पेट्रोलियम पदार्थों के लिए खास कर ढांचे को भी बदलना चाहिए और करों को दूसरी चीजों के करों के बराबर लाना चाहिए। दूसरे, डीजल या रसोई गैस की दोहरी मूल्य नीति की वजह से कालाबाजारी बढ़ने की पूरी-पूरी आशंका है, अब भी सब्सिडी वाली रसोई गैस कालाबाजारी के जरिए होटलों और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तक पहुँच जाती है। डीजल में केरोसिन की मिलावट अब भी होती है और अगर डीजल महंगा हो जाए, तो मिलावट करने वालों को और ज्यादा मुनाफे का लालच हो जाएगा। पेट्रोलियम पदार्थों पर सब्सिडी कम होनी चाहिए और उनके दाम तर्कसंगत होने चाहिए, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन टुकड़ों-टुकड़ों में फैसले करने से उपभोक्ता पर बोझ भी बढ़ेगा और सरकार को भी फायदा नहीं होगा। लेखांश के संदर्भ में निम्न कथनों पर विचार करें: 1- देश में अभी तीस प्रतिशत कारें डीजल से चलती हैं। 2- सरकार प्रत्येक सिलेंडर पर 274 रु- सब्सिडी देती हैं 3- स्थायी संसदीय समिति पेट्रोलियम मंत्रलय से संबंधित है 4- भारत में डीजल और पेट्रोल के बीच 22 रु- की असमानता है। उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? A केवल 2B 1, 2 और 4 तीनों C कोई नहींD 1, 3 और 4
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। संसद में महंगाई पर गरमागरम बहस हुई और तमाम पार्टियों ने महंगाई कम करने के उपाए करने पर जोर दिया। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि फिलहाल महंगाई से निजात मिलना तकरीबन असंभव है, बल्कि कुछ जरुरी चीजें ज्यादा महंगी हो सकती हैं। पेट्रोलियम मंत्रलय की स्थायी संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि छह लाख रुपये सालाना से ज्यादा आमदनी वाले परिवार को रसोई गैस पर कोई सब्सिडी न दी जाए। एक और सुझाव पर भी सरकार विचार कर रही है कि साल में हर परिवार को सिर्फ चार सिलेंडर ही घटे दामों पर मिलें, उसके बाद के सिलेंडरों के लिए पूरी कीमत वसूली जाए। फिलहाल हर सिलेंडर पर सरकार 247 रुपए सब्सिडी देती है। यह सब्सिडी हटा ली जाए, तो एक सिलेंडर 646 रुपए का पड़ेगा। संसद में महंगाई पर चर्चा के दौरान वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि सरकार निजी कारों को बाजार के दाम पर डीजल बेचने की सोच रही है। पेट्रोल, डीजल, केरोसिन वगैरा के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार के हिसाब से तय होते हैं। लेकिन सब्सिडी की वजह से भारत में डीजल और पेट्रोल के बीच लगभग 22 रुपए का फर्क है। इसकी वजह से डीजल कारों की खपत तेजी से बढ़ रही है। अभी देश में 30 प्रतिशत कारें डीजल पर चलती है और इस दशक के अंत तक यह आंकड़ा 50 प्रतिशत हो जाएगा। जाहिर है, रसोई गैस हो या डीजल, सब्सिडी घटाने की मार तो आम आदमी पर ही पड़ेगी, जो कि महंगाई के बोझ से दबा जा रहा है। तार्किक रूप से इसमें कोई गलत बात नहीं है कि रसोई गैस या डीजल या पेट्रोल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार के मुताबिक ही तय हों। अगर ये चीजें सरकार महंगी खरीदे और सस्ती बेचे तो इससे सरकार का घाटा बढ़ेगा और वह जनकल्याणकारी कामों में खर्च कम कर पाएगी। पर समस्या यह है कि दाम सिर्फ पेट्रोलियम पदार्थों के ही नहीं बढ़ रहे हैं। खाद्य पदार्थों की महंगाई आसमान छू रही है। भारतीय उपभोक्ता दुनिया में शायद सबसे महंगी बिजली खरीदता है और वह भी उसे नियमित नहीं मिलती, इसलिए जनरेटर या इन्वर्टर पर पैसा खर्च करता है। भारत में मकानों के दाम असाधारण रूप से ऊँचे हैं, जिसके पीछे गलत नीतियों और काले पैसे की भूमिका है। ऐसे में, रसाई गैस या डीजल के दाम बढ़ना उपभोक्ता के बोझ को भारी बना देगा। यह सही है कि इस वक्त पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ रही है और कुछ आर्थिक विशेषज्ञों की यह बात भी दुरुस्त लगती है कि जब कोई विकासशील अर्थव्यवस्था विकसित अर्थव्यवस्था बनने की राह पर होती है, तब उसे महंगाई के दौर से गुजरना ही पड़ता है। लेकिन सरकार को यह भी देखना चाहिए कि आर्थिक विकास का जो फायदा आम परिवारों को हो रहा है, जिनका जीवन स्तर सुधर रहा है, इस महंगाई के बोझ से यह फायदा खत्म न हो जाए। अगर सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर से मूल्य नियंत्रण हटाना चाहती है, तो उसे पेट्रोलियम पदार्थों के लिए खास कर ढांचे को भी बदलना चाहिए और करों को दूसरी चीजों के करों के बराबर लाना चाहिए। दूसरे, डीजल या रसोई गैस की दोहरी मूल्य नीति की वजह से कालाबाजारी बढ़ने की पूरी-पूरी आशंका है, अब भी सब्सिडी वाली रसोई गैस कालाबाजारी के जरिए होटलों और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तक पहुँच जाती है। डीजल में केरोसिन की मिलावट अब भी होती है और अगर डीजल महंगा हो जाए, तो मिलावट करने वालों को और ज्यादा मुनाफे का लालच हो जाएगा। पेट्रोलियम पदार्थों पर सब्सिडी कम होनी चाहिए और उनके दाम तर्कसंगत होने चाहिए, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन टुकड़ों-टुकड़ों में फैसले करने से उपभोक्ता पर बोझ भी बढ़ेगा और सरकार को भी फायदा नहीं होगा। पेट्रोल के दाम तय होते हैं - A स्थानीय बाजार मेंB व्यापारियों के द्वारा C विश्व बाजार मेंD अंतर्राष्ट्रीय बाजार में
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। संसद में महंगाई पर गरमागरम बहस हुई और तमाम पार्टियों ने महंगाई कम करने के उपाए करने पर जोर दिया। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि फिलहाल महंगाई से निजात मिलना तकरीबन असंभव है, बल्कि कुछ जरुरी चीजें ज्यादा महंगी हो सकती हैं। पेट्रोलियम मंत्रलय की स्थायी संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि छह लाख रुपये सालाना से ज्यादा आमदनी वाले परिवार को रसोई गैस पर कोई सब्सिडी न दी जाए। एक और सुझाव पर भी सरकार विचार कर रही है कि साल में हर परिवार को सिर्फ चार सिलेंडर ही घटे दामों पर मिलें, उसके बाद के सिलेंडरों के लिए पूरी कीमत वसूली जाए। फिलहाल हर सिलेंडर पर सरकार 247 रुपए सब्सिडी देती है। यह सब्सिडी हटा ली जाए, तो एक सिलेंडर 646 रुपए का पड़ेगा। संसद में महंगाई पर चर्चा के दौरान वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि सरकार निजी कारों को बाजार के दाम पर डीजल बेचने की सोच रही है। पेट्रोल, डीजल, केरोसिन वगैरा के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार के हिसाब से तय होते हैं। लेकिन सब्सिडी की वजह से भारत में डीजल और पेट्रोल के बीच लगभग 22 रुपए का फर्क है। इसकी वजह से डीजल कारों की खपत तेजी से बढ़ रही है। अभी देश में 30 प्रतिशत कारें डीजल पर चलती है और इस दशक के अंत तक यह आंकड़ा 50 प्रतिशत हो जाएगा। जाहिर है, रसोई गैस हो या डीजल, सब्सिडी घटाने की मार तो आम आदमी पर ही पड़ेगी, जो कि महंगाई के बोझ से दबा जा रहा है। तार्किक रूप से इसमें कोई गलत बात नहीं है कि रसोई गैस या डीजल या पेट्रोल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार के मुताबिक ही तय हों। अगर ये चीजें सरकार महंगी खरीदे और सस्ती बेचे तो इससे सरकार का घाटा बढ़ेगा और वह जनकल्याणकारी कामों में खर्च कम कर पाएगी। पर समस्या यह है कि दाम सिर्फ पेट्रोलियम पदार्थों के ही नहीं बढ़ रहे हैं। खाद्य पदार्थों की महंगाई आसमान छू रही है। भारतीय उपभोक्ता दुनिया में शायद सबसे महंगी बिजली खरीदता है और वह भी उसे नियमित नहीं मिलती, इसलिए जनरेटर या इन्वर्टर पर पैसा खर्च करता है। भारत में मकानों के दाम असाधारण रूप से ऊँचे हैं, जिसके पीछे गलत नीतियों और काले पैसे की भूमिका है। ऐसे में, रसाई गैस या डीजल के दाम बढ़ना उपभोक्ता के बोझ को भारी बना देगा। यह सही है कि इस वक्त पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ रही है और कुछ आर्थिक विशेषज्ञों की यह बात भी दुरुस्त लगती है कि जब कोई विकासशील अर्थव्यवस्था विकसित अर्थव्यवस्था बनने की राह पर होती है, तब उसे महंगाई के दौर से गुजरना ही पड़ता है। लेकिन सरकार को यह भी देखना चाहिए कि आर्थिक विकास का जो फायदा आम परिवारों को हो रहा है, जिनका जीवन स्तर सुधर रहा है, इस महंगाई के बोझ से यह फायदा खत्म न हो जाए। अगर सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर से मूल्य नियंत्रण हटाना चाहती है, तो उसे पेट्रोलियम पदार्थों के लिए खास कर ढांचे को भी बदलना चाहिए और करों को दूसरी चीजों के करों के बराबर लाना चाहिए। दूसरे, डीजल या रसोई गैस की दोहरी मूल्य नीति की वजह से कालाबाजारी बढ़ने की पूरी-पूरी आशंका है, अब भी सब्सिडी वाली रसोई गैस कालाबाजारी के जरिए होटलों और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तक पहुँच जाती है। डीजल में केरोसिन की मिलावट अब भी होती है और अगर डीजल महंगा हो जाए, तो मिलावट करने वालों को और ज्यादा मुनाफे का लालच हो जाएगा। पेट्रोलियम पदार्थों पर सब्सिडी कम होनी चाहिए और उनके दाम तर्कसंगत होने चाहिए, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन टुकड़ों-टुकड़ों में फैसले करने से उपभोक्ता पर बोझ भी बढ़ेगा और सरकार को भी फायदा नहीं होगा। जब कोई विकासशील अर्थव्यवस्था विकसित अर्थव्यवस्था बनने की राह पर होती है तब उसे - A महंगाई के दौर से गुजरना पड़ता है B कर्ज लेना होता है C काले धन की समस्या को बल मिलता है D कोई नहीं
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। संसद में महंगाई पर गरमागरम बहस हुई और तमाम पार्टियों ने महंगाई कम करने के उपाए करने पर जोर दिया। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि फिलहाल महंगाई से निजात मिलना तकरीबन असंभव है, बल्कि कुछ जरुरी चीजें ज्यादा महंगी हो सकती हैं। पेट्रोलियम मंत्रलय की स्थायी संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि छह लाख रुपये सालाना से ज्यादा आमदनी वाले परिवार को रसोई गैस पर कोई सब्सिडी न दी जाए। एक और सुझाव पर भी सरकार विचार कर रही है कि साल में हर परिवार को सिर्फ चार सिलेंडर ही घटे दामों पर मिलें, उसके बाद के सिलेंडरों के लिए पूरी कीमत वसूली जाए। फिलहाल हर सिलेंडर पर सरकार 247 रुपए सब्सिडी देती है। यह सब्सिडी हटा ली जाए, तो एक सिलेंडर 646 रुपए का पड़ेगा। संसद में महंगाई पर चर्चा के दौरान वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि सरकार निजी कारों को बाजार के दाम पर डीजल बेचने की सोच रही है। पेट्रोल, डीजल, केरोसिन वगैरा के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार के हिसाब से तय होते हैं। लेकिन सब्सिडी की वजह से भारत में डीजल और पेट्रोल के बीच लगभग 22 रुपए का फर्क है। इसकी वजह से डीजल कारों की खपत तेजी से बढ़ रही है। अभी देश में 30 प्रतिशत कारें डीजल पर चलती है और इस दशक के अंत तक यह आंकड़ा 50 प्रतिशत हो जाएगा। जाहिर है, रसोई गैस हो या डीजल, सब्सिडी घटाने की मार तो आम आदमी पर ही पड़ेगी, जो कि महंगाई के बोझ से दबा जा रहा है। तार्किक रूप से इसमें कोई गलत बात नहीं है कि रसोई गैस या डीजल या पेट्रोल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार के मुताबिक ही तय हों। अगर ये चीजें सरकार महंगी खरीदे और सस्ती बेचे तो इससे सरकार का घाटा बढ़ेगा और वह जनकल्याणकारी कामों में खर्च कम कर पाएगी। पर समस्या यह है कि दाम सिर्फ पेट्रोलियम पदार्थों के ही नहीं बढ़ रहे हैं। खाद्य पदार्थों की महंगाई आसमान छू रही है। भारतीय उपभोक्ता दुनिया में शायद सबसे महंगी बिजली खरीदता है और वह भी उसे नियमित नहीं मिलती, इसलिए जनरेटर या इन्वर्टर पर पैसा खर्च करता है। भारत में मकानों के दाम असाधारण रूप से ऊँचे हैं, जिसके पीछे गलत नीतियों और काले पैसे की भूमिका है। ऐसे में, रसाई गैस या डीजल के दाम बढ़ना उपभोक्ता के बोझ को भारी बना देगा। यह सही है कि इस वक्त पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ रही है और कुछ आर्थिक विशेषज्ञों की यह बात भी दुरुस्त लगती है कि जब कोई विकासशील अर्थव्यवस्था विकसित अर्थव्यवस्था बनने की राह पर होती है, तब उसे महंगाई के दौर से गुजरना ही पड़ता है। लेकिन सरकार को यह भी देखना चाहिए कि आर्थिक विकास का जो फायदा आम परिवारों को हो रहा है, जिनका जीवन स्तर सुधर रहा है, इस महंगाई के बोझ से यह फायदा खत्म न हो जाए। अगर सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर से मूल्य नियंत्रण हटाना चाहती है, तो उसे पेट्रोलियम पदार्थों के लिए खास कर ढांचे को भी बदलना चाहिए और करों को दूसरी चीजों के करों के बराबर लाना चाहिए। दूसरे, डीजल या रसोई गैस की दोहरी मूल्य नीति की वजह से कालाबाजारी बढ़ने की पूरी-पूरी आशंका है, अब भी सब्सिडी वाली रसोई गैस कालाबाजारी के जरिए होटलों और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तक पहुँच जाती है। डीजल में केरोसिन की मिलावट अब भी होती है और अगर डीजल महंगा हो जाए, तो मिलावट करने वालों को और ज्यादा मुनाफे का लालच हो जाएगा। पेट्रोलियम पदार्थों पर सब्सिडी कम होनी चाहिए और उनके दाम तर्कसंगत होने चाहिए, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन टुकड़ों-टुकड़ों में फैसले करने से उपभोक्ता पर बोझ भी बढ़ेगा और सरकार को भी फायदा नहीं होगा। भारतीय उपभोक्ता सबसे ऊँचे दाम पर खरीदते हैं - A पेट्रोलB बिजली C अपनी जरूरत के सामानD कोई नहीं
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अदालत की भाषा के मामले में यह संवैधानिक प्रावधान किया गया कि जब तक वहाँ हिदी के प्रयोग की व्यवस्था नहीं होती तभी तक अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाए। मगर आजादी के इतने सालों बाद भी ऊपरी अदालतें हिदी को सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पाई हैं तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। न्यायपालिका में कामकाज का संबंध केवल वकीलों के बीच होने वाली बहस और न्यायाधीश के फैसले तक सीमित नहीं होता। फरियादी और आरोपी भी न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े होते हैं बल्कि उनके अपने-अपने पक्ष ही मुकदमे का आधार बनते हैं। इसलिए कागजात, बहस और फैसले की भाषा ऐसी हो जिसे वादी-प्रतिवादी भी समझ पाएँ। यह नहीं माना जा सकता कि सभी फरियादी और आरोपी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखते होंगे। इसलिए उचित ही बसपा के एक सांसद ने लोकसभा में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हिन्दी को कामकाज की भाषा बनाने की मांग उठाई। हिदी भाषी प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में बहस और कामकाज कुछ हद तक जरूर हिन्दी में होते हैं, बाकी प्रदेशों में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै खंडपीठ के वकीलों ने तमिल में बहस की इजाजत देने की मांग को लेकर आंदोलन चलाया था। कई दिन के धरने के बाद खंडपीठ के जजों ने इसकी अनौपचारिक मंजूरी दे दी, पर यह भी कहा कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बगैर इसका वैधानिक प्रावधान संभव नहीं है। अदालतों में अंग्रेजी का वर्चस्व भी एक बड़ा कारण है कि हमारे यहाँ मामूली कानूनी मसलों में भी लोग वकीलों पर निर्भर होते गए हैं। अदालतों में अंग्रेजी के दबदबे से केवल वादी-प्रतिवादी को परेशानी नहीं उठानी पड़ती। जिन वकीलों ने हिन्दी या दूसरी भारतीय भाषा के माध्यम से कानून की पढ़ाई की है, वे कठिनाई महसूस करते हैं। तमाम वाजिब दलीलों के बावजूद कई बार अंग्रेजी न बोल पाने के कारण उनका पक्ष कमजोर रह जाता है। इस स्थिति को न्यायपूर्ण मानने में किसी को भी संकोच होगा। दरअसल, ऊपरी अदालतों में कामकाज की भाषा केवल कुछ न्यायाधीशों और वकीलों के बनाए माहौल का नतीजा नहीं है। संसद खुद कानून अंग्रेजी में तैयार करती है। कानून में आज भी ब्रिटिश जमाने और उससे भी पहले की तकनीकी शब्दावली इस्तेमाल की जाती है। हिदी को राजभाषा का दर्जा तो दे दिया गया, मगर इसे शासन और कानून की भाषा बनाने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए। यों तकनीकी शब्दावली आयोग ने कानून में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का हिदी कोष तैयार किया, मगर वे शब्द इस कदर दुरूह हैं कि आम लोगों के लिए उनका अर्थ समझना मुश्किल है। यही वजह है कि जहाँ अदालती कामकाज में हिन्दी का इस्तेमाल होता है, वहाँ भी दलीलों और फैसलों को सहज रूप से समझ पाना संभव नहीं होता। अदालतों में हिदी के इस्तेमाल का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उसे महज अनुवाद की भाषा बना दिया जाए। आखिर न्याय की भाषा ऐसी क्यों हो कि उसे सामान्य लोग आसानी से समझ न पाएँ। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सर्वोच्च न्यायालय में अनेक न्यायाधीशों को हिन्दी समझने में दिक्कत पेश आ सकती है, क्योंकि जरूरी नहीं कि वे हिन्दीभाषी हों, उनकी पढ़ाई-लिखाई हिन्दी में हुई हो या हिन्दी की तकनीकी शब्दावली से परिचित हों। लेकिन अगर कानून बनने की प्रक्रिया से ही इसका माहौल बने तो सकारात्मक नतीजे निकल सकते हैं। प्रस्तुत परिच्छेद का विषय है - A अदालती भाषाB हिन्दी भाषा C अंग्रेजी का वर्चस्वD न्याय की भाषा
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अदालत की भाषा के मामले में यह संवैधानिक प्रावधान किया गया कि जब तक वहाँ हिदी के प्रयोग की व्यवस्था नहीं होती तभी तक अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाए। मगर आजादी के इतने सालों बाद भी ऊपरी अदालतें हिदी को सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पाई हैं तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। न्यायपालिका में कामकाज का संबंध केवल वकीलों के बीच होने वाली बहस और न्यायाधीश के फैसले तक सीमित नहीं होता। फरियादी और आरोपी भी न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े होते हैं बल्कि उनके अपने-अपने पक्ष ही मुकदमे का आधार बनते हैं। इसलिए कागजात, बहस और फैसले की भाषा ऐसी हो जिसे वादी-प्रतिवादी भी समझ पाएँ। यह नहीं माना जा सकता कि सभी फरियादी और आरोपी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखते होंगे। इसलिए उचित ही बसपा के एक सांसद ने लोकसभा में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हिन्दी को कामकाज की भाषा बनाने की मांग उठाई। हिदी भाषी प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में बहस और कामकाज कुछ हद तक जरूर हिन्दी में होते हैं, बाकी प्रदेशों में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै खंडपीठ के वकीलों ने तमिल में बहस की इजाजत देने की मांग को लेकर आंदोलन चलाया था। कई दिन के धरने के बाद खंडपीठ के जजों ने इसकी अनौपचारिक मंजूरी दे दी, पर यह भी कहा कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बगैर इसका वैधानिक प्रावधान संभव नहीं है। अदालतों में अंग्रेजी का वर्चस्व भी एक बड़ा कारण है कि हमारे यहाँ मामूली कानूनी मसलों में भी लोग वकीलों पर निर्भर होते गए हैं। अदालतों में अंग्रेजी के दबदबे से केवल वादी-प्रतिवादी को परेशानी नहीं उठानी पड़ती। जिन वकीलों ने हिन्दी या दूसरी भारतीय भाषा के माध्यम से कानून की पढ़ाई की है, वे कठिनाई महसूस करते हैं। तमाम वाजिब दलीलों के बावजूद कई बार अंग्रेजी न बोल पाने के कारण उनका पक्ष कमजोर रह जाता है। इस स्थिति को न्यायपूर्ण मानने में किसी को भी संकोच होगा। दरअसल, ऊपरी अदालतों में कामकाज की भाषा केवल कुछ न्यायाधीशों और वकीलों के बनाए माहौल का नतीजा नहीं है। संसद खुद कानून अंग्रेजी में तैयार करती है। कानून में आज भी ब्रिटिश जमाने और उससे भी पहले की तकनीकी शब्दावली इस्तेमाल की जाती है। हिदी को राजभाषा का दर्जा तो दे दिया गया, मगर इसे शासन और कानून की भाषा बनाने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए। यों तकनीकी शब्दावली आयोग ने कानून में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का हिदी कोष तैयार किया, मगर वे शब्द इस कदर दुरूह हैं कि आम लोगों के लिए उनका अर्थ समझना मुश्किल है। यही वजह है कि जहाँ अदालती कामकाज में हिन्दी का इस्तेमाल होता है, वहाँ भी दलीलों और फैसलों को सहज रूप से समझ पाना संभव नहीं होता। अदालतों में हिदी के इस्तेमाल का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उसे महज अनुवाद की भाषा बना दिया जाए। आखिर न्याय की भाषा ऐसी क्यों हो कि उसे सामान्य लोग आसानी से समझ न पाएँ। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सर्वोच्च न्यायालय में अनेक न्यायाधीशों को हिन्दी समझने में दिक्कत पेश आ सकती है, क्योंकि जरूरी नहीं कि वे हिन्दीभाषी हों, उनकी पढ़ाई-लिखाई हिन्दी में हुई हो या हिन्दी की तकनीकी शब्दावली से परिचित हों। लेकिन अगर कानून बनने की प्रक्रिया से ही इसका माहौल बने तो सकारात्मक नतीजे निकल सकते हैं। संसद का कानून किस भाषा में तैयार किया जाता है? A अंग्रेजी भाषा मेंB हिन्दी भाषा में C दोनों भाषा मेंD दोनों में से किसी भाषा में नहीं
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अदालत की भाषा के मामले में यह संवैधानिक प्रावधान किया गया कि जब तक वहाँ हिदी के प्रयोग की व्यवस्था नहीं होती तभी तक अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाए। मगर आजादी के इतने सालों बाद भी ऊपरी अदालतें हिदी को सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पाई हैं तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। न्यायपालिका में कामकाज का संबंध केवल वकीलों के बीच होने वाली बहस और न्यायाधीश के फैसले तक सीमित नहीं होता। फरियादी और आरोपी भी न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े होते हैं बल्कि उनके अपने-अपने पक्ष ही मुकदमे का आधार बनते हैं। इसलिए कागजात, बहस और फैसले की भाषा ऐसी हो जिसे वादी-प्रतिवादी भी समझ पाएँ। यह नहीं माना जा सकता कि सभी फरियादी और आरोपी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखते होंगे। इसलिए उचित ही बसपा के एक सांसद ने लोकसभा में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हिन्दी को कामकाज की भाषा बनाने की मांग उठाई। हिदी भाषी प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में बहस और कामकाज कुछ हद तक जरूर हिन्दी में होते हैं, बाकी प्रदेशों में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै खंडपीठ के वकीलों ने तमिल में बहस की इजाजत देने की मांग को लेकर आंदोलन चलाया था। कई दिन के धरने के बाद खंडपीठ के जजों ने इसकी अनौपचारिक मंजूरी दे दी, पर यह भी कहा कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बगैर इसका वैधानिक प्रावधान संभव नहीं है। अदालतों में अंग्रेजी का वर्चस्व भी एक बड़ा कारण है कि हमारे यहाँ मामूली कानूनी मसलों में भी लोग वकीलों पर निर्भर होते गए हैं। अदालतों में अंग्रेजी के दबदबे से केवल वादी-प्रतिवादी को परेशानी नहीं उठानी पड़ती। जिन वकीलों ने हिन्दी या दूसरी भारतीय भाषा के माध्यम से कानून की पढ़ाई की है, वे कठिनाई महसूस करते हैं। तमाम वाजिब दलीलों के बावजूद कई बार अंग्रेजी न बोल पाने के कारण उनका पक्ष कमजोर रह जाता है। इस स्थिति को न्यायपूर्ण मानने में किसी को भी संकोच होगा। दरअसल, ऊपरी अदालतों में कामकाज की भाषा केवल कुछ न्यायाधीशों और वकीलों के बनाए माहौल का नतीजा नहीं है। संसद खुद कानून अंग्रेजी में तैयार करती है। कानून में आज भी ब्रिटिश जमाने और उससे भी पहले की तकनीकी शब्दावली इस्तेमाल की जाती है। हिदी को राजभाषा का दर्जा तो दे दिया गया, मगर इसे शासन और कानून की भाषा बनाने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए। यों तकनीकी शब्दावली आयोग ने कानून में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का हिदी कोष तैयार किया, मगर वे शब्द इस कदर दुरूह हैं कि आम लोगों के लिए उनका अर्थ समझना मुश्किल है। यही वजह है कि जहाँ अदालती कामकाज में हिन्दी का इस्तेमाल होता है, वहाँ भी दलीलों और फैसलों को सहज रूप से समझ पाना संभव नहीं होता। अदालतों में हिदी के इस्तेमाल का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उसे महज अनुवाद की भाषा बना दिया जाए। आखिर न्याय की भाषा ऐसी क्यों हो कि उसे सामान्य लोग आसानी से समझ न पाएँ। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सर्वोच्च न्यायालय में अनेक न्यायाधीशों को हिन्दी समझने में दिक्कत पेश आ सकती है, क्योंकि जरूरी नहीं कि वे हिन्दीभाषी हों, उनकी पढ़ाई-लिखाई हिन्दी में हुई हो या हिन्दी की तकनीकी शब्दावली से परिचित हों। लेकिन अगर कानून बनने की प्रक्रिया से ही इसका माहौल बने तो सकारात्मक नतीजे निकल सकते हैं। अदालतों में हिन्दी में कामकाज का अर्थ है - 1- दलीलों और फैसलों को सहज रूप में समझ पाना 2- अनुवाद की भाषा बनाना 3- हिन्दी तकनीकी शब्दावली से परिचित होना ऊपर दिए गए तथ्यों में से सही कथन कौन-सा/से हैं? A केवल 1B केवल 2 C उपरोक्त सभीD उपरोक्त में से कोई नहीं
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अदालत की भाषा के मामले में यह संवैधानिक प्रावधान किया गया कि जब तक वहाँ हिदी के प्रयोग की व्यवस्था नहीं होती तभी तक अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाए। मगर आजादी के इतने सालों बाद भी ऊपरी अदालतें हिदी को सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पाई हैं तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। न्यायपालिका में कामकाज का संबंध केवल वकीलों के बीच होने वाली बहस और न्यायाधीश के फैसले तक सीमित नहीं होता। फरियादी और आरोपी भी न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े होते हैं बल्कि उनके अपने-अपने पक्ष ही मुकदमे का आधार बनते हैं। इसलिए कागजात, बहस और फैसले की भाषा ऐसी हो जिसे वादी-प्रतिवादी भी समझ पाएँ। यह नहीं माना जा सकता कि सभी फरियादी और आरोपी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखते होंगे। इसलिए उचित ही बसपा के एक सांसद ने लोकसभा में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हिन्दी को कामकाज की भाषा बनाने की मांग उठाई। हिदी भाषी प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में बहस और कामकाज कुछ हद तक जरूर हिन्दी में होते हैं, बाकी प्रदेशों में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै खंडपीठ के वकीलों ने तमिल में बहस की इजाजत देने की मांग को लेकर आंदोलन चलाया था। कई दिन के धरने के बाद खंडपीठ के जजों ने इसकी अनौपचारिक मंजूरी दे दी, पर यह भी कहा कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बगैर इसका वैधानिक प्रावधान संभव नहीं है। अदालतों में अंग्रेजी का वर्चस्व भी एक बड़ा कारण है कि हमारे यहाँ मामूली कानूनी मसलों में भी लोग वकीलों पर निर्भर होते गए हैं। अदालतों में अंग्रेजी के दबदबे से केवल वादी-प्रतिवादी को परेशानी नहीं उठानी पड़ती। जिन वकीलों ने हिन्दी या दूसरी भारतीय भाषा के माध्यम से कानून की पढ़ाई की है, वे कठिनाई महसूस करते हैं। तमाम वाजिब दलीलों के बावजूद कई बार अंग्रेजी न बोल पाने के कारण उनका पक्ष कमजोर रह जाता है। इस स्थिति को न्यायपूर्ण मानने में किसी को भी संकोच होगा। दरअसल, ऊपरी अदालतों में कामकाज की भाषा केवल कुछ न्यायाधीशों और वकीलों के बनाए माहौल का नतीजा नहीं है। संसद खुद कानून अंग्रेजी में तैयार करती है। कानून में आज भी ब्रिटिश जमाने और उससे भी पहले की तकनीकी शब्दावली इस्तेमाल की जाती है। हिदी को राजभाषा का दर्जा तो दे दिया गया, मगर इसे शासन और कानून की भाषा बनाने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए। यों तकनीकी शब्दावली आयोग ने कानून में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का हिदी कोष तैयार किया, मगर वे शब्द इस कदर दुरूह हैं कि आम लोगों के लिए उनका अर्थ समझना मुश्किल है। यही वजह है कि जहाँ अदालती कामकाज में हिन्दी का इस्तेमाल होता है, वहाँ भी दलीलों और फैसलों को सहज रूप से समझ पाना संभव नहीं होता। अदालतों में हिदी के इस्तेमाल का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उसे महज अनुवाद की भाषा बना दिया जाए। आखिर न्याय की भाषा ऐसी क्यों हो कि उसे सामान्य लोग आसानी से समझ न पाएँ। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सर्वोच्च न्यायालय में अनेक न्यायाधीशों को हिन्दी समझने में दिक्कत पेश आ सकती है, क्योंकि जरूरी नहीं कि वे हिन्दीभाषी हों, उनकी पढ़ाई-लिखाई हिन्दी में हुई हो या हिन्दी की तकनीकी शब्दावली से परिचित हों। लेकिन अगर कानून बनने की प्रक्रिया से ही इसका माहौल बने तो सकारात्मक नतीजे निकल सकते हैं। प्रस्तुत लेखांश का सही शीर्षक क्या है? A भाषा और अदालत B हिन्दी राजभाषा व अदालत C न्याय की भाषा व आम आदमी D हिन्दी: शासन व कानून की भाषा
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। भारत में भ्रष्टाचार संभवतः ईश्वर के बाद सर्वाधिक सर्वव्यापी है। यह इतना अमूर्त, मायावी तथा शक्तिशाली दैत्य है, जो अपने रूप, रंग और स्थल बहुत आसानी से बदल देता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से और चाहे कुछ हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन देश का जन-गण-मन अपने अधिनायकों के सामने प्रश्नवाचक मुद्रा में उठ खड़ा हुआ है। यही लोकतंत्र की पहली और शायद आखिरी शर्त है। अब विडंबना यह है कि जनता हमेशा इस तरह खड़ी नहीं होती। उसे इस तरह आलोड़ित होने में दशक और कभी-कभी सदियां भी लग जाती हैं। इस पहल का एक प्राथमिक सूत्र यह है कि जनता हमेशा जागरूक बनी रहे। वह अपने लिए बार-बार किसी अन्ना या इतिहास के आह्नान की प्रतीक्षा न करे। इतिहास को अपनी एक पलक के झपकाने में भी सदियां बीत जाती है। दूसरी बात यह है कि लोकपाल या लोकायुक्त भी ऐसे ही मनुष्य होंगे, जैसे हमारे सांसद, अधिकारी या न्यायाधीश हैं। इस अपशकुन के प्रति हम पहले से ही सजग क्यों न रहें कि लोकायुक्त या लोकपाल नामक मांगलिक-प्रतीकोको भी भ्रष्टाचार की जंग लगने न पाये। फिर भी हम एक कदम आगे बढ़े हैं। दूसरा कदम तब तक नहीं उठाया जा सकता, जब तक पहला न उठाया जाए। इस पहल का स्वागत भी ऐसे ही करें, जैसे हमने पहली बार चांद पर अपने पांवों के निशान पड़ने के बाद किया था। अनेक अवसरों पर यह सूक्ति उच्चारित की जाती है, ‘इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।’ इस बार हिमालय से सचमुच नए युग की तारणहार गंगा निकली है। उसे रास्ता दें, प्रदूषित न करें। उसके तटों पर हर 12 साल बाद नहीं, बल्कि हर दिन कुंभ का आयोजन करें। प्रस्तुत लेखांश देश की किस परिस्थिति को प्रदर्शित करता है? A भ्रष्टाचार व व्यवस्थाB राजनीति व भ्रष्टाचार C गंगा और भ्रष्टाचारD ईश्वर और भ्रष्टाचार
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। भारत में भ्रष्टाचार संभवतः ईश्वर के बाद सर्वाधिक सर्वव्यापी है। यह इतना अमूर्त, मायावी तथा शक्तिशाली दैत्य है, जो अपने रूप, रंग और स्थल बहुत आसानी से बदल देता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से और चाहे कुछ हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन देश का जन-गण-मन अपने अधिनायकों के सामने प्रश्नवाचक मुद्रा में उठ खड़ा हुआ है। यही लोकतंत्र की पहली और शायद आखिरी शर्त है। अब विडंबना यह है कि जनता हमेशा इस तरह खड़ी नहीं होती। उसे इस तरह आलोड़ित होने में दशक और कभी-कभी सदियां भी लग जाती हैं। इस पहल का एक प्राथमिक सूत्र यह है कि जनता हमेशा जागरूक बनी रहे। वह अपने लिए बार-बार किसी अन्ना या इतिहास के आह्नान की प्रतीक्षा न करे। इतिहास को अपनी एक पलक के झपकाने में भी सदियां बीत जाती है। दूसरी बात यह है कि लोकपाल या लोकायुक्त भी ऐसे ही मनुष्य होंगे, जैसे हमारे सांसद, अधिकारी या न्यायाधीश हैं। इस अपशकुन के प्रति हम पहले से ही सजग क्यों न रहें कि लोकायुक्त या लोकपाल नामक मांगलिक-प्रतीकोको भी भ्रष्टाचार की जंग लगने न पाये। फिर भी हम एक कदम आगे बढ़े हैं। दूसरा कदम तब तक नहीं उठाया जा सकता, जब तक पहला न उठाया जाए। इस पहल का स्वागत भी ऐसे ही करें, जैसे हमने पहली बार चांद पर अपने पांवों के निशान पड़ने के बाद किया था। अनेक अवसरों पर यह सूक्ति उच्चारित की जाती है, ‘इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।’ इस बार हिमालय से सचमुच नए युग की तारणहार गंगा निकली है। उसे रास्ता दें, प्रदूषित न करें। उसके तटों पर हर 12 साल बाद नहीं, बल्कि हर दिन कुंभ का आयोजन करें। उपरोक्त लेखांश को दृष्टि में रखते हुए सही शीर्षक का चयन करें- A भारत में भ्रष्टाचारB भ्रष्टाचार बनाम लोकनायक C भ्रष्टाचार बनाम आंदोलनD भ्रष्टाचार बनाम लोकतंत्र
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। भारत में भ्रष्टाचार संभवतः ईश्वर के बाद सर्वाधिक सर्वव्यापी है। यह इतना अमूर्त, मायावी तथा शक्तिशाली दैत्य है, जो अपने रूप, रंग और स्थल बहुत आसानी से बदल देता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से और चाहे कुछ हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन देश का जन-गण-मन अपने अधिनायकों के सामने प्रश्नवाचक मुद्रा में उठ खड़ा हुआ है। यही लोकतंत्र की पहली और शायद आखिरी शर्त है। अब विडंबना यह है कि जनता हमेशा इस तरह खड़ी नहीं होती। उसे इस तरह आलोड़ित होने में दशक और कभी-कभी सदियां भी लग जाती हैं। इस पहल का एक प्राथमिक सूत्र यह है कि जनता हमेशा जागरूक बनी रहे। वह अपने लिए बार-बार किसी अन्ना या इतिहास के आह्नान की प्रतीक्षा न करे। इतिहास को अपनी एक पलक के झपकाने में भी सदियां बीत जाती है। दूसरी बात यह है कि लोकपाल या लोकायुक्त भी ऐसे ही मनुष्य होंगे, जैसे हमारे सांसद, अधिकारी या न्यायाधीश हैं। इस अपशकुन के प्रति हम पहले से ही सजग क्यों न रहें कि लोकायुक्त या लोकपाल नामक मांगलिक-प्रतीकोको भी भ्रष्टाचार की जंग लगने न पाये। फिर भी हम एक कदम आगे बढ़े हैं। दूसरा कदम तब तक नहीं उठाया जा सकता, जब तक पहला न उठाया जाए। इस पहल का स्वागत भी ऐसे ही करें, जैसे हमने पहली बार चांद पर अपने पांवों के निशान पड़ने के बाद किया था। अनेक अवसरों पर यह सूक्ति उच्चारित की जाती है, ‘इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।’ इस बार हिमालय से सचमुच नए युग की तारणहार गंगा निकली है। उसे रास्ता दें, प्रदूषित न करें। उसके तटों पर हर 12 साल बाद नहीं, बल्कि हर दिन कुंभ का आयोजन करें। प्रस्तुत लेखांश की विवरण शैली क्या है? A समीक्षात्मकB उपदेशात्मक C आत्मालोकनD विचारात्मक
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। भारत में भ्रष्टाचार संभवतः ईश्वर के बाद सर्वाधिक सर्वव्यापी है। यह इतना अमूर्त, मायावी तथा शक्तिशाली दैत्य है, जो अपने रूप, रंग और स्थल बहुत आसानी से बदल देता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से और चाहे कुछ हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन देश का जन-गण-मन अपने अधिनायकों के सामने प्रश्नवाचक मुद्रा में उठ खड़ा हुआ है। यही लोकतंत्र की पहली और शायद आखिरी शर्त है। अब विडंबना यह है कि जनता हमेशा इस तरह खड़ी नहीं होती। उसे इस तरह आलोड़ित होने में दशक और कभी-कभी सदियां भी लग जाती हैं। इस पहल का एक प्राथमिक सूत्र यह है कि जनता हमेशा जागरूक बनी रहे। वह अपने लिए बार-बार किसी अन्ना या इतिहास के आह्नान की प्रतीक्षा न करे। इतिहास को अपनी एक पलक के झपकाने में भी सदियां बीत जाती है। दूसरी बात यह है कि लोकपाल या लोकायुक्त भी ऐसे ही मनुष्य होंगे, जैसे हमारे सांसद, अधिकारी या न्यायाधीश हैं। इस अपशकुन के प्रति हम पहले से ही सजग क्यों न रहें कि लोकायुक्त या लोकपाल नामक मांगलिक-प्रतीकोको भी भ्रष्टाचार की जंग लगने न पाये। फिर भी हम एक कदम आगे बढ़े हैं। दूसरा कदम तब तक नहीं उठाया जा सकता, जब तक पहला न उठाया जाए। इस पहल का स्वागत भी ऐसे ही करें, जैसे हमने पहली बार चांद पर अपने पांवों के निशान पड़ने के बाद किया था। अनेक अवसरों पर यह सूक्ति उच्चारित की जाती है, ‘इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।’ इस बार हिमालय से सचमुच नए युग की तारणहार गंगा निकली है। उसे रास्ता दें, प्रदूषित न करें। उसके तटों पर हर 12 साल बाद नहीं, बल्कि हर दिन कुंभ का आयोजन करें। भ्रष्टाचार के संदर्भ में किसे कहा गया है कि वह हमेशा जागरुक रहें? A लोकनायकB जनता C न्यायाधीशD प्रशासनिक अधिकारी इसमें कोई किंतु-परंतु नहीं कि 42 साल तक लीबिया में शासन करने वाले मुअम्मर गद्दाफी तानाशाह थे, क्योंकि वह खुद यह कहते थे कि उनके देश में लोकतंत्र के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। इस पर भी आश्चर्य नहीं कि अंतिम क्षणों में वह रहम की भीख मांगते रहे और फिर भी अपने ही लोगों द्वारा घेर कर मार डाले गए, क्योंकि ज्यादातर तानाशाहों का अंत इसी तरह होता आया है। यह भी सही है कि गद्दाफी की मौत के बाद लीबिया में जश्न का माहौल है, लेकिन दुनिया को इस सवाल का जवाब शायद ही मिल सके कि जिन पश्चिमी देशों ने उनका पराभव सुनिश्चित किया वे चार दशकों तक उनका साथ क्यों देते रहे? गद्दाफी के खात्मे के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने खास तौर पर यह रेखांकित किया है कि अब इस देश में एक नए युग की शुरूआत होगी। अमेरिकी राष्ट्रपति ने गद्दाफी के खात्मे के लिए नाटो की अगुआई में चले अभियान पर गर्व प्रकट किया है, लेकिन दुनिया को यह स्मरण रहे कि मुश्किल से दो साल पहले वह एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में गद्दाफी से हाथ मिला रहे थे। यदि पिछले 42 वर्षों के एक छोटे से कालखंड को छोड़ दिया जाए तो गद्दाफी के निरंकुश शासन वाले लीबिया के अमेरिका और यूरोप से मधुर संबंध बने रहे। अमेरिका और यूरोपीय देश यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वे गद्दाफी के खिलाफ इसलिए लामबंद हो गए, क्योंकि ट्यूनीशिया और मिस्र की तरह लीबिया के लोग भी लोकतंत्र के पक्ष में उठ खड़े हुए थे। यह सही है कि लीबिया के लोगों पर अरब क्रांति का असर हुआ, लेकिन ऐसा नहीं है कि इसके पहले इस देश में लोकतांत्रिक शक्तियों ने गद्दाफी के क्रूर शासन से मुक्ति पाने की चाह न दिखाई हो, लेकिन तब अमेरिका और यूरोप ने किसी भी स्तर पर कोई पहल करने की जरूरत क्यों नहीं समझी। यदि लीबिया में हथियारों के बल पर लोकतंत्र स्थापित करने में फ्रांस, बिटेन और अमेरिका की दिलचस्पी के पीछे यह संदेश व्यक्त किया जा रहा है कि इसका मूल कारण तेल संसाधनों का अपने हिसाब से दोहन और रणनीतिक मोर्चे दुरुस्त करना है तो उसे सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। पश्चिमी देशों और विशेष रूप से अमेरिका के अतीत के आचरण के चलते इस संदेश को और बल मिल रहा है। दुनिया आज तक यह समझने में नाकाम है कि अमेरिका ने इराक पर हमला क्यों बोला और उसे सऊदी अरब के दमनकारी शासन में कोई खामी क्यों नहीं दिखती? अमेरिका ने अपने हितों की पूर्ति में सहायक बनने वाले तानाशाह शासकों की जैसी अनदेखी की है उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। निःसंदेह अभी अनेक देशों में लोकतंत्र की लहर आनी शेष है, लेकिन वहां वास्तव में लोकतंत्र स्थापित हो पाना आसान नहीं। ध्यान रहे कि इराक अभी भी अशांत और अस्थिर है। आज लीबिया का भविष्य और बेहतर नजर आ सकता था, यदि पश्चिमी देशों ने सनकी और क्रूर तानाशाह गद्दाफी का इतने लंबे समय तक साथ नहीं दिया होता।
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। भारत में भ्रष्टाचार संभवतः ईश्वर के बाद सर्वाधिक सर्वव्यापी है। यह इतना अमूर्त, मायावी तथा शक्तिशाली दैत्य है, जो अपने रूप, रंग और स्थल बहुत आसानी से बदल देता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से और चाहे कुछ हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन देश का जन-गण-मन अपने अधिनायकों के सामने प्रश्नवाचक मुद्रा में उठ खड़ा हुआ है। यही लोकतंत्र की पहली और शायद आखिरी शर्त है। अब विडंबना यह है कि जनता हमेशा इस तरह खड़ी नहीं होती। उसे इस तरह आलोड़ित होने में दशक और कभी-कभी सदियां भी लग जाती हैं। इस पहल का एक प्राथमिक सूत्र यह है कि जनता हमेशा जागरूक बनी रहे। वह अपने लिए बार-बार किसी अन्ना या इतिहास के आह्नान की प्रतीक्षा न करे। इतिहास को अपनी एक पलक के झपकाने में भी सदियां बीत जाती है। दूसरी बात यह है कि लोकपाल या लोकायुक्त भी ऐसे ही मनुष्य होंगे, जैसे हमारे सांसद, अधिकारी या न्यायाधीश हैं। इस अपशकुन के प्रति हम पहले से ही सजग क्यों न रहें कि लोकायुक्त या लोकपाल नामक मांगलिक-प्रतीकोको भी भ्रष्टाचार की जंग लगने न पाये। फिर भी हम एक कदम आगे बढ़े हैं। दूसरा कदम तब तक नहीं उठाया जा सकता, जब तक पहला न उठाया जाए। इस पहल का स्वागत भी ऐसे ही करें, जैसे हमने पहली बार चांद पर अपने पांवों के निशान पड़ने के बाद किया था। अनेक अवसरों पर यह सूक्ति उच्चारित की जाती है, ‘इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।’ इस बार हिमालय से सचमुच नए युग की तारणहार गंगा निकली है। उसे रास्ता दें, प्रदूषित न करें। उसके तटों पर हर 12 साल बाद नहीं, बल्कि हर दिन कुंभ का आयोजन करें। प्रस्तुत लेखांश के आधार पर उचित शीर्षक का अवलोकन करें: A मुअम्मर गद्दाफी तानाशाह B तानाशाह का अंत: लीबिया C लीबिया: नया अध्याय प्रारम्भ D लीबिया: अमेरिका व यूरोप
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। भारत में भ्रष्टाचार संभवतः ईश्वर के बाद सर्वाधिक सर्वव्यापी है। यह इतना अमूर्त, मायावी तथा शक्तिशाली दैत्य है, जो अपने रूप, रंग और स्थल बहुत आसानी से बदल देता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से और चाहे कुछ हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन देश का जन-गण-मन अपने अधिनायकों के सामने प्रश्नवाचक मुद्रा में उठ खड़ा हुआ है। यही लोकतंत्र की पहली और शायद आखिरी शर्त है। अब विडंबना यह है कि जनता हमेशा इस तरह खड़ी नहीं होती। उसे इस तरह आलोड़ित होने में दशक और कभी-कभी सदियां भी लग जाती हैं। इस पहल का एक प्राथमिक सूत्र यह है कि जनता हमेशा जागरूक बनी रहे। वह अपने लिए बार-बार किसी अन्ना या इतिहास के आह्नान की प्रतीक्षा न करे। इतिहास को अपनी एक पलक के झपकाने में भी सदियां बीत जाती है। दूसरी बात यह है कि लोकपाल या लोकायुक्त भी ऐसे ही मनुष्य होंगे, जैसे हमारे सांसद, अधिकारी या न्यायाधीश हैं। इस अपशकुन के प्रति हम पहले से ही सजग क्यों न रहें कि लोकायुक्त या लोकपाल नामक मांगलिक-प्रतीकोको भी भ्रष्टाचार की जंग लगने न पाये। फिर भी हम एक कदम आगे बढ़े हैं। दूसरा कदम तब तक नहीं उठाया जा सकता, जब तक पहला न उठाया जाए। इस पहल का स्वागत भी ऐसे ही करें, जैसे हमने पहली बार चांद पर अपने पांवों के निशान पड़ने के बाद किया था। अनेक अवसरों पर यह सूक्ति उच्चारित की जाती है, ‘इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।’ इस बार हिमालय से सचमुच नए युग की तारणहार गंगा निकली है। उसे रास्ता दें, प्रदूषित न करें। उसके तटों पर हर 12 साल बाद नहीं, बल्कि हर दिन कुंभ का आयोजन करें। उपरोक्त गद्यांश का मूल रहस्य क्या है? A लीबिया में तानाशाही B लीबिया में लोकतंत्र की लहर C लोकतंत्र की लहर एवं लीबिया में पश्चिमी देशों की भूमिका D संकटग्रस्त लीबिया और पश्चिमी देशों की भूमिका
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। भारत में भ्रष्टाचार संभवतः ईश्वर के बाद सर्वाधिक सर्वव्यापी है। यह इतना अमूर्त, मायावी तथा शक्तिशाली दैत्य है, जो अपने रूप, रंग और स्थल बहुत आसानी से बदल देता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से और चाहे कुछ हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन देश का जन-गण-मन अपने अधिनायकों के सामने प्रश्नवाचक मुद्रा में उठ खड़ा हुआ है। यही लोकतंत्र की पहली और शायद आखिरी शर्त है। अब विडंबना यह है कि जनता हमेशा इस तरह खड़ी नहीं होती। उसे इस तरह आलोड़ित होने में दशक और कभी-कभी सदियां भी लग जाती हैं। इस पहल का एक प्राथमिक सूत्र यह है कि जनता हमेशा जागरूक बनी रहे। वह अपने लिए बार-बार किसी अन्ना या इतिहास के आह्नान की प्रतीक्षा न करे। इतिहास को अपनी एक पलक के झपकाने में भी सदियां बीत जाती है। दूसरी बात यह है कि लोकपाल या लोकायुक्त भी ऐसे ही मनुष्य होंगे, जैसे हमारे सांसद, अधिकारी या न्यायाधीश हैं। इस अपशकुन के प्रति हम पहले से ही सजग क्यों न रहें कि लोकायुक्त या लोकपाल नामक मांगलिक-प्रतीकोको भी भ्रष्टाचार की जंग लगने न पाये। फिर भी हम एक कदम आगे बढ़े हैं। दूसरा कदम तब तक नहीं उठाया जा सकता, जब तक पहला न उठाया जाए। इस पहल का स्वागत भी ऐसे ही करें, जैसे हमने पहली बार चांद पर अपने पांवों के निशान पड़ने के बाद किया था। अनेक अवसरों पर यह सूक्ति उच्चारित की जाती है, ‘इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।’ इस बार हिमालय से सचमुच नए युग की तारणहार गंगा निकली है। उसे रास्ता दें, प्रदूषित न करें। उसके तटों पर हर 12 साल बाद नहीं, बल्कि हर दिन कुंभ का आयोजन करें। निम्नलिखित कथनों को ध्यानपूर्वक अध्ययन कर लेखांश के मद्देनजर सही उत्तरों का चयन करें। 1- हथियारों के बल पर लोकतंत्र लाया जा सकता है 2- तेल संसाधनों की तरफ यूरोपीय देशों का ध्यान है 3- गद्दाफी के विरुद्ध लामबंद होने का प्रभाव मिस्त्र व यमन विद्रोह से आया 4- लीबिया में लोकतंत्र कायम हो गया है। A केवल 1और 4 सही हैं B 1, 3, 4 सही हैं C उपरोक्त सभी सही हैं D उपरोक्त में कोई सही नहीं है
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निम्नलिखित दो परिच्छेदों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। भारत में भ्रष्टाचार संभवतः ईश्वर के बाद सर्वाधिक सर्वव्यापी है। यह इतना अमूर्त, मायावी तथा शक्तिशाली दैत्य है, जो अपने रूप, रंग और स्थल बहुत आसानी से बदल देता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से और चाहे कुछ हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन देश का जन-गण-मन अपने अधिनायकों के सामने प्रश्नवाचक मुद्रा में उठ खड़ा हुआ है। यही लोकतंत्र की पहली और शायद आखिरी शर्त है। अब विडंबना यह है कि जनता हमेशा इस तरह खड़ी नहीं होती। उसे इस तरह आलोड़ित होने में दशक और कभी-कभी सदियां भी लग जाती हैं। इस पहल का एक प्राथमिक सूत्र यह है कि जनता हमेशा जागरूक बनी रहे। वह अपने लिए बार-बार किसी अन्ना या इतिहास के आह्नान की प्रतीक्षा न करे। इतिहास को अपनी एक पलक के झपकाने में भी सदियां बीत जाती है। दूसरी बात यह है कि लोकपाल या लोकायुक्त भी ऐसे ही मनुष्य होंगे, जैसे हमारे सांसद, अधिकारी या न्यायाधीश हैं। इस अपशकुन के प्रति हम पहले से ही सजग क्यों न रहें कि लोकायुक्त या लोकपाल नामक मांगलिक-प्रतीकोको भी भ्रष्टाचार की जंग लगने न पाये। फिर भी हम एक कदम आगे बढ़े हैं। दूसरा कदम तब तक नहीं उठाया जा सकता, जब तक पहला न उठाया जाए। इस पहल का स्वागत भी ऐसे ही करें, जैसे हमने पहली बार चांद पर अपने पांवों के निशान पड़ने के बाद किया था। अनेक अवसरों पर यह सूक्ति उच्चारित की जाती है, ‘इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।’ इस बार हिमालय से सचमुच नए युग की तारणहार गंगा निकली है। उसे रास्ता दें, प्रदूषित न करें। उसके तटों पर हर 12 साल बाद नहीं, बल्कि हर दिन कुंभ का आयोजन करें। लीबिया में गद्दाफी का अंत किसके नेतृत्व में सफल सैन्य कार्रवाई के तहत हुआ? A फ्रांस B नाटो C पेंटागन D अमेरिका
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The following questions are based on four passages in English to test the comprehension of English language. Read each passage and answer the questions.   Apart from the case in which culture and direct utility can be combined, there is indirect utility of various kinds in the possession of knowledge which does not contribute to technical efficiency.  I think some of the worst features of the modern world could be improved by a greater ecouragement of such knowledge and less ruthless pursuit of more professional competence. When conscious activity is wholly conscious activity is wholly concentrated on one definite purpose the ultimate result, for most people is lack of balance accompanied by some form of nervous disorder. The men who directed German policy during the war made mistakes, for example, as regards the submarine campaign which brought America on the side of the Allies, which any person coming fresh to the subject could have seen to be unwise, but which they could not judge sanely owing to mental concentration and lack of holidays. The same sort of thing may be seen wherever bodies of men attempt tasks which put a prolonged strain upon spontaneous. Men as well as children have need of play, that is to say, of periods of activity having no purpose, present enjoyment. But if play is to serve its purpose, it must be possible to find pleasure and interest in matters not connected with work. Better economic organization allowing mankind to benefit by the productivity of machines, should lead to a very great increase of leisure, and much leisure is apt be tedious except to those who have considerable intelligent activities and interests. If a leisured population is to be happy it must be an educated population, and must be educated with a view to mental enjoyment as well as to the direct usefulness of technical knowledge. What is the significance of the phrase “ruthless pursuit” when used, with regard to professional competence. A pursuit of knowledge that makes us ruthless B dogmatic pursuit of knowledge C foolish pursuitD Useless pursuit
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The following questions are based on four passages in English to test the comprehension of English language. Read each passage and answer the questions.   Apart from the case in which culture and direct utility can be combined, there is indirect utility of various kinds in the possession of knowledge which does not contribute to technical efficiency.  I think some of the worst features of the modern world could be improved by a greater ecouragement of such knowledge and less ruthless pursuit of more professional competence. When conscious activity is wholly conscious activity is wholly concentrated on one definite purpose the ultimate result, for most people is lack of balance accompanied by some form of nervous disorder. The men who directed German policy during the war made mistakes, for example, as regards the submarine campaign which brought America on the side of the Allies, which any person coming fresh to the subject could have seen to be unwise, but which they could not judge sanely owing to mental concentration and lack of holidays. The same sort of thing may be seen wherever bodies of men attempt tasks which put a prolonged strain upon spontaneous. Men as well as children have need of play, that is to say, of periods of activity having no purpose, present enjoyment. But if play is to serve its purpose, it must be possible to find pleasure and interest in matters not connected with work. Better economic organization allowing mankind to benefit by the productivity of machines, should lead to a very great increase of leisure, and much leisure is apt be tedious except to those who have considerable intelligent activities and interests. If a leisured population is to be happy it must be an educated population, and must be educated with a view to mental enjoyment as well as to the direct usefulness of technical knowledge. The author does not say: A Children need play B Increased leisure is the result of better economic organisation C Leisured people can be happy if educated D Technical knowledge can improve the world
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Foot racing is a popular activity in the United States. It is seen not only as a competitive sport but also as a way to exercise, to enjoy the cameraderie of like-minded people, and to donate money to a good cause. Though serious runners may spend months training to compete, other runners and walkers might not train at all. Those not competing with might run in an effort to beat their own time or simply to enjoy the fun and exercise. People of all ages, from those of less than one year (who may be pushed in strollers) to those in their eighties, enter into this sport. The races are held on city streets, on college campuses, through parks, and in suburban areas, and they are commonly 5 to 10 kilometres in length. The largest foot race in the world is the 12- kilometre Bay to Breakers race that is held in San Francisco every spring. This race begins on the east side of the city near San Francisco Bay and ends on the west side at the Pacific Ocean. There may be 80,000 or more people running in this race through the streets and hills of San Francisco. In the front are the serious runners who compete to win and who might finish in as little as 34 minutes. Behind them are the thousands who take several hours to finish. In the back of the race are those who dress in costumes and come just for fun. One year there was a group of men who dressed like Elvis Presley; and another group consisted of firefighters who were tied together in a long line and were carrying a firehose. There was even a bridal party in which the bride was dressed in a long white gown and the groom wore a tuxedo. The bride and the groom threw flowers to bystanders, and they were actually married at some point along the route. Which of the following is not implied by the author? A Foot races appeal to a variety of people B Running is a good way to strengthen the heart C Workers can compete for prizes D Age and profession is no bar to enter foot races
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Foot racing is a popular activity in the United States. It is seen not only as a competitive sport but also as a way to exercise, to enjoy the cameraderie of like-minded people, and to donate money to a good cause. Though serious runners may spend months training to compete, other runners and walkers might not train at all. Those not competing with might run in an effort to beat their own time or simply to enjoy the fun and exercise. People of all ages, from those of less than one year (who may be pushed in strollers) to those in their eighties, enter into this sport. The races are held on city streets, on college campuses, through parks, and in suburban areas, and they are commonly 5 to 10 kilometres in length. The largest foot race in the world is the 12- kilometre Bay to Breakers race that is held in San Francisco every spring. This race begins on the east side of the city near San Francisco Bay and ends on the west side at the Pacific Ocean. There may be 80,000 or more people running in this race through the streets and hills of San Francisco. In the front are the serious runners who compete to win and who might finish in as little as 34 minutes. Behind them are the thousands who take several hours to finish. In the back of the race are those who dress in costumes and come just for fun. One year there was a group of men who dressed like Elvis Presley; and another group consisted of firefighters who were tied together in a long line and were carrying a firehose. There was even a bridal party in which the bride was dressed in a long white gown and the groom wore a tuxedo. The bride and the groom threw flowers to bystanders, and they were actually married at some point along the route. As used in the passage, the word “strollers” refers to: A CarriagesB Wheelchairs C WagonsD Cribs
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Foot racing is a popular activity in the United States. It is seen not only as a competitive sport but also as a way to exercise, to enjoy the cameraderie of like-minded people, and to donate money to a good cause. Though serious runners may spend months training to compete, other runners and walkers might not train at all. Those not competing with might run in an effort to beat their own time or simply to enjoy the fun and exercise. People of all ages, from those of less than one year (who may be pushed in strollers) to those in their eighties, enter into this sport. The races are held on city streets, on college campuses, through parks, and in suburban areas, and they are commonly 5 to 10 kilometres in length. The largest foot race in the world is the 12- kilometre Bay to Breakers race that is held in San Francisco every spring. This race begins on the east side of the city near San Francisco Bay and ends on the west side at the Pacific Ocean. There may be 80,000 or more people running in this race through the streets and hills of San Francisco. In the front are the serious runners who compete to win and who might finish in as little as 34 minutes. Behind them are the thousands who take several hours to finish. In the back of the race are those who dress in costumes and come just for fun. One year there was a group of men who dressed like Elvis Presley; and another group consisted of firefighters who were tied together in a long line and were carrying a firehose. There was even a bridal party in which the bride was dressed in a long white gown and the groom wore a tuxedo. The bride and the groom threw flowers to bystanders, and they were actually married at some point along the route. Which of the following is not the reason why people enter foot races? A To exerciseB To enjoy C As a compulsionD For charity
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आप एक जिले के एडीएम (प्रशासन) हैं। आपको एक स्थानीय प्रतिष्ठित स्कूल में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता है। मौका है स्कूल के स्थापना दिवस का। आप स्कूल के समारोह में सपत्नीक पहुंचते हैं। वहां पर विद्यालय की प्रगति-आख्या एवं पुरस्कार वितरण के बाद एक संगीतमय नाटिका का आयोजन होता है जिसमें अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को प्रखर करने के लिए नाटक के एक अंश की प्रस्तुति में एडीएम (प्रशासन) को ही 1 लाख रुपये की घूस लेते हुए दिखाया जाता है। इससे समारोह में उपस्थित पूरे प्रशासनिक अमले की किरकिरी होती है। ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे? A समारोह को बीच में ही छोड़कर स्कूल मैनेजर तथा प्रिंसिपल को खरी-खोटी सुनाते हुए बहिर्गमन करेंगे। B प्रिंसिपल से उस नाटक के प्रस्तुतकर्ता अध्यापक को स्कूल से बर्खास्त करने को कहेंगे। C ऐसे अमर्यादित स्कूल में फिर कभी न आने का संकल्प लेंगे। D पूरे समारोह को धैर्यपूर्वक देखने के बाद, अपने सम्बोधन में नाटक के थीम की प्रस्तुति की सराहना करते हुए व्यक्तिगत कटाक्ष न करने की हिदायत देंगे तथा शिक्षक द्वारा प्रस्तुत क्षमा-प्रार्थना को बड़प्पन से स्वीकार करेंगे।
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आपको प्रशासन में प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों को राहत प्रदान करने तथा उन्हें सुरक्षित रखने की न केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंपी गई है बल्कि समाज कल्याण विभाग की नकेल कसने की शक्ति भी दी गई है। भीषण ठंड से त्रस्त गरीबों तथा आम जनों को राहत देने के लिए अलाव जलवाने, कंबल बांटने, रैन-बसेरे बनवाने तथा खाद्य-पदार्थ वितरण का दायित्व समाज कल्याण विभाग पर है, परन्तु प्रायः पाया जाता है कि ऐसी समाज कल्याण की क्रियाओं में लोग अपनी जेबें भरना शुरू कर देते हैं। ऐसे में आरोप आप तक पहुंचते हैं तो आप क्या करेंगे? A स्वयं, अपने अधीनस्थ अधिकारियों के साथ औचक जांच करके किसी भी प्रकार की अनियमितता को दूर करने के लिए समुचित कार्यवाही करेंगे। B शिकायतों के कारण सारे काम रोक देने का निर्देश देंगे और सभी आवंटनों को वापस करा देंगे। C उच्च और निष्पक्ष अधिकारी से मामले की जांच का निर्देश देंगे और तदनुसार कार्यवाही करेंगे। D समाज कल्याण विभाग से सारा कार्य लेकर, उन्हें समाजसेवी संगठनों को प्रदान कर निशि्ंचत हो जाएंगे।
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गंदे पानी के निकास के लिए बने नालों को घर का कचरा डम्पिंग क्षेत्र बना देना आज प्रायः उत्तर प्रदेश के हर शहर का सबब है। आज कानपुर महानगर में ऐसी समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है जहां नाले पट रहे हैं या फिर पूरी तरह से कंक्रीट के कब्जे में है जिससे सफाई व्यवस्था प्रभावित हो रही है। ऐसी स्थिति में नगर प्रशासक के रूप में आप नालों की सफाई तथा रख-रखाव के लिए क्या करेंगे जबकि मानसून का समय निकट आ गया है? A नगर निगम के अभियंता से इस प्रकार के अतिक्रमण की निशानदेही करके रिपोर्ट बनाने के बाद शीघ्र प्रस्तुत करने के लिए कहेंगे, फिर पुलिस बल की मदद से अतिक्रमण तोड़क दस्ते की सहायता से अतिक्रमण खाली कराकर सफाई अभियान चालू किया जाएगा। B एक ऐसी आख्या बनायी जाएगी जिसके द्वारा संबंधित शहरियों को नोटिस देकर निर्माण स्वयं ध्वस्त करने को कहा जाएगा। C ऐसे सभी शहरियों के ऊपर दो गुना गृहकर लगाने का प्रस्ताव सामान्य सभा में लाया जाएगा तथा लागू किया जाएगा। D प्रदेश के शहरी विकास मंत्रलय को इस प्रकार की स्थिति से अवगत कराकर उनके मार्गदर्शन और निर्देश की प्रतीक्षा करेंगे।
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आप पुलिस अधीक्षक (यातायात) पद पर बरेली में कार्यरत हैं। आपको सूचना मिलती है कि लखनऊ, टनकपुर हाइवे पर रात में ड्यूटी पर रहने वाली पुलिस ट्रक वालों, ट्रैक्टर वालों तथा कार्गो वैन वालों से वसूली करती है, यही नहीं जब उनसे कोई भी ट्रक वाला मुंहमांगी रकम न देकर वाद-विवाद करता है हवाला दिया जाता है कि पैसा सब ऊपर जाता है। ऐसी स्थिति में जबकि दो-तीन घटनाओं में ड्राइवरों की पुलिस द्वारा पिटाई की खबरें आई हैं और अखबारों में पुलिस की बदनामी हुई है तो आप सच्चाई सामने लाने और दोषी पुलिस वालों को गिरफ्रत में लाने के लिए क्या करेंगे? A अपने तेज तर्रार इंस्पेक्टर को इसकी जांच में लगाऊंगा तथा जांच के बाद दोषियों को सजा दूंगा। B औचक निरीक्षण के लिए ‘चीता’ पेट्रोल की पुलिस लगा देंगे। C यह सब होता रहता है तथा इन सबको रात-रात भर जागने का कुछ पुरस्कार तो मिलना चाहिए, सोचकर ऐसी शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया जाएगा। D आप वस्तुस्थिति का स्वयं निरीक्षण कर दोषी पुलिस कर्मियों को दंडित करने की कार्यवाही करेंगे।
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आप जिला निर्वाचन अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं और चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद आदर्श आचार संहिता लागू है, जिसके साथ ही क्षेत्र में धारा 144 भी लागू है। परंतु नामांकन के लिए आने वाले प्रत्याशी अपने साथ बल प्रदर्शन के लिए25-50 गाड़ियों में समर्थकों के साथ असलहे लिए हुए आते हैं। ऐसी स्थिति में आप नामांकन को नियमित और शांतिपूर्ण बनाने के लिए क्या करेंगे? A नामांकन स्थल से 100 मीटर दूरी तक बैरीकैडिंग लगवा कर सभी गाड़ियों का रास्ता रोक देंगे। B वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से नियमों को सख्ती से लागू करने के लिए निर्देश दिए जाने का आग्रह करेंगे। C नामांकन स्थल पर आचार संहिता के नियमों की नोटिस लिखित रूप में लगवाएंगे जिसमें उल्लघंन करने वालों के विरूद्ध कार्यवाही की चेतावनी रहेगी। D नामांकन के समय आयोग की तरफ से सभी प्रत्याशियों को समाचार पत्रें/घोषणाओं के द्वारा नियमों की जानकारी देने के साथ-साथ उनके जुलूसों की वीडियोग्राफी की जाएगी तथा जिस प्रत्याशी के जुलूस में उल्लंघन पाया जाएगा उसका नामांकन निरस्त कर दिया जाएगा।
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आप सोनभद्र जिले के जिला वन संरक्षण अधिकारी हैं। आपको अति विश्वस्त सूत्रें से सूचना मिलती है कि कतिपय वन्य जीवों, जिनको कानूनी संरक्षण प्राप्त है, की खालें तस्करी की जा रही हैं। ऐसी स्थिति में वन्य जीवों की सुरक्षा हेतु आप क्या प्रयास करेंगे जिससे उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके? A वन्य जीवों की सुरक्षा हेतु वन रक्षकों को चुस्त मुस्तैद रहने के लिए उनको आवश्यक सुविधाओं से सुसज्जित करके ऐसी जगहों पर नियुक्त किया जाएगा जिससे ऐसे अपराधी तत्वों पर शिंकजा कसा जा सके। B जिला वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से वन्य जीवों के हत्यारों को पकड़ने में मदद का अनुरोध करेंगे। C ग्राम्य क्षेत्रें में संपर्क करके वहां के निवासियों को वन्य जीवों तथा वन्य क्षेत्रें के संरक्षण का महत्त्व समझाएंगे और उनसे वन्य जीवों के हत्यारों को पकड़वाने के लिए कहेंगे। D शहरी तथा ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रें के स्कूलों में बच्चों को वन्य जीवन के महत्त्व को बताते हुए विविध क्रियाकलापों के द्वारा वन्य जीव हत्यारों के विरुद्ध एक वातावरण बनाने के प्रयास करेंगे इस प्रकार तस्करों तथा हत्यारों के खिलाफ एक प्रकार का सूचना तंत्र विकसित करेंगे।
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आपको किसी निर्वाचन क्षेत्र का पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया है। आपको सूचना मिलती है कि किसी राजनीतिक पार्टी का प्रत्याशी मतदाताओं को प्रभावित करने के लिये उन्हें पैसे बांट रहा है। ऐसे में आप क्या करेंगे? A संबंधित प्रत्याशी के पास जाएंगे तथा उसे समझाएंगे कि ऐसा करना चुनाव आचार संहिता के विरुद्ध है। B सूचना से अनभिज्ञता दर्शाते हुए अपने अन्य कार्यों में लगे रहेंगे। C संबंधित प्रत्याशी को चेतावानी जारी करेंगे कि यदि उसने दोबारा ऐसी कोशिश की तो उसके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी। D मामले की जांच कर सूचना सत्य पाए जाने पर संबंधित प्रत्याशी के खिलाफ संबंधित थाने में प्राथमिकी दर्ज कराएंगे।